मजरूह अल्फ़ाज़ ढूंढते हैं हाशिए के बाहर ठिकाना,
बेमानी उन्वान होते हैं, महज ख़ानदानी नज़राना,
झूलते रहे रंगीन फीते, संग ए बुनियाद रहा तनहा,
स्याह बस्ती का ज़ख्म है नासूर, दुनिया से बेगाना,
चाँद, सितारे, इश्क़, मुहोब्बत तक है, हदूद उनकी,
एक मुद्दत से लोग भूल चुके हैं, खुल के मुस्कुराना,
अब आवाज़ में, वो कशिश नहीं बाक़ी,जो कभी थी,
वाक़िफ़ चेहरा भी तलाशता है भूल जाने का बहाना,
माज़ी के पन्नों में वो खोजता है गुमशुदा अक्स को,
कबाड़ में लोग बेच देते हैं अक्सर, अलबम पुराना ।
* *
- - शांतनु सान्याल

जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(०१-१२-२०२२ ) को 'पुराना अलबम - -'(चर्चा अंक -४६२३ ) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
असंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 01 दिसंबर 2022 को लिंक की जाएगी ....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
असंख्य आभार आदरणीय।
हटाएंवाह!बेहतरीन!
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंअति उत्तम
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंबेहतरीन भाव प्रवणता लिए उम्दा सृजन।
जवाब देंहटाएंअसंख्य आभार आदरणीया ।
हटाएंचाँद, सितारे, इश्क़, मुहोब्बत तक है, हदूद उनकी,
जवाब देंहटाएंएक मुद्दत से लोग भूल चुके हैं, खुल के मुस्कुराना,
असंख्य आभार आदरणीया ।
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