Monday, 3 September 2018

आलोक प्रवाह - -

एक तृषित मैं ही नहीं इस जग में,
हर एक चेहरे में है बसा कहीं
न कहीं एक मृग मरीचिका,
एक यायावर सिर्फ़ नहीं
मेरा मन, हर एक
मोड़ पर है
कोई न
कोई अनबूझ प्रहेलिका। उतार -
चढ़ाव की अपनी ही है एक
अलग अनुभूति, जीवन -
पथ कभी सरल रेखा
और कभी लगे
अपरिभाषित
तालिका।
कुछ फूल तुम्हारे नाम किए अर्पण,
कुछ गंध रहे जीवित मम हृदय
अभ्यंतरण, देह - प्राण
सब तुम्हारे नाम
फिर भी तुम
हो चिर -
अनामिका, अनंत प्रवाह में बहती -
हों जैसे असंख्य दीप मलिका।

* *
- शांतनु सान्याल

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