05 नवंबर, 2011


आसां नहीं ये दोस्त -

इस विरानगी से न पूछो जश्ने ज़िन्दगी के मानी 
इन गलियों न देखा कभी ईद ओ दिवाली,
इक तीरगी है जो मुसलसल बहती है - 
रग़ों से गुज़र कर दिलों तक, कि
उन ख़्वाब के खिलौने, जो 
शीशों में हैं ढले, न दे 
मुझे फिर वही 
खुबसूरत 
तोहफ़ा, टूट जायेंगे सभी, नाज़ुक हैं ये दिलों के 
रिश्ते, अक्श चाँद का था आरज़ी, पलक 
झपकते रात बिखेर जायेगी अँधेरा,
सीड़ियों से लगता है बहुत
क़रीब कहकशां  का 
शहर, लेकिन 
मुझे 
मालूम है, ब्रह्माण्ड की हकीक़त, कि शिफ़र में 
झूलतीं हैं अहद वादों की पर्चियां, तुम 
जी लो खुद के लिए यही कम नहीं,
न खाओ क़सम किसी और के 
लिए, आसां नहीं इतना 
कि लुटा जाओ 
दुनिया 
मुहोब्बत के लिए, 

-- शांतनु सान्याल 
rainbow_galaxy_Nina Yang Painting 

03 नवंबर, 2011

लापता हूँ मैं -

वो चाहते हैं मुझ से मिलना, न जाने किस -
लिए, सुना है उनकी नज़्मों में होता 
है ज़िक्र मेरा, दरअसल मेरे घर 
के आगे नहीं है कोई नदी, 
न ही आकाशगंगा, न 
कोई नील पर्वत,
न ही मचलता 
समुद्र तीर, 
इक 
ख़ामोशी है ज़िन्दा दूर तलक, यहाँ कोई 
अपना नहीं, यही क्या कम है कि
जी रहा हूँ मैं, ये कोई सपना 
नहीं, किसने दिया है 
उन्हें ग़लत पता,
ख़ुदा जाने, 
उनकी 
तलाश है सिमित, लौट जायेगी अपने ही 
द्वार से, खिड़कियों से चांदनी होती 
है शामिल रोज़ उनके ख़्वाबों
में कहीं, फिर खिलेंगे कुछ 
जूही ओ चमेली 
रात ढलते,
सुबह 
की चम्पई धूप में वो भूल जायेंगे मेरा ख़याल.

--- शांतनु सान्याल
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01 नवंबर, 2011


इम्तहां न ले मेरा -

न आज़मा मुझे यूँ बार बार, कुछ तो
वक़्त मिले संवरने का मुझे,
तेरी ख्वाहिश में है न 
जाने कौनसा 
तिलिस्म,
सांस टूट कर भी चाहती है आसमां छूना,
ये इम्तहां मेरे लिए कोई नया नहीं, 
लेकिन हर एक पर्चे पे ज़िन्दगी 
पूछती है लाख सवाल, हर 
सवाल का जवाब होता 
है ज़िन्दगी का 
निचोड़,
इस आग की धारे में चलने की सज़ा ही 
आख़िर मुझे मिट्टी से सोना कर 
गई, वर्ना  दर्द के चमक थे 
फ़िके, हर एक ख़्वाब से 
पहले, रात पूछती 
है मेरी 
तमन्ना, 
सुबह है बर्बाद आशिक़ मेरा, रहता है खड़ा 
चाक गिरेबां, कहीं किसी बस्ती में,
कि ज़िन्दगी चाहती है उसे 
उसका हक़ लौटाना,
कुछ अश्क 
लबरेज़ 
ख़त, मुहब्बत का भरम,सीने की जलन -
और एक मुश्त साँसों की गर्मियां,
सुना है कि उसे है दम की
शिकायत, हो भी न 
क्यूँ कर, उम्र 
भर 
वो तकता रहा एक टक, मेरे चेहरे की तरफ.

-- शांतनु सान्याल
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painting by Walfrido 
   

   

17 अक्टूबर, 2011

किस्तों में जीने की अदा

किस्तों में दे जाते हैं वो जीने की हिदायत,
उधार लौटने में कहीं उम्र ही न गुज़र
जाए, उनकी उपहारों में लिखा
होता है कुछ अजीब सा
सन्देश, तात्पर्य
समझने में
कहीं
झुर्रियां न उभर आए, मैं अपनी ही छाया
से स्वयं को बचाए रखता हूँ, कभी
चेहरा कभी दिल के दाग़,
वास्तविकता व
दिखावे में
ज़रा
सा फ़र्क़ बनाये रखता हूँ, तुम्हारी अपनी
कुछ मजबूरियां थीं शायद, तुमने
खींची हैं आतिश की लकीरें,
इर्दगिर्द मेरे जो ख़्वाब
की थीं बस्तियां
सुना है
जा चुके सभी छोड़ कर किसी और शहर
में, त्याग पुत्र की तरह हैं मेरी
आजकल शख़्सियत, कर्ण
की तरह मन खोजता
है कोई दोस्त जो
बुरा हो कर
भी दे
जाय जीवन को नए सन्दर्भ, आयाम
गहरे, डूबने से पहले ज़िन्दगी
को जहाँ अफ़सोस न हो,
यहाँ तो हर दूसरा है
अजनबी चेहरा,
रग़ों में रह
भरता  
है दोस्ती का दम, वक़्त आने पर कर
जाता है किनाराकशी, दे जाता
है किस्तों में हसी, टुकड़ों
में ज़िन्दगी.

-- शांतनु सान्याल
 

12 अक्टूबर, 2011


हासिये में कहीं 

वो परिभाषा जो करती है, रेखांकन से  
मुझे पृथक, वो तुम्हारी सोच है 
वर्ना मन की गहराइयों में
मेरे भी उठते हैं लहर 
किनारे की खोज 
में दूर तलक, भटकती है ज़िन्दगी -
छूने को क्षितिज रेखा, सुना 
है वहीँ कहीं बहती है 
कोई नेह नदी,
छुपाये रहस्य गहरे, खनिज से पिघल 
कर स्वर्ण होने की प्रक्रिया, 
जीवाश्म से जहाँ 
निकलते हैं 
मोती, 
मैं सीप सा खोले वक्ष स्थल, हूँ खड़ा 
उसी तटभूमि के करीब, जहाँ 
कभी तुमने ली थी सपथ,
रौशनी में ढलने की 
अभिलाषा, 
किया था हस्ताक्षर उस इच्छापत्र में -
सहर्ष, कहा था - कर लो मुझे 
आलिंगनबद्ध अनंत 
काल के लिए,
यद्यपि 
काल तो गुज़र गए मौसमों के ओढ़ में,
न तुम बन सके मोती, न मैं 
बन सका नीलकंठ,
रिक्त शुक्ति 
की तरह 
बिखरे हैं स्वप्न सभी ज़िन्दगी के तीर, 

-- शांतनु सान्याल

painting by Duane Murrin


अधूरी प्यास 

ले चलो फिर मुझे धूमकेतु के पथ से
गुज़र कर निहारिकाओं के
शहर में, ऊब चूका हूँ
मैं दिन रात के
दहन से,
वही आंसू वही सिसकियाँ, फ़रेब के
रेशमी फंदे, रिश्तों के हाट
न जाने कितनी बार
लोग परखेंगे
 मुझे,
वो जो बहती जा रही है जीवन नौका
बिन माझी बिन मस्तूल, रोक
भी लो मेरी सांसें बिखरने
से पहले, कोहरों ने
शर्त रखी है
डूबाने की ख़ातिर, इक रात ही की बात
है, खोल भी दो इत्र की शीशी
बिखर जाने दो  प्रणय
गंध, भूल जाएँ
घने धुंध
रास्ता, मुड़ जाएँ शायद अन्य दिशा में,
नींद में जैसे चलतीं हों परछाइयाँ
हूँ मैं आवरणहीन फिर भी
न जाने तुम चाह कर
भी नहीं चाहते मेरा
व्यक्तित्व
छूना,
मैं शीशा नहीं कि टूट जाऊं ज़रा सी -
ठेस से, कभी तो करो स्पर्श
कि ज़िन्दगी है बुझी
सलाख सी, इक
अधूरी प्यास
सी.

-- शांतनु सान्याल


    


10 अक्टूबर, 2011


अनुसंधानी नेत्र 

जीवन के कुछ अभिनव अर्थ
अनदेखे  गंतव्य, बनाते 
हैं मुझे प्रवासी पंछी, 
यायावर सोच 
भटकती है भूल भुलैया की 
सीड़ियों से हो कर कहीं, 
अन्तरिक्ष के शून्य 
में खोजती हैं 
आँखें 
जन्म मृत्यु के रहस्य, दिन व 
रात की चीख, जीने की 
अदम्य, उत्कंठित
गहराई, 
रूप रंग से परे एक भू प्रदेश, 
घृणा, पूर्वाग्रह विहीन एक 
धरातल, जहाँ स्वप्न 
खिलते हों 
निशि पुष्प की तरह, ओष में 
भीगते हों भावनाएं, शेष 
प्रहर में झरते हों 
पारिजात, 
ह्रदय में जागे जहाँ उपासना 
पारदर्शी हों रिश्तों के 
आवरण, स्वर्णिम 
मुस्कानों 
से झरे मानवता की दीप्ति,
मौलिक प्रणय गंध में 
समाहित हों जहाँ 
निश्वार्थ 
अंतर्मन, हर कोई महसूस करे 
भीगी पलकों की तरलता,
कम्पित मन की 
व्यथा, 
मुखौटा विहीन परिपूर्ण धरा.

-- शांतनु सान्याल

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Landscape paintings - Stuart Kirby 






28 सितंबर, 2011


बिहान पुनः मुस्कुराये 

रेशमी जालों से निकल कभी पारदर्शी पंख लिए,

निस्तब्ध झील से उठ कर नीली घाटियों 

में कहीं, अनन्य कुसुमित वीथी 

जहाँ हो प्रतीक्षारत,

स्वरचित अग्निवलय- परिधि से बाहर उभरते 

हैं, रश्मि पुंज, जीवन रचता है जहाँ

नई परिभाषाएं, उच्छ्वास से 

झरते हैं सुरभित 

अभिलाष, कभी तो देख मुक्त वातायन पार की 

पृथ्वी, क्षितिज देता है रंगीन आवाज़,

साँझ उतरती है वन तुलसी के 

गंध लिए, देह बने 

सांध्य प्रदीप, हों तिमिर, प्रदीप्त पलकों तले,

रात रचे फिर जीने की सम्भावना 

स्वप्न हों मुकुलित दोबारा 

बिहान फिर मुस्कुराये.

-- शांतनु सान्याल
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27 सितंबर, 2011

ग़ज़ल - - सकूत निगाह

मतलब जाने क्या था उस सकूत निगाह का यारब
शोले थे मताजुब देख, उस सर्द ख़ाक का सुलगना

मुमकिन न था, हर ज़हर को हलक पार करना   
बेज़ान थी, तपिश मुश्किल था संग का पिघलना

वो जिस मक़ाम से देता है, मुझे सदायें तड़प कर  
तुरे आतिशफिशां पे तै था लेकिन ताज का ढहना

रोक लेता किसी तरह भी मैं उस कोलाके क़हर को
आसां न था शीशा ए दर्द को छूके फिर से संभलना

शबनम के वो  क़तरे ठहरे रहे काँटों की नोक पे यूँ
ख़ुश्क पत्ते थे बदनसीब, दुस्वार था फिरसे भीगना

रुकी रही देर तक फ़लक पे सितारों की वो मजलिस   
चाह कर भी हो न सका ज़ीस्त का घर से निकलना.

-- शांतनु सान्याल  
अर्थ -
मताजुब - आश्चर्य से
 सकूत - ख़ामोशी
आतिशफिशां - ज्वालामुखी
 मजलिस  - संस्था
कोलाके क़हर - तूफ़ान की बर्बादी
ज़ीस्त  - जीवन
 


24 सितंबर, 2011


अछूता बचपन 

परिसीमित अंचल मेरा स्रोत के विपरीत 
बह न सका, झूलते बरगद के मूल 
थामे मैं तकता रहा सांझ का 
उदास चेहरा, परिश्रांत, 
शिथिल,कोसों 
चल कर आता हुआ जीवन तटभूमि छू न 
सका, इस वन्य वीथि से हो कर जाती 
हैं कुछ पगडंडियाँ, नियति की 
रेखाओं की तरह, तिर्यक 
कभी समानांतर, 
निस्तेज आँखों में डूबती हैं भावी स्वप्नों की 
दुनिया, उसने चाहा था शरद की एक 
मुट्ठी ज्योत्स्ना, हेमंती धूप की 
कुछ परतें, शेमल की 
उड़तीं रेशमी रुई,
सभी ने कहीं न कहीं ऊँचाइयों को छू लिया, 
वो कुछ भी हो न सका, सुबह शाम 
एकटक देखता है वो लौटते 
हुए उजले परिधानों में 
सजे कुलीन बच्चे,
मुस्कराते हुए पालकों का आलिंगन, बड़े 
जतन से थामे हुए मज़बूत हाथ,
ख़ुद को पाता है इन्हीं भीड़ 
का हिस्सा, लेकिन 
कहीं कोई शून्यता उसे लौटा लाती है, वहीँ 
जहाँ से कोई भी राह निकलती नहीं,
आद्र आँखों से वो देखता है नदी 
का कटाव, धंसते किनारे 
बड़े ध्यान से वो पोंछता है रेस्तरां के मेज़ 
भाग्य की परछाई जो कभी उभर 
ही न सकी, जीवन ठहरता 
कहाँ है छूटते बचपन 
के लिए, 

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
  
     
  

नज़्म - - फ़लसफ़ा ए इश्क़

मर्तूब नफ़स से उठती हैं शाम ढलते
मज़तरब मेरी आहें, लोग कहते
हैं राज़े आतिश का पता नहीं,
महराबे जिस्म में रात
करती हैं तलाश मुझको, फ़िदा होने
से क़बल गुलेयास सजाती है
मेरा बदन खुश्बुओं से,
फिर ज़िन्दगी
गुज़रती है सोजिश राहों से नंगे पांव,
नक्ज़शुदा अहसास उठाते हैं   
ताबूत, मैं फिर ज़िन्दान
से निकल
राहे आसमां में करता हूँ सफ़र कामिल,
ये तेरी चाहत है जो मुझे हर
बार जीला जाती है,
नामहदूद तेरी मुहोब्बत मुझे मरने नहीं
देती, सिफ़र से बारहा उभर आता
हूँ मैं, नज़दीक तेरे बसते हैं
ख़ारिज अज़ आसमां
की दुनिया,
लेते हैं फ़लसफ़ा ए इश्क़ पैदाइश दोबारा.

-- शांतनु  सान्याल

अर्थ :   
  मरतूब - भीगी
गुलेयास - चमेली
मज़तरब - उद्वेलित
सोजिश - सुलगते
नक्ज़शुदा - टूटे हुए
ख़ारिज़ अज़ आस्मां - आकाश पार
फ़लसफ़ा - दर्शन  
 

22 सितंबर, 2011

ग़ज़ल - - ज़िन्दगी से कहीं ज़्यादा

ये गुमां था  वो चाहते हैं, हमें ज़िन्दगी से कहीं ज़्यादा
साँस रुकते ही सभी,वो ख़ुशी केअबहाम दूर होने लगे,

बामे हसरत पे शाम ढलते वो चिराग़ जलाना न भूले 
ताबिशे रूह लरजती है,राहत ओ आराम दूर होने लगे, 

मैंने ख़ुद ब ख़ुद ओढ़ ली है, तीरगी ए फ़रामोश शायद 
लज्ज़ते मुहोब्बत, मरहले शाद, तमाम दूर होने लगे,

इक पल नज़र से दूर न होने की, ज़मानत थी बेमानी 
रफ़्ता रफ़्ता यूँ, ज़िन्दगी से सुबहो शाम दूर होने लगे, 

-- शांतनु सान्याल 

अबहाम - कोहरा 
बाम - पठार
 ताबिश - चमक 
मरहला - वक़्त 
रफ़्ता - धीरे

20 सितंबर, 2011


पथराई आँखों के सपने 

ये मुमकिन न था किसी के लिए यूँ 

दुनिया ही भूला देना, दामन अपना 

हमने ख़ुद ही समेट लिया, रिश्ते वक़्त 

के साथ इक दिन ख़ुद ही सिमट गए,   

ये और बात थी की शमा बुझ के भी 

जलती रही उम्रभर, इंक़लाब उठा था 

हरीक हायल की मानिंद, देखे थे हमने 

मुख्तलिफ़ अल्मशकाल के सपने भी,  

रोटियां, पक्के मकानात, चिलमन से 

झांकते ताज़ारुह मुस्कराहटें, खुशनुमां  

ज़िन्दगी, माँ के आंसुओं में हमने कभी 

देखी थी तैरतीं बूंदों की क़स्तियां, आँचल 

से पोंछते हुए कांपते हाथ,दरवाज़े पे खड़ी

वो तस्वीर, जो अपना ज़ख्म कभी किसी को 

दिखा न सकी, सूनी कलाइयों में पुराने दाग़,    

जो कभी  भर ही न पाए, घर से निकलते हुए 

बहुत चाहा कि इक नज़र देख लें ज़िन्दगी,

लेकिन हर ख्वाहिश की तवील उम्र नहीं 

होतीं, उस आग में झुलसने की जुस्तज़ू थी 

सदीद, जलते रहे रात दिन, मिटते रहे 

लम्हा लम्हा, जब उस क़िले के मीनारों में 

परचम उड़े, हम स्याह कोने पे थे कहीं पड़े,

हमें मालूम ही न चला कब और कैसे 

हम हासिये से निकल ज़मी पे बिखर गए,

उस आग ने शायद उन ख्वाबों को भी जला 

दिया, अब हम ख़ुद से पूछते हैं इंक़लाब ओ 

आज़ादी के मानी, खाख में मिलने का सबब !

तलाशते हैं अपना इक अदद ठिकाना कि

रात है बेरहम, ज़िन्दगी मांगती है अपना 

हिसाब, हमने क्या दिया और किसने क्या 

लौटाया, हमें याद नहीं,  मुद्दत हुए आग पे 

रख कर हाथों पे हाथ, क़सम खाए हुए - 

-- शांतनु सान्याल 

हरीक हायल - जंगल की आग 

अल्मशकाल -Kaleidoscope बहुरूपमूर्तिदर्शी

मुख्तलिफ़ - विभिन्न 

19 सितंबर, 2011

उन्वान जो चाहे दे दो

ज़िन्दगी भी क्या चीज़ है अक्सर 
सोचता हूँ मैं, दोनों जानिब 
हैं रुके रुके  से धूप छाँव
की बस्तियां, दौड़ते दरख़्त 
कँवल भरे झील, रेत  के टीले 
 उदास चेहरों पे बबूल के 
साए, पलकों से गिरते पसीने 
की बूँदें, नंगे बदन बच्चों 
की भीड़, नदी किनारे उठता धुआँ,
कहीं कुछ छूटता नज़र आए 
रेल की रफ़्तार है ओझल, दौड़ 
चलीं हैं परछाइयाँ, उस पुल से क्या 
गुज़रती हैं कभी खुशियों की 
आहटें, जब भी देखा है तुम्हें ख़ामोश
निगाहें, तुम कुछ न कहते हुए 
भी बहुत कुछ कह जाते हो, उन इशारों 
का दर्द घुलता है रात गहराते, 
बेदिली से चाँद का धीरे धीरे सधे
क़दमों से ऊपर उठना, ढलती उम्र में 
जैसे किसी दस्तक की आस हो,   
चेहरे की झाइयाँ करती हैं 
मजबूर वर्ना आइने में रखा क्या है,
ये उम्मीद की लौटेंगी बहारें इक दिन 
वो रोज़ सवेरे दौड़ आता है,
कचनार के झुरमुट पार नदी के 
कगार, इंतज़ार करता है देर तक,
पटरियां हैं मौजूद अपनी जगह, पुल के 
नीचे बहती पहाड़ी नदी, अब सूख
चली है,  महुए की डालियों से झर 
 चले हैं उम्रदराज़ पत्ते, दूर तक उसका 
निशां कोई नहीं, शायद वक़्त का
 फ़रेब है या  अपनी क़िस्मत में मिलना 
लिखा नहीं, मुमकिन हैं उसने 
राहों को मोड़ लिया, ज़िन्दगी उदास लौट 
आती है वहीँ जहाँ किसी ने दी थीं 
ख्वाबों की रंगीन मोमबत्तियां, जो कभी 
जल ही न सकीं, अँधेरे में दिल 
चाहता है तुम्हें छूना महसूस करना, 
सांस लेना, दो पल और जीना --

-- शांतनु सान्याल  
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18 सितंबर, 2011

नज़्म - - जीने की आरज़ू,


आसमां की थीं शायद मजबूरियां
नजम टूट कर बिखरते रहे 
ज़मीं के थे अपने ही  
मंतक़, जो चाह कर भी अपना न 
सकी सिमटती नूरे जरयां
हर इक सांस में था 
ख़ुदा, हर क़दम 
पे जीने की आरज़ू, बेअसर रहीं न 
जाने क्यूँ अपना बनाने की 
अदा, हर इक बात पे न 
कहो कि लिल्लाह की 
मर्ज़ी, उसी ने कहा था मुझे कि मिलूं 
मैं तुमसे मस्जिद के साए 
मंदिर की सीड़ियों में 
कहीं, तपते धूप में, सर्द चाँद रातों में,
मिले भी तुम मगर अजनबी की 
तरह, पूछते रहे लहू का रंग 
जीने की अहमियत 
बिखरने का 
मक़ाम, हज़ारों सवालात, दे न सका 
कोई माक़ूल जवाब, अपनी ये 
शख्सीयत लिए लौट चला 
मैं गुमशुदा क़ब्रगाहों
के क़रीब, जहाँ फिज़ाओं में है पुरसुकून 
ख़ामोशी, अपनापन, ज़िन्दगी 
यहीं कहीं करती है तलाश 
सितारों के टूटने की 
वजह, इश्क़िया लोगों के मक़बरे, रूहों की 
सरज़मीं, रात ढलते जहाँ लगते हैं 
सूफ़ियों  के मेले, अक़ीदत यहाँ 
है ग़ैरमानी, शर्त हैं सभी 
सिर्फ़ इंसानी !

-- शांतनु सान्याल
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  अर्थ -  
  नजम - तारा 
 मंतक़ - तर्क 
नूरे जरयां - रौशनी का प्रवाह 
सूफ़ी - रहस्यमय 
अक़ीदत  - श्रद्धा 
माक़ूल - सही  

16 सितंबर, 2011

रुको ज़रा

रुको ज़रा
न दिखा आइना, अक्स बिखरा हुआ
चला पड़ा हूँ मैं फिर उन्हीं राहों पे
तलाशे वजूद की ख़ातिर -
उभरती हैं दर्द की लकीरें, ज़िन्दगी का
हिसाब है ग़लतियों से भरा, इस्लाह
है मुश्किल, जिसे तू कहे
जाने महबूब वो कोई नहीं, है वहम मेरा
ये वही वाकिफ़ शख्स है जिसने
हर क़दम उलझाया मुझे
ताशिर में रह कर
 भटकाया सहरा सहरा, मज़िल मंज़िल !
कहीं शायद रुकी है बारिश, हवाओं
में ज़िन्दगी का अहसास लगे,
न यहाँ है कोई मज़ार न
सदग़ कोई, लेकिन गूंजती हैं फिज़ाओं में
नन्हें बच्चों की किलकारियां,
खेलते हैं वो देर रात इन
चांदनी की परछाइयों
में कहीं लुकछुप, उनकी मासूम चेहरे में
ज़िन्दगी तलाशती है नाख़ुदा की
सूरत, नदी है गहरी बहुत
जाना है रौशनी के
शहर, रुको ज़रा की चूम लूँ उनके क़दम !
--- शांतनु सान्याल 
इस्लाह - सुधार
नाख़ुदा - मल्लाह
सदग़- मंदिर
ताशिर- अंतर्मन

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09 सितंबर, 2011

ग़ज़ल - - कभी तो आ ज़िन्दगी,

भीगी शाम की तरह कभी तो आ ज़िन्दगी,
उदास लम्हात को यूँ  फिर सजा ज़िन्दगी.

वो सभी ख़ुश्बुओं के दायरे घुल चले स्वतः 
नीली नूर में धुली कोई आग जला ज़िन्दगी,

फिर उन आँखों में देखी है जीवन की उमंग,
साँसों को इकबार यकीं फिर दिला ज़िन्दगी,

रुके रुके से हैं, फूलों के मौसम न जाने क्यूँ 
व्यथित चेहरों में  गुल फिर खिला ज़िन्दगी,

कौन है जो, मासूम दिलों से खेलता है बारहा
न उठे दोबारा उन्हें मिट्टी में मिला ज़िन्दगी,

ये फिज़ाएं पुकारती हैं अमन के परिंदों को 
फिर कहीं से मुहोब्बत को ले आ ज़िन्दगी, 

--- शांतनु सान्याल 
आवाहन

वो राजपथ से बहते रुधिर धारे

क्लांत, कराह्तीं देवालय,

पाखंडों का पैशाचिक नृत्य

क्या यही है भरतवंशी तेरा अंत

फिर क्यूँ नहीं उठती शौर्य

की वो गंगन चुम्बित जयकारे,

हे ! नव प्रजन्म उठा शपथ

कोटि कोटि जन के परित्राण हेतु

कर कवच धारण,माँ भारती

करे आवाहन, हे! तुम्हें सनातनी,

हों एक धर्म रक्षार्थ सहस्त्र किनारे !

-- शांतनु सान्याल
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31 अगस्त, 2011

न कर तलाश - -


न कर तलाश मुझे 
ज़िन्दगी ढूँढती है 
अर्श से फ़र्श तलक मुसलसल 
की मेरा वजूद बिखरा है 
बेतरतीब, किसी की मजबूरियों 
में हूँ शामिल, बेचता हूँ
 जिस्म ओ जां, जीने के लिए,
क़र्ज़ में डूबे हैं खेत 
ओ खलिहान, पलायन है -
मेरी नियति, माथे 
पर खुदे हैं, अभिशापित लकीरें 
हर पल ठगे जाना,
हर क्षण जीना मरना, इसके 
सिवा कुछ भी नहीं मेरे 
पास, लौट जाओ भी -
इस धूलभरी राहों में तुम चल न 
सकोगे, ये राह नहीं आसां,
नदी पार, पगडंडियों से निकल, 
ईंट भट्टों में कहीं, आगे ज़रा बढ़ कर 
दाह घाटों में बिखरे फूलों में 
छुपे चंद सिक्कों में 
कहीं, संकरी गलियों से उठते धुएँ -
के ओट में, थके हुए बचपन में कहीं, 
चाय की दूकान के सामने, पंचर 
सुधारते नन्हीं उँगलियों में 
कहीं, पान की पीक भरे 
नुक्कड़ की वो दीवार, जिसमें किसी 
ने लिखा था," वो सुबह ज़रूर आएगी",
उसी दिवार से ढहते हुए 
प्लास्तरों के टुकड़ों में कहीं,
बिखरा पड़ा है 
अस्तित्व मेरा, ये ज़िन्दगी 
नाहक है तलाश तेरा, कि कब से मैं 
हूँ गुमशुदा ज़माने की भीड़ में !
* * - - शांतनु सान्याल 



26 अगस्त, 2011

नंगे पांव आओ ज़रा चल के - -


ग़ज़ल 

कोई  शीशा ऐ ख़्वाब नहीं, जैसा चाहा खेल गए 
जिस्म है ये काँटों से सजा, रुको ज़रा संभल के,

हिक़ारत, नफ़रत, आग के शोलों में ढला हूँ  मैं
आसपास भी हैं ज़िन्दगी,  देखो ज़रा निकल के,

बंद घरों  की खिड़कियों से, है दूर जलता चमन 
बच्चों की मानिंद फिर भी, खेलो ज़रा मचल के,

इन लहरों में उठती हैं हार ओ जीत की तस्वीरें 
किसी दिन के लिए यूँ दिल, देखो ज़रा बदल के,

समंदर का खारापन,साहिल को अपना न सका
नदी की मिठास में कभी ख़ुद, देखो ज़रा ढल के,

कुंदन हो या हीरे की चुभन, मुझे मालूम नहीं -
भीगी निगाहों से तो कभी, देखो ज़रा पिघल के,

मंदिर मस्जिद तक, क्यूँ सिर्फ़ है तुम्हारी मंजिल !
क़रीब है ज़िन्दगी, नंगे पांव, आओ ज़रा चल के, 

-- शांतनु सान्याल 


24 अगस्त, 2011

ग़ज़ल - - शैलाबे जुनूं

अट्टहास के बीच ज़िन्दगी बेलिबास खड़ी
वक़्त की मेहरबानियाँ भी कुछ कम नहीं,

खींच लो जितना चाहों सांसों की रफ़्तार -
मज़िल पे कभी तुम और कभी हम नहीं,

इस दौर में हर कोई, खुद से है मुख़ातिब 
आइना  ख़ामोश, कि मुझे भी शरम नहीं,

बाँध लो निगाहों में पट्टियाँ ये रहनुमाओं
जान के भूली है राहें, मेरा कोई वहम नहीं,

मालूम है मुझे ज़माने की रस्मे वफ़ादारी
दौलत पे निगूँ सर, इनका कोई धरम नहीं,

वो फिर बनेगे शहंशाह लूट कर सारा शहर
करो राजतिलक, रोके कोई वो क़सम नहीं,

इस तरह जीने की आदत मुझे रास नहीं -
ये ज़हर है  मीठा, ये इलाजे  मलहम  नहीं,

उठो भी आसमानों से दहकते शक्ले तूफां
थाम ले  शैलाबे जुनूं, किसी में वो दम नहीं.

-- शांतनु सान्याल

  

23 अगस्त, 2011

ग़ज़ल - - निज़ात

तारों भरा ये शामियाना, रात सजी दुल्हन -

ज़िन्दगी चाहे निज़ात, फिर वही चिर दहन,

नदी से उठे धुंआ, बेचैन क़श्ती, रूह बेक़रार 
डूबती उभरती लहरें,फिर वही अधीर थकन,

रुके ज़रूर वादियों में, मुड़ के देखा भी हमें - 
न बढे क़दम, घेरती रही यूँ दिल की उलझन,

कोई  साया अंधेरों में भटकता रहा रात भर -
बंद दरवाज़े, दस्तक न दे सका, ये मेरा मन, 

वीरां सड़कों से कौन गुज़रा लहूलुहान पांव
जिस्म पे बिखरे दाग़, अनबुझ है वो जलन,

ख़ुद को समेटता हूँ, मैं मुसलसल ज़िन्दगी
क्या हुआ  कि वो तमाम मस्सरतें हैं,  रेहन 

सुबह की रौशनी में न देख यूँ  ज़माना  मुझे
मीलों लम्बी तीरगी से चुरा लाया हूँ ये बदन,

-- शांतनु सान्याल  
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22 अगस्त, 2011

ग़ज़ल - - ओझल हो गए

उड़ते  पुल  से वो गुज़रे, सफ़ेद  बादलों की  तरह 
नज़र  भी आये ज़रा  ज़रा, फिर  ओझल  हो गए,

ज़िन्दगी  तकती  रही,  इशारों  की  वो बत्तियां,
रिश्ते  सभी  यूँ निगाहों  से बहते काजल हो गए,

अपनापन, फुटपाथ, पुरानी  किताबों  की  दुकान
छू  न  सका, कि  इश्क़  आसमानी आँचल हो गए,

वो हँसे या आंसू बहाए, कुछ  भी फ़र्क नहीं पड़ता,
चाहने वाले न जाने  कब,कहाँ, क्यूँ  पागल हो गए,

गुफाओं में था कहीं गुम, वो  ख़ुद को यूँ मिटाए हुए
 रेशमी धागों के ख़्वाब सभी मकड़ी के जाल हो गए,

न  दे सदा  कि गूँज तेरी  उभर कर बिखर जायेगी
ज़िन्दगी के हसीन पल, पिघल कर बादल हो गए,

लोग कहते हैं, मुझे बर्बाद इक दर्दे अफ़साना, कहें
हमराहे तूफ़ान, जज़्बात सभी संगे साहिल हो गए !

-- शांतनु सान्याल 

painting by ananta 2010
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20 अगस्त, 2011

देखा है तुम्हें करीब से

देखा है तुम्हें करीब से

ज़िन्दगी को तुमने देखा हो जिस तरह भी
दो पल का साथ मगर मुतासिर कर गया, 

यूँ तो चाहत की फ़ेहरिस्त थी बहोत लम्बी
अपलक आँखों से वो सब ज़ाहिर कर गया,

उस मोड़ पे जा कर बिखर जाते हैं, रास्ते -
 दर्द को सहने के लिए  वो माहिर कर गया,

मुझसे चाहते हो न जाने क्या खुल के कहो
हूँ महलों में लेकिन दिल यूँ  बेघर कर गया,

उसने क़सम खाई थी, हर क़दम पे मेरे लिए 
न जाने,  क्यूँ आखिर तन्हां सफ़र कर गया,

रिश्तों की भीड़ में, शायद  खो गया हो कहीं,
दर्दे वसीयत लेकिन वो मेरे नज़र कर गया,

-- शांतनु सान्याल

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painting - Manuela Valenti

زندگی کو تھمنے دیکھا ہو جس طرح بھی 
دو پل کا ساتھ مگر متاثر کر گیا
یوں تو چاہت کی فہرشت تھی بھوت لمبی 
اپلک آنکھوں سے وو سب ظاہر کر گیا 

اس موڈ پی جا کر بکھر جاتے ہیں  راستے 
درد کو سہنے کے لئے وو ماہر کر گیا 

مجھسے چاہتے ہو نہ جانے کیا کھل کے کہو 
ہوں محلوں میں مگر دل بےگھر کر گیا 
اسنے قسم کھایی تھی ہر قدم پی میرے لئے 
نہ جانے آخر کیوں تنہاں سفر کر گیا 

رشتوں کی بھیڑ میں شاید کھو گیا ہو کہیں 
دردے وصیت لیکن وو میرے نظر کر گیا 

شانتانو سانیال -




11 अगस्त, 2011

नज़्म - - सांसों की धूप छांव

वो राहें जो कभी लौट आती नहीं, देखा -
है, तुम्हें ये ज़िन्दगी उसी राह से गुज़रते,
सूखे पत्तों के हमराह, मौसम बदल गए
देखा है, आसमां को अक्सर रंग बदलते,
अहाते के सभी बेल छू चले मुंडेर की ईंट,
उदास अक्श जाने क्यूँ फिर नहीं खिलते,
उनकी हर बात में है,  ख़ुश्बुओं  का गुमां -
उड़ चले बादल, चाह कर भी नहीं बरसते,
सांसों की धूप छांव, उन निगाहों की नमी
छू जाय दिल, वो मिलके भी नहीं मिलते,
चांदनी छिटकी है वादियों में फिर बेशुमार
वो सिमटे हैं इस तरह, कभी नहीं बिखरते,
 
पढ़ जाते हैं सभी राज़े दिल, यूँ निगाहों से, 
लबों से वो, लेकिन कभी कुछ नहीं लिखते,


-- शांतनु सान्याल  

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07 अगस्त, 2011


जाने कहाँ जाएँ 
नजुमे महफ़िल, बज़्मे कहकशां  हो मुबारक 
अँधेरी बस्तियों से गुज़रती हैं मेरी राहें,
उदास, मायूस चेहरे, ग़मज़दा, बेरौनक हयात 
हैं तमाम अह्बाबे जीस्त, सिर्फ़ मेरी चाहें,
उन पहाड़ियों के पार भी बसती है कोई दुनिया 
खिलते हैं ख़ाके गुल, मुस्कुराती हैं कराहें,

टूटे पुल के अहाते रख आया, सभी हर्फ़े मुहोब्बत 
ख़ुदा जाने बेहतर,नसीब कहाँ बहा ले जाए,
वो सायादार दरख़्त, बहारों में शायद फिर खिले !
हम तो चल दिए, तन्हां रास्ता जहाँ ले जाए,
हमें मालूम है लौटती सदाओं की हालत, ये दोस्त 
बिखरने से पहले शायद बादे नसीम उड़ा ले जाए,
-- शांतनु सान्याल  
   
 नजुमे महफ़िल - सितारों  की महफिल   
 बज़्मे कहकशां - आकाश गंगा की महफिल
 अह्बाबे जीस्त, - जिंदगी के दोस्त
 ख़ाके गुल     - राख के फूल
 हर्फ़े मुहोब्बत - प्रेम पत्र
 दरख़्त     - वृक्ष,बादे नसीम - सुबह की हवा
  

05 अगस्त, 2011

वो ख़ुशी

न मिलो मुझसे, न देखो मेरी तरफ
इक धुंध का बादल हूँ बिखर जाऊँगा, 
चट्टान से नीचे दुनिया लगे दिलकश
मोड़ से आगे न जाने किधर जाऊँगा,
दरख्तों में कहीं बसते हैं ढेरों जुगनू  
ज़रा ठहर ज़िन्दगी, मैं फिर आऊंगा,
न बाँध कोई धागा उभरती साँसों को 
दर्द के रिश्तों से न, यूँ  उभर पाऊंगा,
साए की मानिंद मुहोब्बत ठीक नहीं 
पत्तों की तरह इकदिन झर जाऊँगा,
न रोक मेरी राहें कि मंजिल पुकारतीं 
रात से पहले अंधेरों में घिर जाऊँगा,
कुछ भी तो नहीं बाक़ी, कि दे सकूँ -
फिर कभी सही वो ख़ुशी भर जाऊँगा,
-- शांतनु सान्याल 

  

04 अगस्त, 2011

नज़्म - - काग़ज़ के नाव

भीगते काग़ज़ के नाव रुक चले हों
शायद दिल के आँगन में कहीं -
तुमने छुआ है,अभी अभी जज़बात
इक सिहरन सी जगी लहरों में -
कहीं, बह चले  फिर भीगे अल्फाज़,
नन्हें हाथों के वो मिट्टी के बाँध
फिर दे चलें, मासूमियत से आवाज़,
न करो बंद हथेली, बेक़रार बूंदें -
हैं मुद्दत से बिखरने को यूँ भी बेताब,
कहाँ रख आये हँसी के मर्तबान 
खोल भी दो तमाम बंद रोशनदान,
किश्तों में मुस्कराने की अदा न
कर जाये कहीं ये ज़िन्दगी ही बर्बाद,
 
-- शांतनु सान्याल




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