क़र्ज़ ए ज़िंदगी कम नहीं, तक़ाज़ा भी है बेहिसाब,
अक्स मुरझाया हुआ, ओंठों पे है खिलता गुलाब,
मुद्दतों बाद मिले हैं, किसी नादिर गौहर की तरह,
हाल ए दिल जो भी हो,चेहरे की चमक है शादाब,
मानाकि अहल ए शहर में हूँ इक फ़र्द ए गुमशुदा,
कूच के वक़्त पड़े रहते हैं यूँ ही माल ओ असबाब,
इस रात की पुरअसरार ख़ामोशी में, न दे दस्तक,
कुछ देर ज़रा और, सजने दे पलकों पे हसीं ख़्वाब,
ख़्वाहिशों के झूमर में, झूलते से हैं, इश्क़ ए जुनूं,
जाम ए शराब से, उभरता सा लगे सूर्ख़ आफ़ताब,
पुराने लिबास से कम नहीं होती इंसां की हैसियत,
अख़बारों से हट कर, अपने अक्स में हों कामयाब,
* *
- - शांतनु सान्याल
अर्थ :
अहल ए शहर - पूरे शहर में
पुरअसरार - रहस्यमय
नादिर गौहर - अमूल्य रत्न, शादाब - ताज़ा
सूर्ख़ आफ़ताब - लाल सूर्य

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" गुरुवार 2 फरवरी 2023 को साझा की गयी है
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
दिल की गहराइयों से शुक्रिया।
हटाएंपुराने लिबास से कम नहीं होती इंसां की हैसियत,
जवाब देंहटाएंअख़बारों से हट कर, अपने अक्स में हों कामयाब,
वाह! बहुत खूब!!! आभार और बधाई!!!
दिल की गहराइयों से शुक्रिया।
हटाएंपुराने लिबास से कम नहीं होती इंसां की हैसियत,
जवाब देंहटाएंअख़बारों से हट कर, अपने अक्स में हों कामयाब,
वाह! बहुत खूब!!! आभार और बधाई!!!
बहुत खूब, सच को शब्दों के लिबास में सामने लाती रचना।
जवाब देंहटाएंसादर
दिल की गहराइयों से शुक्रिया।
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