उजालों में लोग पढ़ते हैं दूसरों के
आविष्कार, अंदर की कहानियों
को उघाड़ता है अन्धकार,
मुख़बिर की तरह
पीछा करती हैं
परछाइयां,
और हम
भागते हैं, माया के पीछे लगातार,
लम्बे, रहस्यमय पथ का हूँ,
एकाकी पथिक, मुझे
हर हाल में पहुंचना
है, अपने घर
द्वार,
इस खोह के अंदर हैं अदृश्य अनेक
रोशनदान, कौन किसे छलेगा,
अंतरतम की आँखें हज़ार,
देह से उठ कर सभी
चाहत हैं, धुएं के
बादल,
हर एक गिरेबां पे है, उसकी नज़र
बारम्बार, किसने देखा है,
दिव्य अदालत की
सीढ़ियां, सब
कुछ है
खुला हुआ, यहीं है न्याय का दरबार,
उस गुप्त प्रणय पाश में हैं कोई
अदृश्य कांटा, उतना ही
धंसता जाए जितना
निकालें हर बार,
सभी हो जाएं
बंदी, देह
से लिपटे जब मायावी बेल, उतर - -
जाए सब गेरुआपन, जब छू
जाए सिक्त
किनार।
* *
- - शांतनु सान्याल

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति शांतनु जी, ऐसी अभिव्यक्ति जिसका एक-एक शब्द ध्यान से पढ़ने, गुनने तथा आत्मसात् करने योग्य है ।
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुन्दर और सार्थक रचना।
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत सुंदर।
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंखुला हुआ, यहीं है न्याय का दरबार,
जवाब देंहटाएंउस गुप्त प्रणय पाश में हैं कोई..
बहुत खूब
दिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंवाह!!!
जवाब देंहटाएंसुन्दर।
दिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंबहुत बहुत सुन्दर , सराहनीय
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
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