22 जुलाई, 2013

झूलता पुल - -

कोई झूलता पुल है दरमियां अपने 
या उतरता ख़ुमार पिछले 
पहर का, वो मेरे 
दिल में हैं 
नुमाया या तासीर उनकी शोख़ -
नज़र का, वो मेरे रूबरू हैं 
या नशा किसी 
अनजान 
सहर का, जिस्म चांदनी और रूह 
संदली ! वो कोई पैकर ए 
ख़्वाब है या अक्स 
आसमानी -
शहर का !
* * 
- शांतनु सान्याल  
Unknown Artist quite dusk Painting

21 जुलाई, 2013

यकदिगर आशना फिर कभी - -

निगाहों से हो गुफ़्तगू, यकदिगर आशना फिर कभी,
 
बज़्म ए आसमान को, ज़रा और होने दो इशराक़ी,
हूँ ग़ुबार, कोई संग तिलिस्म, पहचानना फिर कभी,

ये वजूद है इसरार आमेज़, या कोई मुजस्मा ख़ाक -
रहने भी दो यूँ ख़्वाबआलूद, इसे अपनाना फिर कभी,

उस मोड़ से सभी रास्ते, न जाने कहाँ होते हैं गुम -
अभी तो हो हम नफ़स, वहां जाना आना फिर कभी,

निगाहों से हो गुफ़्तगू, यकदिगर आशना फिर कभी,
 * *
- शांतनु सान्याल
यकदिगर - परस्पर  इशराक़ी - उज्जवल

20 जुलाई, 2013

भूला न सके - -

राज़ ए वाबस्तगी वो कभी छुपा न सके,

भीड़ उनको यूँ घेरी रही हमेशा उम्र भर -
तन्हा दिल मगर किसी को दिखा न सके,

गुल खिले बहोत हस्ब मामूल हर तरफ़,
अहसास ए गुलदान दोबारा सजा न सके, 

हर मोड़ पे थे, कई नुक़ता ए मरासिम !
किसी से भी दोबारा, दिल मिला न सके, 

वो आज भी मुस्कुराते हैं बा चश्म मर्तूब 
चाह कर भी, तबाह गुलशन बसा न सके, 

ज़माना हुआ, रस्म रिहाई अब याद नहीं 
सुनते हैं, वो आज भी हमें भूला न सके !

राज़ ए वाबस्तगी वो कभी छुपा न सके,
* * 
- शांतनु सान्याल 

19 जुलाई, 2013

नज़र मिला - -

नज़र मिला कि फिर ये रंगीन ख़्वाब रहे न रहे,

उठ रहें हैं, पहाड़ों में धुंध के बादल रह रह कर,
किसे ख़बर ये जादुवी, हसीं माहताब रहे न रहे,

अभी तो है, हमारी वफ़ा सादिक़ ओ ख़ूबसूरत,
न जाने सुबह तलक यूँ ही लाजवाब रहे न रहे,

ये आईना भी है, हम पे फ़िदा दिल ओ जां से - 
कल किसने है देखा ये नूर ओ शबाब रहे न रहे,
* * 
- शांतनु सान्याल 

artist nora kasten

18 जुलाई, 2013

अंदरूनी शख्सियत - -

रुसवा है ज़माना तो रहे हमसे, इश्क़ में 
कामिल कायनात है नज़र के -
सामने, अब बढ़ चले 
क़दम कहकशां 
से आगे 
कहीं !
हर रंग ओ नूर हैं फ़िके उस बेमिशाल -
असर के सामने, वो मौजूद दर 
रूह गहराई, वो शामिल 
अंदरूनी शख्सियत,
बहोत मुश्किल 
है उसका 
अलहदा होना, हर एक संग ए साहिल 
है नाज़ुक शीशा, उस बेलगाम 
लहर के सामने - -
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art dale-jackson

17 जुलाई, 2013

आख़िर इल्ज़ाम किसे दें - -

दग़ा दे जाए जब अपना ही साया, आख़िर 
इल्ज़ाम किसे दें, किनाराकशी थी 
उसकी बहोत ही ख़ूबसूरत,
टूटती रहीं दिल की 
धडकनें रह 
रह कर,
उसने कहा हमने तो दिल तेरा छुआ भी - 
नहीं, इस अदा पे कोई क्या करे,
वो मुस्कुराते हैं या चलते 
हैं तीर मकनून !
हम ख़ुद 
हैं मातबर इस दिलकश फ़रेब के, सोचते 
हैं अब कि, इनाम किसे दें ! 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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art by EmilyMiller

16 जुलाई, 2013

गुज़िश्ता रात - -

अश्क अनमोल या क़तरा ए जज़्बात !
न जाने क्या थे वो सुलगते मोती,
बूंद बूंद गिरते रहे सीने पे 
तमाम रात, कोई 
आतफ़ी -
तुफ़ान गुज़रा है जिस्म ओ जां से हो 
कर यूँ गुज़िश्ता रात ! कि वजूद 
पूछता है अपने ही अक्स 
का ठिकाना, आईना 
भी है गुमसुम,
साया भी 
मेरा नज़र आए बेगाना, किस सिम्त 
न जाने लौट गयीं ख़्वाबों की 
बदलियाँ रात ढलते !
इक अहसास 
ए सहरा 
के सिवा मेरे दामन में अब कुछ नहीं, 
* * 
- शांतनु सान्याल 
dripping droplets - -

15 जुलाई, 2013

ग़ैर मुन्तज़िर - -

इक हौज़ ए शीशा है, उसकी मुहोब्बत,
तैरतीं हैं, जिस में मेरी चाहत की 
रंगीन मछलियाँ, ओढ़े हुए 
ख़्वाबों के पारदर्शी 
झीनी झीनी 
सी बदलियाँ, मेरी साँसों से जुड़ी हैं - - 
कहीं न कहीं उसकी धडकनें, 
जिस्म ओ जां में ढले 
हैं उसके सभी 
जज़्बाती
रंग, उसकी निगाहों की रौशनी से ही -  
मिलती है मुझे इक मुश्त ज़िन्दगी,
वो इश्क़ ए दरिया है अंतहीन -
गहरा, साहिल छूने की 
ख़्वाहिश न हो 
जाए कहीं 
ग़ैर मुन्तज़िर - - - - - - इक ख़ुदकुशी !
* * 
- शांतनु सान्याल
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art by van otterloo

13 जुलाई, 2013

पहाड़ियों के उस पार कहीं - -

पहाड़ियों के उस पार कहीं, है शायद सुबह 
का कोई रास्ता, हर शाम सूरज -
होता है गुम वहीँ से, न 
जाने क्यूँ उदास 
है साया 
मेरा, छोड़ जाता है मुझे तनहा शाम ढलने 
से बहोत पहले, इस ख़्वाहिश की भी
है अपनी अलग ख़ूबसूरती -
जो छूना भी चाहे 
उसे, और 
टूटने से घबराए, वो इश्क़ है या कोई - - - 
मरमोज़ गुलदान, दूर से जो दिखे 
शफ़ाफ़ ! लेकिन नज़दीक 
जाते ही बिखर जाए 
तार तार - - 
पुरतिलिस्म है ये शब या तेरी आँखों में 
कहीं, इक समंदर सिमटा हुआ !
* * 
- शांतनु सान्याल 


12 जुलाई, 2013

दरमियां अपने - -

ख़ौफ़ नहीं हमको इन अंधेरों से लेकिन -
कोई छुपके से हदफ़ बनाए तो 
क्या करें, वो क़ातिल 
निगाह अक्सर 
देती है 
फ़रेब मुझको, अपना आस्तीन ही धोखा 
ग़र दे जाए तो क्या करें, इस दौर 
के अपने ही हैं दस्तूर ओ 
आईन, चेहरा ही 
ख़ुद, इक 
नक़ाब ग़र बन जाए तो क्या करें, इतना 
अपनापन भी ठीक नहीं, कुछ तो 
फ़ासला रहे दरमियां अपने, 
कम से कम खंजर की 
चमक तो नज़र 
आए - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

11 जुलाई, 2013

वहम ख़ूबसूरत - -

रहने भी दे बरक़रार ये वहम ख़ूबसूरत,
न उठा अभी से राज़ ए चिलमन !
ये सफ़र है बहोत तवील,
दुश्वारियां भी कम 
नहीं, किसे 
है फ़ुरसत कि देखें आईने में अक्स - - 
गुमशुदा, हर शख्स की अपनी 
है तरजीह फ़ेहरिस्त !
न जाने किस 
मरहले 
पे है तेरी मुहोब्बत खड़ी, लिए सीने पे 
इंतज़ार मख़सूस - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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unknown source 12

09 जुलाई, 2013

नुक़ता ए आग़ाज़ - -

इन लम्हों की कशिश है जानलेवा, फिर भी 
मुझे जी लेने दे, कुछ देर और ज़रा !
रहने दे बेतरतीब, बिखरी हुई 
निगाहों की रौशनी, 
मद्धम ही -
सही
कुछ पल तो नज़र आये उन्वान ए ज़िन्दगी,
ये चाहत है कोई परिंदा दस्तगीर कि 
दरीचा क़फ़स है खुला सामने !
लेकिन वजूद भूल जाए 
उड़ना आसमां की 
ओर - - 
लौट आए बार बार नुक़ता ए आग़ाज़ की - - 
जानिब, बहुत मुश्किल है मुस्तक़ल 
रिहा होना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  
art by MKisling

06 जुलाई, 2013

कुछ ख़ास नहीं - -

कुछ ख़ास नहीं फिर भी दिल चाहता कुछ 
ख़ास कहना, न जाने कहाँ हैं बहारों 
की मंज़िल, मिले न मिले -
कोई ग़म नहीं, इक 
नदी है सिमटी 
सी तेरी 
आँखों में कहीं, मेरा वजूद है इक पत्ता - 
शाख़ से टूटा हुआ, तेरी पलकों 
के किनारे किनारे, चाहे 
यूँ ही दूर तक -
बहना !
कुछ ख़्वाब जो थे बहोत नाज़ुक, ग़र टूट 
गए तामीर से पहले, बुरा कुछ -
भी नहीं, कांच की अपनी 
है मज़बूरी, चाहत 
की छुअन 
थी बेसब्र बहोत, सजाने के पहले अगर -
गुलदान कोई हाथों से फिसल 
जाए तो क्या कीजिये !
फिर कभी, किसी 
भीगी रात 
में, गुल शबाना अपने दिल में सजाए - - 
रखना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by David Adickes 1

01 जुलाई, 2013

रूह तक उतरो कभी - -

कभी हो सके तो मेरी रूह तक उतरो, काफ़ी 
नहीं लब छू कर, गहराई का अंदाज़ 
करना, आईने की भी अपनी 
हैं मजबूरियां ! आसां 
नहीं चेहरे की -
इबारत 
यूँ पढ़ना, तुम्हारी ख़्वाहिशों में है नुमायां -
लज़्ज़त ए बदन की महक, मेरी 
जुस्तजू में हैं शामिल 
ख़याल से परे 
नेमत 
बेशुमार ! ये वो चाहत है जिसे लफ़्ज़ों में - - 
बयां करना है नामुमकिन, इक 
जुनूं सूफ़ियाना, जो ले 
जाए वजूद, इक 
अजीब 
इसरार की जानिब, जो नाज़िल भी है और 
पोशीदा भी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
art by annette winkler

वो दिल फ़रेब सही - -

वो दिल फ़रेब सही फिर भी देता है ज़िन्दगी 
को जीने के नए बहाने ! कभी दर्द -
हक़ीक़ी, कभी ख़्वाब आलूद 
अफ़साने ! हर मोड़ 
पे ऐ मुहोब्बत 
तू खड़ा 
है ख़ामोश, लिए भीगे आँखों में कई राज़ - - 
अनजाने, तुझे पाने की हसरत में 
कितनी सांसें हुई बोझिल,
कितने धड़कन टूटे 
न जाने, फिर 
भी इक 
जुनूं है जो दिल ओ जां में छाया हुआ, हर 
तरफ़ तेरी परस्तिश हर सिम्त 
तेरा जलवा, दरअसल 
तू है नाख़ुदा के 
शक्ल में 
कोई अहसास ए ख़ुदा ! वाबस्तगी है तुझ
से जीने मरने का, ये सच तू माने 
या न माने - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

29 जून, 2013

मामुल मुताबिक़ - -

वो कुरेदते हैं बुझी राख कुछ इस तरह 
कि इक गुमां सा रहता है फिर 
सुलगने का, न खेल यूँ 
बार बार, मेरे 
ख़ामोश 
दर्द ए उल्फ़त से, कहीं झुलस कर न -
रह जाए तेरी ख़्वाब की दुनिया, 
रहने दे मुझे यूँ ही अँधेरे 
में मुब्तला,कि इक 
खौफ़ सा 
रहता हर वक़्त दिल को, कहीं फिर न 
जल उठे बुझते चिराग़ ज़िन्दगी 
के, फिर ज़माने में कहीं 
न उठे तबाह कुन 
तूफ़ान !
कि मैं तंग हो चुका हूँ यूँ बारहा जीने -
मरने से, रहने दे मुझे मेरे हाल 
पे मामुल मुताबिक़ !
कुछ वक़्त 
चाहिए 
दर्द को दवा तक तब्दील होने में - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

26 जून, 2013

ख़ुद की तलाश - -

फिर मुझे ख़ुद की तलाश है, खो सा गया हूँ मैं 
मुद्दतों से जाने कहाँ, वो कहते हैं कि -
मेरी मंज़िल सिर्फ़ तेरे पास 
है, इक जुस्तजू जो 
गहराए 
शाम ढले, यूँ लगे लाफ़ानी कोई ख़ुशबू, रूह 
ए इश्क़ के बहोत आसपास है, न 
देख मुझे फिर उन्ही क़ातिल 
निगाह से, कि यूँ बारहा 
जां से गुज़रना 
नहीं -
आसान है, झुकी नज़र पे रहने दे कुछ देर - - 
और अक्स ए कहकशां, कि ज़िन्दगी 
आज मेरी ज़रा उदास है - -
* * 
- शांतनु सान्याल 

14 जून, 2013

बात ही बात में - -

इक सुरूर जो ले जाए होश उड़ा, बात ही
बात में, इक शब्का जो घेरे जिस्म
ओ जां, मुख़तलिफ़ अंदाज़
में ! फ़र्क़ करना हो
मुश्किल जब
दिन ओ
रात में, इक ख़ुमारी जो बन जाए कोई
ठहरा हुआ तुफ़ान, न डुबोए, न ही
उभरने दे, अनबुझ अंगार
की मानिंद जले रूह
मेरा, यूँ भरी
बरसात
में ! दूर तलक हैं बिखरे उनकी निगाहों
के साए, फिर भी इक सराब ए
तिश्नगी सी है, न जाने
क्यूँ इस हयात में,
इक सुरूर
जो ले जाए होश उड़ा, बात ही बात में - -
* *
- शांतनु सान्याल

09 जून, 2013

मरकज़ गुल - -

अचानक शाम की बारिश, और उसकी
पुरअसरार मुस्कराहट, ज़िन्दगी
तलाशती है, फिर जीने
की वजह, उस
भीगे
अहसास में उभरते हैं कुछ ख़्वाब - - -
ख़ूबसूरत ! लम्हा लम्हा इक
ख़ुमारी जो ले जाए किसी
शब गरेज़ान की
जानिब,
उसकी मुहोब्बत है पोशीदा बूंद कोई दर
मरकज़ गुल, जो रात ढले बन
जाए अनमोल मोती,
लिए सीने में
बेपायान
ख़ुशबू !
* *
- - शांतनु सान्याल

मरकज़ गुल - फूल के भीतर
बेपायान - अंतहीन
 शब गरेज़ान- मायावी रात्रि

27 मई, 2013

सुलहनामा - -

न जाने क्या था दिल में उसके, मुझे न थी 
ख़बर ज़रा, उन आँखों ने मुझे ले 
डूबा न जाने कहाँ, इक 
अंतहीन सफ़र 
और दूर
है किनारा, बहरहाल अब तेरी महफ़िल में 
लौटना है मुश्किल, अब कोई आवाज़ 
छूती नहीं मुझको, न कर यूँ 
टूटकर इंतज़ार लौटती 
सदा का !
अभी तलक है जवां वादी ए ज़िन्दगी, फिर 
कोई सुलहनामा पे कर ले दश्तख़त,
कि दहलीज़ पे रुका रुका सा 
है मौसम ए बहार, न 
कर यूँ फ़रेब
ख़ुद से,
कि ज़िन्दगी का सफ़र नहीं इतना आसां - -
* * 
- शांतनु सान्याल 
art by MAILEE FORD
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23 मई, 2013

नुक़ता ए मरकज़ - -

इजलास ख़ुफ़िया है शायद आख़री पहर,
तारों की मौजूदगी है कुछ कम, न
जाने कहाँ गए वो ज़रिया
ए रौशनी, कि चाँद
भी है गुमसुम,
सहमी
सहमी सी है चांदनी ! इक अजीब सी -
ख़ामोशी रही दरमियां अपने, न
तुम कुछ कह सके, और
न ही हम दिखा
पाए दाग़
ए दिल अपना, सिफ़र में देखते रहे रात
भर, मेरी सांसों में थी ख़ुशबू तेरी
चाहतों की पुरअसर , लेकिन
न तुम समझ पाए
और न हम ही
दिखा
पाए वो नुक़ता ए मरकज़ जहाँ खिलते हैं -
गुल जावेदां ख़ूबसूरत - -
* *
- शांतनु सान्याल

इजलास ख़ुफ़िया  -- गुप्त सम्मलेन
जावेदां - अमर
नुक़ता ए मरकज़  - केंद्र बिंदु

14 मई, 2013

अनश्वर समर्पण - -

इक तटबंध है मेरा वजूद, तू इक नदी अबाध्य 
बेक़ाबू ! वो प्रणय जो तुझे बाँध ले गहन 
अंतर्मन, जीवन चाहे वो उपासना 
अंतहीन, वो पावन चाहत 
जो ले जाए जीवन 
परम सत्य 
की ओर, पाए देह व प्राण परिपूर्ण सार्थकता - -
इक अहसास जो महके अन्दर - बाहर 
छद्म विहीन, कर जाए आत्म -
विभोर  हर  सिम्त 
हर ओर !
वो समर्पण जो हो अनश्वर ज्वलंत अग्नि के 
भी ऊपर !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by ALBERT BIERSTADT

10 मई, 2013

तहे दिल आईना - -

वो आज भी खड़ा है उसी मोड़ पर, जहाँ 
कभी थीं आबाद बस्तियां, कशिश 
दिल की जाती नहीं, बदल 
जाए चाहे ज़माना 
जितना,
वो इंतज़ार जो सांस से बंधा हो ताउम्र,
बहोत मुश्किल है उसका राह 
बदलना, मुहाजिर 
जज़्बात की 
अपनी 
है कहानी, मंज़िल दर मंज़िल इक - - 
सफ़र अंतहीन, चेहरा दर 
चेहरा अक्स उसका,
हर मुस्कान पे 
झलक 
उसकी, वो पोशीदा रह कर भी हो - - - 
शामिल, तहे दिल आईना !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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amazing painting by RASSOULI

09 मई, 2013

नज़र की रौशनी - -

हैरां हूँ मैं, देख तेरी नज़र की रौशनी !
हर सिम्त है फैला इक अहसास
आसमानी, नूर महताब
है इश्क़ तेरा, जाए
दिल के बहोत
अन्दर,
हर चेहरे पे नज़र आये अक्स ताबां,
अँधेरे उठा चले गोया ग़मगीन
ख़ेमा, उभर चली है ज़मीर
की ख़ूबसूरती, इक
ख़ुद तज़जिया
जज़्बात
है बेक़रार, ज़िन्दगी को मुक्कमल - -
मुतासिर कर जाने को - -
* *
- शांतनु सान्याल
 

06 मई, 2013

उजाले की तलाश - -

न कर मेरा इंतज़ार, आख़री लोकल से मैं 
न लौट पाऊंगा, खो चुका हूँ मैं दुनिया 
की भीड़ में इक बेनाम अजनबी 
की तरह, बहोत मुश्किल 
है मुझे खोज पाना,
कि बंद कर 
लो 
सदर दरवाज़ा रात गहराने से पहले, न -
कर किसी दस्तक की ख़्वाहिश,
है हवाओं में ज़हर आलूद 
उँगलियों के दाग़ 
नुमायां !
न 
जाने किस रूप में लूट जाए कोई यूँ मेरा 
नाम ले के, दर्द तेरा है कितना 
असली या बातिल मुझे 
ख़बर नहीं, फिर 
भी मेरी 
जां !
मुहोब्बत का भरम रहने दे सुबह होने - - 
तलक, कि उभर सकता हूँ मैं 
फिर अचानक, अब तक 
साहिल की तलाश 
है मेरे दिल में 
ज़िन्दा !
* * 
- शांतनु सान्याल 

इक अदद सिफ़र - -

न पूछ तन्हाई का आलम बिछुड़ जाने के बाद,
न सुलग पाए, फिर चिराग़ ए जज़्बात 
इक बार बुझ जाने के बाद, बहोत 
चाहा, बहोत समझाया, न 
बस पायी दिल की 
बस्ती दोबारा, 
उजड़ जाने के बाद, यूँ तो राहतों के नामज़द - -
कम न थे, फिर भी लाइलाज ही रहा 
दर्दे जिगर चोट खाने के बाद,
बेअख्तियार वजूद 
मेरा, रूह भी 
भटके सहरानशीं, सितारा शिकस्ता कोई, है - -
अब नसीब मेरा, इक अदद सिफ़र के 
सिवा ज़िन्दगी अब कुछ भी 
नहीं, कि लहराती हो 
जैसे कोई कटी 
पतंग ज़मीं 
ओ आसमां के दरमियाँ डोर से टूट जाने के बाद,
* * 
- शांतनु सान्याल   
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by Thomas Houck

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