20 अप्रैल, 2019

आख़िरकार - -

सुबह और शाम के दरमियां बहुत कुछ
बदल ही जाता है, कुछ मुरझाए फूल
गुलदान में झुके रहते हैं और
परिश्रांत सूरज अन्ततः
ढल  ही जाता है।
अब किस से
कहें दिल
की
बात, तन्हाइयों में ये ख़ुद ब ख़ुद बहल
ही जाता है। यूँ तो सारा शहर है
उजाले में डूबा हुआ, फिर भी
अँधेरे का जादू चल ही
जाता है। हमने
लाख चाहा
कि
तुम्हारा इंतज़ार न करें, फिर भी, हर -
एक आहट में, नादां दिल बेवजह
मचल ही जाता है। सुबह और
शाम के दरमियां बहुत
कुछ बदल ही
जाता
है।

* *
- शांतनु सान्याल

11 अप्रैल, 2019

पलातक - -

कब तक यूँ ही फ़रारी का स्वांग रचोगे,
आईने के सामने हर शख़्स है, इक
अदद नंगा सच, चाहे जितना
भी पहन लो रंग गेरुआ,
सिद्धार्थ फिर भी
क्या बन
सकोगे। नियति की ज्यामिति में, क्या
राजा, क्या रंक, हर कोई है बंधा
निमिष मात्र से, अदृश्य -
प्रहार से चाह कर
भी बच न
सकोगे। कुछ बूंद मेरी निगाह के, कुछ 
नूर तेरी चाह के, बहुत कुछ हैं ये
ज़िन्दगी के लिए, चाहतों का
क्या आसमान भी कम
सा लगे है, चार
दिन की है
चांदनी,
उम्र भर इन्हें सहेज कर कहाँ रखोगे। - -
चाहे जितना भी पहन लो रंग
गेरुआ, सिद्धार्थ फिर भी
क्या बन सकोगे।
* *
- शांतनु सान्याल  
 

27 मार्च, 2019

हिय के अंदर - -

कदाचित मरुधरा है हिय के अंदर, अनवरत -
प्यास जगाए, ख़ानाबदोश हो कर भी
मेरी दुनिया, तुम्हीं तक आ कर,
न जाने क्यों रुकना चाहें।
इक अजीब सा मोह
है, तुम्हारे सजल
नयन के
कोर,
अलस दुपहरी में जैसे बरगद की जटाएँ, सूखती
नदी को छूना चाहें। बहोत मुश्किल है, इन
हथेलियों के अंकगणित को समझना,
जो कुछ भी हो हासिल, इस पल
की मेहरबानी है, जो खो
गया, सो खो गया,
हम क्यों न
उसे भूलना
चाहें। ख़ानाबदोश हो कर भी मेरी दुनिया, तुम्हीं
तक आ कर, न जाने क्यों रुकना चाहें। 

* *
- शांतनु सान्याल






25 मार्च, 2019

अंतहीन प्रतीक्षा - -

उम्र से भी कहीं लम्बी है प्रतीक्षा, गली के
आख़री छोर में, कील ठोंकते हाथों को
आज भी है किसी का  इंतज़ार।
कहने को यूँ तो बहुत कुछ
बदल गया मेरे शहर
में, लेकिन अभी
तक है ज़िंदा,
अंधेरों का संसार। क्षितिज में फिर उभरी
हैं उम्मीद की किरण, शायद सुबह
का आलम हो कुछ ज्यादा ही
ख़ुशगवार। ख़्वाब देखते
हुए बूढ़ा जाती हैं
जहाँ जवां -
आँखें, कहाँ रुकता है किसी के लिए ये - -
ज़माने का कारोबार। जीवन स्रोत
को है बहना, हर पल, हर एक
लम्हा, ये और बात है कि
कभी तुम उस पार
और कभी
हम रहें  इस पार।  कहाँ रुकता है किसी के
लिए ये ज़माने का कारोबार।

* *
- शांतनु सान्याल

22 मार्च, 2019

दस्तक से पहले - -

हमेशा की तरह फिर हाथ हैं ख़ाली, अंजुरियों
से जो गुज़र गए उनका अफ़सोस नहीं,
कुछ नेह रंग यूँ घुले मेरी रूह में
कि चाह कर भी अब उनसे
निजात नहीं, न जाने
कितनी बार ओढ़ी
है ख़्वाबों के
पैरहन,
ये ज़िन्दगी फिर भी लगे है इक ख़ूबसूरत - -
उतरन। सूखे पत्तों का वजूद जो भी
हो, मौसम को तो है हर हाल में
बदलना, मेरे घर का पता
तुम्हें याद रहे या न
रहे, हर मोड़ पर
है कहीं न
कहीं
पुरअसरार दहलीज़ ! ऐ दोस्त, दस्तक से पहले
ज़रा संभलना। सूखे पत्तों का वजूद जो
भी हो, मौसम को तो है हर हाल में
बदलना।

* *
- शांतनु सान्याल

19 मार्च, 2019

सुबह का फेरीवाला - -

हाशिए के लोग हमेशा की तरह हैं गुमशुदा,
अपनी अलग दुनिया में, वो आज भी
हैं बंजारे ऊँची इमारतों के नीचे,
न जाने कौन अलसुबह,
फिर ख़्वाबों के
इश्तहार
लगा गया, फिर मासूम मेरा दिल दौड़ चला
है, दिलफ़रेब, चाहतों के पीछे। क़ातिल
है, या मसीहा, ख़ुदा बेहतर जाने,
सुना है कोई जादू है, उसके
लच्छेदार बातों के
पीछे। चलो
फिर
तुम्हारे वादों पे यक़ीन कर लें, ज़िन्दगी को
कुछ पल ही सही आराम मिले, दवा है
या सुस्त ज़हर किसे ख़बर उन
नाम निहाद राहतों के
पीछे। वो आज भी
हैं बंजारे ऊँची
इमारतों के
नीचे।

* *
- शांतनु सान्याल

08 मार्च, 2019

गन्धकोष - -

चाहे जितना भी अंतहीन साम्राज्य हो किसी का,
नियति के आगे असहाय, सभी एक समान,
सभी मुसाफ़िर एक ही पथ के, अज्ञात
भोर की ओर अग्रसर, एक ही
पांथनिवास में रात्रि
अवस्थान।
अनभिज्ञ सभी एक दूजे से, फिर भी अदृश्य नेह -
बंधन, कभी खिले भावनाओं में विरल हास -
परिहास, और कभी जीवन तट पर उठे
अशेष क्रंदन। किसे ख़बर कौन
देखे प्रथम, आख़री पहर
का तारक बिहान,
निशि पुष्पों
की है अपनी अलग मजबूरी, सुबह की आहट के 
साथ, सभी सुरभित कोषों का अवसान।
चाहे जितना भी अंतहीन साम्राज्य
हो किसी का, नियति के आगे
असहाय, सभी एक
समान।

* *
- शांतनु सान्याल

27 फ़रवरी, 2019

एकात्म पलों में कहीं - -

निःस्तब्ध रात्रि, अवाक पृथ्वी, आकाश तब
आलोक मुखर, एकात्म तुम और मैं,
उन पलों में केवल भासमान।
सुन्दर या असुंदर, तिक्त
या मिष्ठ सब कुछ
तब शून्य -
मात्र,
ऊर्ध्वमुखी तब देह प्राण, धूम्रवलय सम
महाप्रस्थान। जब खुलें फूलों के गंध -
कोष, तब खुल जाएँ बंद वातायन
अपने आप, सुरभित अंतर्मन
तब करे मुक्तिस्नान।
वैध अवैध सब
मानव रचना,
सृष्टि की
है अपनी अलग प्राकृत सुंदरता, उन्मुक्त
यहाँ सभी एक समान। 

* *
- शांतनु सान्याल


25 फ़रवरी, 2019

रहस्यमय प्याला - -

शेष पहर जब झर जाएँ निशिपुष्प और
चाँद हो चले मद्धिम तुम पाओगे
उसे दिगंत में कहीं, तुम्हारे
हिस्से का उजाला है
है अपनी जगह
मौजूद।
जीवन स्रोत अविरल बहता जाए, न
आदि, न कोई अंत, निःश्वास के
डोरों से नित नए स्वप्न सजाए,
नियति ही जाने क्या है
उसमें, अंत या
उत्स,लेकिन
ये सच है
तुम्हारे हिस्से का प्याला है अपनी
जगह मौजूद।
* *
- शांतनु सान्याल 

22 फ़रवरी, 2019

मुहाने की ओर - -

कुछ भी रिक्त रहता नहीं वक़्त भर
जाता है हर एक ख़ालीपन,
पतझड़ के पीछे दबे
पांव चलता है
मधुमास,
सुदूर
महुवा वन के बीच, झांकता है - - -
रक्तिम पलाश। संकरी
नदी अपना अस्तित्व
बचाए सागर -
संगम
की आस लगाए, अनवरत महातट
की ओर बहती जाए। क्या
पाया, क्या खोया, अर्थ -
हीन हैं सारे गणित,
बंद मुट्ठी में
मेरे अब
 कुछ
भी नहीं, मायावी जुगनू उड़ गए कब
मुझे उसकी ख़बर नहीं, अब
जीवन लगे बहुत सहज।
* *
- शांतनु सान्याल

21 फ़रवरी, 2019

गहराइयों के ख़ातिर - -

लहरों की नियति में था आख़िर बिखर जाना,
कुछ दूर दिगंत से आए कुछ उठे ख़ामोश
मेरे अधर किनारे, कुछ छलके, कुछ
थम कर रह गए, मेरी आँखों के
अरमान सारे। कभी हम
रहे तुम से बेख़बर,
और कभी
तुम ने
ख़ुद को खुलने न दिया, कुछ अनकही - -
बातों को तुमने चाह कर भी कभी
सुलगने न दिया। कोई शीशी
बंद इत्र के मानिंद था
तुम्हारा प्रणय -
निवेदन,
ह्रदय संदूक में रहा एकाकी, न जाने क्यों
तुमने उसे उन्मुक्त बिखरने न दिया।
शायद गहराई न हो जाए कम,
इसी डर से जीवन तट को
तुमने असमय यूँ ही
सिमटने न
दिया।

* *
- शांतनु सान्याल


 

09 फ़रवरी, 2019

ये शहर कभी आबाद था - -

वो सभी लोग अचानक मूक
ओ बधिर बन गए, भरी
सभा में जब मैंने,
राज़ ए गिरह
खोल दी,
रहनुमाई करने वाले तब पा
ए ज़ंजीर बन गए झूठे
वादों पे हमने हर
पल यूँ जां
निसार
किया,हर बात उनकी आख़िर
ज़हर बुझे तीर बन गए। बंद
आँखों का ईमान हमें
कहीं का न छोड़ा,
अपनों के बीच
देखिये
गुमशुदा तस्वीर बन गए। इश्तहारों
के भीड़ में सच्चा ताबीज़
बेमानी है,खोटे सिक्के
ही शहर में बुलंद
तक़दीर बन
गए।

* *
- शांतनु सान्याल

27 जनवरी, 2019

रौशनी के उस पार - -

रौशनी में डूबा हुआ सारा शहर -
लगता है बेहद ख़ूबसूरत,
उड़ान पुल हो, या
आकाश पथ
से झाँकते
मग़रूर निगाहें, काश देख पाते,
अंधकार में विलीन कुछ
जीवन की राहें। डरा -
डरा सा संकरी
गलियों से
गुज़रता वो कोई ख़्वाब नहीं, मेरा
हमसाया,जो चीखता है ख़ामोश,
फैलाए अपनी बाँहें। वो सभी
मायावी मोड़ अक्सर
निकलते हैं इसी
राजपथ से,
अय्यारों
से बचना है बहोत मुश्किल, आप
चाहें या न चाहें। हर एक मुखौटे
के पीछे, न जाने कितने,
चेहरे हैं छुपे हुए,
गोल तख़्ती
पे घूमता हुआ मेरा वजूद, खंजर
उनके हाथ, वही हाक़िम, वही
सरबराह क़ौम, जी चाहे
जो भी कर
जाएं। 

* *
- शांतनु सान्याल 






 

26 जनवरी, 2019

राज़ ए तलाश - -

आईना भी वही, अक्स भी वही,
फिर हैरानगी कैसी, वो कोई
गुमशुदा ख़्वाब है, या
ढलती धूप की
तपन,
अहाता भी वही, घर भी वही, -
फिर आवारगी कैसी।
ताउम्र का
अहदनामा शायद अब तुम्हारे
पास नहीं, रास्ता वही,
ठिकाना भी वही,
फिर
नाराज़गी कैसी। अक्सर मैं, -
ख़ुद से सवाल करता हूँ
लाजवाब हो कर,
जो वजूद
में नहीं,
उसके लिए फिर दीवानगी कैसी।

* *
- शांतनु सान्याल
 

23 जनवरी, 2019

प्रथम स्पर्श - -


वो कच्ची उम्र की छुअन या निस्तब्ध पलों
में पीपल पात का हिलना, एक मख़मली
एहसास के साथ तुम्हारा वो बेबाक
हो के मिलना । काश लौट आएं
फिर वही सुबह शाम, मुन्तज़िर
निगाहों से हर पल मीठी
आग में सुलगना ।
वो कशिश
जो जीने की चाहत बढ़ा जाए, वो अंदाज़ ए
निगाह, जो ख़ुश्बू ए जज़्बात बढ़ा जाए,
दबे क़दमों से जैसे मौसम ए बहार,
उजड़ा शहर दोबारा, फूलों से
यूँ सजा जाए।
* *
- - शांतनु सान्याल
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17 जनवरी, 2019

सुबह से पहले - -

हर एक अट्टहास के बाद, कुछ देर ज़रूर
ख़ामोशी करती है राज, और इसी
दौरान पैदा होते हैं अकल्पित
इन्क़लाब। धर्म - अधर्म
की दुहाई देने वाले
अचानक जब
साध जाएं
भीष्म -
नीरवता, समझ लीजिये भविष्य का - 
अप्रत्याशित जवाब। दहशत में था
अचानक सारा शाही परिवार,
देख सामने एक जुट
जंगली भैसों का
भावी संहार,
सुप्त -
प्रलय की अपनी ही है, एक असामान्य
प्रवृत्ति, कब, और कैसे, कर जाए
विध्वस्त, पृथ्वी और आकाश
हो जाएं पल में आख़री
पहर के टूटे
ख़्वाब।

* *
- शांतनु सान्याल

02 जनवरी, 2019

इस पल के बाद - -

उस अनंत अनुबंध के तहत हैं सभी अंगभूत,
न कोई कम, न कोई अधिक, बीज और
धरा के मध्य हैं सिमटे सभी जीवन,
वो आजतक निकल न पाए
गर्भगृह के तम से बाहर, 
न जाने किस देवता
के हैं वो दम्भी
अग्रदूत।
उस अनंत अनुबंध के तहत हैं सभी अंगभूत।
प्रकृति और पुरुष के मुहाने पर लहराए
महासिंधु अपार, कदाचित उस
दिव्य दिगंत में उभरे जग
के खेवनहार, न तुम,
तुम हो, न मैं,
मैं हूँ,
जो कुछ भी है बस इसी पल में सिमित, इस
पल के बाद है जगत मिथ्या हे मम् अवधूत।
उस अनंत अनुबंध के तहत हैं
सभी अंगभूत।
* *
- शांतनु सान्याल 

29 दिसंबर, 2018

अंतर - गहन - -

पुरोहित की है अपनी बेबसी, शाम गहराते ही
बंद हो गए मंदिर के दरवाज़े, ख़ामोश
हैं सभी, पृथ्वी हो या आकाश,
सिर्फ़ अंतर गहन सारी
रात है जागे।
मरूस्वप्न सा है ये जीवन, या कल्पतरु से - -
लटके हुए असंख्य अभिलाष, कोहरे में
लिपटी हुई मेरी चाहत, निकलना
चाहे सुबह से कहीं आगे।
नवीन - पुरातन का
द्वंद्व
सनातन, जन्म - मृत्यु का अदृश्य पुनरावर्तन,
मोह - बंधन चाहे जितना तोड़ें, उतना
ही प्रियवर अपना लागे।  ख़ामोश
हैं सभी, पृथ्वी हो या आकाश,
सिर्फ़ अंतर - गहन सारी
रात है जागे।

* *
- शांतनु सान्याल

19 दिसंबर, 2018

तितलियों के हमराह - -

सफ़र ज़िन्दगी का नहीं - -
रुकता किसी के
लिए,
टिमटिमाते से दूर रह
जाते हैं छूटे हुए
स्टेशन,
एल्बम के पन्नों में कहीं,
दबी छुपी सी है वो
हंसी,
तितलियों के हमराह खो
जाते हैं सभी बचपन।
बंद दरवाज़े
के पार
मुंतज़िर नहीं अब कोई
दस्तक, तन्हाइयों
के झुरमुट में,
मैं हूँ
और मेरी धड़कन। वादियों
के सीने से, फिर उठ
चले हैं धुंध के
बादल,
न जाने आग है या बारिश,
ख़ामोश है क्यूँ दरपन।
तमाम रात
तलाशता
रहा
मजलिस ए आसमान, फिर
भी ढूंढ़ न पाए कोई
मेरा गुमशुदा
लड़कपन।

* *
- शांतनु सान्याल


10 दिसंबर, 2018

कटु सत्य है लेकिन - -

रात गहराते ही निशि पुष्पों ने
वृन्त छोड़ दिया, हवाओं
की मनःस्थिति
समझना
आसान नहीं, गंध चुरा के फूलों
का सुबह से नाता जोड़ दिया।
कोई नहीं रुकता किसी
के लिए ये कटु
सत्य है,
उगते ही सूरज के अंधेरों से - -
रिश्ता तोड़ दिया। जीवन -
मरण का आलेख,
अनवरत धुंध
भरा,
इसीलिए जीवन वक्र को सीधे
राह मोड़ दिया। अब चाहे
कोई, जो भी समझे
कुछ अंतर नहीं,
जो मन
को करे अशांत ऐसी चाहत छोड़ -
दिया।

* *
- शांतनु सान्याल 
 

28 नवंबर, 2018

सजल अभिलाष - -

उस निशीथ मौन के अंदर, बिखराव समेटे
मेरा मन, कच्ची मटकी तपने से पूर्व
जैसे देखे लाख सपन।  किसे ख़बर
कौन क्षितिज से उभरे बिहान
सतरंगी, ओस में डूबे हुए
हर पल मेरे चंचल
दिगंत - विहंगी।
कहीं कोई
फिर फूल खिले और सुरभित हो अंतरतम,
बुझे सभी आग्नेय अरण्य, मिले हर
एक साँस को जीने का वरदान 
कम से कम।

* *
- शांतनु सान्याल

  

21 नवंबर, 2018

प्रवासी मन - -

सूखते कांटेदार बेलों के बीच अभी तक हैं
बाक़ी कुछ गुलाबी मुस्कान, कोई
आए या न आए, हर चीज़ हो
जैसे यथावत, खिलता
हुआ अपने स्थान।
उम्मीद के
फूल
शायद कभी मुरझाते नहीं,चाहे पतझर हो
या मधुऋतु, क्या धूप और क्या छाँव,
गेरुआ मन हर पल एक समान।
जलविहीन फल्गु तट हो या
ज्वलंत मणिकर्णिका -
घाट, उन्मुक्त -
पाखी, सदा
प्रवासी,
प्राणों में बाँधे अंतहीन उड़ान। - - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल  

12 नवंबर, 2018

नज़्म जो निगाहों से छलके - -

मुस्कराहटों से जीवन के सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं जाते, फिर भी ये सत्य है,
कि हर एक शख़्स कहीं न कहीं
अपने आप में गहराइयों
तक है उथला, कुछ
रिसते घाव
दिखाए
नहीं जाते। मेरी ख़ामोशी को उसने इक
नया आयाम ही दे दिया, बियाबां के
सीने में जैसे सुलगता कोई सावन,
तमाम ही दे दिया, ये ज़िन्दगी
की हैं ज़मीं, किसी अंतहीन
बंजर से कम नहीं, जज़्बा
ए दरख़्त इक बार
जो सूखे, दोबारा
किसी
हाल पे उगाये नहीं जाते। सुबह ओ शाम
के दरमियां कोई अनदेखा पुल ही था
शायद, जो सांसों को टूटने न दिया,
इस पार कौन था और उस पार
कौन, ये सोचना है बेमानी,
चाँद रात की ख़्वाहिश
 ने, शायद हमें
उनसे छूटने
न दिया,
इक अजीब सा कोहराम था रात भर मजलिस
ए आसमां पर, जो नज़्म मेरी निगाहों से
छलके वो फिर दोहराए नहीं जाते,
मुस्कराहटों से जीवन के
सभी व्यतिक्रम
छुपाए नहीं
जाते। 
* *
- शांतनु सान्याल  

01 नवंबर, 2018

ग़र कभी गुज़रो - -

अब पूछते हैं वो मेरा गुमशुदा
ठिकाना, जब याद नहीं
मुझको तारीख़ ए
रवाना।
वहीँ मोड़ पे कहीं हम सब कुछ
छोड़ आए, कोई याद हो
बाक़ी तो यूँ ही भूल
जाना।
उम्र की बदहाल सड़क ही तो - -
है ज़िन्दगी, कभी अपनों
ने लूटा, कभी बेदर्द
ज़माना।
सभी सब्ज़ दरख़्त सूख गए
अपने आप, दरअसल
बारिश तो था सिर्फ़
इक बहाना।
इस ज़मीं के सीने में सोतों - -
की कमी नहीं, मुश्किल
है लेकिन झरनों
को ढूंढ लाना।
हर कोई जैसे है अपने ही - - -
दायरे में गुम, आशना
चेहरा भी लगे यहाँ
अनजाना।

* *
- शांतनु सान्याल

30 अक्टूबर, 2018

बाक़ी अब कुछ भी नहीं - -

जो कुछ भी था उसमे में बाक़ी,
 ढलती रात ने ले लिया,
कुछ बूँद छुपाए
सीने में
आकाश तकता रहा ज़मीं को, -
मुसलसल सूनापन छोड़,
सभी कुछ बरसात
ने ले लिया।
अंतहीन कोई प्यास है वो, या  -
मेरी अनबुझ आरज़ू ! नफ़स
ख़्वाबों से छूटे मगर,
कुछ ख़्वाहिशात
ने ले लिया।
उम्र भर हम को न समझ आए
वो सभी राज़े तक़ाज़ा,
महसूल के बहाने
कुछ ज़ियादा
ही उसकी
ज़ात ने ले लिया। हम आज भी - -
उसी घाट पर हैं बैठे मुंतज़िर
निगाह लिए, जन्मों का
इम्तहान एक ही
पल में रूहे
निजात
ने ले लिया।  - -
* *
- शांतनु सान्याल
 


12 अक्टूबर, 2018

RAISE VOICE FOR # Me Too Movement

After observing continuously the campaign of # Me Too Movement, one thing became very clear that so-called the superhero of the era or the face of every advertisement is the great diplomate too - - no need to write the name, other politicians of present government who are claimed the torch bearer of beti bachao or save the daughter movement are also predators - - though particularly English news media are doing their work honestly - - anyways its a great beginning by Tanushree Dutta against the sexual predators of our society whom we are giving the status of god and saying the pride of humanity, days of Hippocrates, pseudo gentleness and so-called '' sanskari log'' are over, every citizen should raise their voice against these sexual predators of our society
who are just like woodworm making the Indian society day by day too much hollow and weak. Those people of Bollywood (who are against women's movement ) are actually hidden pimp, they want to earn the money after forcing the innocent women indirectly to flesh trade, there should be strict law and regulation for contract/employment for women's safety and protection, there shouldn't be any compromise of their dignity in the film industry / IT sectors/media / or any other organizations. If present government is really honest in their so-called women empowerment policy then they must show 56 inches chest for making immediately law and regulation regarding this comprehensive policy otherwise in coming election women shouldn't vote them.
- Shantanu Sanyal



11 अक्टूबर, 2018

दुआ - सलाम - -

मुखौटों का शहर है आरसी का
यहाँ कोई काम नहीं, परत
दर परत हैं न जाने
कितने ही छुपे
रंग - रोगन,
मौज
ए रौशनी का यहाँ कोई आख़री
मुकाम नहीं। फिर सज चले
हैं गली कूचों के सभी
बेरंग दरो दिवार,
लेकिन परदे
के ओट
में, खुशियों का कोई नाम नहीं।
वही बदहवास चेहरे तकते हैं
घिसी पिटी इश्तहारों को,
ईद हो या दिवाली
झुके कमर को
लेकिन
आराम नहीं। दहलीज़ में न जाने
कौन रंगीन दावतनामा छोड़
गया, कहने को वो शख़्स
अपना है लेकिन
दुआ - सलाम
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल


19 सितंबर, 2018

जाने क्यों - -

सभी कुछ है सांस लेता हुआ मेरे आसपास,
फिर भी, न जाने क्यों रहता है ये दिल
उदास, वक़्त की सांप सीढ़ियों ने
मुझे, हर मोड़ पे, गिर कर
संभलना है सिखाया,
फिर भी न जाने
क्यों अभी
तक
हैं नाज़ुक मेरे एहसास। घर से मंदिर तक
का सफ़र, यूँ तो है बहोत ख़ुशगवार,
मुश्किल तो तब होती है, जब
मुख़ातिब हों उजड़े चेहरों
के नक़्क़ास। शहर
की भीड़ में
सिर्फ़
मैं ही न था तनहा, न जाने कितने लोग -
यूँ ही भटकते मिले अपने ही घरों के
आसपास। अजीब सा नशा है
उस अनदेखे वजूद का,
खो देते हैं दानिशवर
भी अक्सर,
अपने
होश वो हवास। फिर भी न जाने क्यों, ये
दिल रहता है उदास। 

* *
- शांतनु सान्याल

वो कौन थे - -

न जाने वो कौन थे अजेय पथिक,
गुज़रे अंतिम प्रहर, देह रंगाए
राख, छोड़ गए दूर तक
सुलगते पैरों के
निशान।
न जाने वो कौन थे, किस चाह में
जीवन को बनाया महाज्वाल -
स्तूप, और मुस्कुराते हुए
किया सर्वस्व दान।
काश, वो महा -
मानव
फिर लौट आएं, और सिखाएं हमें -
स्वाधीनता का सत्य अभिप्राय,
पुनः एक बार मानवता का
रचे हम, वास्तविक -
संविधान।

* *
- शांतनु सान्याल


 

07 सितंबर, 2018

किसी और दिन - -

कोई नहीं रुकता किसी के लिए,
ये ज़िन्दगी का सफ़र है कोई
ख़ूबसूरत ख़्वाब नहीं।
तहत तबादिल
से है तमाम
कारोबार
ए जहाँ, यहाँ कोई भी किसी -
का अहबाब नहीं। तुम्हारी
वाबस्तगी बेशक है
बहुत ही दिलकश
लेकिन तहे
दिल में
है क्या, मुझे इसका ज़रा भी -
अंदाज़ नहीं। चलो मान
भी लें कि हैं बहोत
गहरी तुम्हारी
निगाहें,
किसी और दिन डूब के देखेंगे
ज़रूर, लेकिन आज नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 





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