भूमिका विहीन है दिल की किताब,
अलिखित है अब तक अंतिम
कविता, अभी तक सांसों
के पृष्ठ हैं गीले, कुछ
ख़ामोश शब्द
चाहते हैं
नए
अर्थों में ढलना, कुछ बेज़ुबान भावों
को चाहिए उन्मुक्त भाषा, अभी
तक मेरे जज़्बात ने, तुम्हारे
अंतरतम को छुआ ही
नहीं, तुम आज
भी देखती
हो मुझे
बस
निष्पलक, बेजान आँखों से, जैसे - -
ढूंढ रही हो मेरे बहुत अंदर, इक
लुप्तप्राय नदी का उद्गम,
जहाँ पूर्व जन्म का
कोई सूत्र छूट
गया हो
जैसे,
तुम आज भी संतुष्ट नहीं हो इस
भौतिक अनुबंध से, तुम्हारी
चाहत ले जाती है अधूरी
कविताओं को गहन
समुद्र के अतल
में, खोजता
हूँ मैं
वो विरल मोती, जो दे सके तुम्हारे
अभिलाष को राहत, मैं चाहता
हूँ अंतिम कविता पर हो
सिर्फ तुम्हारे अधर
हस्ताक्षर, सम्पूर्ण
प्रणय का महत
अनुदान।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुंदर रचना।
जवाब देंहटाएंआपका हृदय तल से आभार ।
हटाएंवाह:
जवाब देंहटाएंबढ़िया लेखन
आपका हृदय तल से आभार ।
हटाएंआपका हृदय तल से आभार ।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सृजन। हार्दिक बधाई
जवाब देंहटाएंआपका हृदय तल से आभार ।
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