27 मई, 2020

नेपथ्य में कहीं -

ये धूप - छांव का अनुबंध है
बहोत नाज़ुक, कब बदल
जाए रंगीन परदों का
जादू कोई जाने
ना, कल
और
आज के दरमियां बहुत कुछ
बदल गया, कल मेरा
वजूद किसी राजा
से कम न था,
आज हूँ
भीड़
में भी अकेला, जाहिर है अब
मुझे कोई पहचाने ना। इस
रंगमंच में सभी को है
निभाना अपना
अपना
किरदार, कभी भरपूर सभागृह,
इत्र में डूबी हुई सांसे करे
इंतज़ार, और कभी
ज़िन्दगी एक
शब्द भी
जाने
ना। ख़त ओ किताबत मेरी कुछ
कम न थी, लेकिन जवाब थे
कि गुम हो गए लौटते
हुए, किसे दोष दें,
जब बहुत
अपना
कोई, हमें अपना ही माने ना।
- - शांतनु सान्याल


16 मई, 2020

अब कोई दुआ न देना - -


अब लम्बी उम्र की दुआ न देना
के अब बहलने की उमर नहीं 
हमारी, इक मीठा सा है
ख़ुमार रूह की
गहराइयों
तक,
वो नशा जो चेहरे तक आ
के सिमट जाए, वो
चाहत अपने
आप उतर
गई
सारी । चाँदनी का लिबास
ओढ़े कब तक इंतज़ार
करे कोई, झरते
फूलों के
साथ
आख़िर, ये रात भी यूँ ही सो
गई बेचारी, तर्जुमा है
बहोत मुश्किल,
रहने दे गुम,
तहे -
निगाह भूली हुई दास्ताँ हमारी।
- - शांतनु सान्याल


10 मई, 2020

बहाने तलाश करें - -


हर सांस हैं बोझिल, हर एक
नज़र में सूनापन, फिर भी
ज़िन्दगी मुस्कुराने के
बहाने तलाश
करे, वो
कोई
आशना चेहरा है या ख़्वाब
पिछले पहर का, दूर
जितना जाना
चाहूँ, वो
क़रीब
आने के बहाने तलाश करे।
मेरा पता है कहीं क्षितिज
की नाज़ुक लकीरों में
छुपा हुआ, वो अपने
सीने में अक्सर
मुझे छुपाने
के बहाने,
तलाश
करे। मैं चाह कर भी यूँ
निजात पा न सकूँ,
वो शख़्स मुझे,
हर लमहा
अपने
में समाने के बहाने, तलाश
करे। न उसके इख़्तियार
में है कुछ, न मेरे वश
में ज़रा भी, फिर
भी न जाने क्यूँ
वो मुझे से
लौट के न जाने के बहाने
तलाश करे।
- - शांतनु सान्याल




07 मई, 2020

निरुपाय हर एक चेहरा - -

कुछ भी नहीं वश में अपने,
चाहे हो दो गज़ ज़मीं या
मुट्ठीभर आसमान,
तुम भी हो
परदेशी
मुसाफ़िर, मेरा भी नहीं यहां
कोई चिरकालिक स्थान ।
परिभाषाओं का क्या,
धुंध की तरह
अक्सर
बदलते हैं वादियों का रुख,
कभी बिखरे नदिया
कगार, कभी
पहाड़ों सी
ऊंची
उड़ान । विलिनता ही है - -
इस जीवन का एकमेव
शाश्वत - सत्य, फिर
क्यूँ हो हम इतना
आंतकित,
ख़ुद के सिवा कोई नहीं - -
दे हमें यहां अभयदान ।
उदय के साथ
अदृश्य
चले हमेशा सूरज का चिर
अवसान ।
- - शांतनु सान्याल






05 मई, 2020

मरहमी स्पर्श - -


न जाने कौन सी जगह है
उस पार, जो लुभाती है
मुझे जुगनुओं के
द्वीप की तरह
हर बार,
मेरा जिस्म होना चाहे कोई
विस्मृत, पुरातन मंदिर,
तुम विशालकाय
बरगद बन
पाओ
अगर इक बार, मुझे तुम्हारे
आवर्त में है जीना मरना,
नहीं चाहिए छद्मवेशी
ये संसार, ये सही
है कि हर एक
के भाग्य
में नहीं
मोंगरे की तरह खुल के - -
महकना, हर्ज़ क्या है
आख़िर माटी गंध
हो जाना कभी
कभार,
देह मेरा है ढहता कोई प्राचीर,
ढहने दो इसे यूँ ही वक़्त के
साथ, हो सके तो ढक लो
मुझे अपने मरहमी -
शैवाल से
आरपार ।
- शांतनु सान्याल








03 मई, 2020

नदी और किनारे के दरमियान


नदी और किनारे के
दरमियाँ
रहता है एक ख़ामोश सा
रिश्ता, डूबने का सुख
वही जाने जो
टूटने को
हो
तैयार । उठ गई रात ढले आसमां
की महफ़िल, फिर दिल में है
जागी सुबह की उम्मीद,
फिर कलियां हैं
खिलने को
बेक़रार ।
कहने को दूर दूर तक है एक न
ख़त्म होने वाली वीरानगी,
किसे ख़बर कितनी
दूर तक ले चले
ऐ बहती
हुई
दिल की आवारगी, न जाने इसे
है किससे यूँ मुक्कमल
मिलने का अशेष
इंतज़ार ।
- शांतनु सान्याल

07 फ़रवरी, 2020

उम्मीद की लकीर - -

किसी की चाहतों में ख़ुद को मिटा देना
नहीं आसां, बड़ी सहजता से उसने
तोड़ा था नाज़ुक रिश्ते, लेकिन
न जाने क्यूँ वो शख़्स रहा
ताउम्र परेशां।  बिखरे
हुए ख़्वाबों में
कहीं न
कहीं
होता है सुबह का ठिकाना, आज की
रात चाहे गुज़री हो दहकते हुए
रास्तों से, ग़र मुमकिन
हो कभी, मुंतज़िर
आँखों में
लौट आना। सितारों का उभरना नहीं
छूटता उजाले और अँधेरे के
दरमियां, इक हलकी
सी लकीर होती
उम्मीद की
हमेशा,
चाहे बेशुमार हों  ज़िन्दगी में कमियां।

* *
- शांतनु सान्याल   

30 जनवरी, 2020

बहरहाल - -

न जाने कितने लम्हों ने देखा
है हमें बहोत क़रीब से,
कभी मुस्कुराहटों
के बेलबूटे और
कभी रफ़ू से
झाँकती
ज़िन्दगी की रुमाल, अब नहीं
पूछता आईना भी हमारा
हालचाल । दालान की
धूप भी अब नहीं
मय्यसर, हर
जानिब
हैं कंक्रीट के जंगल, न कोई
शिकायत किसी से न
खोने पाने का
मलाल,
इक तुम्हारी निगाह के अलावा
हमारा ठिकाना कोई नहीं,
कल की कल सोचेंगे
आज तुमसे हैं
मुख़ातिब
हम बहरहाल - -
- - शांतनु सान्याल

28 जनवरी, 2020

पुनःच - -

छाया - आलोक के बीच कहीं
ज़िन्दगी उभरती है ले कर
नई संभावनाएं, दहलीज़
पे मेरे न जाने कौन,
सुबह - सवेरे रख
गया अदृश्य
शुभ -
कामनाएं। फिर कच्ची धूप में
उड़ चली हैं तितलियां, फिर
किसी ने दी है मुझे एक
मुस्त महकती हुईं
तसल्लियां,
फिर
तुम्हारी आँखों में उभर चले हैं
सजल अनुरागी भावनाएं।
- शांतनु सान्याल

हमेशा की तरह - -

पत्ते गिरने का मौसम नहीं रुकता,
वक़्त की रेल गुज़रती है
निःशब्द अपने गंतव्य
की ओर, पार्क
के बेंच
पर पड़े सूखे पत्तों में कहीं खो
जाते हैं यादों के तहरीर,
कुछ मौन संबोधन,
कुछ नेह स्पर्श,
कोहरे की
तरह
जिस्म ओ जाँ को छूते ही
अदृश्य हो जाते हैं
धीरे - धीरे,
रहता है
क़रीब सिर्फ़ एक अहसास
निगाहों के कोरों में
कुछ लवणीय
जल बिंदु
और
विलीन होती वृक्षों की विराट
परछाइयां, उतरती है शाम
रोज़ बोगनवेलिया के
झुरमुटों से लेकर
मायावी
रूप।
- - शांतनु सान्याल

12 जनवरी, 2020

अनंत नग़मा - -

हथेली में कहीं आज भी है
रौशनदान से उतरती एक
बूंद रौशनी की दुनिया,
अलस दुपहरी में
जैसे उतरती
हों नीम
से निःशब्द परछाइयां । यूँ
तो ज़िन्दगी के आसपास
खंडहरों की कमी नहीं,
फिर भी न जाने क्यूं
दिल के आईने में
धूल जमी नहीं।
सब कुछ
बदल
जाता है, चाहे चेहरा हो या
चश्मा, एक मीठा सा
एहसास वक़्त के
साथ हो जाता
है अनंत
नग़मा।
- शांतनु सान्याल






05 जनवरी, 2020

यथावत रिक्त - -

महासमुद्र है प्रतीक्षारत अपनी जगह अटल, -
दीर्घ जीवन की यात्रा हो या नदी कोई
विश्रृंखल, विसर्जन है निश्चित,
न जाने कौन रह रह कर,
देता है दस्तक मेरे 
अंतःकरण के
कपाट पर,
किसे
ख़बर की वो है अजनबी या मेरा चिर परिचित।
कोई स्मृति गुच्छ है या अनौपचारिक फूल
उसके हाथ, दहलीज़ और अंतःगृह के
मध्य रहा यूँ तो लुकछुप का साथ,
फिर भी जी चाहता खुली
सांस लूँ हो उन्मुक्त -
चित्त, न तुम
हो कोई
परिपूर्ण यामिनी, न मैं ही हूँ कोई अनंत गंध,
तुम्हारा आँचल भी है अधूरा, मेरा देह -
पिंजर भी रहा यथावत रिक्त।

* *
- शांतनु सान्याल



  

05 दिसंबर, 2019

झरोखों के उस पार - -

लौट जाओ जुगनुओं के हमराह ऐ दोस्त,
मेरी मंज़िल है कहीं दूर क्षितिज पार,
अभी जो अँधेरा है बाक़ी वो भी
हट जाएगा अपने आप,
फिर मेरी रूह है
बेताब छूने
को
दोनों कगार। मेरे क़दमों से कोई उतारे
सितारों के ज़ंजीर, मेरी आँखों में हैं
बेक़रार सुबह के ताबीर, अभी
तक हैं ज़िंदा मेरे सीने में
दफ़न,जीने की ललक
अपार। वक़्त के
चाबूक टूट
गए
लेकिन,जिस्म अभी तक है मेरा अटूट,-
तुम्हारी चाहत तुम तक महदूद,
मेरी ख़्वाहिश चाहे  खुला
आसमान, खुले दिलों
का एक मुश्त
मीनाबाज़ार।

* *
- शांतनु सान्याल


17 नवंबर, 2019

काश लौट आए - -


मुसलसल ख़ामोशी थी हद ए नज़र तक,
स्टेशन रहा मुन्तज़िर लेकिन नहीं
लौटा मेरा बचपन, न जाने
किस सिम्त मुड़ गई
तमाम पटरियां,
उम्र भर
लेकिन दौड़ता रहा, मेरे रग़ों में इक मीठा
सा कंपन। जब कभी शाम हुई बोझिल,
बहोत याद आए तालाब के छूटते
किनारे, कच्चे  सिंघाड़ों की
उम्र थी मुख़्तसर, शाम
ढलते, नीले थोथों
में डूब गए
सारे।
न जाने क्या बात थी उस सोंधी ख़ुश्बू की,
जो आज तक है ज़िंदा, रूह में हमारे।

* *
- शांतनु सान्याल

painting by Alexandros-Christofias-boy-reading

06 नवंबर, 2019

रात्रिशेष के पथिक - -

जब शून्यता में डूब जाए शहरी कोलाहल,
और निशि पुष्प तलाशें अपना वजूद,
उड़ान सेतुओं की ख़ामोशी जब
कोहरे में हो जाएँ कहीं गुम,
मन विनिमय का खेल,
चलो पुनः खेलें
हम। इस
आख़री
पहर के आगे भी है एक नया दिगंत, जहाँ
कदाचित हो ख़ुश्बुओं का संसार, न
कोई चाहत, न कोई राहत, एक
अनंत नीरवता के मध्य
जहाँ उभरे हमारा
निःस्वार्थ -
प्यार।
जुगनुओं से सजे किनारे पर कहीं है खड़ी -
वो मयूर पंखी नाव, एक स्रोत अविरल
तुम्हारे निगाहों के आरपार, सिर्फ़
बहते है जाना मुहाने की ओर,
न कोई मंदिर, न कोई
मस्जिद, पल भर
भी नहीं अब
ठहराव,
हे, महा रात्रि ! हम तो हैं उजाले के पथिक, -
निरंतर बढ़ें सुबह की ओर, न कोई
पांथशाला, न कोई अचल पड़ाव,
न कोई ठिकाना अपना, न
कोई अन्तर्निहित
अपना गांव।

* *
- शांतनु सान्याल   






 

05 नवंबर, 2019

उड़ते पत्तों के दरमियां कहीं - -

जिस गर्भगृह से हैं आलोकित पृथ्वी और
आकाश, वही अंतरतम करे स्वयं की
तलाश, सारा कुछ उजाड़ कर
जैसे कोई विलुप्त अरण्य,
ठूंठों के मध्य करे
अपनों की
आस।
वो तमाम घरौंदों का कहीं कोई निशान न
रहा, कुछ डूब गए, कुछ डूबा दिए गए,
देशांतरी पक्षियों की तरह मेरा
भी, अब यहाँ कोई जान
पहचान न रहा,
चलो अच्छा
ही हुआ,
तथाकथित आत्मीय स्वजनों का मुझ  पर
अब कोई एहसान न रहा, मैंने भी लौट
कर न देखा खिसकते हुए किनारे
को, मेरे डूबने के बाद वो
भी परेशान न रहा।
 
* *
- शांतनु सान्याल 






04 अक्टूबर, 2019

दोनों किनारे - -

खण्डहरों के बीच खड़ा बूढ़ा मंदिर,
तकता है ख़ामोश, नदी अपना
तट बदलती हैं अहर्निश,
समय की लकीरें
उभरती हैं
चुपचाप। चेहरा हो या प्राचीर, कुछ
भी नहीं चिरस्थायी, झुर्रियों
का भूगोल कर जाता
है खोखला सब
कुछ अपने
आप।
मुहाने पर देर तक खड़ा रहा मैं ले -
कर अँजुरी भर फूल, साँझ ढली
रात हुई, स्वप्न झरे, गंध -
कोष खुले, दोनों किनारे
फिर खिले अरण्य -
बबूल।

* *
- शांतनु सान्याल

 


27 सितंबर, 2019

सुलह कर लिया जाए - -

आसमानी मजलिस थी कोई, उठ गई अपने
आप सुबह से पहले, इक ख़ुमार सा है
बाक़ी दिलो जां में दूर तक, मानों
फिर डूबने की हो ख़्वाहिश,
किनारे के सतह से
पहले। मेरा
वजूद
जो भी हो ज़माने की नज़र में, तुम आज भी
हो पहलू में मेरे, किसी अमरबेल की
तरह, आग का कोई घेरा हो
या मौत का अंधा कुआं,
लगते हो मानों सभी 
इक अदद खेल
की तरह।
कहाँ
हासिल है मनमाफ़िक मुराद, फिर क्यूँ न - 
ज़िन्दगी से यूँ सुलह कर लिया जाए,
निगाहों के दरमियाँ रहे इश्क़ का
वसीयतनामा, फूल मिले या
काँटे, मुस्कुरा कर ख़ाली
दामन क्यों न भर
लिया जाए,
फिर
क्यूँ न ज़िन्दगी से यूँ सुलह कर लिया जाए। 

* *
- शांतनु सान्याल

19 सितंबर, 2019

एक मुठ्ठी उजाला - -

अपने आप निःशब्द खुल जाता है वक़्त
का रफ़ू, अब कोई चाहे, किसी भी
छोर से खींचे, जिस्म मेरा
अब है इक अभ्र का
का ढांचा, चाहे
कोई किसी
भी ओर
से भींचे। यूँ तो सभी ज़ख़्म  के निशान
भर गए अपने आप, नाम मलहम
पे लेकिन तुम्हारा ही रहा,
कौन साथ रहा दूर
तक, और कौन
हाथ छुड़ा
गया,
डूब के जब उभरे तो देखा, सामने केवल
डूबता किनारा ही रहा। तुम क्षितिज
पे मेरा इन्तज़ार करना, मैं  इक
मुठ्ठी उजाला हूँ, रात ढलते
बिखर जाऊँगा, रख
लेना मुझे अपने
पहलू में
कहीं, नियति ने ग़र साथ दिया तो कुछ
और अधिक निखर जाऊँगा।

* *
- शांतनु सान्याल  




18 सितंबर, 2019

ज़रा सी कहासुनी - -

पुराने चश्मे की तरह धुंधलके में कहीं,खो
जाते हैं सभी क़रीबतरीन किनारे,
अँधेरे में सिमटे हुए नाज़ुक
मेरे अहसास खोजते हैं
तब टूटे हुए तारे।
कोहरे में
डूबी
हुई उन वादियों में है शायद कहीं जुगनुओं
की बस्ती, तुम्हारे पलकों के साए में
कहीं ढूंढ़ती है एक मुश्त पनाह,
मेरी मजरूह हस्ती। इक
रात है या मेरी रूहे -
परेशां, अँधेरे
में भी
खोजती हैं तुम्हारे निगाहों की रौशनी, जब
कभी होती है ज़िन्दगी से मुख़्तसर सी
कहासुनी।

* *
- शांतनु सान्याल

11 अगस्त, 2019

डूबते साहिल के दरमियां - -

अभी अभी उतरा है अरण्य नदी का सैलाब,
और छोड़ गया है दूर तक तबाही का
मंज़र, कुछ अधडूबे मकानों के
बीच लहराते हैं टूटे हुए मेरे
ख़्वाब। अभी अभी
दिगंत ने फिर
ली है
अंगड़ाई, उभरते हुए टीले से फिर मैंने देखा
है राहतों का सवेरा, उभरते - डूबते हुए
इन पलों में किनारे छूटते नहीं,
हर हाल में ज़िन्दगी ढूंढ़
ही लेती है कहीं न
कहीं उम्मीद
का डेरा।
अभी अभी तुमने थामा है मेरे काँपते हाथ - -
अब दोबारा डूब भी जाएं तो कोई ग़म
नहीं, माझी की भी हैं  अपनी
अलग मजबूरियां, मेरी
जां से उसकी जां
कुछ कम
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल


 

10 अगस्त, 2019

पारदर्शी वक्षस्थल - -

उन निःस्तब्ध क्षणों में, कुछ अदृश्य
अश्रु कण भी, निश्चित झरे मेरी
आँखों से, आँचल की थी
अपनी ही अलग
परिसीमा,
यूँ तो न जाने कितने पुष्प झरे, उन -
नाज़ुक शाखों से। मेरी चाहतों
का हासिल जो भी हो,
लेकिन, मेरी
प्रीत का
कोई हिसाब नहीं, आँखों की लिपि से
लिखी, उस गहन अनुभूति की
शायद, कोई किताब नहीं।
ईशान कोणीय मेघ
थे या घनीभूत
झंझावर्त,
बरसे लेकिन अपने ही शर्तों पर, यूँ -
तो सारा जिस्म था ज़ंजीरों से
जकड़ा हुआ, फिर भी यूँ
लगा सावनिया बूंदें
गिरें शीशे के
परतों पर।

**
- शांतनु सान्याल   

02 अगस्त, 2019

चतुष्कोण - -

उस चतुष्कोण से निकलना इतना नहीं सरल,
हर एक मिलन बिंदु से निकलते हैं न
जाने कितने प्रतिबिंब, न कोई
बही खाता, न ही कुछ वहाँ
लिपिबद्ध, उस प्रश्न
का मुश्किल है
खोजना
हल, उस चतुष्कोण से निकलना इतना नहीं -
सरल। अनुप्रवाह के सभी सहचर, लेकिन
विपरीत स्रोत में एकाकी जीवन, न
कोई माझी, न कोई प्रकाश -
स्तम्भ, बहता जाए
अस्तित्व मेरा
स्वतः
अविरल, उस चतुष्कोण से निकलना इतना नहीं
सरल। उस पुरातन सत्य के नेपथ्य में नव
पल्लव खोजें नवीन प्राण वायु, यद्यपि
इस मायावी जगत में कोई नहीं
चिरायु, हर एक पग पर हैं
विद्यमान कोई न कोई
प्रतिस्थापन, रिक्त
स्थानों का होता
रहता है यूँ
ही अदल-बदल, उस चतुष्कोण से निकलना इतना
नहीं सरल।

* *
- शांतनु सान्याल

30 जुलाई, 2019

कोई न जाने - -

कब दो किनारे मझधार में आ मिले -
केवल निशीथ के सिवा कोई न
जाने, बिहान भी था विस्मित
देख तरंगों का सर्पिल -
मिलन, धरा और
नभ का विभेद
उस पल
कोई न जाने। अनाहूत वृष्टि की तरह
कोई भिगो गया दूर तक मरू -
प्रांतर, अंतरतम से उठे
उस पल परम -
नाद गहरे,
सुख दुःख, अपने पराये, जन्म मृत्यु,
हिसाब किताब, प्रेम घृणा, सभी
उस पल विस्मृत अवसाद
ठहरे। किस मोड़ से
मुड़ना है किस
राह से
गुज़रना, कब चिता भस्म हो शून्य में
बिखरना, ये रहस्य उसके सिवा
और कोई न जाने। कब दो
किनारे मझधार में आ
मिले, केवल निशीथ
के सिवा कोई न
जाने।

* *
- शांतनु सान्याल 

26 जुलाई, 2019

अज्ञातवास - -

वो शबनमी अनुराग है कोई, या घुमन्तु मेघ,
हाथ बढ़ाते सिर्फ़ दे जाए एक सिक्त
अहसास, मेरी आँखों में फिर
सज चले हैं वादियों से
उतरती नरम
धूप, फिर
तुमने
छुआ है मुझे बेख़ुदी में यूँ लेके गहरी सांस - - !
झील में उतर आया हो जैसे आसमानी
शहर, या फिर तुम्हारे नयन हो
चले हैं छलकते मधुमास।
पहाड़ों की गोद में
फिर जुगनुओं
ने डाला
है डेरा, फिर तुम्हारे स्पर्श से जग उठे हैं सीने
के अनगिनत अज्ञातवास। क्या यही है
इंगित पुनर्जीवन का या फिर कोई
ख़्वाबों का उच्छ्वास। वो
शबनमी अनुराग है
कोई, या घुमन्तु
मेघ, हाथ
बढ़ाते सिर्फ़ दे जाए एक सिक्त अहसास, - - -

* *
- शांतनु सान्याल

25 जुलाई, 2019

आशियाना विहीन - -

गहराइयाँ हैं अंतहीन, कहने को नदी सूख चुकी,
ज़ेर ज़मीं अभी तक है मेरी आँखों की नमी,
यूँ तो जंगल की आग सारा चमन को
फूंक चुकी। न जाने कौन है इस
दौर का रहबर, मुस्कराता
है पुरअसरार निगाहों
से, इतना भी
ग़ुरूर ठीक
नहीं,
न जाने किस सिम्त उठे आतिशफ़िशां इन दर्द
की कराहों से। हम कल भी थे ख़ानाबदोश
हम आज भी हैं रूहे दरबदर, हमारा
ठिकाना कहीं नहीं, तुम्हारी
महफ़िलों का रंग जो
भी हो, रात ढले
उतर जाएगा,
हम हैं
क्षितिज पार के परिंदे हमारा आशियाना कहीं - -
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल

24 जुलाई, 2019

अमरबेल - -

कहाँ से लाएं पहली सी चाहत, उम्र के साथ -
आईना भी लगे है धुंधलाया सा, ये
तक़ाज़ा तुम्हारा, यूँ तो है बहुत
ही ख़ूबसूरत, लेकिन शाम
ढले हर फूल लगे है
मुरझाया सा।
उम्मीद
तुम्हारी यूँ तो चाँद रात से कम नहीं, लेकिन
सुबह के साथ जिस्म ओ जां लगे है
अपना नहीं, पराया सा। सीने
से उठता धुआँ और आँखों
की नमी रहे ओझल,
किसी अदृश्य
संधि के
तहत, ये और बात है कि चेहरा लगे उम्र भर
का सताया सा। न जाने आज भी तुम्हारी
मुस्कराहटों का तिलिस्म, मुझे मरने
नहीं देता, लगे सांसों के इर्द गिर्द
कोई अमरबेल तुम्हारा ही
है लगाया सा। कहाँ
से लाएं पहली
सी चाहत,
उम्र के साथ आईना भी लगे है धुंधलाया सा।

**
- शांतनु सान्याल

10 जुलाई, 2019

अब किसे है चाहत - -

हाशिए से उन्वान का सफ़र नहीं आसां,
हर एक मोड़ पर हैं पेंच बेशुमार,
न थाम सीढ़ियों को इतने
सख़्त हाथों से, अपनों 
ने ही मुझे गिराया
है कई बार।
अब वो
आए हैं पूछने हाले दिल मरीज़ का, जो
जीते जी मर चुका हज़ारों बार। ये
मख़मली पैबंद न भर पाएंगे
मेरे अरमानों को दोबारा,
अब किसे है चाहत,
आए या न आए
फ़सले बहार।
* *
- शांतनु सान्याल


 

10 मई, 2019

मुक्त द्वार - -

कहीं दूर, अदृश्य दिशा में,
साँझ ढले बरसे हैं
मेघ, अतीत
की
परछाइयों से फिर जाग - -
उठे हैं आवेग।
आकाशमुखी
हैं सभी
मुक्त
द्वार, पिंजर एकाकी, - - -
उन्मुक्त जीवन
सभी चाहें, हम,
तुम हों या
पाखी।
तितलियों के संग, उड़ - -
गए सभी स्वप्न
अभिलाष,
मौसम
की
नियति में है बदलना उसे -
कहाँ अवकाश।

* *
- शांतनु सान्याल





 

20 अप्रैल, 2019

आख़िरकार - -

सुबह और शाम के दरमियां बहुत कुछ
बदल ही जाता है, कुछ मुरझाए फूल
गुलदान में झुके रहते हैं और
परिश्रांत सूरज अन्ततः
ढल  ही जाता है।
अब किस से
कहें दिल
की
बात, तन्हाइयों में ये ख़ुद ब ख़ुद बहल
ही जाता है। यूँ तो सारा शहर है
उजाले में डूबा हुआ, फिर भी
अँधेरे का जादू चल ही
जाता है। हमने
लाख चाहा
कि
तुम्हारा इंतज़ार न करें, फिर भी, हर -
एक आहट में, नादां दिल बेवजह
मचल ही जाता है। सुबह और
शाम के दरमियां बहुत
कुछ बदल ही
जाता
है।

* *
- शांतनु सान्याल

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