25 फ़रवरी, 2019

रहस्यमय प्याला - -

शेष पहर जब झर जाएँ निशिपुष्प और
चाँद हो चले मद्धिम तुम पाओगे
उसे दिगंत में कहीं, तुम्हारे
हिस्से का उजाला है
है अपनी जगह
मौजूद।
जीवन स्रोत अविरल बहता जाए, न
आदि, न कोई अंत, निःश्वास के
डोरों से नित नए स्वप्न सजाए,
नियति ही जाने क्या है
उसमें, अंत या
उत्स,लेकिन
ये सच है
तुम्हारे हिस्से का प्याला है अपनी
जगह मौजूद।
* *
- शांतनु सान्याल 

22 फ़रवरी, 2019

मुहाने की ओर - -

कुछ भी रिक्त रहता नहीं वक़्त भर
जाता है हर एक ख़ालीपन,
पतझड़ के पीछे दबे
पांव चलता है
मधुमास,
सुदूर
महुवा वन के बीच, झांकता है - - -
रक्तिम पलाश। संकरी
नदी अपना अस्तित्व
बचाए सागर -
संगम
की आस लगाए, अनवरत महातट
की ओर बहती जाए। क्या
पाया, क्या खोया, अर्थ -
हीन हैं सारे गणित,
बंद मुट्ठी में
मेरे अब
 कुछ
भी नहीं, मायावी जुगनू उड़ गए कब
मुझे उसकी ख़बर नहीं, अब
जीवन लगे बहुत सहज।
* *
- शांतनु सान्याल

21 फ़रवरी, 2019

गहराइयों के ख़ातिर - -

लहरों की नियति में था आख़िर बिखर जाना,
कुछ दूर दिगंत से आए कुछ उठे ख़ामोश
मेरे अधर किनारे, कुछ छलके, कुछ
थम कर रह गए, मेरी आँखों के
अरमान सारे। कभी हम
रहे तुम से बेख़बर,
और कभी
तुम ने
ख़ुद को खुलने न दिया, कुछ अनकही - -
बातों को तुमने चाह कर भी कभी
सुलगने न दिया। कोई शीशी
बंद इत्र के मानिंद था
तुम्हारा प्रणय -
निवेदन,
ह्रदय संदूक में रहा एकाकी, न जाने क्यों
तुमने उसे उन्मुक्त बिखरने न दिया।
शायद गहराई न हो जाए कम,
इसी डर से जीवन तट को
तुमने असमय यूँ ही
सिमटने न
दिया।

* *
- शांतनु सान्याल


 

09 फ़रवरी, 2019

ये शहर कभी आबाद था - -

वो सभी लोग अचानक मूक
ओ बधिर बन गए, भरी
सभा में जब मैंने,
राज़ ए गिरह
खोल दी,
रहनुमाई करने वाले तब पा
ए ज़ंजीर बन गए झूठे
वादों पे हमने हर
पल यूँ जां
निसार
किया,हर बात उनकी आख़िर
ज़हर बुझे तीर बन गए। बंद
आँखों का ईमान हमें
कहीं का न छोड़ा,
अपनों के बीच
देखिये
गुमशुदा तस्वीर बन गए। इश्तहारों
के भीड़ में सच्चा ताबीज़
बेमानी है,खोटे सिक्के
ही शहर में बुलंद
तक़दीर बन
गए।

* *
- शांतनु सान्याल

27 जनवरी, 2019

रौशनी के उस पार - -

रौशनी में डूबा हुआ सारा शहर -
लगता है बेहद ख़ूबसूरत,
उड़ान पुल हो, या
आकाश पथ
से झाँकते
मग़रूर निगाहें, काश देख पाते,
अंधकार में विलीन कुछ
जीवन की राहें। डरा -
डरा सा संकरी
गलियों से
गुज़रता वो कोई ख़्वाब नहीं, मेरा
हमसाया,जो चीखता है ख़ामोश,
फैलाए अपनी बाँहें। वो सभी
मायावी मोड़ अक्सर
निकलते हैं इसी
राजपथ से,
अय्यारों
से बचना है बहोत मुश्किल, आप
चाहें या न चाहें। हर एक मुखौटे
के पीछे, न जाने कितने,
चेहरे हैं छुपे हुए,
गोल तख़्ती
पे घूमता हुआ मेरा वजूद, खंजर
उनके हाथ, वही हाक़िम, वही
सरबराह क़ौम, जी चाहे
जो भी कर
जाएं। 

* *
- शांतनु सान्याल 






 

26 जनवरी, 2019

राज़ ए तलाश - -

आईना भी वही, अक्स भी वही,
फिर हैरानगी कैसी, वो कोई
गुमशुदा ख़्वाब है, या
ढलती धूप की
तपन,
अहाता भी वही, घर भी वही, -
फिर आवारगी कैसी।
ताउम्र का
अहदनामा शायद अब तुम्हारे
पास नहीं, रास्ता वही,
ठिकाना भी वही,
फिर
नाराज़गी कैसी। अक्सर मैं, -
ख़ुद से सवाल करता हूँ
लाजवाब हो कर,
जो वजूद
में नहीं,
उसके लिए फिर दीवानगी कैसी।

* *
- शांतनु सान्याल
 

23 जनवरी, 2019

प्रथम स्पर्श - -


वो कच्ची उम्र की छुअन या निस्तब्ध पलों
में पीपल पात का हिलना, एक मख़मली
एहसास के साथ तुम्हारा वो बेबाक
हो के मिलना । काश लौट आएं
फिर वही सुबह शाम, मुन्तज़िर
निगाहों से हर पल मीठी
आग में सुलगना ।
वो कशिश
जो जीने की चाहत बढ़ा जाए, वो अंदाज़ ए
निगाह, जो ख़ुश्बू ए जज़्बात बढ़ा जाए,
दबे क़दमों से जैसे मौसम ए बहार,
उजड़ा शहर दोबारा, फूलों से
यूँ सजा जाए।
* *
- - शांतनु सान्याल
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17 जनवरी, 2019

सुबह से पहले - -

हर एक अट्टहास के बाद, कुछ देर ज़रूर
ख़ामोशी करती है राज, और इसी
दौरान पैदा होते हैं अकल्पित
इन्क़लाब। धर्म - अधर्म
की दुहाई देने वाले
अचानक जब
साध जाएं
भीष्म -
नीरवता, समझ लीजिये भविष्य का - 
अप्रत्याशित जवाब। दहशत में था
अचानक सारा शाही परिवार,
देख सामने एक जुट
जंगली भैसों का
भावी संहार,
सुप्त -
प्रलय की अपनी ही है, एक असामान्य
प्रवृत्ति, कब, और कैसे, कर जाए
विध्वस्त, पृथ्वी और आकाश
हो जाएं पल में आख़री
पहर के टूटे
ख़्वाब।

* *
- शांतनु सान्याल

02 जनवरी, 2019

इस पल के बाद - -

उस अनंत अनुबंध के तहत हैं सभी अंगभूत,
न कोई कम, न कोई अधिक, बीज और
धरा के मध्य हैं सिमटे सभी जीवन,
वो आजतक निकल न पाए
गर्भगृह के तम से बाहर, 
न जाने किस देवता
के हैं वो दम्भी
अग्रदूत।
उस अनंत अनुबंध के तहत हैं सभी अंगभूत।
प्रकृति और पुरुष के मुहाने पर लहराए
महासिंधु अपार, कदाचित उस
दिव्य दिगंत में उभरे जग
के खेवनहार, न तुम,
तुम हो, न मैं,
मैं हूँ,
जो कुछ भी है बस इसी पल में सिमित, इस
पल के बाद है जगत मिथ्या हे मम् अवधूत।
उस अनंत अनुबंध के तहत हैं
सभी अंगभूत।
* *
- शांतनु सान्याल 

29 दिसंबर, 2018

अंतर - गहन - -

पुरोहित की है अपनी बेबसी, शाम गहराते ही
बंद हो गए मंदिर के दरवाज़े, ख़ामोश
हैं सभी, पृथ्वी हो या आकाश,
सिर्फ़ अंतर गहन सारी
रात है जागे।
मरूस्वप्न सा है ये जीवन, या कल्पतरु से - -
लटके हुए असंख्य अभिलाष, कोहरे में
लिपटी हुई मेरी चाहत, निकलना
चाहे सुबह से कहीं आगे।
नवीन - पुरातन का
द्वंद्व
सनातन, जन्म - मृत्यु का अदृश्य पुनरावर्तन,
मोह - बंधन चाहे जितना तोड़ें, उतना
ही प्रियवर अपना लागे।  ख़ामोश
हैं सभी, पृथ्वी हो या आकाश,
सिर्फ़ अंतर - गहन सारी
रात है जागे।

* *
- शांतनु सान्याल

19 दिसंबर, 2018

तितलियों के हमराह - -

सफ़र ज़िन्दगी का नहीं - -
रुकता किसी के
लिए,
टिमटिमाते से दूर रह
जाते हैं छूटे हुए
स्टेशन,
एल्बम के पन्नों में कहीं,
दबी छुपी सी है वो
हंसी,
तितलियों के हमराह खो
जाते हैं सभी बचपन।
बंद दरवाज़े
के पार
मुंतज़िर नहीं अब कोई
दस्तक, तन्हाइयों
के झुरमुट में,
मैं हूँ
और मेरी धड़कन। वादियों
के सीने से, फिर उठ
चले हैं धुंध के
बादल,
न जाने आग है या बारिश,
ख़ामोश है क्यूँ दरपन।
तमाम रात
तलाशता
रहा
मजलिस ए आसमान, फिर
भी ढूंढ़ न पाए कोई
मेरा गुमशुदा
लड़कपन।

* *
- शांतनु सान्याल


10 दिसंबर, 2018

कटु सत्य है लेकिन - -

रात गहराते ही निशि पुष्पों ने
वृन्त छोड़ दिया, हवाओं
की मनःस्थिति
समझना
आसान नहीं, गंध चुरा के फूलों
का सुबह से नाता जोड़ दिया।
कोई नहीं रुकता किसी
के लिए ये कटु
सत्य है,
उगते ही सूरज के अंधेरों से - -
रिश्ता तोड़ दिया। जीवन -
मरण का आलेख,
अनवरत धुंध
भरा,
इसीलिए जीवन वक्र को सीधे
राह मोड़ दिया। अब चाहे
कोई, जो भी समझे
कुछ अंतर नहीं,
जो मन
को करे अशांत ऐसी चाहत छोड़ -
दिया।

* *
- शांतनु सान्याल 
 

28 नवंबर, 2018

सजल अभिलाष - -

उस निशीथ मौन के अंदर, बिखराव समेटे
मेरा मन, कच्ची मटकी तपने से पूर्व
जैसे देखे लाख सपन।  किसे ख़बर
कौन क्षितिज से उभरे बिहान
सतरंगी, ओस में डूबे हुए
हर पल मेरे चंचल
दिगंत - विहंगी।
कहीं कोई
फिर फूल खिले और सुरभित हो अंतरतम,
बुझे सभी आग्नेय अरण्य, मिले हर
एक साँस को जीने का वरदान 
कम से कम।

* *
- शांतनु सान्याल

  

21 नवंबर, 2018

प्रवासी मन - -

सूखते कांटेदार बेलों के बीच अभी तक हैं
बाक़ी कुछ गुलाबी मुस्कान, कोई
आए या न आए, हर चीज़ हो
जैसे यथावत, खिलता
हुआ अपने स्थान।
उम्मीद के
फूल
शायद कभी मुरझाते नहीं,चाहे पतझर हो
या मधुऋतु, क्या धूप और क्या छाँव,
गेरुआ मन हर पल एक समान।
जलविहीन फल्गु तट हो या
ज्वलंत मणिकर्णिका -
घाट, उन्मुक्त -
पाखी, सदा
प्रवासी,
प्राणों में बाँधे अंतहीन उड़ान। - - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल  

12 नवंबर, 2018

नज़्म जो निगाहों से छलके - -

मुस्कराहटों से जीवन के सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं जाते, फिर भी ये सत्य है,
कि हर एक शख़्स कहीं न कहीं
अपने आप में गहराइयों
तक है उथला, कुछ
रिसते घाव
दिखाए
नहीं जाते। मेरी ख़ामोशी को उसने इक
नया आयाम ही दे दिया, बियाबां के
सीने में जैसे सुलगता कोई सावन,
तमाम ही दे दिया, ये ज़िन्दगी
की हैं ज़मीं, किसी अंतहीन
बंजर से कम नहीं, जज़्बा
ए दरख़्त इक बार
जो सूखे, दोबारा
किसी
हाल पे उगाये नहीं जाते। सुबह ओ शाम
के दरमियां कोई अनदेखा पुल ही था
शायद, जो सांसों को टूटने न दिया,
इस पार कौन था और उस पार
कौन, ये सोचना है बेमानी,
चाँद रात की ख़्वाहिश
 ने, शायद हमें
उनसे छूटने
न दिया,
इक अजीब सा कोहराम था रात भर मजलिस
ए आसमां पर, जो नज़्म मेरी निगाहों से
छलके वो फिर दोहराए नहीं जाते,
मुस्कराहटों से जीवन के
सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं
जाते। 
* *
- शांतनु सान्याल  

01 नवंबर, 2018

ग़र कभी गुज़रो - -

अब पूछते हैं वो मेरा गुमशुदा
ठिकाना, जब याद नहीं
मुझको तारीख़ ए
रवाना।
वहीँ मोड़ पे कहीं हम सब कुछ
छोड़ आए, कोई याद हो
बाक़ी तो यूँ ही भूल
जाना।
उम्र की बदहाल सड़क ही तो - -
है ज़िन्दगी, कभी अपनों
ने लूटा, कभी बेदर्द
ज़माना।
सभी सब्ज़ दरख़्त सूख गए
अपने आप, दरअसल
बारिश तो था सिर्फ़
इक बहाना।
इस ज़मीं के सीने में सोतों - -
की कमी नहीं, मुश्किल
है लेकिन झरनों
को ढूंढ लाना।
हर कोई जैसे है अपने ही - - -
दायरे में गुम, आशना
चेहरा भी लगे यहाँ
अनजाना।

* *
- शांतनु सान्याल

30 अक्टूबर, 2018

बाक़ी अब कुछ भी नहीं - -

जो कुछ भी था उसमे में बाक़ी,
 ढलती रात ने ले लिया,
कुछ बूँद छुपाए
सीने में
आकाश तकता रहा ज़मीं को, -
मुसलसल सूनापन छोड़,
सभी कुछ बरसात
ने ले लिया।
अंतहीन कोई प्यास है वो, या  -
मेरी अनबुझ आरज़ू ! नफ़स
ख़्वाबों से छूटे मगर,
कुछ ख़्वाहिशात
ने ले लिया।
उम्र भर हम को न समझ आए
वो सभी राज़े तक़ाज़ा,
महसूल के बहाने
कुछ ज़ियादा
ही उसकी
ज़ात ने ले लिया। हम आज भी - -
उसी घाट पर हैं बैठे मुंतज़िर
निगाह लिए, जन्मों का
इम्तहान एक ही
पल में रूहे
निजात
ने ले लिया।  - -
* *
- शांतनु सान्याल
 


12 अक्टूबर, 2018

RAISE VOICE FOR # Me Too Movement

After observing continuously the campaign of # Me Too Movement, one thing became very clear that so-called the superhero of the era or the face of every advertisement is the great diplomate too - - no need to write the name, other politicians of present government who are claimed the torch bearer of beti bachao or save the daughter movement are also predators - - though particularly English news media are doing their work honestly - - anyways its a great beginning by Tanushree Dutta against the sexual predators of our society whom we are giving the status of god and saying the pride of humanity, days of Hippocrates, pseudo gentleness and so-called '' sanskari log'' are over, every citizen should raise their voice against these sexual predators of our society
who are just like woodworm making the Indian society day by day too much hollow and weak. Those people of Bollywood (who are against women's movement ) are actually hidden pimp, they want to earn the money after forcing the innocent women indirectly to flesh trade, there should be strict law and regulation for contract/employment for women's safety and protection, there shouldn't be any compromise of their dignity in the film industry / IT sectors/media / or any other organizations. If present government is really honest in their so-called women empowerment policy then they must show 56 inches chest for making immediately law and regulation regarding this comprehensive policy otherwise in coming election women shouldn't vote them.
- Shantanu Sanyal



11 अक्टूबर, 2018

दुआ - सलाम - -

मुखौटों का शहर है आरसी का
यहाँ कोई काम नहीं, परत
दर परत हैं न जाने
कितने ही छुपे
रंग - रोगन,
मौज
ए रौशनी का यहाँ कोई आख़री
मुकाम नहीं। फिर सज चले
हैं गली कूचों के सभी
बेरंग दरो दिवार,
लेकिन परदे
के ओट
में, खुशियों का कोई नाम नहीं।
वही बदहवास चेहरे तकते हैं
घिसी पिटी इश्तहारों को,
ईद हो या दिवाली
झुके कमर को
लेकिन
आराम नहीं। दहलीज़ में न जाने
कौन रंगीन दावतनामा छोड़
गया, कहने को वो शख़्स
अपना है लेकिन
दुआ - सलाम
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल


19 सितंबर, 2018

जाने क्यों - -

सभी कुछ है सांस लेता हुआ मेरे आसपास,
फिर भी, न जाने क्यों रहता है ये दिल
उदास, वक़्त की सांप सीढ़ियों ने
मुझे, हर मोड़ पे, गिर कर
संभलना है सिखाया,
फिर भी न जाने
क्यों अभी
तक
हैं नाज़ुक मेरे एहसास। घर से मंदिर तक
का सफ़र, यूँ तो है बहोत ख़ुशगवार,
मुश्किल तो तब होती है, जब
मुख़ातिब हों उजड़े चेहरों
के नक़्क़ास। शहर
की भीड़ में
सिर्फ़
मैं ही न था तनहा, न जाने कितने लोग -
यूँ ही भटकते मिले अपने ही घरों के
आसपास। अजीब सा नशा है
उस अनदेखे वजूद का,
खो देते हैं दानिशवर
भी अक्सर,
अपने
होश वो हवास। फिर भी न जाने क्यों, ये
दिल रहता है उदास। 

* *
- शांतनु सान्याल

वो कौन थे - -

न जाने वो कौन थे अजेय पथिक,
गुज़रे अंतिम प्रहर, देह रंगाए
राख, छोड़ गए दूर तक
सुलगते पैरों के
निशान।
न जाने वो कौन थे, किस चाह में
जीवन को बनाया महाज्वाल -
स्तूप, और मुस्कुराते हुए
किया सर्वस्व दान।
काश, वो महा -
मानव
फिर लौट आएं, और सिखाएं हमें -
स्वाधीनता का सत्य अभिप्राय,
पुनः एक बार मानवता का
रचे हम, वास्तविक -
संविधान।

* *
- शांतनु सान्याल


 

07 सितंबर, 2018

किसी और दिन - -

कोई नहीं रुकता किसी के लिए,
ये ज़िन्दगी का सफ़र है कोई
ख़ूबसूरत ख़्वाब नहीं।
तहत तबादिल
से है तमाम
कारोबार
ए जहाँ, यहाँ कोई भी किसी -
का अहबाब नहीं। तुम्हारी
वाबस्तगी बेशक है
बहुत ही दिलकश
लेकिन तहे
दिल में
है क्या, मुझे इसका ज़रा भी -
अंदाज़ नहीं। चलो मान
भी लें कि हैं बहोत
गहरी तुम्हारी
निगाहें,
किसी और दिन डूब के देखेंगे
ज़रूर, लेकिन आज नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 





04 सितंबर, 2018

इक मुश्त रौशनी - -

अहाते की धूप को यूँ ही
चुपके से आने दो,इक
मुश्त रौशनी है
काफ़ी दिल
ए नाशाद
के लिए,
किस
किस का रोना रोएं जिसे
जाना है उसे जाने दो।
हमें अपने बेरंग
दर ओ दीवार
से कोई
शिकायत नहीं, काग़ज़ी
फूलों को देख ग़र
कोई बहके तो
बहक जाने
दो।
ये आईना है बहोत ही - -
बेमुरव्वत, कोई
समझौता नहीं
करता,उनकी
मर्ज़ी,
नाज़ुक शीशमहल बारहा
चाहे सजाने दो। ताश
के घर ही तो  हैं
सभी, कोई
बादशाह
हो या
फ़क़ीर, ढहना तो है मुक़र्रर
 इक दिन, चाहे घर
जितना ऊंचा
बनाने दो।

* *
- शांतनु सान्याल


 

03 सितंबर, 2018

आलोक प्रवाह - -

एक तृषित मैं ही नहीं इस जग में,
हर एक चेहरे में है बसा कहीं
न कहीं एक मृग मरीचिका,
एक यायावर सिर्फ़ नहीं
मेरा मन, हर एक
मोड़ पर है
कोई न
कोई अनबूझ प्रहेलिका। उतार -
चढ़ाव की अपनी ही है एक
अलग अनुभूति, जीवन -
पथ कभी सरल रेखा
और कभी लगे
अपरिभाषित
तालिका।
कुछ फूल तुम्हारे नाम किए अर्पण,
कुछ गंध रहे जीवित मम हृदय
अभ्यंतरण, देह - प्राण
सब तुम्हारे नाम
फिर भी तुम
हो चिर -
अनामिका, अनंत प्रवाह में बहती -
हों जैसे असंख्य दीप मलिका।

* *
- शांतनु सान्याल

मुहाने के यात्री - -

जनशून्य तटभूमि, या अनावृत वक्षस्थल,
लहरों का आघात निरंतर, कुछ
बुझते जलते अदृश्य आग्नेय -
कण, कभी तुम्हारे मध्य
कभी मेरे अंदर।
जीवन के
रूप
या मुहाने पर समर्पित जलधार, कहीं
उभरते जुगनुओं के बहते द्वीप,
कहीं टूटते रिश्तों के कगार।
निशि पुष्प की तरह
कभी महकते
अनुरागी
पल,
और कभी नीरवता फैलाए अपना - -
अंचल।  फिर भी जीवन नदी बहे
निःशब्द अविरत,सांसों में
बांधे विस्तृत समुद्र -
सैकत।

* *
- शांतनु सान्याल

23 अगस्त, 2018

मुक्ति स्नान - -

सभी रंग थे फीके, सभी अक्स अधूरे,
उस छुअन में था न जाने कैसा
जादू, इक बार जो तन से
लगा, उम्र भर न मन
से छूटे। बग़ैर
लब  छुए
वो
हलक़ के पार हुआ, हाँ जान बूझ कर
ही मैंने विषपान किया। अब सभी
जीवन मरण के पैमाने लगे
बहोत हलके, निगाहों
में दूर तक सिर्फ़
उसी का
नूर है
झलके, मैंने अपने आप ही सभी दुःख -
दर्द का अवसान किया। न जाने
किसने कहा था कि मोक्ष
मिलता है नदियों के
किनारे, मैंने
अपने
भीतर जा कर बारहा मुक्ति स्नान किया।

* *
- शांतनु सान्याल

22 अगस्त, 2018

उम्र भर - -

कुछ एहसास होते हैं सोंधी ख़ुश्बू
की तरह मिटते नहीं उम्र भर,
अगरचे बारिश आती
जाती रही मौसमी
हवाओं के
साथ
 अक्सर, कुछ मोह सूत  होते हैं
अमरबेल की तरह, सिमटते
नहीं उम्र भर। कौन सा
अहद था जो दिल
से उतर कर
रूह तक
दख़ल
कर गया, इस मोम के दहन हैं - -
अनंत, ये हर हाल में पिघलते
नहीं उम्र भर। पिंजरे
की नियति में है
शून्यता,चाहे
मायावी
तंतु से कसो जितना, सीने के कुछ
अदृश्य अनल हैं चिरकालीन,
सुलगते नहीं उम्र भर।
इस जीवन
उत्सव
का,
अपना ही है अलग आलोकमय - - -
शामियाना, उभरते टूटते
तारों की रौशनी ग़र
खो जाएं तो
मिलते
नहीं
उम्र भर।

* *
- शांतनु सान्याल 




 

05 अगस्त, 2018

जाने कौन है वो - -

एक दिन अचानक गुलाब की -
तरह खिले बिहान ! हर
चेहरे पर हो ताज़गी
और जीने का
इत्मीनान।
एक
सुबह हो यूँ दुआओं वाली शबनम
से तरबतर, आईना छुपा ले
अपने सीने में झुर्रियों के
निशान। कौतूहल
मेरा फिर ढूंढ
लाए वो
 गुमशुदा लड़कपन, दरवाज़ा
खोलते ही नज़र आए
सपनों की दूकान।
दौड़ा ले जाए
मुझे,
फिर किसी फेरीवाले की पुकार,
ख़रीद लाऊँ कोई मीठा
अहसास,छोटे
मोटे सामान।
मीठी
झिड़कियां सुने हुए यूँ तो एक
उम्र गुज़र गई, वही मासूम
नादानियाँ फिर सर पे
उठाए आसमान।
इतनी भी
दूरी
ठीक नहीं ये सच है कि मशीन
 हैं सभी, किसी बहाने ही
सही ग़लत नहीं
रखनी जान
पहचान।
अगरचे वक़्त की बेरहमी ने - -
मुझे कहीं का न छोड़ा,
न जाने कौन है
जो अक्सर
मुश्किल
कर
जाए आसान।
* *
- शांतनु सान्याल 

04 अगस्त, 2018

मेरे घर का पता - -

लज्जित था दर्पण जब -
मुखौटे उतरने लगे,
उस महासभा
में थे
सभी मस्तक झुके हुए, -
घावों के निशान
जब देह से
यूँ उभरने
लगे।
दोहराते रहे मन्त्र, ''मातृ - -
रूपेण संस्थिता '' की,
नमस्तस्यै के
पूर्व, छद्म
पलस्तर उखड़ने लगे। - - -
रहस्य कूपों के जाल
 से हैं सभी आश्रय
स्थल, कहाँ
जाएं
लोग जब रक्षक ही निगलने
लगे। यूँ तो बात थी हर
एक चेहरे पे हंसी
लौटने की,
दांत
भी नहीं निकले और वो विष
उगलने लगे। तथाकथित
मानव तालिका में
नाम मेरा भी
हो, डर
सा
लगता है जब पड़ौसी बेवजह
घूरने लगे। मालूम है
अच्छी तरह
तुम्हारे
न आने की वजह, अब तो ख़ुद
हम भी अपने घर का पता
भूलने लगे।   

* *
- शांतनु सान्याल   
 

03 अगस्त, 2018

इस तरफ से - -

इस राजपथ से कभी,
पाँव बंधे ज़ंजीर
लिए गुज़रो
तो जाने,
हर
एक भीड़ में कहीं - - -
भटकती है
मेरी
ही
गुमशुदा परछाई, - - -
झुलसे हुए
चेहरों
की
ज़मीं पे, नंगे पाँव - -
कभी ठहरो तो
माने। न
जाने
कौन है जो अभिशाप
दे गया मेरे पुरसुकूं 
शहर को, कभी
इन वीरान
बस्तियों
के दरमियान हो के -
गुज़रो तो जाने।
एक मुद्दत
से आस
लगाए, लोग बैठे हैं -
खंडित घाट के
किनारे,
आसमानी कश्ती से,
अंधकारमय
गली
कूचों पे उतरो तो माने।

* *
- शांतनु सान्याल

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