04 अप्रैल, 2012


मध्य रात्रि 

जलती बुझती जुगनू सी कुछ बातें, मन 
के सजल तरंगों में लिखती हों जैसे 
प्रतिबिंबित कविताएँ, मेह 
बरसे आधी रात या 
छू जाए किसी 
के आँखों 
से निकलती, रहस्यमयी मद्धम नीली 
रौशनी, दूर तक  बिखरे हों जैसे 
श्वेत रंगी वन्य कुसुम 
या तुषार कण 
पिघलने 
को हों व्याकुल, कोई आहट जो घेरती है 
मन को, या चांदनी में नहाये हुए 
देवदार फेंकते हैं जादुई
प्रतिच्छाया, एक 
मीठा सा 
आभास या है कोई आसपास, बढ़ चले 
हैं क़दम किसी की तरफ अनजान,
अनायास, न जाने कौन है 
छुपा सा बहुत ही 
नज़दीक,
भीगे भावनाओं के क़रीब, या ज़िन्दगी
चल रही ख़्वाब के 
हमराह - - 

- शांतनु सान्याल 
 http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
mountain range - source Cheryl gallery 



03 अप्रैल, 2012

नज़्म - - मुहोब्बत के हरूफ़,

कुछ भी तो नहीं मेरे पास, फिर है किस
चीज़ की तुम्हें तलाश, कहीं और 
हो शायद वो गुमशुदा, कोई 
चाहत या ख़्वाब  की 
ताबीर, न  देख 
मुझे यूँ 
पुरअसरार निगाहों से बार बार, मैं वो 
नहीं जिसकी है तुम्हें तलाश, 
वज़ाहत जो भी हो इस 
वजूद के मानी हैं 
मुख़्तसर,
इक  चिराग़ जो बुझ  के भी जलता है 
बारहा शाम ढलते ही, बामे 
मुक़द्दस ढह चुका है 
तो क्या हुआ, 
अब भी 
हैं मौजूद कुछ पोशीदा इबादत के निशां, 
ग़र चाहो तो ले जाओ कुछ बिखरे 
मुहोब्बत के हरूफ़, कुछ 
अश्के रूह, इसके 
अलावा 
मेरे दामन में कुछ भी नहीं - - - 

- शांतनु सान्याल  

02 अप्रैल, 2012


बंद आँखों की दुनिया 

न करो प्रत्याशा इतनी कि बोझ बन जाय जीवन,
मिलने और खोने में था अंतर केवल कुछ 
क्षणों का, चिरस्थायी कहाँ आलिंगन,
बंद आँखों में था सम्पूर्ण व्योम 
समाया, पलक खुलते ही 
उठ गए सभी तारों 
के समारोह,
भटक गयी हो शायद मेरी आवाज़ वादियों से -
गुज़रते, या बिखर गए हों स्वर लहर,
अच्छा ही हुआ तुमने न सुनी 
वो आर्तनाद, एक थकन,
कुछ  शून्यता, वो 
प्रतिध्वनि 
जो टूटती है बार बार, जुड़ने की उम्मीद लिए 
हज़ार, झंझा में जैसे कोई दीपक चाहे 
दीर्घ ज्वलन, डूबते तारों का वो 
दिव्य अवतरण या जीने 
की असीम अभिलाष
लिए मरू प्रांतर, 
ह्रदय की 
भी हैं अपनी ही मजबूरियां, ढूंढ़ता है विलुप्त 
अपनापन, चाह कर हटा नहीं पाता
देह से लिपटे मोह वल्लरी, 
अंतर से जुड़े असंख्य 
मायावी तंतु,
चाहता 
है आँखें बंद कर देखना स्वप्नों की दुनिया, या 
वक्ष जड़ित जीने की कोई अमूल्य 
वसीयत - - 

- शांतनु सान्याल 
April Morning - painting by - Vesna Vera 

01 अप्रैल, 2012

لا عنوان (शीर्षक विहीन ) हिंदी /اردو

इक तलाश जो जिस्मो जान से हो गुज़र गया, 
बराह रास्त न थे, ज़िन्दगी के मरहले फिर भी 
बमुश्किल धीरे धीरे क़िस्मत तेरा असर गया,
इस राह की भी हैं अपनी ही दर्दे दास्ताँ लेकिन 
हक़ीक़त जो भी हो, वो इब्दी तौर से संवर गया,
उस मंज़िल पे रौशन  हैं, यूँ  हज़ारों दवी चिराग़ 
दस्ते शमशीर का जत्था भी दो पल ठहर गया, 

- शांतनु सान्याल 
اک تلاش جو جسمو جان سے ہو گزر گیا،
براه راست نہ تھے، زندگی کے مرحلے پھر بھی
بمشکل دھیرے دھیرے قسمت تیرا اثر گیا،
اس راہ کی بھی ہیں اپنی ہی درد داستاں لیکن
حقیقت جو بھی ہو وہ ابدي طور سے سںور گیا،
اس منزل پہ روشن ہیں، یوں ہزاروں دوي چراغ
دستے شمشير کا جتتھا بھی دو پل ٹھہر گیا،
شانتنو سانیال 
angels-flight - Painting by Marina Petro

31 मार्च, 2012


जन अरण्य की ओर

अज्ञात स्पर्श  जो जलरंग चित्र की तरह बिखेर 
जाती है सांत्वना, अनजान सी एक 
दस्तक रख जाती है पुष्प -
गुच्छ दरवाज़े के 
समीप, 
कोई दे जाता है धीरे से सुरभित अनुबंध, फिर 
जीवन है अग्रसर छूने को प्रतिबद्धता, 
फिर ह्रदय करता है अंगीकार 
भूल कर विगत सभी 
दुःस्वप्न, भोर 
की तरुण 
किरणें, भीगे पंखुड़ियों का हौले हौले खुलना -
निसर्ग भर चला हो जैसे पुरातन घाव,
कोई अदृश्य स्वर में फिर गा 
चला है प्रभाती राग, दे 
रहा हो ज्यों 
आह्वान,
जीवन संघर्ष के लिए फिर व्यक्तित्व है तैयार.

- शांतनु सान्याल
painting morning sunlight-watercolor by Sergey Zhiboedov 

29 मार्च, 2012


मोक्ष की प्राप्ति 

मांगी न थी हमने, कोई अमूल्य इच्छापत्र या
राज सिंहासन, सिर्फ़ चाहा था परिचय -
पत्र की वापसी, जो हुतात्माओं 
की थी धरोहर, लहू में 
अंकित वो शपथ 
पत्र जिसमे 
थे वचनबद्ध, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु -
निरामयः की भावना, न जाने कहाँ 
गए वो पृष्ठ जिनकी पंक्तियों 
में सुलगते थे, मानवता 
के अखंडित लौ, 
वो कल्प 
वृक्ष जिसकी शाखाओं में उगते थे देश प्रेम के 
कोंपल, वो  भव्य बरगदी वात्सल्य जो 
समेट ले अपनी छाया में सभी 
को समरसता के साथ, 
न जाने कहाँ 
गयीं  वो
संवेदनाएं जो कभी बहती थी ह्रदय मध्य, अब 
तो सांस भी लेनी हो तो लेनी होगी 
भ्रष्ट शासकों  से अनुमति, 
अपना मृत देह लिए 
फिर मैं खड़ा 
हूँ उसी 
मणिकर्णिका घाट पर दोबारा कोई तो आगे 
बढे, करे मुझे श्मशान शुल्क से 
मुक्त कि चाहती है मेरी 
आत्मा इस पवित्र 
भूमि में 
दोबारा मोक्ष प्राप्ति - - - 

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

Sun Rising in Fog

  

28 मार्च, 2012


आत्मसात 

मूल्यांकन जो भी हो, सच तो ये है कि अस्तित्व 
को बिखेरना सहज नहीं, चौखट के बाहर
मैं रहूँ या परछाई, हर दृष्टि में
न मैं याचक न तुम ही हो 
दाता, उनकी 
अपनी हों,
कदाचित  बाध्यताएं, आंचल समेटने से पूर्व  बंद 
हो गए आशीषों के द्वार, भाग्य लेखन 
जो भी हो, बंद होते नहीं उद्भासित 
दिव्य पांथशाला, सुपात्र  की 
परिभाषा किसने गढ़ी
उन्हें सठिक हो 
ज्ञात,
ऋत्विक ने तो सींचा था पवित्र जल सबके लिए 
एक समान, ये कहना कठिन है, कौन
कितना और किस तरह कर 
सका उसे परिपूर्ण 
आत्मसात.

- शांतनु सान्याल 
mystic light 



अदृश्य छाया 

अंतहीन चाहत जीवन के, लेकिन हाथों में 
चार प्रहर, कभी तो आ बन कर सांध्य
प्रदीप, शून्य देवालय हैं कब से 
प्रतीक्षारत, उठ चले प्राणों 
से ज्यों धूम्र वलय, 
घिर चले हों 
जैसे 
ईशान्यकोणी मेघदल, कभी तो आ यूँ ही 
निशि पुष्पित गंधों में ढल कर, 
भर जा सांसों में कोई 
चंदनी आभास, 
रख जा 
फिर से कोई, नयन पातों पर स्वप्नील 
आकाश, सजने दे क्लांत यामिनी 
खिल चले हों जैसे रजनी 
गंध के वृंत, लिख 
जा पुनः 
अप्रकाशित, स्निग्ध बिहानी गीत, मन के 
स्वरलिपि हैं आतुर, फिर उसे 
गुनगुनाने को, दे जा 
कोई ओष में 
भीगी 
जीवन प्रभात, तृषित हिय चाहे दो पल 
विश्राम - - - 

- शांतनु सान्याल
rare flower 1

27 मार्च, 2012

अर्थहीन नहीं वो बूंद

इस सुबह शाम के लेखाचित्र में कहीं,
किसी एक बिंदु पर था, ठहरा सा 
प्रणय बूंद पारदर्शी, उठते 
गिरते  तरंगों के 
भीड़ में 
लेकिन वो अपनी बात कह न सका, 
दौड़ गए सब मधुमास के पीछे, 
हस्ताक्षर चाहिए मन में 
या देह की भूमि है 
पंजीयनहीन, 
कहना आसान नहीं, वो चाह कर भी 
ज्यादा दूर बह न सका, एक 
अनुबंध जो कारावास 
में भी मुस्कुराता 
है, जीवन 
की वही प्रतिबद्धता, जो दूसरों के लिए 
उत्कीर्ण हैं, स्वयं की आत्म कथा 
तो अर्थहीन हैं, यही सोच-
उसे  खुले पिंजरे से 
कभी बाहर
उड़ा  न सका, वो बूंद अपनी जगह से आगे 
इसलिए बढ़ न सका - - - 

- शांतनु सान्याल

25 मार्च, 2012

किसी दिन के लिए ही सही - -


रेखांकित पंक्ति  से कभी बाहर निकल कर
तो देखें, हाशिये में भी कुछ सांसों के 
शब्द हैं जीवित, हस्तलिपि 
उसकी  ठीक नहीं तो 
क्या, कभी 
हथेली पर बिखरे रेखाओं को जोड़ कर तो 
देखें, उस कोने पर जो गुमसुम सा, 
एकाकी बैठा हुआ है शिशु,
कभी समय मिले तो 
उसे पुचकारें, 
सर पर 
ज़रा हाथ फिरा के तो देखें, जीवन का प्रति -
बिम्ब है अधूरा, अहाते में बिखरे हुए 
फूलों को पुष्पदान में सजा के 
तो देखें, आत्मीयता की 
परिभाषा जो भी हो, 
कभी किसी 
दिन के लिए ग़ैरों को भी अपना बना के तो 
देखें - - - 

- शांतनु सान्याल  
Painting  - a child - by Denise Cole 

24 मार्च, 2012


परिचयहीन 

अर्थहीन न थी वो अंतर्मन की यात्रा, इसी 
बहाने सही, स्वयं को पहचानने 
का तो अवसर मिला, मैं 
चाह कर भी उसे 
भूला न 
सका, वो चाह कर भी मेरे समीप आ न 
सका, इस नीरवता में थे न जाने 
कितने भावनाएं समाधिस्थ, 
द्वार तक पग बढे थे 
लेकिन पा कर 
भी उसे 
पा न सका, गंतव्य था मेरे सामने बांह 
फैलाए, क़दम उठने से पहले 
ढह गए सभी ताश के 
घर सहसा, हाथ
बढे 
लेकिन छलकता जाम उठा न सका, फिर 
जीत गए तुम नियति के साथ,
अप्रत्याशित भू कम्पन, 
उस मोड़ तक मैं 
जा न सका, 
पा के 
भी तुम्हें पा न सका, अपना परिचय बता न 
सका. 

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/ 
Art Quiet Pond by  Robert Kuhn 







21 मार्च, 2012

उठालो अहद दोबारा 

अजीब सी है दीवानगी किसी मोड़ पे रूकती ही नहीं,
आवारापन और ये परछाई कभी वो मुझ से
आगे और कभी ज़िन्दगी है हैराँ खड़ी
मेरे सामने, वो फ़सील जो
ढह गया  बुझ कर,
ज़माना हुआ,
कौनसी
आंच लिए जिगर में भटकती हैं, फिर  तुम्हारी -
मुहोब्बत, पिघल कर, धुएं में उड़ गए
मोम से जज़्बात, अब शमा की
दुहाई लाज़िम नहीं,  हो
सके तो चुन लो
आसमां के
आंसू,
सुलगते दामन में बेक़रार से हैं हसरतों की कलियाँ,
भीग जाएँ दोबारा मुरझाये जुस्तजू, कि
सूरज निकलने में ज़रा वक़्त है
बाक़ी, उठा भी लो फिर
मुस्कराने का
अहद,
ज़िन्दगी टूट कर पुकारती है  तुम्हें बार बार - - -

- शांतनु सान्याल 
अहद -commitment 
फ़सील - firewall 

08 मार्च, 2012


तन मन रंग डारी उसने -

कौन रंग गया देह से लेकर गहन मन की भावना,
वो शाश्वत स्पर्श, सजा गया इन्द्रधनुषी संवेदना,

अकस्मात्  झंकृत, ज्यों सुप्त जीवन के  सरगम,
कहीं आँचल, कहीं काजल , होश नहीं कहाँ हैं  हम, 

पूछते हैं, ख़ुद से ख़ुद का ही  खोया  हुआ  ठिकाना,
जमुना बहे कि प्रणय नीर मुश्किल है, उभर आना,

कदम्ब डार या बाहों का हार, हर ओर उड़े गुलाल, 
तन छुए तो मन अकुलाय, कैसा है ये मायाजाल,

- शांतनु सान्याल
PAINTING BY SARITA SINGH - INDIA

02 मार्च, 2012

जलते पगडंडियों में दूर तक -

वो बिखराव जो समेटता है मुझे अपने हर बूँद
में, उसी भीगे अहसास में ज़िन्दगी चाहती
है फिर बिखर जाना, वही मुस्कान जो
मुझे देता है सुकूं, हर बार टूट कर
जुड़ से जाते हैं सांसों के
नाज़ुक मरासिम,
अभी तो
छुआ है सिर्फ़ ख़ुश्बू की परत को, क़ुर्बत को
ज़रा और महक जाने दे, सजे कुछ
देर और  जाफ़रानी शाम, ढले
तो सही सूरज मुक्कमल
तौर से, रात के
आँचल में
उभरे ख़्वाबों के कशीदाकारी, छन कर आने दे
गुलमोहर के पत्तों से थोड़ी सी चांदनी,
रूह ओ ज़िन्दगी फिर चाहती हैं
चंद लम्हात  तेरी निगाहों
के छाँव में यूँ ही
गुज़ारना,
फिर चाहे तो ले चल, क़िस्मत मुझे दहकते हुए
पगडंडियों में दूर तक - - -

- शांतनु सान्याल



23 फ़रवरी, 2012



हमदर्द  कोई - - - 

हिज़ाब उठते ही हाकिम का चेहरा
जाने क्यूँ सर्द हुआ -

मुस्कराने की सज़ा बयां की थी 
हमने, सिर्फ़ इतनी सी थी बात,
दिल टूटा था हमारा लेकिन -
जाने उसके सीने में क्यूँ दर्द हुआ, 

वो देखते रहे मुझे मजरूह  -
निगाहों से यूँ बार बार , गोया 
सारा शहर पल भर में किसी 
आतिशफिशां के हाथ  सुपुर्द हुआ,

चाह कर भी किसी ने, न 
उठाई बुलंद आवाज़ उसके 
खिलाफ़, कहने को ये तमाम 
दुनिया लेकिन  मेरा हमदर्द हुआ,

- शांतनु सान्याल
 http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
Earth - Bartosz Beda paint exhibition
Journey To The Center Of The Earth, Lagoon Reveal Concept Art.

18 फ़रवरी, 2012

ज़रा सी देर 

इस रात की अपनी ही हैं कुछ मजबूरियां
चांदनी छू तो जातीं हैं जिस्म
लेकिन छूट से जाते हैं
कहीं दूर जज़्बात
के दुनिया !
उसके बातों में हैं उम्मीद की ख़ुश्बू, मेरे
दिल में हैं मगर दर्द की अब तलक
परछाइयाँ, संभलने दे  ज़रा
न दे दस्तक यूँ बेक़रार
हो कर, अभी
अभी ज़िन्दगी ने सिखा है लड़खड़ा कर
चलना, होश आ ले तो ज़रा फिर
खोल दूँ , मैं सभी बंद
रोशनदान और
 खिड़कियाँ - - -
-- शांतनु सान्याल

15 फ़रवरी, 2012


गुमशुदा रहने दे मुझे यूँ ही - - 

हासिल क्या था, क्या नहीं कभी सोचा ही नहीं,
जो मिल गए चलते चलते कहीं, किसी 
मोड़ पे वो कभी, मुस्कराए ज़रूर 
देखा भी इक नज़र और 
बादलों की मानिंद 
बिन रुके 
गुज़र गए, ज़िन्दगी ठहरी रही देर तक उसी 
जगह जहाँ से रूठा था सावन सदियों 
पहले, कि बियाबां के सिवा अब 
यहाँ कुछ भी नहीं, न कोई 
शिकायत, न ही बाक़ी
ख्वाहिशों की
फ़ेहरिस्त, 
बुझ चले हैं चाहत के वो सभी चिराग़, उम्र 
का भी अपना है अलहदा हिसाब, 
न छेड़ शाम ढलते फिर 
वही पुरानी बात, 
मुश्किल से 
ज़िन्दगी को मिली है, इक मुश्त निजात, न 
कर फिर मुतालबा मेरी जां दोबारा, 
कि मुमकिन नहीं बार बार यूँ 
इश्क़े ज़हर पीना, हर 
लम्हा जीना और 
हर लम्हा 
मरना, 
रहने दे मेरा अक्स अजनबी वक़्त के आइने में,
गुमशुदा होना चाहे है दिल फिर तेरे 
शहर में - - - 

-- शांतनु सान्याल
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Painting by Matthew Scheuerman 

08 फ़रवरी, 2012


ला उन्वान (untitled )

यूँ  तोहमत लिए हम तेरी बज़्म से उठ आये,
कि अजनबी बादलों का बरसना नहीं लाज़िम,

प्यासी ज़मीं, प्यासे लोग हर सिम्त ख़ामोशी !
है बेदर्द आसमान यहाँ, तड़पना नहीं लाज़िम, 

हर आहट में कोई अपना ही हो ये ज़रूरी नहीं,
ग़ैरों के लिए भी कभी, बिखरना नहीं लाज़िम,

वो सवाल जो ख़ुद इक जवाब हो गहराई लिए,
क्यूँ बेवा सांझ का, फिर संवरना नहीं लाज़िम,

-- शांतनु सान्याल
Evening rain in London painting by David Atkins


30 जनवरी, 2012


हमने भी जीना सीख लिया 

तपते राहों से गुज़रना था लाज़िम,
परछाइयों ने वक़्त देखते ही 
रुख़ अपना बदल लिया, 
ज़िन्दगी ने भी हर
मोड़ पर ख़ुद को 
मोड़ना, सीख 
लिया, 
वो ख़्वाब जो कभी झूलते थे 
रस्सियों में, भीगे कपड़ों 
की तरह, साँझ से 
पहले उन्हें 
हमने 
भी सहेज कर छत से, तह करके 
सरहाने सजा के रखना, देर 
से सही लेकिन आख़िर 
सीख लिया, वो 
मुहोब्बत जो 
देता रहा 
फ़रेब मुझको, वक़्त के साथ दिल 
भी उस इश्क़ से खुबसूरत
किनाराकशी करना 
सीख लिया. 
ज़माना अब कहे चाहे जो मर्ज़ी 
हमने भी सायादार दरख्तों 
को दोस्त बनाने का 
हुनर सीख लिया.

-- शांतनु सान्याल
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22 जनवरी, 2012


अलाव की तरह 

न दिला, याद वो वहशी रात का आलम,
मैंने ख़ुद को है, जलाया अलाव की तरह,

उजाला जो दे जाय, इक हलकी सी हंसी,
जीवन को है बिखेरा मैंने बहाव की तरह,

चाह कर भी छू न सके वो दामन मेरा -
बाअज़ बढ़ाया हाथ हमने नाव की तरह, 

कोई पहलु उसे अक्सर उलझाये रहा,वो  
अक्सर मुझसे मिला भटकाव की तरह,

वादी की ख़ामोशी रही बरक़रार मुद्दतों 
अपना रिश्ता यूँ रहा धूप छांव की तरह,

आज भी देखता है शिफ़र आँखों से मुझे,
दिल में है इश्क़ किसी ठहराव की तरह, 

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/





20 जनवरी, 2012

सूर्य की प्रथम किरण

भाषाहीन आँखें तकती रहीं एकदृष्ट
आंसुओं में तैरतीं वो भावनाएं,
कोई श्रावणी संध्या जिसने
भिगोया था हमें सुदूर
मालविका वन में,
कभी तुमने
जलाया
था बरगद तले मिटटी का दीपक
साँझ ढले, कभी तुमने
पुकारा था उपनाम
से मुझे जिसे
सुनने को
तरसती रहीं निगाहें, उन घाटियों
के उसपार शायद है कोई
तितलियों का शहर
अक्सर आधी
रात, उड़
आतें हैं रंगीन सपनों के टूटे पंख,
खिड़कियों के कांच में प्रायः
दिखाई दे जाते हैं कुछ
घनीभूत प्रणय
बूंद के झालर,
मैं बेचैनी से आज भी सुबह की
प्रतीक्षा करता हूँ, तू सूर्य
की प्रथम किरण बन
कर ह्रदय के अर्ध
विकसित फूल
को फिर इक बार खिला जाए,
ज़िन्दगी में पुनः रंग
भर जाए - - -

-- शांतनु सान्याल

18 जनवरी, 2012

नज़्म - - अंदाज़े वफ़ा है जुनूनी

तू वही है जो अँधेरे में भी दिखाई दे जाए,
इस रात की उफनती सांसों में मेरा
भी ज़िक्र हो शायद, तू फिर
कहीं से आये थाम ले
मेरी बाहें,  डूबने
से पहले
उबार ले जाए,लोग कहते हैं  मेरा अंदाज़े
 वफ़ा  है जुनूनी, पिघलते रेत की
मानिंद है मेरा वजूद
बेमिशाल, किसी
की चाहत में
ज़िन्दगी
ढलती है गर्म भट्टियों से गुज़र कर, यूँ
कांच की तरह खुबसूरत, ग़र
हाथ से फिसल जाए,
तो उम्र भर टूटने
का सदमा
बना रहे,  
डूबते तारों ने दिया था तेरे घर का ठिकाना !
तेरी इक झलक में यूँ ज़माना गुज़र
गया हमें ख़बर ही नहीं, हम
आज भी वहीँ हैं खड़े
जहाँ से ज़िन्दगी
तुम्हारे
हमराह हो गई, आज भी मुन्तज़िर है संगे
साहिल  तेरे इक लम्स के लिए, आज  
भी दिल को है अज़ाब से उभरने
की ख्वाहिस, तपते ज़मीं
से उठीं हैं दुआएं,
 कभी तो हो
तेरी नज़र
मेहरबां, कभी तो मेरी अक़ीदत यक़ीं पाए,   
जिस्मानी मेल से उठ कर है कहीं
उस मुहोब्बत के मानी, कभी
तो उसे क़बूल करे, कभी
तो मेरी ज़ात का दम
भरे, कुछ पल के
लिए ही सही,
मज़लूम ज़िन्दगियों को तेरे साए में राहत मिले !

- - शांतनु सान्याल  





14 जनवरी, 2012

नज़्म - - अंतर्मन,

बहुत क़रीब से दिल के गुज़रे मगर छू न सके 
अंतर्मन, असमय मेघ की भांति ठहरे 
ज़रूर शिखर पर, चाह कर भी वो 
बारिश की बूंदों में तब्दील 
हो न सके, तपती 
घाटियों की 
तरह 
अतृप्त भावनाएं, बादलों का यूँ गुज़रना
 देखती रही, विगत रात न जाने 
क्या हुआ, आकाशगंगा के 
किनारे सभी ख़्वाब
बैठे रहे मातमी 
चेहरा लिए !
हमने 
बहुत चाहा, आँखों में बसाना उनको, वो 
आये ज़रूर नज़र हमको लेकिन 
तासीर में शायद कुछ कमी 
थी, वर्ना उनका अक्स 
उभर कर निगाहों 
से यूँ फिसलता 
नहीं - - - 

- - शांतनु सान्याल 
 

30 दिसंबर, 2011

नज़्म - - शर्तों में ही सही

शर्तों में ही सही, उसने साथ जीने की क़सम 
खाई है, फिर वहीँ से चल पड़े हम जहाँ 
पे कभी उसने साथ छोड़ा था, न 
जाने क्यूँ उसी मक़ाम पर 
आते ही उसकी 
उँगलियाँ 
ख़ुद ब
ख़ुद 
छोड़ जाती हैं हाथ मेरा, शायद उसे ऊँचाइयों 
से डर लगता है, लेकिन इन्हीं घाटियों 
से मिलती है प्रेरणा मुझ को, वो 
खौफ़ जो उसे रखती है दूर,
उन्हीं कांपती सांसों में,
ज़िन्दगी उसे थाम
लेती है सीने से 
लगा कर, 
बरबस !
ये कौन सी अदा है उसकी अक्सर सोचता हूँ 
मैं, जब कभी वो क़रीब आये इक 
ख़मोश खुमारी भी साथ लाये,
बहकना या डगमगाना
ये आदत तो आम 
है लेकिन 
उनकी 
आँखों का नशा है जाने क्या, जब भी देखा 
उन्हें डूब कर, ज़िन्दगी मुक़म्मल
 बेहोश नज़र 
आये ----

--- शांतनु सान्याल
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28 दिसंबर, 2011

नज़्म - - ज़िन्दगी की राहें,

उठती हैं कहाँ से ये दीर्घ श्वास की बूंदें 
साँझ से बोझिल है ज़िन्दगी की 
राहें,राहतों का हिसाब
रखना न था आसां,
न जाने क्या 
पिलाते 
रहे 
वो दवा के नाम पर, हमने भी की बंद 
आँखें, मुहोब्बत के नाम पर, कहाँ 
से आती हैं ये रुक रुक की 
सदायें, दिल को अब 
तलक यकीं है
वो चाहते 
हैं मुझे, 
ये वहम ही हमें रोक रखता है क़रीब
उनके,  वर्ना बहारों को गुज़रे 
ज़माना हुआ - - - 

- - शांतनु सान्याल
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 PAINTING BY Harry Brioche_evening_sky

05 दिसंबर, 2011

उद्भासित अंतर्मन

निबिड़, आर्द्र अंधकार में उभरती ज्योति पुंज !
प्रायः कर जाती है अंतर्मन आलोकित,
मैं और मेरी छाया, निस्तब्ध 
रात्रि में करते हैं वार्तालाप, 
कहाँ और कैसे छूट
गए मुलायम 
तटबंध,
कुछ अंकुरित स्वप्न, कुछ सुप्त अभिलाषाएं,
जीवन कगार में अध खिले कुछ अनाम
पुष्प, जो अर्ध विकसित ही रहे, 
खिल न सके वो घनीभूत 
भावनाएं, समय की 
तपन पिघला न 
सकी वो 
अतृप्त पिपासा, बिखरी ही रहीं जीर्ण पल्लव 
पर, अनमोल ओष बिन्दुओं के सदृश,
तुम्हारा प्रेम, चाह कर छू न सका 
वो गीत बिखरा रहा संवेदना 
के तारों पर लापरवाही 
से आजन्म, इस 
उधेड़बुन में 
व्यस्त रहा जीवन कि हो पूर्ण संग्रह ब्रह्माण्ड 
हथेलियों में सिमट कर, वो वृष्टि छायित 
भू भाग कभी भीग ही न पाया, 
जबकि सजल नयन थी 
सम्मुख हर पल, 
फिर कभी 
अगर 
पुनर्जीवन हो प्राप्त, ह्रदय लिखेगा वास्तविक 
जीवन उपसंहार, यर्थाथ की कड़वाहट,
नग्न सत्य, छद्मविहीन चरित्र,
सम्पूर्ण सौन्दर्य, आवरण -
हीन प्रतिबिम्ब,

- - शांतनु सान्याल

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