बुधवार, 28 दिसंबर 2016

रस्म ए ख़ुदा हाफ़िज़ - -

कभी कभी शून्यता बहोत
क़रीब होता है। तमाम
झाड़ फ़ानूस क्यूं
न हों रौशन -
दिल का
कोना फिर भी बेतरतीब
होता है। कभी बिन
मांगे ही मिल
जाए बहुत
कुछ,
कभी इक चाहत पे हो
हज़ार जवाब तलब,
पाने और खोने
के इस
खेल में यक़ीनन सिर्फ़
अपना अपना नसीब
होता है। उनकी
महफ़िल
से हैं
हम बहोत आश्ना,
शमुलियत की
अपनी
अलग है ख़ूबसूरती
लेकिन रस्म ए
ख़ुदा हाफ़िज़
कुछ
अज़ीबोग़रीब होता है।
न कोई दूर, नहीं
कोई दिल के
क़रीब
होता है इस खेल में
यक़ीनन सिर्फ़
अपना अपना
नसीब
होता है।

* *
- शांतनु सान्याल




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