Thursday, 3 January 2013

वो परिशां था बहोत - -

वो परिशां था बहोत देख मेरी हालत 
ए जुनूं, उसे अंदाज़ कहाँ यूँ 
परस्तिश में ख़ुद को 
मिटा जाना,
न शमा कोई, न बज़्म की इफ़्त्ताह,
आसां कहाँ किसी की चाह में 
जिस्म ओ जां को यूँ 
जला जाना, 
उस आशिक़ ए रूह की थी अपनी 
ही ग़ैर मामूली वज़ाहत,
बेसदा हो दिल में 
समा जाना, 
न कोई सबूत, न ही शनाख्त की 
गुंजाइश, उस शोला निहां 
की तपिश में थी 
इक बेनज़ीर 
कशिश 
मुमिकन कहाँ वर्ना इश्क़ में इस 
तरह वजूद का पिघल 
जाना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल
परस्तिश - पूजा
बज़्म - महफ़िल
इफ़्त्ताह - शुरुआत ,
वज़ाहत - वर्णन ,
बेनज़ीर - निराला 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

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2 comments:

  1. शोरे-शरर हूँ शोला हूँ के पोशीदा हूँ मैं
    शेरो-उनवाँ हूँ सनाख्वां हूँ कहाँ हूँ मैं
    निगाहें-नाज के कतरों से
    सितारों की चमक है
    आहों अंदाज की
    आवाज से
    जमीं जर्रों में खनक है
    आह ! कि मेरी आह से इक
    कयामत ही बरपे
    बर्क ब-रफ्तार
    गिरे और
    जर्रो-जमीं दरके
    बेवजुद-जान बेरफ्त होकर
    इसकी आगोश ही में
    कहीं जब्त हो जाउँ.....

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