अकस्मात सभी मेघ अदृश्य हो गए,
उजली धूप दूर तक है बिखरी
हुई, उड़ चला है नील -
पंछी अनजान
दिगंत की
ओर,
स्मृति के अहाते पड़े हुए हैं सुख के
कुछ बूंद, कुछ अपरिभाषित
सजलता, पारदर्शी
खिड़कियों के
उस पार हैं
बहुत
कुछ, मसृण सतह पर वक़्त कभी
नहीं ठहरता। हथेलियों में
कहाँ रुकता है जल -
प्रपात, स्वप्निल
दुर्ग में हैं बंद
सभी अर्ध
सत्य,
कंगूरों के बीच से झांकता है धुंध -
भरा प्रभात, हमारे दरमियां
बहुत कुछ हो कर भी,
कुछ भी नहीं होता,
कई बार उभरा
हूँ मैं डूब
कर,
कई बार लौट आए मेरे हाथ गहन
शून्यता के साथ, फिर भी
ज़िन्दगी ढूंढती है वही
गुमशुदा बरसात
की रात, ये
और
बात है कि हथेलियों में नहीं रुकते
हैं जलप्रपात।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर सृजन।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंहथेलियों में
जवाब देंहटाएंकहाँ रुकता है जल -
प्रपात, स्वप्निल
दुर्ग में हैं बंद
सभी अर्ध
सत्य,
गहन भाव लिए बहुत ही सार्थक भावाभिव्यक्ति।
वाह!!!
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंकई बार लौट आए मेरे हाथ गहन
जवाब देंहटाएंशून्यता के साथ, फिर भी
ज़िन्दगी ढूंढती है वही
गुमशुदा बरसात
की रात
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,शांतनु भाई।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंअद्भुत पंक्तियां लिखीं शांतनू जी कि "स्मृति के अहाते पड़े हुए हैं सुख के
जवाब देंहटाएंकुछ बूंद, कुछ अपरिभाषित
सजलता, पारदर्शी
खिड़कियों के
उस पार हैं
बहुत
कुछ, मसृण सतह पर वक़्त कभी
नहीं ठहरता।" ....वाह, नि:शब्द हूं
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंकई बार लौट आए मेरे हाथ गहन
जवाब देंहटाएंशून्यता के साथ, फिर भी
ज़िन्दगी ढूंढती है वही
गुमशुदा बरसात
की रात, ये
और
बात है कि हथेलियों में नहीं रुकते
हैं जलप्रपात।..सुंदर सार्थक सृजन।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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