Saturday, 4 January 2014

नूर ए इश्क़ तेरा - -

ज़रा सा और उभरने दे मुझे, अभी 
तक हूँ मैं ग़म की परछाइयों 
में सहमा सहमा, कहीं 
नूर ए इश्क़ तेरा 
न कर जाए 
अचानक 
हैरां !
अभी अभी बेख़ुदी से ज़रा सम्भले 
हैं जिस्म ओ जां, कुछ देर 
और, यूँ ही रहने दे 
अब्र आलूद 
हाल ए 
दिल,
कि आँख खुलने से क़बल, कहीं न 
बिखर जाएँ पुरनम मोती,  
अभी तो रात है बहोत 
बाक़ी, न जा उठ 
कर यूँ पहलू 
से मेरे,
कि है ये उम्र भर की मिन्नतों का -
सिला - - 

* * 
- शांतनु सान्याल   

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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