कोई झूलता पुल है दरमियां अपने
या उतरता ख़ुमार पिछले
पहर का, वो मेरे
दिल में हैं
नुमाया या तासीर उनकी शोख़ -
नज़र का, वो मेरे रूबरू हैं
या नशा किसी
अनजान
सहर का, जिस्म चांदनी और रूह
संदली ! वो कोई पैकर ए
ख़्वाब है या अक्स
आसमानी -
शहर का !
* *
- शांतनु सान्याल
Unknown Artist quite dusk Painting
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