मेज के आर पार पड़ी रहती है एक मुश्त
शाम की मद्धम रौशनी, चीनी मिट्टी
के दो ख़ाली प्यालों पर ओंठों के
अदृश्य निशान, रेत का इक
टूटा हुआ बांध, बुझी हुई
एक मोमबत्ती, कुछ
मुरझाए से लाल
गुलाब, और
अविरल
बहता
हुआ
समय स्रोत, रात के सुरंग में रुका रहता
प्रेमिक अंधकार, कुछ पलों के लिए
ही सही सभी दुःखों का होता
है अवसान, चीनी मिट्टी
के दो ख़ाली प्यालों
पर ओंठों के हैं
अदृश्य
निशान । झरते निशि पुष्पों का, सिहरित
दीप शिखा के संग निःशब्द सरगोशी,
बंद पलकों पर अतृप्त अधर का
उष्मित चिन्ह, स्पंदित युगल
ह्रदय, और दूर तक इक
अंतहीन ख़ामोशी,
कंपित चंद्र बिंब,
लहरों का
अद्भुत
तट
पर प्रणय समर्पण, देह - प्राण का पूर्ण -
निमज्जन, गहन निद्रा के बाद सब
मुश्किल आसान, चीनी मिट्टी
के दो ख़ाली प्यालों पर हैं
ओंठों के अदृश्य
निशान ।
* *
- - शांतनु सान्याल

जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 22 फरवरी 2023 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।
आपका हृदय तल से आभार ।
हटाएंवाह ❤️
जवाब देंहटाएंआपका हृदय तल से आभार ।
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