गुरुवार, 28 जनवरी 2021

शून्य स्तूप - -

एक से बढ़ एक ख़ूबसूरत -
हवेलियों का है ये
शहर, झूलते
बरामदों
में खेलते हैं, धूप छाँव के -
मंज़र, ठहर लूँ घड़ी
भर कहीं, ऐसा
कोई सायबाँ
न मिला,
जिसका जितना दामन  - -
था, उतना ही धूप
समाया, यक्ष
का संदूक
रिक्त
था,
भाग्य में शून्य स्तूप आया,
बदल दे हाथ के लकीरों
को, ऐसा कोई
मेहरबाँ न
मिला,
ज़िन्दगी जीने के लिए, सभी
दौड़े जा रहे हैं बेतहाशा,
नए दिन के साथ
नए षड्यंत्र,
वही
मंसूबों का तमाशा, बातचीत
ताउम्र चली, फिर भी
कोई हमज़बाँ
न मिला,
सुना
था मिलता है दिल को बड़ा
सुकूं उसके साए में,
लिहाज़ा हम
तलाशते
रहे उम्र
भर
उस दरख़्त का पता, जिसका
अक्स उतर आए दिल में
वो आसमाँ न
मिला।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

 

















 

18 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 29-01-2021) को
    "जन-जन के उन्नायक"(चर्चा अंक- 3961)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

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  2. सुन्दर मनोभावों की अभिव्यक्ति..

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २९ जनवरी २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर सराहनीय अभिव्यक्ति आदरणीय सर।

    तलाशते
    रहे उम्र
    भर
    उस दरख़्त का पता, जिसका
    अक्स उतर आए दिल में
    वो आसमाँ न
    मिला।..बहुत ही हृदयस्पर्शी...।

    जवाब देंहटाएं

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