Sunday, 1 December 2013

न रहो यूँ बेहरफ़ - -

ये ख़ुमार ए नीम शब, यूँ ही गुज़र न जाए कहीं,

न रहो यूँ बेहरफ़, सहमे सहमे, फ़ासलों में तुम 
नूर महताब वादियों में यूँ ही ठहर न जाए कहीं,

हम कब से हैं खड़े, अपनी साँसों को थामे हुए -
ये गुलदां ए ज़िन्दगी, यूँ ही बिखर न जाए कहीं, 

बंद पलकों में हैं, रुके रुके से सितारों के साए -
मसमूमियत ए इश्क़, यूँ ही उतर न जाए कहीं, 

ये ख़ुमार ए नीम शब, यूँ ही गुज़र न जाए कहीं,

* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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