23 फ़रवरी, 2023

सिर्फ़ सिफ़र बाक़ी - -

वो बैरंग ख़त जिस पे था अश्क का मुहर,
उसे सही ठिकाना, न मिल सका उम्र भर,

वो जज़्बा जो दिल के अंदर में रहा ज़ब्त,
ढूंढती रही जाने किसे, ख़ानाबदोश नज़र,

सैलाब ए जुनूं था, निगाहों का तिलिस्म,
मुल्क ए अज़ल, तक रहेगा उसका असर,

किस ने देखा है फ़िरदौस की भूल भुलैया,
बस इसी पल में है रौशन ज़ीस्त का शहर,

ओंठ ओ ज़ाम के बीच है ज़रा सा फ़ासला,
किसे मालूम पलभर में  नशा जाए बिखर,

मोहक शीशी की तरह है, नक़्श ए जिस्म,
सिफ़र रहता है बाक़ी, जब उड़ जाए अतर,
* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 

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