24 अप्रैल, 2013

चश्म अन्दाज़ - -

कुछ और मेरे सीने में है, पेश नज़र ज़माना -
कुछ और जुदा, किससे कहें हाल ए 
दिल अपना, दुनिया की 
सियासत अपनी 
जगह, न 
देख 
मुझे यूँ हैरत ए निगाह, मेरी मंज़िल का निशां 
है तेरी आँखों में छुपा, ये परवाज़ सीड़ियाँ 
हैं या कोई मकनूं इम्तहां, हर सांस 
इक नयी आरज़ू, हर क़दम 
ख़्वाबों का कारवां !
इस दौर का 
अपना 
ही 
है क़ानून ज़मीं, जो तोड़ पाए तो हासिल हो 
मानी ज़िन्दगी ! फ़र्क़ गुज़ारी उनका 
अपना नज़रिया, चश्म अन्दाज़ 
मेरा यकसानी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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Vernazza Door Flowers

22 अप्रैल, 2013

निजात कहाँ - -

उसका आना ग़ैर मुन्तज़िर बारिश था, या 
पोशीदा पेशगोई, तूफां से पहले, शाम 
सहमी सी रही देर तक उसके 
जाने के बाद, ज़िन्दगी 
देखती रही उफ़क़ 
पे बुझते 
हुई इक लकीर ए आतिश, इक सन्नाटा 
पुरअसर छू सा गया अंदरूनी वजूद,
रात की अपनी है मजबूरी, 
निजात कहाँ तीरगी 
से, चाँद निकले 
न निकले,
फिर हम जलाए जाते हैं दिल के फ़ानूस,
कहीं खो न जाए उसकी मुहोब्बत 
स्याह राहों में दोबारा - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

18 अप्रैल, 2013

फ़रेब दिलकश - -

अब इस दूरबीन ए अहसास के मानी कुछ 
भी नहीं, कि वो शख्स है ओझल !
वक़्त का कोहरा, था बहोत 
गहरा, बारहा लौट 
आई आवाज़ 
मेरी,
दूर तक जा कर, वादियों का रव्वैया भी न 
रहा मुनासिब, मौसम के साथ बदल 
से गए बाज़गश्त सदाएं ! ये 
ख़ामोशी हैं शायद 
शरीक ए 
सफ़र 
अपना, हर हाल में घेरे रहता है वजूद के 
अन्दर बाहर, चलो हमने भी कर 
ली इक पैमां ज़िन्दगी से,
कि वक़्त के आईने 
में अपना 
अक्स, 
कम से कम न करे, यूँ फ़रेब दिलकश !
* * 
- शांतनु सान्याल 
depth of reflection 

16 अप्रैल, 2013

महक उसकी - -

ख़्वाब ही सही, रहने दे मेरी आँखों में उसकी
चाहत की नमी, कोहरा ही सही, छाया 
रहे वादियों में पुरअसर, उसकी
जुस्तजू में रूह चाहती 
है भटकना, कई 
जन्मों तक, 
कभी गुलशन, कभी सहरा, इक तलाश - - 
मुसलसल, सुलगते दिन या पुरनम 
रातें, इक उसकी ख़्वाहिश बाक़ी 
सब रस्मी बातें, दरमियाँ 
ज़मीं ओ फ़लक !
इक प्यास 
अनबुझ, दिल की गहराइयों में सिर्फ़ रंग 
उसका, तहे ज़मीर महक उसकी !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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15 अप्रैल, 2013

क़ाफ़िले मुहोब्बत के - -


इक इंतज़ार अंतहीन, तरबतर जिस्म 
ओ जां मगर, ज़िन्दगी है या कोई
बियाबां बिखरा दूर तलक !
उस मोड़ पर अक्सर 
खोजता है, ये 
मुस्ताक़ 
ज़मीर, जहाँ वजूद को मिले इक मुश्त 
राहत ए तिश्नगी, ख़्वाबों को मिले 
इक क़तअ हक़ीक़त की 
ज़मीं ! हमसफ़र 
कोई आरज़ी,
या कोई 
गुमशुदा राही, मिल जाए रात ढलने 
से पहले, कि उफ़क़ पे आज 
भी रुके रुके से हैं कुछ 
क़ाफ़िले मुहोब्बत 
के बेक़रार !
* * 
- शांतनु सान्याल 

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alone waiting

13 अप्रैल, 2013

शमादान आतफ़ी - -

दर ओ दीवार के रंग से न आज़मा, दिल 
की ज़मीं की ख़ूबसूरती, ढह जाए 
मेहराब तो क्या, चांदनी हर 
चंद तलाशती है छूना 
अहसास ए संग -
मरमरी !
फ़रामोश करके मेरी इश्क़ बुनियाद, वो 
रहा बहोत परेशां, ताउम्र कोई देता 
रहा दस्तक, ताउम्र दहलीज़ 
पे थी महकती इक 
ख़ामोशी, हर 
लम्हा 
वो सजाए गुलदान क़ीमती, हर पल - - 
कहीं फिसल जाए हाथों से, 
शमादान आतफ़ी !
* * 
- शांतनु सान्याल 
आतफ़ी - जज़्बाती 


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palermo - art by john lovett

12 अप्रैल, 2013

पैकर कहकशां !

अंजुमन ए नजूम में था रात भर, इक मुबाहसा 
बेइन्तहा, के ज़मीं पे नज़र आता है कोई 
पैकर कहकशां ! मोज़ूअ बहस 
रुक सी जाती है अक्सर 
आ कर उनकी 
आँखों में 
बारहा, हसूद दिल चाहता है मुक्कमल फ़तह - - 
खुला आसमां ! इक संदली ख़ुशबू सा है, 
तारी तहे ज़मीर, ज़िन्दगी फिर 
चाहती है तेरे इश्क़ में, बूंद 
बूंद कामिल शबनम 
की मानिंद, 
फूलों पे 
बग़ैर शर्त अन्दर तक लबरेज़ जज़्ब हो जाना !
* * 
- शांतनु सान्याल 
अंजुमन ए नजूम - सितारों का समूह 
मुबाहसा - बहस 

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colour splash by Hugh Morrow

11 अप्रैल, 2013

रहने भी दें - -

कुछ भी न था दरमियाँ हमारे, ये सच है 
या हिजाब रस्मी, रहने भी दें सीने 
में दफ़न ये ख़ूबसूरत राज़ 
इब्दी ! कुछ ख़्वाब जो 
न टूटे उम्र भर, 
रहने भी 
दे दिल के कोने में कहीं वो इबादत - - 
मख़फ़ी, कि लग न जाए कहीं 
इलज़ाम ग़ैर मोमिन का 
उम्र भर के लिए 
मुझ पर !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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इब्दी - गुप्त 
मख़फ़ी - छुपा हुआ 
मोमिन - विश्वास करने वाले 
ART BY MELTEM KILIC

08 अप्रैल, 2013

शीशा ए कायनात - -

मय्यसर कहाँ, वो मंज़िल जहाँ ज़िन्दगी को 
दो पल राहत मिले, उठते हैं हर सिम्त 
मौज कोहराम, हर जानिब है 
इक ग़ैर यक़ीनी सूरत -
हाल, न तुझे 
खोज 
पाए चश्म तिश्ना, न कोई ग़ैर मुन्तज़िर - - 
बारिश का ही इमकां, इक दहन 
मुसलसल है ज़िन्दगी में 
बहरहाल, तेरा 
इश्क जुनूं 
कहीं 
न कर जाए तबाह, दिल का ये नाज़ुक शीशा
ए कायनात - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 


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art by Yvonne Harry

07 अप्रैल, 2013

जिस्म ओ जां के परे - -

तक़ाज़े उनके तस्सवुर के परे, ज़िन्दगी 
के किनारे सिमटते हुए, चाहत 
के धारे बेलगाम, वजूद
का बचना बहोत 
मुश्किल,
हर फ़सील पे दहकते जुनूं, हर मोड़ पे 
हैं चमकते ख़्वाबों के जुगनू, 
कहाँ से लाएं संग -
पारस उनकी 
आरज़ू 
ज़रीन कायनात, अपनी हैसियत इक -
ख़ाक ए महक, उनकी ख्वाहिश 
संदली जहान, मुमकिन 
कहाँ ख़यालों का, 
ज़िन्दगी 
में यूँ हुबहु शक्ल में ढलना, न जाने फिर
भी क्यूँ दिल चाहता है तुम्हें 
ज़िन्दगी से ज़ियादा 
फ़राहम करना,
जिस्म ओ 
जां 
के परे रूह तक निसार करना - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
ज़रीन - सुनहरी 
drops - - no idea about painter 

05 अप्रैल, 2013

अंतहीन जुस्तजू - -

सब कुछ बिखरा सा रहा दरिया के दोनों 
जानिब, वक़्त था या कोई बहता 
हुआ लहरों का आसमां !
मुख़्तसर दामन 
न समेट 
पाया 
किसी की मुहोब्बत बेशुमार, ज़िन्दगी -
के उस मोड़ पर था मैं बहोत ही 
अकेला, न वो सुन पाए 
मेरी गूंजती सदा, न 
मैं रुक पाया 
उनके 
इंतज़ार में कुछ और ज़रा, जज़्बात रहे 
दूर तक बिखरे हुए, हद ए नज़र !
किसे ख़बर कि वो आज 
भी तलाशते हैं मेरा 
पता, गलियों 
गलियों, 
मंज़िल दर मंज़िल, इक ला मतनाही - 
जुस्तजू - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

ला मतनाही - अंतहीन 


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art by edvaldas ivanauskas

04 अप्रैल, 2013

सुबह दुआओं वाली !

इक सन्नाटा सा है दूर तलक, अक्स चाहे
निजात, लेकिन आईना गुमसुम !
इक मुसाफ़िर पोशीदा और
अंधेरों से उभरती
आवाज़ !
तेरी मुहोब्बत बेशक ख़याल से परे, फिर
भी जाने क्यूँ, बाँध न पाए मेरे
मज़तरब जज़्बात, कोई
रूह बदवी, दे जाए
मुसलसल
दस्तक आधी रात, कि बसती  हैं गली - -
नुक्कड़ में रात ढले ख़ामोश
कराहों की बस्तियां
लिए निगाहों
में एक
शबनमी ख़्वाब, हर चेहरे पे जहाँ तैरतीं
हों इक किरण इत्मीनान ! ज़िन्दगी
खोजती है बड़ी शिद्दत से, वो
सुबह दुआओं वाली !
जहाँ तेरे सिवा
भी और,
मुस्कुराते हों लिए इक ख़ूबसूरत अन्दाज़,
* *
- शांतनु सान्याल
रूह बदवी - आदिम आत्मा



03 अप्रैल, 2013

हमनफ़स किसी का - -

ज़िन्दगी का सफ़र नहीं रुकता, गुज़र जाते हैं 
मौसमों के मक़ाम, सुबह शाम के यूँ 
तनासब में, फिर कहीं उसकी 
मुहोब्बत खोजती 
है मेरा निशां,
गुमशुदा,
जज़्बात हैं कि ढलते नहीं, उम्र का भरोसा कुछ 
भी नहीं, आज भी वो शामिल है, शाम 
के धुंधलके में कहीं, आज भी 
इक इंतज़ार हैं ज़िन्दा,
दिल की गहराइयों 
में कहीं, इस 
अहसास 
का, अपना ही है लुत्फ़ बेशुमार, तनहा हो कर 
भी वजूद बन जाए हमनफ़स किसी 
का - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

artist ZELIC VICTOR ANDREEVICH

01 अप्रैल, 2013

नज़रिया अपना अपना - -

दुनिया की वही दायमी नुक़्तह नज़र, अन्दर 
कुछ और बाहर कुछ, अपनी भी वही 
अलग मजबूरी, हर वक़्त 
आमदा बा सिम्त 
इन्क़लाब,
फिर 
ज़माने की वही दलील किताबी, असलियत 
से कोसों दूर, अपना वजूद फिर तनहा 
राह ए संगसार की जानिब, हर 
चेहरा काज़ब, लिए हाथों 
में इंसाफ़ ए शलाक़,
अपनी तक़दीर 
में फिर 
सज़ा ए इंसानियत मुक़रर, दुनिया की है 
अपनी ही, इक तरजीह फ़ेहरिस्त, 
बहोत पुरानी, लेकिन अपना 
नज़रिया लीक से हट 
कर, आप कह 
लें जो 
चाहे, ज़हर ए असलियत या फिर ज़मीर 
ए अमृत, ये आप पर है मनहसर !
* * 
- शांतनु सान्याल 
अर्थ - 
दायमी नुक़्तह नज़र - स्थायी दृष्टिकोण 
आमदा बा सिम्त इन्क़लाब - क्रांति की तरफ बढ़ना 
काज़ब - छद्म 
शलाक़ - कोड़ा
 मनहसर - निर्भर 
संगसार - पत्थरों की मार 
Art symbols - - 

31 मार्च, 2013

रात ढलते - -

मुश्किल इतना भी न था, कि दोबारा न मिलते,
भूल जाने का सबब कुछ और रहा होगा,
नफ़स में शामिल होने का भरोसा
न था, इतना भी नाज़ुक,
क़सम लेकर
मुकर
जाने का सबब कुछ और रहा होगा, बाख़बर -
हूँ इस आवारगी ए मौसम से, पल में
धूप खिले, पल में दूर तक हो
अँधेरा, ये बहाना लेकिन
क़ाबिल ए ऐतमाद
नहीं, वादा
लेकर
मंज़िल बिसर जाने का सबब कुछ और रहा
होगा, इक ख़ामोश, निगाह ए क़रार
था दरमियां अपने, गवाह कोई
नहीं सिवा तबादिल  
ए साँस के,
रात ढलते बूंद बूंद शबनमी अहसास में यूँ
बिखर जाने का सबब कुछ और
रहा होगा - -
* *
- शांतनु सान्याल

28 मार्च, 2013

अब्र ए ख़ुशबू - -

रूकती कहाँ हैं रोके, उड़ती हुईं  ख़्वाब आलूद 
तितिलियाँ, अपनी हथेलियों में बंद कर 
ले, जुगनू की मानिंद महके हुए 
कुछ मेरे जज़्बात, इक 
लम्स, जो बदल 
जाए मेरी 
ख़ुश्क तक़दीर, ख़ुदा के लिए किसी दिन - - 
इक पल के वास्ते बिखर जा अब्र 
ए ख़ुशबू की तरह - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

ART BY DAVID JAY SKIPER

23 मार्च, 2013

उभरता सितारा - -


वो आज फिर मेरी, अंदरूनी गहराई खंगाल गया,
गोया ख़ामोश ज़मीर पे यूँ सुलगती लौ डाल गया, 

तमाशबीनों की भीड़ में, अपने भी अजनबी लगे,
लड़खड़ाने के पहले, नाआशना कोई संभाल गया,

उस रास्ते की सभी बत्तियां थीं, मुद्दतों से बुझी -
न जाने वो कौन था,जो अंधेरों से यूँ निकाल गया, 

हर एक  की नज़र में था वो इक उभरता सितारा,
आख़िर शब न जाने क्यूँ वो, बहोत बदहाल गया,
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by by ~fadmaggot

17 मार्च, 2013

तोहफ़ा ए दर्द - -

मेरा दर्द मुझको अज़ीज़ था क्यूँ तुमने 
ख़ुद को शामिल किया, फिर बुझे 
अंगारों को हवा दी, फिर 
इक बार ज़िन्दगी 
को बा सिम्त 
गिरफ़्त ए 
तूफां 
किया, मेरा ज़ब्त इतना ज़हीफ़ न था, 
क्यूँ तुमने फिर शीशा ए शक्ल 
दिया, मैं यूँ ही था अपनी 
दुनिया में खोया 
हुआ, क्यूँ 
तुमने 
मुझसे प्यार किया, क्यूँ तुमने फिर - - 
इक नया तोहफ़ा ए दर्द दिया।
* * 
- शांतनु सान्याल 
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painting by AMANDA ELLIS 
painting by AMANDA ELLIS 

13 मार्च, 2013

सांसों के हरुफ़ - -

न जाने क्या वजह थी, वो शख्स कभी -
खुल कर मिल ही न सका, मैंने 
तो ज़िन्दगी की किताब 
रख दी थी उसके 
सामने -
बेझिझक, बर्हनह सच की तरह, हैरत 
भरी नज़र से उसने देखा ज़रूर,
उलट पलट कर कई बार 
पढने की कोशिश 
भी की शायद, 
लेकिन 
उन्वान से आगे वो बढ़ ही न सका - - 
हाथों से सिर्फ़ सतही अहसास 
किया, दिल की गहराइयों 
को कभी छू न सका, 
कैसे ज़ाहिर 
करूँ 
कि इन ख़ामोश, सांसों के हरुफ़ में
हैं छुपे, बेतरतीब तूफ़ान ठहरे 
हुए, इन धडकनों में हैं 
शामिल कितने 
जज़्बाती 
भंवर 
आपस में उलझे हुए, कि इन रग़ों में 
में बहती है किसी की मुहोब्बत 
तकमील ए हयात के लिए, 
कि  बंजर आँखें 
तकती हों 
जैसे 
उम्र भर की मन्नत लिए सीने में - - 
एक मुश्त बरसात के लिए !
* *
- शांतनु सान्याल 
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Calm before the Storm 

03 मार्च, 2013

वो मैं नहीं - -

यक़ीनन वो मैं नहीं, जो तेरी ख़्वाबों में -
उभरता है, इक जाम छलकता 
हुआ सा, या कोई साहिर 
चाँद रात का, भरता 
हो ख़ुशबू जो 
फूलों 
में शब गहराते, वो मैं नहीं जो तेरी पेशानी 
में तारों की झालर सजाए, चश्म ए 
साहिल पे ज़िन्दगी लुटाये, 
बेहद मुश्किल है 
मेरी जां 
तसव्वुर को यूँ हक़ीक़त में बदलना, तपते 
सहरा से निकल, जज़्बात के दिलकश 
कहकशाँ पर चलना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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artist svetlana novikova

25 फ़रवरी, 2013

जिल्द के मानी - -

इक  रौशनी जो कर जाए अंतःकरण तक
रौशन, इक बूंद जो तेरी अनुकंपित
निगाह से टपके, कर जाए
जीवन मुक्कमल,
हर साँस में
हो जैसे
तेरा अक्स निहित, कि किसीका दर्द ओ -
ग़म न हो मुझसे जुदा, ये अहसास
न मुरझाये कभी कि इक
इंसानियत ही है
आला तरीन
मज़हब,
बाक़ी किताबों की बातें रहने दे सुनहरी - -
सफ़ात में बंद, ख़ूबसूरत जिल्द
के मानी नहीं कि दास्तां
ए ज़िन्दगी भी होगी
दिलकश !
* *
- शांतनु सान्याल  


22 फ़रवरी, 2013

तारीफ़नश्दा - -

ये कांच से नाज़ुक, हसीं अहसास !
कि इक खौफ़ सा दिल में
बना रहता है हर
लम्हा, कहीं
टूट न
जाए ये महीन धागे, मख़फ़ी रंगों
में ढले, न खेल यूँ, तू मेरी
धड़कनों के साथ, कि
सांस लेना भी
हो जाए
मुश्किल, बहोत तरमीन के बाद
कहीं उभरी है तस्वीर ए
मुक़्क़दस, ये इश्क़
नहीं जिस्मानी,
कि मेरी
मुहोब्बत है इक तारीफ़नश्दा - -
अहसास ए बेनज़ीर !
* *
- शांतनु सान्याल

अर्थ -
मख़फ़ी - रहस्य
तरमीन - साधना
तारीफ़नश्दा - अपरिभाषित
 बेनज़ीर - अद्वित्य

 

16 फ़रवरी, 2013

ख़्वाब नए - -

न फ़लक, न ज़मीं, हद ए नज़र, ये
कैसा इदराक दिल में है छाने
चला, इक ख़ालीपन
है हर सिम्त,
ग़ैर
मुन्तज़िर कोई नादीद अब्र, हो - -
जैसे बेक़रार सा, बिखर
जाने को,ये कैसा
जज़्ब तासीर
है उनकी  
निगाहों का, हर शै है कोहरे में डूबा
हुआ इक सिवाय उन
झिलमिलाते
साहिल
ए पलक, कि हर बार ज़िन्दगी - -
उभर आती है मुक़्क़दस
सीडियों के किनारे,
वो पोशीदा
हाथ
मुझे कभी डूबने नहीं देते, हर बार
जल उठते हैं उदास, चिराग़ -
ए शब लिए सीने में,
सुलगते ख़्वाब
नए - -
* *
- शांतनु सान्याल

ख़्वाब नए - -



13 फ़रवरी, 2013

अभिलाष चिरंतन - -


अशेष कहाँ, ये अभिलाष चिरंतन
उस छवि में निहित जीवन मरण,
प्रति पल प्रगाढ़ झंझावात, प्रति -
क्षण सम्मुख,एक खंडित दर्पण।

उदय अस्त, अहर्निश निरंतरता
पुष्पित मन, कभी बिन आवरण,
मृगजल या मायावी प्रणय गंध -
नीरव, कभी अधीर अंतःकरण।

तृषित नेत्र व्याकुल देखे चहुँ दिश
न ही निद्रित, न ही पूर्ण जागरण,
सत्य-असत्य या कोई दृष्टी भ्रम
अज्ञात यात्रा दे, पुनः आमन्त्रण ।
* *
- शांतनु सान्याल
 

07 फ़रवरी, 2013

तेरी इक नज़र - -

अहसास अबरी, साँस मद्धम, कभी तो
छू जा, तू मेरी मंजमद जज़्बात !
इक ज़माने से, लिए बैठे हैं -
दिल में, टूट कर
बिखरने
की ख़्वाहिश, न कर यूँ नज़र अंदाज़ -
कि बड़ी मुश्किल से कभी -
उभरते हैं, सहरा ए
आसमां पे
अब्र घुम्मकड़, रेत में दफ़न ख़्वाबों से
कभी कभी खिलते हैं गुल -
ख़ारदार, कि तेरी इक
नज़र में है
मोजूद,
उम्र भर की दुआओं का असर - -
* *
- शांतनु सान्याल  


05 फ़रवरी, 2013

रूह ख़ाना बदोश !

मेरे हिस्से की धूप थी काफ़ी या नाकाफ़ी, -
अब उसके मानी कुछ भी नहीं, ये
सच है कि उस महदूद दायरे
में, जीना हमने सीख
लिया, इक ज़रा
सी रौशनी ही
बहोत थी गुंचा ए तक़दीर बदलने के लिए,
अँधेरा है दोस्त क़दीमी अपना, हर
वक़्त रहता है दिल के क़रीब
यूँ साए की तरह, धूप
तो है रूह ख़ाना
बदोश !
वक़त ही नहीं देता ज़रा सँभलने के लिए,
अभी अभी था आसमां पर छाया
शाह ए रौशनी की मानिंद,
पलक झपकते न
जाने कहाँ
से उड़ आये बादलों के गिरोह आवारा, अब
भीगने के सिवा कोई रास्ता नहीं
बाक़ी  - -
* *
- शांतनु सान्याल

02 फ़रवरी, 2013

मबहम चश्म - -


लब ख़ामोश रहे, मबहम चश्म से उभरे
कुछ बाअहसास दर्द, रफ़्ता रफ़्ता
उसका चेहरा दूर होता गया,
इक धुंध सी छायी
रही दरमियां
हमारे,
जाती हुई बहार का दामन हाथों से छूट
गया, लौट कर शायद उसने देखा
होगा ज़रूर, इक तीरगी के
सिवा कुछ न था दूर
तक उसके जाने
के बाद !
चाँद ढला भी नहीं,और उजालों की - -
दुनिया कोई लूट गया।
* *
- शांतनु सान्याल
मबहम चश्म - धुंधली आँखें

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