30 जून, 2012

नज़्म - - ख़ामोश निगाहें,

अजनबी सी है रात गुज़री, तकती रहीं 
ख़ामोश निगाहें, वो ख़्वाब थे या 
हकीक़त किसे हम ये राज़ 
बताएं, खंडहर से पड़े 
हैं हर सिम्त ये 
जज़्बात
के ज़खिरे, ये दर्दे क़दीम अपना, दिखाएँ 
भी तो किसे दिखाएँ, कभी राह थी 
इस जानिब, कभी चाह थी 
उनकी आसमां से 
आगे, अब 
टूटते 
सितारों को कैसे पलकों में हम बिठाएं - -
- शांतनु सान्याल


27 जून, 2012

नज़्म - - सदियों की तन्हाई

मीलों लम्बी ये ख़ामोशी, चांदनी में झुलसती
सदियों की तन्हाई, कहीं कोई नहीं; दूर
तक, सिर्फ़ मैं हूँ और मुझ से 
बरहम मेरी परछाई, 
ये बाज़गश्त 
कैसी 
जो मुझ से निकल कर मुझ तलक लौट आई, 
कौन है जो दे रहा कुछ पहचानी सी
दस्तक, ये वहम मेरा कहीं हो
न जाए इक सच्चाई,
वजूद है कोई 
या आईना,
सूरतें सभी एक जैसीं, ये ज़मीं अपनी या है -
परायी, घूरते से हैं सन्नाटे, अँधेरे में 
भटकतीं क़ातिल निगाहें, किस 
से करें दोस्ती और किस 
से करें बेवफ़ाई,
इस मुखौटे 
के शहर में किस पे करें भरोसा, कौन देगा यहाँ 
ज़िन्दा होने की गवाही - - - 
- शांतनु सान्याल 


बाज़गश्त - प्रतिध्वनि
बरहम - नाराज़ 



   

26 जून, 2012


फिर दोबारा 
उठे फिर कहीं से यकायक, लापता  तूफां 
फिर बरसें  टूटकर, बादलों के साए,
फिर निगाहों में तेरी चाहत 
फिर ज़िन्दगी चाहती 
है क़तरा क़तरा 
बिखरना, 
फिर बहे संदली हवाएं, फिर फिज़ाओं में 
हो पुरअशर ताज़गी, फिर धनक 
से छलकें रंगीन जज़्बात,
फिर इक बार दिल 
चाहता है यूँ 
संवरना
कि जीने के मानी हों *लाज़वाल - - - 
- शांतनु सान्याल  
painting by Theo Dapore

25 जून, 2012

नज़्म


तीर ओ कमान; जो भी था पास उसके -
आज़मा  लिए उसने, दिल ऐ
*गज़ाल लेकिन कर न 
सका बस में कोई,
मजरूह मेरे
जज़्बात
हैं तैयार, हर इक  इम्तहां से गुजरने को, 
वो परेशां सा है आजकल, मुझसे 
मिलने के बाद, कि शिकारी 
ख़ुद हो चला हो जैसे 
शिकार, अपने 
ही फैलाए 
जाल में, 
मुझे फ़ुरसत नहीं मिलती जो करूँ उसे 
उससे  ही आज़ाद, फिर कभी 
सोचेंगे, जाएँ या न जाएँ 
उसके दिल के 
पास - - 
- शांतनु सान्याल 
* गज़ाल (अरबी) - हिरण

23 जून, 2012


पुराना आईना 
वो हदे नज़र नहीं, लेकिन छू जाय है; दिल की 
गहराई, ये कैसा भरम मेरा; चल रहा हूँ 
ज़मीं पर; और आसमां छू रही 
मेरी परछाई, न चाँद, न 
सितारे, न ही कोई 
आकाशगंगा,
फिर भी है जिस्मो जां रौशन, न जाने कौन 
पिछले पहर भर गया; ख़ुश्बुओं से मेरी 
तन्हाई, लिख  गया ज़िन्दगी के
रिक्त पृष्ठों पर नयी 
कहानी, ये फिज़ा;
ये सुबह; सभी 
तो थे 
रोज़ मौजूद, फिर क्यूँ पूछता है; मेरा नाम 
आईना पुराना - - 
- शांतनु सान्याल  
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blooming mirror 

21 जून, 2012

नज़्म - - दस्तख़त,

इस शहर की तमाम रास्ते, गलि नुक्कड़ 
थे आशना कभी मुझसे; इक मुद्दत 
के बाद लौटा हूँ यहाँ, कोई तो 
बतलाए मेरे घर का निशां,
इसी मोड़ पर कभी 
उठाई थी क़सम 
साथ जीने 
मरने 
की; यही कहीं था शायद कोई सोया हुआ 
आतिशफ़िशां, जाने कहाँ उड़ गए 
सुलगते राख़ में वो तहरीरे 
अहद, जिसमे की थी 
हमने खूने 
दस्तख़त, कि लौटा लाएंगे ज़मीं पर इक 
दिन सितारों कि दुनिया - - 
- शांतनु सान्याल 

19 जून, 2012


दिल से उठती है जो आह, उसका असर न पूछ 
जाती है, वो हमराह ताउम्र, जहाँ तक 
तू जाए, फिरदौस हो या आतिशे 
दर्रा, हर मक़ाम पे वो दर 
तेरा खटखटाए, 
मुमकिन है 
ताक़त से 
जीत जाए कोई दुनिया, लाज़िम नहीं  दिलों में 
हुकूमत करना - - - 
- शांतनु सान्याल
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mysterious night gate 

16 जून, 2012


परावर्तन पूर्व 
वो पुरोधा कोई या मीर ए कारवां जो भी हो 
उस दिगंत से हो कर गुज़रना है अभी 
बाक़ी, किताबी बातों से कहीं 
गहरी है ज़िन्दगी की 
वास्तविकताएं,
कभी अपने 
अग्नि 
वलय से बाहर निकल कर देखें; हर क़दम 
पर खड़ें हैं छद्मवेशी रावण, क्षितिज 
रेखाओं पर दौड़ते हैं स्वर्ण -
मृगिय आभास, हर 
कोई खड़ा है 
लिए 
शून्य पात्र, सिर्फ एक मौक़े की है उन्हें -
तलाश, जो जिसे छल जाए यहाँ 
नहीं कोई नैतिकता का 
प्राचल, यहाँ कोई 
राघव नहीं 
जो आए अकस्मात् कर जाये जीर्णोद्धार ! 
स्वयं को करनी है सत्यता की 
खोज, कोई नहीं यहाँ 
जो कर जाये 
अंतर्मन 
प्रबुद्ध सहसा, एक युद्ध खुद से पहले फिर 
करें परावर्तन की चाह - - - 
- शांतनु सान्याल
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artist McNaughtonRainy Reflections..

10 जून, 2012


किसकी परछाइयाँ

उस लकीर पर जहाँ, मिलते हैं ज़मीं आसमां
गुज़रते हैं अक्सर देर रात सितारों के कारवां,

उसी मंज़िल पर हैं कहीं, रौशनी के चिलमन -
वहीँ पर कहीं है,शायद मेरा पोशीदा मेहरबां,

किस के दम पर हैं रौशन,आँधियों में ये दीये
जिन्हें बुझा न पाए, उभरती रेतीली आंधियां,

वक़्त ने चाह बारहा,यूँ तो मिटाना मेरा वजूद 
खुले सहरा में हैं तैरती,ये किसकी परछाइयाँ !

- शांतनु सान्याल
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Paintings Realism Oil Seascape Igor Maykov

07 जून, 2012


दस्तक 
एक दस्तक; जो उम्र भर पीछा करे 
नींद हो या जागरण, वो खड़ा 
था देर तक, दरवाज़े पर 
लिए न जाने क्या 
चाहत, कोई 
सन्देश,
या मुस्कराने की राहत, देर कर दी 
ज़िन्दगी ने द्वार खोलने में 
इतनी कि उसे आवाज़ 
छू न सकी, वो
कोई दूत 
था, या अक्स जाना पहचाना, रख 
गया कोई शून्य इत्रदान 
देहरी में इस तरह 
कि सुरभित 
हैं तबसे 
अंतर्मन की संकुचित गलियां, कभी 
भूले से वो आ जाये इस सोच 
में रखता हूँ दिल के 
कपाट खुले
आठों 
पहर,जीवन चाहता है कि भर लें वो 
शून्यता जो वक़्त ने दिए,
छलक जाएँ फिर 
ख़ुश्बू की
बूंदे
उदास अहातों तक बिखर कर - - - 
- शांतनु सान्याल
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art by ANN MORTIMER 

30 मई, 2012


कल रात कोई 
वो सभी इलज़ाम बहोत ख़ूबसूरत लगे -
जो उसने लगाये थे मुझ पर, यूँ 
भी ज़िन्दगी में इनामों की 
कमी न थी, इक और 
नायाब नगीना 
जड़ गया 
कोई,
दाग़े दिल लिए फिरता हूँ मैं उसकी गली 
में अकसर, बदहवास सा कुछ  कुछ, 
सुना है ; टूटे दहलीज़ पर कल
शब, भीगा  गुलाब
रख गया
कोई, 
- शांतनु सान्याल  
Paintings by Maria Serafina

26 मई, 2012

रौशनी का वादा

अन्तर्निहित थे मन में सभी अंकुरित भावनाएं ;
मौसम ने कदाचित शपथ उभरने का 
निभाया होता, मेघों की वरीयता 
जो भी हो, कुछ बूंद यूँ ही 
लापरवाही से तपते 
ह्रदय पर 
गिराया होता, उपेक्षित मरुभूमि की ख़ामोशी -
व नज़र अंदाज़ आसमान, कहीं से 
रात ने शबनम तो चुराया 
होता, नियति की थी 
अपनी  ही 
मज़बूरी, वरना रेत के टीलों में कम से कम 
चांदनी तो बिछाया होता, इन अंधेरों 
से निकल आने में वक़्त नहीं 
लगता ; ग़र रौशनी ने 
अपना वादा तो 
निभाया 
होता - - - 
- शांतनु सान्याल 

25 मई, 2012


कोई क़दम तो बढ़े
कोई तो उठे बज़्म से ललकारते हुए 
कि लपक जाए दहकता शोला, 
कोई तो आए लहराके यूँ 
बादलों की तरह 
राख़ होने से 
बच भी  जाए किसी का आशियाना, -
न पूछ ऐ दोस्त मेरी ज़िन्दगी 
की हकीक़त, इक आइना 
है जो टूट कर भी 
बिखरने नहीं 
देता मेरा 
वजूद, कि हर बार खाक़ से उभरता 
हूँ मैं तूफ़ान की तरह - - - 

- शांतनु सान्याल
painting by MARIE

23 मई, 2012


ग़र मिल जाए कोई 

ये ख़ामोशी अब लाज़िम नहीं कांपते लबों को
फिर ज़बां मिल जाए,

रात का सफ़र और धड़कता दिल, काश कोई 
तो कारवां मिल जाए,

सीने में लिए फिरता हूँ रौशनी का शहर, कहीं 
से आसमां मिल जाए,

क़िस्मत का सितारा डूबा नहीं, भूले से सही,
इक क़द्रदां मिल जाए,

- शांतनु सान्याल

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waves 4

22 मई, 2012


आवाज़ न दे कोई 
ये कैसे  ख़ुमार लिए रात भर गई जिस्मो जां,
है ज़माना बहोत दूर सहमा सहमा; और 
हम बस चले हैं रफ़्ता रफ़्ता जैसे 
लबे कहकशां, न दे हमें 
आवाज़ कोई कि
हमने छोड़ 
दी है ;
नफ़रतों से सुलगती वो जहां, इन ख़लाओं
में है न जाने क्या तिलिस्म गहरा,
जितना ही डूबते जाएँ उतना 
ही उन निगाहों में बढ़े
कोई राज़ 
बेक़रां, 

- शांतनु सान्याल 
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Circinus Galaxy

19 मई, 2012

फिर कभी - - -

किसी दिन, फिर पूछेंगे, उदासी का सबब
आज बसने भी दो ज़िन्दगी को ;
नज़दीकियों के आसपास,
वो सवाल जो कर
जाये दिल
की
गहराइयों में उथल पुथल, घिर आएं बेवक़्त
ही निगाहों में बदलियाँ, नहीं चाहिए
वो दर्द भरी बरसात, मखमली
शाम के साए, और उभर
चले हैं ख़्वाब नए !
खिलने दें
फिर
क्यों नहीं मुरझाये शबे गुल, भरने दें इक -
अह्सासे ख़ुश्बू ; कि मुख़्तसर है ये
रात ; और अरमानों की
फेहरिस्त बहोत
लम्बी - - -

- शांतनु सान्याल




13 मई, 2012

जिस्म ओ रूह

 
अब फ़र्क़ नहीं पड़ता दिल को 
किसी के नज़र अंदाज़ का;
हम छोड़ आये सभी 
मरहले दर्दो 
ग़म के
बहोत दूर, उनकी  तसल्ली
में  हैं ; अफ़सानों की 
इक लम्बी सी 
कतार,  
जी रहें हैं; अब तक ज़हर -
खाने के बाद, रख
जाओ कोई भी 
गुल, दिल 
चाहे 
जो, अब हमें कुछ भी नहीं  
चाहिए, इतना कुछ 
पाने के बाद,
वो चाहत 
जो 
जान से गुज़रे, मुमकिन 
कहाँ दोबारा उसका 
उभरना, ये शै
है; बहोत 
क़ातिल उभरती है इक बार
जिस्म ओ रूह लेने 
के बाद - - 
 - शांतनु सान्याल  



 

12 मई, 2012


काश वो मिल जाये 

न जाने क्या मज़बूरी थी उसकी, ख़ामोश
निःशब्द, वो गुज़र गया मेरे पहलू
से होकर यूँ ; जैसे हाथों से 
छूट जाय किसी की
उँगलियाँ डूबने 
से पहले, 
मेरी सांसों के साहिल पर था वो खड़ा दूर !
आवाज़ मेरी लौट आई मजरूह 
हमेशा की तरह; वो 
शायद था 
अपनी 
ही जहाँ में मसरूफ़, बहोत चाहा कि छू लूँ 
उसे, लेकिन उस भंवर से निकलना 
न था आसां, न उसने ही हाथ 
बढ़ाया, न  ज़िन्दगी ने 
साथ निभाया,
वो शख्स  
अँधेरे में आख़िर गुम होता गया; बहोत 
दूर - - - 

- शांतनु सान्याल
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Rising Moon by Clifford T. Bailey  

11 मई, 2012

कोई पूछे ज़रा 


गुज़री है रात नंगे पांव दहकते अंगारों से शायद;
क्षितिज पर उभरे हैं; फिर कहीं जा के कुछ
रंगीन नज़ारे, एक शून्यता जो ख़ुद
में समेटे है सारी दुनिया, वो
खोजते हैं अस्तित्व
बिखर जाने
के बाद,
कोई पूछे तो सही; आसमां से शामियाना होने
का दर्द, कितने ही तूफ़ान लिए सीने में
वो रौशन रहा रात भर, आंसुओं
को उसने कहा शबनम;
कितनी मुश्किल
से टपके थे
जज़्बात
कोई क्या जाने, ज़िन्दगी रुकी रही देर तक;
भोर की हलकी रौशनी में तनहा, साँस
थे यायावर प्रतिध्वनि; न जाने
किस ओर मुड़ गए - - -

- शांतनु सान्याल



10 मई, 2012

अभी बहोत बाक़ी है 

फिर जलाएं शमा कि रात अभी बहोत बाक़ी है,
ये अँधेरा न डस जाये कहीं मेरी ख्वाहिश -
निकले ही नहीं, जज़्बात अभी बहोत  बाक़ी है,

वक़्त ने निभाया साथ, उसकी मर्ज़ी से -
ज़रासे घिरे बादल, बरसात अभी बहोत बाक़ी है,  

उस शिफ़र के पार भी है ज़िन्दगी शायद 
दिल के अलावा, कायनात अभी बहोत बाक़ी है,

मेरी सांसों से गुज़र कर, देखो कभी तुम -
ख़्वाब तो देखा, अशरात  अभी बहोत बाक़ी है,

ये जूनून कहीं न कर जाय मुझे राख़ कि 
मुसलसल  दहन , निजात  अभी बहोत बाक़ी है .

- शांतनु सान्याल 
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by Steve Garfield 

08 मई, 2012

उसने कहा था

किस खूबसूरती से उसने की किनाराकशी,
न कोई आवाज़, न ही दर्दे अहसास
मासूम निगाहों से कहा -
शीशा ही था सो
टूट गया,
बूंद बूंद बिखरती रही ज़िन्दगी, दम ब दम
हर ख़ुशी, फूल बिखरे थे ज़मीं  पे
बेतरतीब, मुस्कान लिए
उसने कहा - गुल ही
थे सो झर गए,
इक साँस
जो उभरती रही रात दिन किसी के लिए यूँ
टूट कर, आँखों में  नमी थी या कोई
ख़्वाब की चुभन, पलकों में
ठहरे ज़रा देर ज़रूर,
और फिर गिर
पड़े, उसने
कहा - आंसू ही थे छलके और टूट कर बिखर
गए - -

- शांतनु सान्याल

04 मई, 2012


अनहद संवेदना 

अनुभूति व कल्पना के मध्य कहीं देखा है संभवतः 
उसका अस्तित्व एक मौन साधक की तरह,
अदृश्य, लेकिन है शामिल हर साँस में,
ज्यों मरुभूमि में अप्रत्याशित 
वृष्टि भिगो जाय तप्त 
संध्या, लिख जाय
कोई उम्मीद 
की 
रुबाई, खंडहरों में फैलती वन बेलियों की तरह, है 
वो अंतर्मन की गहराइयों में छुपा, कोई 
गुमनाम कवि की तरह, अनहद 
उसकी भावना, हर पल 
जगाये उपासना,
अलौकिक 
हो कर
भी वो है विद्यमान प्राकृत, किसी साधारण से 
इन्सान की तरह - - - 

- शांतनु सान्याल 
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Painting by Donald Zolan 

02 मई, 2012


लापता मेरा वजूद 

जब कभी उसने कहा, मैंने दिल से सुना
ये और बात थी कि उसने कभी दिल 
से कहा ही नहीं, हर लफ़्ज़ में 
इक नपातुला सा अंदाज़,
वो शख्स अक्सर 
भंवरजाल में 
मुझे डुबो गया, उस ख़्वाब में थीं न जाने 
कितनी सलवटें, ज़िन्दगी चाह कर 
भी कोरा कागज़ हो न सकी, 
लिख गए मौसम मेरे 
दर पे, मेरी ही 
गुमनामी
के इश्तेहार, कि बेघर हूँ आजकल अपने 
ही घर में, ये हस्र, मुझसे पूछता है 
मेरी मासूमियत का सबब, 
कैसे कहूँ  कि बाहोश 
ही मैंने दस्तख़त
की थी,
कभी उसके तहरीरे जज़्बात पर, बेख़ुदी में 
शायद - - - 

- शांतनु सान्याल
creeper 

25 अप्रैल, 2012


अभिनव अंगीकार 

वो कोई अन्य न था, मेरी अपनी ही प्रतिच्छाया थी
प्रश्न चिन्हों को समेटे, कभी दहलीज और 
कभी अहाते में, कदाचित खड़ा रहा
प्रखर धूप हो या चांदनी रात, 
खुले वक्षस्थल में लिए
समय  चक्र 
निशान, 
कोई निवृत आनंद हो जैसे युगों से प्रतीक्षारत, कर 
चला हो नीरव अनुसन्धान, कभी आमने 
सामने, कभी अदृश्य दर्पण की 
तरह सतत अनुसरण, मैं 
चाह कर भी उसे 
अपरिग्रह 
कर न सका, वो मेरे अस्तित्व के रास्ते कब व कैसे 
अंतर्मन की गहराई लांघता रहा, हर पल मेरा 
अहम, अभिमान, ईर्ष्या का दहन करता 
रहा मुझे पता ही न चला, कोई तो 
है,जो छद्म रूप लिए उसे कर 
जाता है,सक्रीय और 
मैं झुकाता हूँ   
शीश बेझिझक, करता हूँ अपनी भूलों का पश्चाताप,
हर दिन जीवन  करता है उसे अभिनव रूप 
में अंगीकार - - - 

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

painting by Ivan Aivazovsky 

23 अप्रैल, 2012

पतझर से हो कर गुज़रे हैं ये ख़्वाब तमाम रात 
तभी उभरते तूफ़ानी हवाओं से नहीं डरते,
हर क़दम इक तलातुम, हर मोड़ पे दुस्वारियां 
ताबीरे हयात, जूनूनी बहावों से नहीं डरते,
- शांतनु सान्याल 
midnight - midnight - Tania Farrugia 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

09 अप्रैल, 2012

नज़्म ( اردو عبارت کے ساتھ )तिश्नगी

कुछ और वजह होगी भूल जाने की, वो शख्स 
कभी था वाबस्ता ज़िन्दगी से, आसां
कहाँ ज़मीर को दग़ा देना, इक 
आग बुझा दिल में फिर 
दोबारा आग लगा 
लेना, वो 
कोई 
राज़ लिए सीने में भटकता है सहरा सहरा, 
मुमकिन कहाँ जहाँ में, हर क़दम 
पे गुमनाम चश्मों का उभर 
आना, वो इक ऐसी 
तिश्नगी है 
जो 
लब से उठती है ख़ामोश, रूह पे होती तमाम,
बहुत ही मुश्किल मेरे अहबाब - ए -
जावदाँ, सांसों का जिस्म 
से जुदा होना - - 

- शांतनु सान्याल 
نظم 
کچھ اور وجہ ہوگی بھول جانے کی، وہ شخص
کبھی تھا وابستہ زندگی سے، آساں
کہاں ضمیر کو دغا دینا، اک
آگ بجھا دل میں پھر
دوبارہ آگ لگا
لینا، وہ
کوئی
راز لئے سینے میں بھٹكتا ہے صحرا صحرا،
ممکن کہاں جہاں میں، ہر قدم
پہ گمنام چشموں کا ابھر
آنا، وہ اک ایسی
تشنگي ہے
جو
لب سے اٹھتی ہے خاموش، روح پہ ہوتی تمام،
بہت ہی مشکل میرے احباب - اے -
جاوداں ، سانسوں کا جسم
سے جدا ہونا -

- شانتنو سانیال 
painting by Barbara Fox

08 अप्रैल, 2012

नज़्म - - लबरेज़ ख़्वाब

जालीदार मेहराब से, जब रात ढलते -
उतरती है चांदनी, उनींदी आँखों
में तैरते हैं कुछ ख़ुश्बुओं
में लबरेज़ ख़्वाब,
कुछ ख़ामोश
वादे
लिए, अनकहे हज़ार अफ़साने, कोई
दहलीज़ पे रख जाता है चुपके
से हैरत अंगेज़ तोहफ़ा,
पंखुड़ियों में
लिपटा
इक बंद लिफ़ाफ़ा, नज़्म या ग़ज़ल न
जाने क्या है उसमें, रात भर
इक मीठा सा दर्द लिए
सीने में, वजूद
सोचता है
उसे खोलें की नहीं, राज़ ग़र खुल जाए
तो ज़िन्दगी में लुत्फ़ क्या
बाक़ी होगा, यही
ख्याल मुझे
तमाम रात सांस लेने नहीं देता, ये तेरा
अंदाज़े बयां है या जानलेवा
इक़रार नामा, अक्सर
सोचता है दिल
लेकिन
वो तहरीरे ज़िन्दगी चाह कर भी पढ़ नहीं
पाता, हर बार सोचता है ज़ेहन
हर बार चाहता है कहना,
मुझे तुमसे मुहोब्बत
है लेकिन हर
बार ये
कह नहीं पाता, लौट जातीं हैं जालियों से
छन कर आने वाली रौशनी या
घिर चलीं हैं फिर आसमां
में बदलियाँ - -

- शांतनु सान्याल

07 अप्रैल, 2012


सहयात्री 

ये  नीरवता  जो अपने आप में ही है एक 
विप्लव, भूल से न  समझे कोई 
सब कुछ  है अच्छा, न 
जाने कब उठे 
सहसा 
किस  दिशा से ले कर अग्निशिखा, कर 
जाए  पलक  झपकते  सब  तहस
नहस, विस्मृत  व  मृत
के  शाब्दिक अर्थों 
में  है अंतर, 
भूलना और भूला  देना  दोनों  सहज  नहीं, 
रत्न जड़ित मुकुट, मयूर -
सिंहासन और धूसर 
कंटकमय  पथ 
के  मध्य 
की  दूरी  बहुत  नहीं, कब  कालचक्र थम 
जाए  इसकी भविष्यवाणी 
सरल  नहीं, अदृश्य 
अभिशाप जब 
हो जाएँ 
जागृत, मौन शक्ति कर जाती  हैं पलभर 
में  स्वाहा, कौन राजा और कौन
रंक, उस पथ के यात्री 
सभी  समान, 
रिक्त 
हाथ सभी मुसाफिर, कभी तू  गंतव्य की 
ओर  कभी मैं आकाश पार, 
फिर  क्यूँ  इतना  करे 
हाहाकार - - - 

- शांतनु सान्याल 
shadows midnight 



06 अप्रैल, 2012

नज़्म ( اردو عبارت کے ساتھ ) दुआओं की बस्ती

तंग दायरे से निकल कर तो देख ज़रा बाहर
बेइन्तहां ख़ूबसूरत है ये दुनिया, ख़ुद
तलक  महदूद होने का नाम
नहीं ज़िन्दगी, नरम
धूप की मानिंद
बिखर जा वादियों में अल सुबह, बेक़रार से
हैं, कितने ही ख़्वाब शबनम में भीगे
हुए, आ बाद - ए - नसीम के
हमराह, दिल के जज़्बात
हैं बेसबर खिल जाने
के लिए, तेरा
हर क़दम हो मंज़िल - ए - मसावात की
जानिब, यहाँ अपना पराया कोई
नहीं, ये है दुआओं की बस्ती,
यहाँ हर कोई मिस्कीं
और हर दिल है
शहंशाह,
छोड़ जा क़दमों के निशां, ये राह जाती है
बहोत दूर, दर्ब - ए - बहिश्त
की तरफ, न सोच देर
तक की ज़िन्दगी
है मुख़्तसर,

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/ 
 نظم


تنگ دائرے سے نکل کر تو دیکھ ذرا باہر
بےنتها خوبصورت ہے یہ دنیا، خود
تلک مهدود ہونے کا نام
نہیں زندگی، نرم
دھوپ کی ماند
بکھر جا مدعیان میں القاعدہ صبح، بےقرار سے
ہیں، کتنے ہی خواب شبنم میں بھیگے
ہوئے، آ بعد - اے - نسیم کے
ہمراہ، دل کے جذبات
ہیں بےسبر کھل جانے
کے لئے، تیرا
ہر قدم ہو منزل - اے - مساوات کی
جانب، یہاں اپنا کا ہے کوئی
نہیں، یہ ہے دعاؤں کی بستی،
یہاں ہر کوئی مسكي
اور ہر دل ہے
شہنشاہ،
چھوڑ جا قدموں کے نشاں، یہ راہ جاتی ہے
بهوت دور، درب - اے - بهشت
کی طرف، نہ سوچ دیر
تک کی زندگی
ہے مختصر،
-شانتنو سانیال




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