Thursday, 3 December 2015

रुका सा सवेरा - -

फिर बह चली हैं, नम
संदली हवाएँ फिर
कहीं उसने
ज़ुल्फ़ है
बिखेरा।
फिर निगाहों में उभरे
हैं अक्स उनके
फिर कहीं
दिल में
चाँदनी का है डेरा। उड़
चले है दूर नाज़ुक
परों की तितलियाँ,
खोजती है मेरी
नज़र फिर
ख़्वाबों का बसेरा। रहने
दे मुझे यूँ ही उनींद
पलों में मुल्लबस, *
क्षितीज के
पार कहीं अभी है रुका 
सवेरा।

* *
- शांतनु सान्याल 

* खोया हुआ