14 फ़रवरी, 2014

काश, ऐसा हो जाए - -

इक तलाश जो गुज़री सिसकती -
सीलनभरी राहों से हो कर,
जहाँ जवानी से पहले 
ज़िन्दगी झुर्रियों 
में सिमट 
जाए,
इक जुस्तजू जो चीखती है गली -
कूचे में कहीं, काश उसे 
ख़ुशगवार सुबह 
नसीब हो
जाए, 
इक तमन्ना, जो झांकती है झीनी 
पर्दों से कहीं, शायद उसके 
ख्वाबों को मिले 
तितलियों 
के पर,
इक मासूम सी मुस्कान उभरती है 
झुग्गियों के साए से कहीं, 
काश, वो अंधेरों से 
निकल खुली 
हँसी में 
बदल जाए, इक ख्वाहिश उठती है 
अक्सर दिल में, काश, हर 
एक चेहरे से बोझिल 
रात ढल जाए - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

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River Roses

13 फ़रवरी, 2014

दरमियान ज़मी ओ आसमान - -

न जाने किस बियाबां में बरसे हैं 
राख रंगी बादल, शाम ढलते
इक अहसास ए पुरसुकूं 
सा है दिल को, न 
जाने किसने 
फिर 
छुआ है ख़ामोश दर्द को मेरे, कि 
फिर रफ़ता रफ़ता तेरी 
मुहोब्बत जवां हो 
चली है, हर 
सिम्त 
में है इक अजीब सा ख़ुश्बुओं में 
डूबा इन्क़लाब, फिर किसी 
ने कुरेदा है कहीं बुझता 
हुआ अंगारा, कि 
उड़ चले हैं 
हवाओं 
के हमराह फिर तुझे पाने की - -
जुस्तजू, या जुगनुओं में 
छुपे हैं, कहीं इश्क़
की अनबुझ 
चिंगारियां,
फिर 
भटकती है रूह, दरमियान ज़मी 
ओ आसमान, किसी कोहरे 
की मानिंद मुसलसल 
वादी दर वादी,
दूर तक !

* * 
- शांतनु सान्याल 

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11 फ़रवरी, 2014

वो आज भी है - -

वो आज भी है बहोत दिलकश,
नाज़ुक सुबह की किरण 
की तरह, खुलती 
हैं, जज़्बात 
की नाज़ुक पंखुड़ियां उसकी - -
निगाहों की धूप ले कर,
वो आज भी है बेहद 
हसीं, खिलते 
हैं उदास 
लम्हें, उसके ओंठों की सहमी 
सहमी सी पुरअसरार 
हँसी ले कर, रहे 
मौसम की 
अपनी 
मजबूरियां, बदलना है उसके 
फ़ितरत में शामिल, वो 
आज भी है बहोत
ज़िन्दगी के 
नज़दीक,
ख़ुश्बूदार साँसों की तरह - - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

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09 फ़रवरी, 2014

अहाते में कहीं - -

अहाते में कहीं खिलें हैं रजनीगंधा -
या तेरी मुहोब्बत का यक़ीं 
हो चला है इस दिल को, 
रात भर बरसे 
हैं आवारा 
बादल, या छूती रही रुक रुक कर - -
बेचैन लहर साहिल को, न 
जाने कैसी है ये मद्धम 
अहसास की 
ख़ुश्बू,
भिगोती है रात ढले सांस बोझिल को, 
इक मीठा सा दर्द है, जिस्म ओ 
जां में मेरे, क्या कहें या 
न कहें उस हसीं 
क़ातिल को,
धीरे -
धीरे तेरी मुहोब्बत का यक़ीं हो चला -
है इस दिल को - -

* * 
- शांतनु सान्याल 
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कोई और न था - -

वो शख़्स कोई और न था मेरे अक्स 
के सिवा, छलता रहा मुझे ही 
ओ रात दिन, मेरे ही 
अंदर रह कर, वो 
आत्म दहन 
था कोई,
या ज़रूरत से कहीं ज्यादा पाने की -
ख्वाहिश, कहना है बहोत 
मुश्किल, दरअसल 
कई बार हम 
जानबूझ 
करते हैं ख़ुद से फ़रेब, और ढूंढ़ते हैं 
इक अदद मासूम चेहरा, 
इल्ज़ाम के लिए, 
मैंने ख़ुद ही 
चुनी थी 
राह अपनी, मंज़िल ग़र नज़र न -
तो इसमें रहनुमा आसमां 
का आख़िर क़सूर
कैसा, उसने 
तो खुला रखा था रात भर, उजालों 
भरा शामियाना - - 

* * 

- शांतनु सान्याल 

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08 फ़रवरी, 2014

मुंतज़िर साँसें - -

उस मोड़ पे अब तलक हैं बिखरे 
गुलमोहरी यादों के निशां, 
कुछ मुस्कुराहटों के 
ख़ुश्बू, और 
एक 
मुश्त खुला आसमां, तलाशती -
हैं बेचैन निगाहें उजली 
रातों की कहानियां, 
कुछ तुम्हारे इश्क़ 
का वहम, 
कुछ 
मेरी रूह की परछाइयां, न जाने
किस जानिब तुम गए मुड़,
न जाने किस ओर थी 
मेरी मंज़िल, आज 
भी हैं मुंतज़िर 
मेरी साँसें, 
आज 
भी है बेक़रार, तुम्हारे लिए मेरा 
दिल - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
मुंतज़िर - इंतज़ार में 
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07 फ़रवरी, 2014

फिर कभी पूछ लेना - -

रहने दे कुछ दर्द बेज़ुबां तहत ए 
राख, कि आँखों ने अभी 
अभी दोस्ती की है 
अजनबी 
ख्वाब से, फिर कभी पूछ लेना 
इन नमनाक आँखों का 
माज़रा, अभी तो 
मुस्कुराने का 
हुनर पा 
जाए ज़िन्दगी, क्यूँ बेक़रार से 
हैं तेरे चेहरे के बदलते रंग, 
अभी तो हमने पूरी 
तरह से दिल 
में तुझे 
उतारा भी नहीं, कुछ और वक़्त 
चाहिए, मुहोब्बत को 
मुक्कमल यक़ीं 
में बदलने 
के लिए.

* * 
- शांतनु सान्याल 

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05 फ़रवरी, 2014

कोई लकीर मकनून - -

जिस्म ओ जां के दरमियां है कोई 
लकीर मकनून, या तेरी 
चाहत का है कोई 
बेइंतहा 
जूनून, भटकती है रूह मंज़िल दर 
मंज़िल, सहरा - सहरा, वादी 
दर वादी, गुलशन -
गुलशन,
इक दीवानगी जो कर जाए असर,
दिल के बहोत अंदर, भूल 
जाए ज़मीर, सारी 
दुनिया,
लम्हा दर लम्हा, खो जाए वजूद -
किसी की निगाहों में इस 
क़दर कि, होश ओ 
बेख़ुदी में 
न रह जाए कोई तफ़ावत ज़रा भी,
बस इक तेरा चेहरा नज़र आए 
रुबरु मेरे, बाक़ी सारा 
जहान, इक धुंध 
में डूबता 
उभरता दिखाई दे मुझको कि मैं 
हो चला हूँ तेरे इश्क़ में 
लापता - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

अर्थ - 
मकनून - छुपा हुआ 
जूनून - दीवानगी 
सहरा - मरू भूमि 
तफ़वात - अंतर 
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ख़ूबसूरत शून्यता - -

इक ख़ालीपन सा रहा हमराह
दूर तक, जबकि सब
कुछ था बिखरा
हुआ मेरे
दामन में बेतरतीब, फूल ओ -
महक, रात ओ चांदनी,
फिर भी काँटों की
नोंक पे ठहरी
हुई सी,
शबनमी बूंद ही रही ये मेरी -
ज़िन्दगी, कुछ उलझी
हुई, कुछ अजीब
सी, इक
अंतहीन इंतज़ार या अनबुझ
कोई तिश्नगी, कहना
है मुश्किल, कहाँ
जाना चाहे
दिल
और न जाने कहाँ थी मंज़िल
पोशीदा, मृगतृष्णा थीं
वो परछाइयाँ, या
ख़ुद हमने
चाहा
नीलकंठ होना, फिर भी जो -
कुछ मिला हिस्से में
हमारे, बेशक
ख़ूबसूरत
ही था.

* *
- शांतनु सान्याल

03 फ़रवरी, 2014

ज़िन्दगी की राहें - -

न खेल यूँ आतिश ए जज़्बात से - 
मेरे, झुलस न रह जाए कहीं 
उभरते बर्ग मुहोब्बत, 
अभी तलक 
तुमने 
देखा कहाँ है चमन का मुक्कमल 
संवरना, सूरज की पहली -
किरण में फूलों का 
हौले हौले से 
खिलना,
अभी अभी तो ढली है ख़ुमार ए -
शब, कुछ और रौशनी बिखरे 
वादियों में, अभी तलक 
है तुम्हारे दिल में 
शबनमी 
छुअन बाक़ी, न देख यूँ नींद भरी 
आँखों से हक़ीक़ी दुनिया,
कि आसां नहीं है 
ख्वाबो से
यकायक उभरना, ज़िन्दगी की -
राहें हैं बहोत मुश्किल 
लेकिन हसीन भी 
कम नहीं।

* * 
- शांतनु सान्याल 

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ज़रा और सहेज पाते - -

 बहोत नाज़ुक थे वो रेशमी पल -
ज़रा सी आहट में टूट गए,
ज़रा और सहेज पाते 
अपनी बिखरी 
हुई, बूंद -
बूंद ये ज़िन्दगी कि उसके पहले
ही वो रूठ गए, इक कोहरा 
सा था ज़रूर दरमियां 
अपने, लेकिन 
अँधेरा 
नहीं, फिर भी न जाने क्यूँ, हम 
भीड़ में तनहा छूट गए, 
कोशिशों में न थी 
कोई कमी,
सीने 
से लगा रखा था, उन्हें ताउम्र - - 
हमने, तक़दीर का गिला 
किस से करें लूटने 
वाले फिर भी 
लूट गए,
बहोत नाज़ुक थे वो रेशमी पल -
ज़रा सी आहट में टूट गए.

* * 
- शांतनु सान्याल  

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30 जनवरी, 2014

ख़ुद से बेख़बर - -

दूर दूर तक है अहसास तनहाई, 
गुलों के रंग ओ अतर भी 
हैं कुछ फीके फीके 
से, बेरंग सी 
हो चली 
है ये 
ज़िन्दगी तेरे जाने के बाद, हर 
चीज़ है मौजूद अपनी 
जगह, हमेशा की 
तरह, फिर 
खिले 
हैं अहाते में कहीं गुल यास, न 
जाने क्या हुआ, दिल है 
है बहोत उदास, 
तेरे जाने के 
बाद,
कि अब हमें नहीं छूती कोई भी  
ख़ुश्बू पहले की तरह, 
लम्हा लम्हा हम 
खो चले हैं
किसी 
और ही जहां में ख़ुद से बेख़बर।

* * 
- शांतनु सान्याल  

 गुल यास - चमेली 

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बेइंतहा मुहोब्बत - -

इस क़दर बेइंतहा तेरी मुहोब्बत, 
न कर जाए मुझ से जुदा 
मेरी हस्ती, न भूल 
जाऊं मैं कहीं, 
तमाम 
आलम ओ वजूद तेरी निगाह के 
सामने, न बना मुझको 
यूँ ज़र्रे से आसमां,
कि बिखरने 
के बाद न 
ढूंढ़ 
पाऊँ कहीं नाम ओ निशां अपना,
रहने दे मुझे यूँ ही ग़ैर महसूस, 
ज़ेर साया तेरी आँखों में 
कहीं, कि ग़र टूट 
जाऊं कभी 
तो - - 
मिल जाए मुझे पनाह, कूचा ए -
दिल में तेरे कहीं न कहीं !

* * 
- शांतनु सान्याल  - 

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29 जनवरी, 2014

आँखों की ज़ुबां - -

बहोत कुछ कहने की चाह में कुछ 
भी न उनसे कहा गया, सिर्फ़ 
निगाहों में छुपाये दर्द - 
ए किताब, हम 
उन्हें 
देखते रहे, ख़ुदा जाने, वो आँखों की 
ज़ुबां जानते भी हैं या नहीं, 
लोग कहते हैं इश्क़ 
में, दिल की 
बात
ख़ुश्बुओं में ढल जाती है, शायद - -
उन्हें भीगे अहसास ने छुआ 
हो कहीं, कि लौटतीं 
ख़ामोश सदाओं
को हर्फ़ 
ए ज़िन्दगी मिले, नज़रअंदाज़ बुतों 
को जज़्बात ए बंदगी मिले - - 

* * 
-  शांतनु सान्याल 


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28 जनवरी, 2014

अभी तक मेरी साँसों में है - -

कुछ दर्द ख़ुसूसी, न पूछ ऐ हमनशीं, -
बाहिजाब रहने दे, ये दिल की 
ख़ूबसूरती, न कर 
बेनक़ाब -
यूँ सरे 
महफ़िल, बस अभी अभी तो ज़िन्दगी
ने सीखा है मुस्कुराना,अभी अभी, 
तेरी निगाहों में हमने देखी 
है इक उभरती ख़ुशी !
कुछ और बढ़े 
दिल की 
कशिश, कुछ दूर तो चले ख़ुमार ए -
नज़दीकी, अभी अभी तो जले 
हैं शाम ए चिराग़, हाले 
दिल न पूछ मुझसे 
से, कि अभी 
ये रात 
है बहोत बाक़ी, अभी तक मेरी साँसों 
में है किसी की याद बाक़ी !

* * 
- शांतनु सान्याल

अर्थ - 
ख़ुसूसी - व्यक्तिगत 
बाहिजाब - परदे के साथ 
ख़ुमार - नशा 
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25 जनवरी, 2014

तूफ़ान ए इन्क़लाब - -

न जाने कहाँ है वो सुबह ख़ुशगवार, 
जिसे पाने की चाहत में उम्र 
गुज़र गई, न जाने ये 
कैसा है कोहराम, 
फिर किसी 
ने दी 
है, भीड़ चीरकर दर्द भरी चीत्कार -
ये कैसा है जश्न तेरी महफ़िल 
में मुदीर ए जमुरियत,
दर नज़दीक ए 
क़िला,
गूंजती हैं दबे कुचलों की पुकार और 
अब तलक है तू अनजान, कहीं 
ये अनसुनापन न कर 
जाए तुझे तबाह 
हमेशा के 
लिए 
कि फिर उफ़क़ पे उभरने लगा है - -
तूफ़ान ए इन्क़लाब - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ 
जमुरियत - लोकतंत्र 
मुदीर - दिग्दर्शक 
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stormy moonlight 

तलाश - -

कहाँ मिलती है हर चीज़, ज़िन्दगी में 
मुताबिक़ दिल के, कुछ न कुछ 
समझौता है, ज़रूरी जीने 
के लिए, न रख 
सीने में 
तलब, यूँ तस्सवुर से ज़ियादा, कि - -
टूटने के बाद, न चुभे कहीं 
ख्वाबों के टुकड़े, 
तमाम उम्र 
जिसे 
तलाश की हमने बुतों की भीड़ में, वो 
शख्स था, न जाने कब से मेरे 
तहे दिल में पिन्हाँ, उस 
की निगाहों में है 
इक अजब 
सी - - 
चमक आजकल, शायद उसने देखा - -
है बेदाग़ आईना, इक मुद्दत के 
बाद - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by filomena booth

24 जनवरी, 2014

आस्मां का रास्ता - -

मेरी ज़ात है महज़, इक ख़ुश्बूदार 
हवा का झोंका, न बना मुझे 
महदूद शख्सियत, 
रहने दे मुझे 
यूँ ही  
साँसों में इक ख़ूबसूरत अहसास -
की तरह, मेरा वजूद है महज़,
इक बहता हुआ पहाड़ी 
झरना, न रोक 
मुझे, यूँ 
अपने हुस्न ए तिलिस्म में जकड़ 
के, बिखरने दे मुझे बंजर -
किनारों में खुल कर,
मेरे जज़्बात 
हैं, रूह 
ख़ानाबदोश, न कर इन्हें क़ैद - - - 
अपनी पुरअसरार आँखों 
के क़फ़स में, कहीं 
ये मेरी  
ज़िन्दगी, न भूल जाए आस्मां का 
रास्ता - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 

अर्थ -
 ज़ात - स्वभाव 
महदूद - सिमित 
क़फ़स - पिंजरा 
 पुरअसरार - राज़ भरे 
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forget-me-not, by deborah-schuster

23 जनवरी, 2014

किसी की राह में - -

न दो आवाज़, कि हम भूल चुके हैं
अपना नाम तक किसी की
चाह में, न जाने कैसी
है ये सर्द आग,
न जले
मुक्कमल, न बुझे राख बन कर !
इक दहन नादीद कोई, जले
है दिल की गहराइयों
में, पहलु में
कोई -
नहीं, फिर भी कोई चलता है जैसे
मेरी परछाइयों में, दूर तक
फैले हैं अंधेरों के साए,
इक वीरानगी सी
है हर सिम्त,
फिर भी
न जाने है क्यूँ बेक़रार सा मेरा - -
दिल किसी की राह में,

* *
- शांतनु सान्याल


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22 जनवरी, 2014

किसे ख़बर फिर मिलें न मिलें - -

किसे ख़बर फिर मिलें न मिलें, जो 
पल हैं, अपने दर मुक़ाबिल,
क्यूँ न जी लें उन पलों 
में उम्र से लम्बी 
ज़िन्दगी 
अपनी, यूँ तो ख्वाहिशों का कोई -
इख़त्ताम नहीं, फिर भी 
इन लम्हों में क्यूँ न 
सजा लें अनदेखे 
ख्वाबों के 
दरीचे,
वो दर्द जो अश्क से मोती न बन
पाएं कभी ,उन्हें ज़मीं दोज़ 
करना है बेहतर, कोई 
साथ नहीं चलता 
उम्र भर के 
लिए,
जो वस्त राह साथ छोड़ जाए उसे 
वक़्त रहते भूल जाना ही है 
अक़लमंदी ! 

* * 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ - 
इख़त्ताम - अंत 
ज़मीं दोज़ - ज़मीं के निचे 
वस्त - मध्य 

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21 जनवरी, 2014

लम्हा लम्हा जलते बुझते रहे - -

इक बेइन्तहा गहराई सामने, या 
उसका पुरअसरार निगाहों 
से देखना, तमाम रात
ज़िन्दगी, डूबती 
उभरती 
रही, 
किसी शिकस्ता हाल कश्ती की 
तरह, मौज ए समंदर या 
अंधेरों के साए, किसी 
ने भी न की हमसे 
सुलहनामे 
की बात,
हर 
कोई था तमाशबीन, संग ए - - -
साहिल की तरह, रात 
भर गिरती रही 
शबनम या 
क़तरा 
ए आतिश, हमें कुछ भी अहसास 
नहीं, किसी के इश्क़ में हम 
यूँ ही लम्हा लम्हा 
जलते बुझते 
रहे - - 

* * 
- शांतनु सान्याल  
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20 जनवरी, 2014

आख़िर हमने भी सीख लिया - -

अँधेरों से उभरना, आख़िर हमने भी -
सीख लिया, वक़्त की है शायद 
अपनी कोई मजबूरी, बहने 
दो उसे अनजानी 
मंज़िलों की
तरफ़,
किनारों पे ठहरना, आख़िर हमने भी 
सीख लिया, ये सच है कोई नहीं 
रुकता घायल राही के लिए,
तजुर्बा ए ज़िन्दगी से, 
ज़ख़्मी क़दम 
चलना, 
आख़िर हमने भी सीख लिया, कोई -
नहीं होता दरअसल राज़दार ए 
अश्क, दिखाते हैं लोग 
यूँ ही नक़ाबपोश 
हमदर्दी !
चुनांचे दर्द में भी मुस्कुराना आख़िर -
हमने भी सीख लिया, अँधेरों से 
उभरना, आख़िर हमने 
भी सीख लिया।
* *
- शांतनु सान्याल 

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blooming smile

18 जनवरी, 2014

आजकल - -

मुलायम सा ख़ुमार है तारी जिस्म
ओ जां में आजकल, पहले तो
मौसम में कुछ ठहराव
सा देखा है हमने,
लेकिन कुछ
बदलाव
सा है आसमां में आजकल, इन -
रंग ओ नूर की लकीरों में
कहीं तेरी मुहोब्बत
करती है
तरसीम ए ज़िन्दगी, पहले तो न
थी इतनी ख़ूबसूरत ज़िन्दगी
अपनी, इक अजीब सी
हलचल है जज़्बात
ए कारवाँ में
आजकल,
मुलायम सा ख़ुमार है तारी जिस्म
ओ जां में आजकल - -

* *
- शांतनु सान्याल
अर्थ -
 तारी - छाया हुआ
तरसीम - चित्रांकन
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poetic beauty
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art by LorraineMae

17 जनवरी, 2014

गहराइयों तक - -

वो दरख़्त जिस पे लिखा था कभी 
हमने नाम अपना, वो फूल 
जो छुपाया था तुमने
दिल की धड़कनों
में कहीं,
वक़्त के साथ दरख़्त ग़र टूट जाए 
तो कोई ताज्जुब नहीं, पृष्ठों 
में दबे फूल की तरह
सूख जाए तो 
कुछ भी 
आश्चर्य नहीं, फिर भी कहाँ आसां 
है ख़ुश्बू ए इश्क़ का फ़ना 
होना, मुझे मालूम 
है, आज भी 
तुम्हारी 
धड़कनों में कहीं न कहीं बसती है 
मेरी रूह की छुअन बहोत 
गहराइयों तक !
* * 
- शांतनु सान्याल   
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purity of life

14 जनवरी, 2014

ज़रा सी चाहत - -

बेज़ार जिस्म, रूह भी बोझिल, इस  
शब ए मजरूह में ऐ दोस्त, 
कोई और दिल दुखाने 
की बात न कर, 
इन ज़ख्मों 
का  क्या
वक़्त के साथ सभी भर जाएंगे,  न 
ही ख्वाहिश उम्र ए दराज़ की, 
न है कोई चाहत रंगीं 
बहिश्त की हमको,
ग़र हो सके 
तो दे 
हमें थोड़ी सी जगह, अपनी पलकों 
के साए में कहीं, कि उम्र भर 
भटकी है ज़िन्दगी, यूँ 
ही तपते सहरा 
में, इक 
सायादार शजर के लिए, इक तेरी - -
शफ़ाफ़ मुस्कराहट है काफ़ी 
तस्कीन ए दर्द के 
असर के 
लिए.

* * 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ 
शब ए मजरूह - घायल रात 
उम्र ए दराज़ - लम्बी उम्र 
बहिश्त - स्वर्ग 
शजर - पेड़ 
शफ़ाफ़ - स्पष्ट 
तस्कीन - राहत 
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painting by Delilah Smith

13 जनवरी, 2014

शाश्वत मानवीय अहसास - -

कुहासा भरे उस पथ पर कहीं, आज 
भी रुके रुके से हैं निःश्वास,
वाट जोहते हैं सजल 
नयन, न जाने 
मन में है 
किस 
के मिलने की आस, वो अदृश्य हो -
कर भी है कहीं शामिल गहन  
अंतरतम के बीच, कभी 
वो उभरे व्यथित 
चेहरों में -
मौन !
कह जाए जीवन सारांश, कभी वो 
भटके जन अरण्य में, ह्रदय 
में लिए मृग तृष्णा 
गंभीर, कभी 
ठहरे 
अनाम बूंद बनकर पथराई आँखों 
के तीर, निस्तब्ध प्रतिध्वनि 
हो कर भी वो कर जाए 
जीवन मंथन, ले 
जाए सुदूर 
कभी,
और कभी रहे यहीं आसपास, बन 
कर एक शाश्वत मानवीय 
अहसास - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 
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mist beauty

12 जनवरी, 2014

न तोड़ ये रंगीन वहम मेरा - -

उन बनफ़शी लम्हों का जादू और 
तेरी निगाहों में अक्स मेरा,
फिर धुंध भरी राहों में 
खो जाने को दिल 
चाहता है,
कोई 
ख़ुश्बू जो भर जाए साँसों में इक -
अहसास ए ताज़गी, ज़िन्दगी 
फिर लगे बामानी ओ 
ख़ूबसूरत, फिर 
तेरी बज़्म 
ए गुल 
में जाने को दिल चाहता है, ख्वाब 
ही सही न तोड़ ये रंगीन वहम 
मेरा, फिर ख़ुद से निकल 
तेरे वजूद में दाख़िल 
होने को दिल 
चाहता 
है - -

* * 
- शांतनु सान्याल
बनफ़शी - बैगनी रंग   

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10 जनवरी, 2014

सुबह की नरम धूप - -

न रोक, ऐ दरख्त बुलंद सुबह की नरम 
धूप, कुछ टुकड़े ही सही बाँट ले 
मेरे शिकस्ता दहलीज़ 
के साथ, भीगे 
ख्वाबों 
को इक मुश्त अहसास ए ज़िन्दगी तो 
मिले, तेरी टहनियों में खिलें 
मौसमी फूल या हों 
फलों से झुके 
भरपूर !
ग़र न मिले ख़ुशी दर ज़ेर साया, ऐसी -
बुलंदी से फ़ायदा क्या, न भूल कि 
इक चिंगारी, झरे पत्तों के 
बीच कर जाए लंका 
दहन, लम्हों 
में न 
हो जाए कहीं तबाह, ये सब्ज़ सल्तनत
तेरी - - 

* * 
- शांतनु सान्याल  


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09 जनवरी, 2014

ख़ालिस सच - -

ये वो सरज़मीन ए इश्क़ है जहाँ -
कोई फ़र्क़ नहीं बादशाह ओ
फ़क़ीर में, मुझे हासिल
है दुनिया की वो
तमाम बेश
क़ीमत
ख़ुशी, उसकी इक मुहोब्बत भरी  
नज़र में, अब क्या रखा है
सितारा शनास, इस
हथेली के उलझी
लकीर में,
न दिखाओ मुझे फ़लसफ़ा ए - - -
आईना, उसके आगे हर
चीज़ है बेमानी !
वो इक
ख़ालिस सच है सारे आलमगीर -
में, ये वो सरज़मीन ए
इश्क़ है जहाँ कोई
फ़र्क़ नहीं
बादशाह ओ फ़क़ीर में - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल

सितारा शनास - - ज्योतिषी
 फ़लसफ़ा - दर्शन
ख़ालिस - विशुद्ध
आलमगीर - सार्वभौम

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past