Friday, 7 September 2018

किसी और दिन - -

कोई नहीं रुकता किसी के लिए,
ये ज़िन्दगी का सफ़र है कोई
ख़ूबसूरत ख़्वाब नहीं।
तहत तबादिल
से है तमाम
कारोबार
ए जहाँ, यहाँ कोई भी किसी -
का अहबाब नहीं। तुम्हारी
वाबस्तगी बेशक है
बहुत ही दिलकश
लेकिन तहे
दिल में
है क्या, मुझे इसका ज़रा भी -
अंदाज़ नहीं। चलो मान
भी लें कि हैं बहोत
गहरी तुम्हारी
निगाहें,
किसी और दिन डूब के देखेंगे
ज़रूर, लेकिन आज नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 





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