Wednesday, 24 July 2019

अमरबेल - -

कहाँ से लाएं पहली सी चाहत, उम्र के साथ -
आईना भी लगे है धुंधलाया सा, ये
तक़ाज़ा तुम्हारा, यूँ तो है बहुत
ही ख़ूबसूरत, लेकिन शाम
ढले हर फूल लगे है
मुरझाया सा।
उम्मीद
तुम्हारी यूँ तो चाँद रात से कम नहीं, लेकिन
सुबह के साथ जिस्म ओ जां लगे है
अपना नहीं, पराया सा। सीने
से उठता धुआँ और आँखों
की नमी रहे ओझल,
किसी अदृश्य
संधि के
तहत, ये और बात है कि चेहरा लगे उम्र भर
का सताया सा। न जाने आज भी तुम्हारी
मुस्कराहटों का तिलिस्म, मुझे मरने
नहीं देता, लगे सांसों के इर्द गिर्द
कोई अमरबेल तुम्हारा ही
है लगाया सा। कहाँ
से लाएं पहली
सी चाहत,
उम्र के साथ आईना भी लगे है धुंधलाया सा।

**
- शांतनु सान्याल

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (25-07-2019) को "उम्मीद मत करना" (चर्चा अंक- 3407) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 25 जुलाई 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  3. बहुत ही उम्दा होता है आप का सृजन
    सादर

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  4. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  5. बेहतरीन सृजन...
    वाह!!!

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  6. समय कहना एक जैसा रहता है, वह तो बदलता जाता है,
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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