25 फ़रवरी, 2013

जिल्द के मानी - -

इक  रौशनी जो कर जाए अंतःकरण तक
रौशन, इक बूंद जो तेरी अनुकंपित
निगाह से टपके, कर जाए
जीवन मुक्कमल,
हर साँस में
हो जैसे
तेरा अक्स निहित, कि किसीका दर्द ओ -
ग़म न हो मुझसे जुदा, ये अहसास
न मुरझाये कभी कि इक
इंसानियत ही है
आला तरीन
मज़हब,
बाक़ी किताबों की बातें रहने दे सुनहरी - -
सफ़ात में बंद, ख़ूबसूरत जिल्द
के मानी नहीं कि दास्तां
ए ज़िन्दगी भी होगी
दिलकश !
* *
- शांतनु सान्याल  


22 फ़रवरी, 2013

तारीफ़नश्दा - -

ये कांच से नाज़ुक, हसीं अहसास !
कि इक खौफ़ सा दिल में
बना रहता है हर
लम्हा, कहीं
टूट न
जाए ये महीन धागे, मख़फ़ी रंगों
में ढले, न खेल यूँ, तू मेरी
धड़कनों के साथ, कि
सांस लेना भी
हो जाए
मुश्किल, बहोत तरमीन के बाद
कहीं उभरी है तस्वीर ए
मुक़्क़दस, ये इश्क़
नहीं जिस्मानी,
कि मेरी
मुहोब्बत है इक तारीफ़नश्दा - -
अहसास ए बेनज़ीर !
* *
- शांतनु सान्याल

अर्थ -
मख़फ़ी - रहस्य
तरमीन - साधना
तारीफ़नश्दा - अपरिभाषित
 बेनज़ीर - अद्वित्य

 

16 फ़रवरी, 2013

ख़्वाब नए - -

न फ़लक, न ज़मीं, हद ए नज़र, ये
कैसा इदराक दिल में है छाने
चला, इक ख़ालीपन
है हर सिम्त,
ग़ैर
मुन्तज़िर कोई नादीद अब्र, हो - -
जैसे बेक़रार सा, बिखर
जाने को,ये कैसा
जज़्ब तासीर
है उनकी  
निगाहों का, हर शै है कोहरे में डूबा
हुआ इक सिवाय उन
झिलमिलाते
साहिल
ए पलक, कि हर बार ज़िन्दगी - -
उभर आती है मुक़्क़दस
सीडियों के किनारे,
वो पोशीदा
हाथ
मुझे कभी डूबने नहीं देते, हर बार
जल उठते हैं उदास, चिराग़ -
ए शब लिए सीने में,
सुलगते ख़्वाब
नए - -
* *
- शांतनु सान्याल

ख़्वाब नए - -



13 फ़रवरी, 2013

अभिलाष चिरंतन - -


अशेष कहाँ, ये अभिलाष चिरंतन
उस छवि में निहित जीवन मरण,
प्रति पल प्रगाढ़ झंझावात, प्रति -
क्षण सम्मुख,एक खंडित दर्पण।

उदय अस्त, अहर्निश निरंतरता
पुष्पित मन, कभी बिन आवरण,
मृगजल या मायावी प्रणय गंध -
नीरव, कभी अधीर अंतःकरण।

तृषित नेत्र व्याकुल देखे चहुँ दिश
न ही निद्रित, न ही पूर्ण जागरण,
सत्य-असत्य या कोई दृष्टी भ्रम
अज्ञात यात्रा दे, पुनः आमन्त्रण ।
* *
- शांतनु सान्याल
 

07 फ़रवरी, 2013

तेरी इक नज़र - -

अहसास अबरी, साँस मद्धम, कभी तो
छू जा, तू मेरी मंजमद जज़्बात !
इक ज़माने से, लिए बैठे हैं -
दिल में, टूट कर
बिखरने
की ख़्वाहिश, न कर यूँ नज़र अंदाज़ -
कि बड़ी मुश्किल से कभी -
उभरते हैं, सहरा ए
आसमां पे
अब्र घुम्मकड़, रेत में दफ़न ख़्वाबों से
कभी कभी खिलते हैं गुल -
ख़ारदार, कि तेरी इक
नज़र में है
मोजूद,
उम्र भर की दुआओं का असर - -
* *
- शांतनु सान्याल  


05 फ़रवरी, 2013

रूह ख़ाना बदोश !

मेरे हिस्से की धूप थी काफ़ी या नाकाफ़ी, -
अब उसके मानी कुछ भी नहीं, ये
सच है कि उस महदूद दायरे
में, जीना हमने सीख
लिया, इक ज़रा
सी रौशनी ही
बहोत थी गुंचा ए तक़दीर बदलने के लिए,
अँधेरा है दोस्त क़दीमी अपना, हर
वक़्त रहता है दिल के क़रीब
यूँ साए की तरह, धूप
तो है रूह ख़ाना
बदोश !
वक़त ही नहीं देता ज़रा सँभलने के लिए,
अभी अभी था आसमां पर छाया
शाह ए रौशनी की मानिंद,
पलक झपकते न
जाने कहाँ
से उड़ आये बादलों के गिरोह आवारा, अब
भीगने के सिवा कोई रास्ता नहीं
बाक़ी  - -
* *
- शांतनु सान्याल

02 फ़रवरी, 2013

मबहम चश्म - -


लब ख़ामोश रहे, मबहम चश्म से उभरे
कुछ बाअहसास दर्द, रफ़्ता रफ़्ता
उसका चेहरा दूर होता गया,
इक धुंध सी छायी
रही दरमियां
हमारे,
जाती हुई बहार का दामन हाथों से छूट
गया, लौट कर शायद उसने देखा
होगा ज़रूर, इक तीरगी के
सिवा कुछ न था दूर
तक उसके जाने
के बाद !
चाँद ढला भी नहीं,और उजालों की - -
दुनिया कोई लूट गया।
* *
- शांतनु सान्याल
मबहम चश्म - धुंधली आँखें

31 जनवरी, 2013

भीगे ख़्वाब की बूंदें - -

समा वो तारों भरा, बेरहम रात ने
जाते जाते यूँ उलट दी, कि 
कोई निशां ए दरार 
नहीं बाक़ी, 
दूर तक बिखरे हैं क़तरा ए शबनम 
या मेरी आँखों से टूटे हैं कुछ 
भीगे ख़्वाब की बूंदें,
सीने में अब 
तलक 
रुके रुके से हैं, तेरी लब से छलके -
हुए कुछ नूर ए ज़िन्दगी, या 
उम्र भर तड़पने का 
अज़ाब दे कोई,
सूरज !
शायद है रहनुमा तुम्हारा, यहाँ इक 
अँधेरा है बेकरां मुसलसल - -
* * 
- शांतनु सान्याल 

समां - आकाश 
अज़ाब - अभिशाप 


29 जनवरी, 2013

इक अदद चेहरा - -

मुखौटों की भीड़, और    इक अदद ख़ालिस चेहरे 
की तलाश, बहोत मुश्किल है बहरान 
दरिया की सतह पर, अक्स 
नाख़ुदा का उभरना !
हर एक मोड़ 
पे हैं भरम जाल, कौन है ख़ून इशाम और कौन 
मसीहा, फ़र्क़ नहीं आसां, कि हर नुक्कड़ 
की दीवार पर लिखे हैं, ग़ैर वाज़ी 
फ़लसफ़े के लुभावने 
इश्तहार !
हर शख्स दिखाता है यहाँ आसमानी बाग़, हर 
क़दम पे हैं शिफ़र की सीड़ियाँ, तै करना 
है ख़ुद को बहोत सोच समझ कर,
ये वजूद नहीं कोई 
नीलामी का 
मज़मून,
कि अब तलक ज़िन्दा है इक अदद  ज़मीर मेरा,
* * 
- शांतनु सान्याल 
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ख़ालिस - शुद्ध 
बहरान दरिया - आंदोलित नदी 
नाखुदा - मल्लाह 
ख़ून इशाम - रक्त पिशाच 
मज़मून - नमूना 
ग़ैर वाज़ी - अस्पष्ट 
शिफ़र - शून्य 
Desert Bloom - no idea about painter 

27 जनवरी, 2013

क़रार ताल्लुक़ - -

वो सभी चेहरे, जाने पहचाने, लगे पहलु बदलने,
जब ढलती धूप ने मुझसे, क़रार ताल्लुक़ 
तोड़ लिया, इक अँधेरा है मेहरबां 
अपना, जो निभाता है 
अहद ए क़दीम 
बारहा,
वो सदाएँ जिनमे थीं कभी तासीर ज़िन्दगी, न 
जाने क्या हुआ, वादियों तक जा कर 
फिर कभी न लौट पायीं, शायद 
सुबह ओ शाम के दरमियां 
थे सदियों के रुकावटें,
इक इंतज़ार 
बेशुमार,
और न आने के बहाने हज़ार, कि ज़िन्दगी -
अब दर्द को दवा में तब्दील कर 
चली है आहिस्ता - -
आहिस्ता !
- शांतनु सान्याल 
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painting by artist Paul Wolber ...

22 जनवरी, 2013

इक ख्वाहिश - -

तहलील तो हो जाऊं, ग़र सीप सा दिल 
मिले कोई, एक मुद्दत से हूँ लिए 
सीने में ख़्वाब अबरेशमी,
क़तरात नदा मेरी 
आँखों में 
ठहरे हैं इक ज़माने से यूँ टपकने की 
चाहत लिए हुए - - 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ :
तहलील - घुलना 
ख़्वाब अबरेशमी - रेशमी स्वप्न 
क़तरात नदा - ओस की बूंदें 

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sea shell art 

20 जनवरी, 2013

कोई ख़्वाब - -

मालूम है ख़्वाब ओ शीशे में फ़र्क़ कुछ भी
नहीं, फिर भी आज रात के लिए 
कुछ ख़्वाब तो हसीं दे जाए,
बड़ी अहतियात से 
सजाई है दिल 
की ज़मीं, 
कुछ लम्हा सही, कहकशां से उतर कर - 
तेरी मुहोब्बत की रौशनी, जिस्म 
ओ जां पर कामिल बिखर 
जाए - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by Anthony Forster 

18 जनवरी, 2013

बर्ग ए जदीद - -


महवर ए फ़सील पर न रख ज़िन्दगी मेरी,
कहीं जल के फिर दोबारा अक्स ए 
आतिशफिशां  न बन जाऊं, 
ये तेरी आज़माइश न 
कर दे मुझे इक 
शोला 
ए जुनूं, पिघलूं कुछ इस तरह कि सारी - 
दुनिया में बरपे हंगामा, रहने दे 
मुझे नर्म ज़मीं के निचे,
नूर ए सहर की 
चाहत लिए,
कि तेरी मुहोब्बत में इक दिन वजूद हो 
जाए बर्ग ए जदीद - - 
* * 
- शांतनु सान्याल
अर्थ - 
महवर ए फ़सील - आग की दीवारों के बीच 
बर्ग ए जदीद - नया पत्ता 
नूर ए सहर - सुबह की किरण
आतिशफिशां - ज्वालामुखी 
शोला ए जुनूं - आवेगी शिखा 

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Artist-Gervie G. Macahia

क़फ़स ए जुनूं - -

नहीं चाहिए, वो मरहम जो ज़ख्म भर जाए -
बग़ैर इलामत के, कुछ और वक़्त 
चाहिए मुझको दर्द ज़ाद 
होने के लिए, 
वो दुनिया जो कुरेदती है ख़ाक ए वजूद मेरा,
नहीं चाहिए, वो चेहरा फ़रिश्ता, जो 
मसीहाई के नाम पर, दे जाए 
फिर मुझे धोका, इक 
मुश्त और ग़म 
चाहिए मुझे,
मुक्कमल बर्बाद होने के लिए, रूह करती है 
मिन्नतें, क़फ़स ए जुनूं से अक्सर,
चंद रोज़ और चाहिए मुझे,
ख़ुद से आज़ाद होने 
के लिए - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by albert gallery 



16 जनवरी, 2013

शब मोहोम - -

ये शब मोहोम है, या मेरी आँखों में किसी ने 
तिलिस्म भर दिया, ये कैसा वहम छाया 
कि थम चली है, सारी ख़ुदायी, न 
जागे से हैं मेरे जज़्बात, न 
सोयी सी ये तन्हाई, 
न जाने किस 
मोड़ पर 
आ गई ज़िन्दगी, वो सनम है या कोई हक़िक़ी -
ख़्वाब की सूरत, हर क़दम इक राज़ 
गहरा, हर लम्हा कोई लहराती 
सराब, हर जानिब इक 
सदा बाज़गश्त !
उनकी 
निगाहों में कहीं तैरती हैं, मेरी साँसों की बेशुमार 
रंगीन कश्तियाँ - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
शब मोहोम - मायावी रात 
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on Snowy Night Painting by Sabrina Zbasnik 

15 जनवरी, 2013

चश्म ए ज़िन्दां - -

उन चश्म ए ज़िन्दां में ज़िन्दगी चाहती है, 
ताउम्र क़ैद होना, उनसे मिल कर 
मैं, ज़ीस्त ए  ख़ानाबदोश 
भूल गया, ये ज़मीं 
वो आसमां,
कभी 
थे बहोत आशना, न जाने क्या हुआ -
क्यूँ कर हुआ, आईना है मेरे 
रूबरू लेकिन अफ़सोस 
मैं अपना ही 
अक्स 
भूल गया, उस तस्वीर में हैं, जाने कितने 
रंगीन मोड़, कितने उलझे राज़ ए 
ज़िन्दगी, उन ख़ामोश 
निगाहों को देख,
उफ़नते 
ज़रियां का जोश ओ ख़रोश भूल गया - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by Sekhar Roy








14 जनवरी, 2013

इक मेरे सिवाय - -


तेरी साँसों में कहीं, आज भी महकती है,
मेरी भावनाओं की ख़ुशबू, मानो या
न मानो, आज भी गहरी आँखों
में हैं कहीं, मुझे पाने की 
अथक चाहत, जिसे 
तूने मृगतृषा 
समझा, 
वो कुछ और नहीं, मेरी मुहोब्बत की थी 
तपन, अब तलक तेरी हस्ती में 
हूँ मैं शामिल, इस मरू 
प्रांतर में इक मेरे 
सिवाय कोई 
बादल
का साया नहीं, और यही वजह है जो -
मुझे मुहाजिर होने नहीं देता,
* * 
- शांतनु सान्याल  
 art by Alexei Butirskiy

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03 जनवरी, 2013

वो परिशां था बहोत - -

वो परिशां था बहोत देख मेरी हालत 
ए जुनूं, उसे अंदाज़ कहाँ यूँ 
परस्तिश में ख़ुद को 
मिटा जाना,
न शमा कोई, न बज़्म की इफ़्त्ताह,
आसां कहाँ किसी की चाह में 
जिस्म ओ जां को यूँ 
जला जाना, 
उस आशिक़ ए रूह की थी अपनी 
ही ग़ैर मामूली वज़ाहत,
बेसदा हो दिल में 
समा जाना, 
न कोई सबूत, न ही शनाख्त की 
गुंजाइश, उस शोला निहां 
की तपिश में थी 
इक बेनज़ीर 
कशिश 
मुमिकन कहाँ वर्ना इश्क़ में इस 
तरह वजूद का पिघल 
जाना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल
परस्तिश - पूजा
बज़्म - महफ़िल
इफ़्त्ताह - शुरुआत ,
वज़ाहत - वर्णन ,
बेनज़ीर - निराला 
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no idea about creator 1

02 जनवरी, 2013

वही शख़्स - -

न फेर यूँ निगाहें, उसकी दुआओं में है 
शामिल जहाँ की ख़ूबसूरती, वो 
वही शख़्स है जिसने तुझे 
अता की ज़िन्दगी,
वो वही 
आलम ए रौशनी है जिसकी पनाह में 
है दुनिया ओ बहिश्त की अमन 
ओ ख़ुशी, न कर यूँ तू 
नज़रअंदाज़ 
उसकी 
शख़्सियत में है कहीं सदा ए ख़ुदा, वो 
वही शख़्स है जिसने तुझे 
सिखाया इस ज़मीं 
पर दो क़दम 
चलना -
* * 
- शांतनु सान्याल 
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WENDY LEEDY ART

21 दिसंबर, 2012

मस्मुमियत दर्दनाक !

तीर कोई जो गुज़रा है, दिल के पार अभी,
ख़ामोश बग़ैर इशारा, संभल भी पाते 
कि कर गई मजरुह जिस्म ओ 
जां, किसी की इक नज़र,
अभी तलक है इक 
मस्मुमियत 
दर्दनाक !
इलाज ए दायमी नज़र न आए दूर तक !
ज़िन्दगी फिर है परेशां, न है ज़मीं 
हमदर्द और न ही आशना ऐ 
आसमां, ये वजूद 
है मेरा या 
ग़ैर मुतमईन भटकती रूह ए क़दीम - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
मस्मुमियत - नशा 
दायमी - दीर्घ 
ग़ैर मुतमईन - अतृप्त 
क़दीम - प्राचीन 
 Dzign Art

07 दिसंबर, 2012

ज़िंदगी का रुख़ - -

अनजाने ही हम बहुत दूर यूँ आ गए कि 
मुमकिन नहीं, बाहमी क़रार तोड़ देना,

दर चश्म अंदाज़ हैं, उभरते कई  ख़्वाब 
मुश्किल है,लेकिन सारा जहाँ छोड़ देना,

तूही नहीं, इक मक़सद ए ज़िन्दगी मेरी,
आसां कहां, सब ख़ुशी तुझसे जोड़ देना, 

तरजीह की कसौटी है, यूं उलझन भरी -
नहीं लाज़िम ज़िंदगी का रुख़ मोड़ देना !

- शांतनु सान्याल 
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art by Petra Ackermann

06 दिसंबर, 2012

हमें मंज़ूर नहीं - -

कर सके तो करो मुझे अहसास, अभी इसी पल,
जां तो महज है उठती गिरती सांसों का 
इक ताना बाना, हमने तो रूह 
तक लिख दी तुम्हारे 
नाम, नतीजा 
जो भी 
हो इस दीवानगी का, आतिशफिशां कहो या -
कोई और सुलगता सा तुफ़ान, इक 
जूनून ए फ़िदा है मेरी चाहत,
आसमां से भी लौट 
आती है हर 
दफ़ा, दे  
दस्तक दरब इल्ही, कि तुमसे अलहदगी हमें 
मंज़ूर नहीं - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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दरब इल्ही - स्वर्ग द्वार 
Painting by Jurek Zamoyski 

28 नवंबर, 2012

दो लफ्ज़

वो अभी तलक है सांसों में शामिल, बेइन्तहा 
इक जावेदान ख़ुश्बू की तरह, कोई भी 
चेहरा नहीं दर मुक़ाबिल उसके,
उस बाज़ताब चश्म में मैंने 
देख ली सारी दुनिया,
अब हर एक 
नज़र 
है बेमानी उस ख़ूबसूरत निगाह के सामने - - !
- शांतनु सान्याल 

27 नवंबर, 2012

हमदर्द नज़र - -

इक इंतज़ार जो दे जाए ज़िन्दगी को 
ख़ुशगवार मानी, इक शाम 
कभी ग़लती से ही सही 
लिख जा मेरे 
नाम - - 
कब से हैं मअतर जज़्बात के दरिचे,
कोई लम्हा रख जा मेरी सुर्ख़ 
निगाहों में शबनमी 
ख़्वाब की 
तरह,
मालूम है मुझे रेगिस्तां की हक़ीक़त !
कभी किसी दिन के लिए मेरी 
जां, भिगो जा पल दो पल 
के लिए वीरां पड़े 
ज़िन्दगी के 
रास्ते,
किसी भूले हुए बादलों के मानिंद, कि 
तकती हैं, उदास आँखें तेरी 
इक हमदर्द नज़र के 
लिए - - 

- शांतनु सान्याल  
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art by Francine Dufour Jones

23 नवंबर, 2012

अहसास ए गुलदान - -

नफ़्स मेरा निजात पा न सका, बड़ी 
नफ़ासत के साथ उसने सजायी 
अहसास ए गुलदान, कुछ 
तो है उसकी इसरार 
आमेज़ निगाहों 
की रौशनी 
में, ज़िन्दगी हर क़दम संवर जाती 
है बिखरने से पहले, वो शख्स 
जो मुझे ले जाए अक्सर 
तसव्वुर  से आगे,
किसी और 
ही जहान में, जहां गुलज़ार हैं सभी 
गुल ओ ख़ार, अपनी अपनी 
अंदरूनी ख़ूबसूरती 
लिए हुए - - 

- शांतनु सान्याल 
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इसरार 
आमेज़ - रहस्यमयी 

painting by BARBARA FOX 2

20 नवंबर, 2012

न जाने क्या था - -

उठा कुछ इस तरह, हिजाब उसके 
चेहरे से, गोया बिखरती हो
ख़ुश्बू, रात गहराए 
जास्मिन की 
नाज़ुक 
शाख़ों से ! बेहोश से जिस्म ओ -
ज़ेहन, वो चांदनी थी या 
कोई  ख़ुमार आलूद 
साया, इक 
अनचाहा ख़ूबसूरत नशा, या राज़ 
पोशीदा, ख़ुदा जाने वो क्या 
था, इक तलातुम 
ज़िन्दगी को 
दे गया - - 

- शांतनु सान्याल 
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moonlit flower 

15 नवंबर, 2012

रूह कामिल - -

पैमाना जो भी हो किसी की नज़र में,
वो शख्स कोई दूसरा नहीं मेरे 
अलावा, जो खौफ़ज़दा
सा है ख़ुद की 
नज़र में, ऐतराफ़ करना था बहोत - 
मुश्किल, अक्स था वाज़ी 
अपनी जगह, इक 
लम्बी सी 
फ़हरिस्त नाज़ुक हर्फ़ों में लिखी, वो 
लापता हिसाब या था कोई 
उम्र भर की पोशीदा 
नक्क़ासी,
उभरती रही बारहा छुपाने के बाद ! 
इक साया सा है, जो कर 
जाता है परेशां, हर 
क़दम जिंदगी 
चाहती है, 
इस्लाह  मुसलसल, कोई नहीं यहाँ 
रूह कामिल - - 

- शांतनु सान्याल  
ऐतराफ़ - ख़ुद को पहचानना 
इस्लाह - सुधार 
रूह कामिल - परिपूर्ण आत्मा 
Artist Steven Townsend 
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11 नवंबर, 2012

निजात - -

बहुत दूर आने के बाद, न करो लौट जाने की 
बात, मुमकिन कहाँ सांसों का वापस 
आना, इक बार ग़र हो जाए
कहीं तबादिल, दिल
ओ जां, अब 
ताउम्र 
ए ताल्लुक़ का बिखर जाना नहीं आसां, ये -
और बात है कि बदल जाओ, राह ए 
मंज़िल अपनी, बहोत ही 
मुश्किल है, अहसास 
ए रूह से यूँ 
निजात 
पाना, ख़ामोश ! ज़िन्दगी से कहीं और यूँ ही 
निकल जाना, हर एक  मरहले पे 
होगी मौजूद, कराह ए 
इश्क़, क़दम 
बढ़ाना 
भी चाहोगे तो साँस उभर आएगी - - - - - - 

- शांतनु सान्याल 
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painting by Felipe D Tapia

02 नवंबर, 2012

आख़री पहर - -

ख़्वाब टूटने का सोग मनाएं क्यूँ कर !
शीशा ए ख़याल था सो टूट गया, 
अभी तक उम्मीद है मेरी 
बाक़ी, ज़िन्दगी में 
फिर अनचाहा 
रोग लगाएं
क्यूँ कर, 
इधर से कहीं गुज़रती है आख़री पहर 
कहकशां, यहीं पे कहीं रुकता है 
चाँद घड़ी दो घड़ी, ये तेरे 
सफ़ाफ़ चश्म हैं या 
कोई पोशीदा 
मुसाफ़िरख़ाना, हर क़दम राज़ गहरा !
हर जानिब छाए संदली धुआं,
सफ़ा दर सफ़ा कोई
लिख रहा हो 
जैसे 
वहमआलूद, इक ख़ूबसूरत  सफ़र ए 
अफ़साना - - 

- शांतनु सान्याल
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सोग - दुःख 
कहकशां - आकाशगंगा 
सफ़ाफ़ चश्म - पारदर्शी आँख 
पोशीदा - छुपा हुआ 
सफ़ा दर सफ़ा - पृष्ठ प्रति पृष्ठ 
वहमआलूद - मायावी 
art of steave phillips 
--آخری پہر

خواب ٹوٹنے کا سوگے مناے کیوں کر!
شیشہ اے خیال تھا سو ٹوٹ گیا،
ابھی تک امید ہے میری
باقی، زندگی میں
پھر انچاها
روگ  لگائیں
کیوں کر،
ادھر سے کہیں گزرتی ہے آخری پہر
کہکشاں ، یہیں پہ کہیں ركتا ہے
چاند گھڑی دو گھڑی، یہ تیرے
سفاف چشم ہے یا
کوئی پوشیدہ
مسافرخانا، ہر قدم راز گہرا!
ہر جانب چھائے صندلی  دھواں،
صفا  درصفا  کوئی
لکھ رہا ہو
جیسے
وهم آلود ، حیرت انگیز زندگی کا
اک افسانہ -

-شانتنو  سانیال

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past