बिखरी है लालिमा क्षितिज पार शाम हो रही है,
ज़िंदगी यूँ क़िस्तों में, धीरे धीरे तमाम हो रही है,
आधी रात को, सभी रास्ते रेगिस्तान हो जाएंगे,
गली कूचों में बेवजह शबनम बदनाम हो रही है,
इस महानगर के नीचे आबाद है, दूसरा शहर भी,
ज़मीं से फ़लक तक हर एक शै नीलाम हो रही है,
अजीब सी तृष्णा है सुलगते सीने के बहुत अंदर,
हाकिम है लापता राहज़नी सर ए आम हो रही है,
* *
- - शांतनु सान्याल
20 मार्च, 2023
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आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 21 मार्च 2023 को साझा की गयी है
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
आपका असीम आभार आदरणीया ।
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंइस महानगर के नीचे आबाद है, दूसरा शहर भी,
जवाब देंहटाएंज़मीं से फ़लक तक हर एक शै नीलाम हो रही है,
गहरी बात.. कम शब्दों में बड़ी बात।
सार्थक रचना के लिए बधाई आदरणीय।
आपका असीम आभार आदरणीया ।
हटाएंमहानगरों की त्रासदी पर सशक्त बयान
जवाब देंहटाएंआपका असीम आभार आदरणीया ।
हटाएंलापता हाकिम को ढूँढा जाए
जवाब देंहटाएंइस उलझन को सुलझाया जाए
नवसंवत्सर समाधान खोजने का वर्ष साबित हो ! शुभकामना हमको और आपको !
आपका असीम आभार आदरणीया ।
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