कोहरे में डूबा हुआ नन्हा सा एक स्टेशन, -
पहाड़ियों की तलहटी में बसा हुआ
गुमशुदा स्मृति प्रदेश, कच्चे
पक्के रास्ते से हो कर
आहिस्ता गुज़रता
हुआ समय का
रिक्शा चक्र,
हवाओं
में पके धान की ख़ुश्बू, बहुत कुछ मानचित्र
में नहीं होता है विशेष, पहाड़ियों की
तलहटी में बसा हुआ गुमशुदा
स्मृति प्रदेश। अध गिरा
हुआ खजूर का पेड़,
उम्रदराज़ पीपल
का दरख़्त,
पांच
दशक पुराना पक्षियों का कलरव, अंतरतम
में बसा कोई सोंधा गंध, बबूल की
टहनियों से झूलते परिंदों के
घरौंदे, प्राचीन मंदिर का
पुनरुद्धार, रंग रोगन
से झांकते हुए
विस्मृत
कुछ
शिलालेख, दीर्घ दस्तक के बाद खुलता है बंद
कपाट, " कौन हो तुम अनाहूत आगंतुक ? "
"यहाँ कुछ भी नहीं है अवशेष "
पहाड़ियों की तलहटी में
बसा हुआ गुमशुदा
स्मृति प्रदेश ।
द्वार धीरे
से बंद
हो जाता है दूर तक बिखरे पड़े रहते हैं ओस
के बूंद - -
* *
- - शांतनु सान्याल

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 15 जनवरी 2023 को साझा की गयी है
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
सुंदर भावपूर्ण अहसास को संजोती सुंदर, गहन रचना ।
जवाब देंहटाएंभावपूर्ण सार्थक सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंएक मर्मांतक अभिव्यक्ति शान्तनु जी जिसके शब्दों में व्याप्त सन्नाटे हृदय को विचलित कर रहे हैं।सादर 😞
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