मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं
निशाचर, सुदूर बांस वन में
अग्नि रेखा सुलगती सी,
कोई नहीं रखता
यहाँ दीवार
पार की
ख़बर,
नगर कीर्तन चलता रहता है - -
अपनी जगह, शब्दों में हैं
तथागत, उत्पीड़न
घर के अंदर,
छींके पर
रखे हैं,
सभी ख़्वाबों के खिलौने, बिल्ली
की तरह लोग देखा किए
आठों पहर, सोचने
से कहीं गिरता
है, नीचे
नीला
आकाश, ज़रा सी हलचल में,थम
सा गया सारा शहर, मैं छोड़
आया था, सब कुछ
समुद्र के किनारे,
बिन छुए ही
लौट गई
तेज़
वो मझधार की लहर, कोई किसी
का सर दर्द नहीं लेता,
मेरे दोस्त, बाहर
से हर कोई
है सजल,
अंदर
से लेकिन बेअसर, मृत नदी के
दोनों तट पर खड़े हैं -
निशाचर।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंसुन्दर प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंमकर संक्रान्ति का हार्दिक शुभकामनाएँ।
ह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंअत्यंत भावपूर्ण । शुभकामनाएँ ।
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंवाह! बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता।
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना आदरणीय
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंसुंदर रचना आदरणीय शांतनु जी
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंसुन्दर भावाभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंदुर्दिन समय की नब्ज टटोलती भावपूर्ण रचना
जवाब देंहटाएंवाह
बधाई
ह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंलौटती लहर क्या कुछ नहीं समेटे है खुद में
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंबहुत ही सुन्दर
जवाब देंहटाएंह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएंकोई किसी
जवाब देंहटाएंका सर दर्द नहीं लेता,
मेरे दोस्त, बाहर
से हर कोई
है सजल,
अंदर
से लेकिन बेअसर, मृत नदी के
दोनों तट पर खड़े हैं -
निशाचर।----- बहुत सराहनीय
ह्रदय तल से आभार - - नमन सह।
हटाएं'वो मझधार की लहर, कोई किसी
जवाब देंहटाएंका सर दर्द नहीं लेता,
मेरे दोस्त, बाहर
से हर कोई
है सजल,
अंदर
से लेकिन बेअसर, मृत नदी के
दोनों तट पर खड़े हैं -
निशाचर।' - बहुत ही सुन्दर, बंधू शान्तनु जी! क्या बात कह दी है आपने!
असंख्य आभार आदरणीय, नमन सह ।
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