28 सितंबर, 2011


बिहान पुनः मुस्कुराये 

रेशमी जालों से निकल कभी पारदर्शी पंख लिए,

निस्तब्ध झील से उठ कर नीली घाटियों 

में कहीं, अनन्य कुसुमित वीथी 

जहाँ हो प्रतीक्षारत,

स्वरचित अग्निवलय- परिधि से बाहर उभरते 

हैं, रश्मि पुंज, जीवन रचता है जहाँ

नई परिभाषाएं, उच्छ्वास से 

झरते हैं सुरभित 

अभिलाष, कभी तो देख मुक्त वातायन पार की 

पृथ्वी, क्षितिज देता है रंगीन आवाज़,

साँझ उतरती है वन तुलसी के 

गंध लिए, देह बने 

सांध्य प्रदीप, हों तिमिर, प्रदीप्त पलकों तले,

रात रचे फिर जीने की सम्भावना 

स्वप्न हों मुकुलित दोबारा 

बिहान फिर मुस्कुराये.

-- शांतनु सान्याल
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27 सितंबर, 2011

ग़ज़ल - - सकूत निगाह

मतलब जाने क्या था उस सकूत निगाह का यारब
शोले थे मताजुब देख, उस सर्द ख़ाक का सुलगना

मुमकिन न था, हर ज़हर को हलक पार करना   
बेज़ान थी, तपिश मुश्किल था संग का पिघलना

वो जिस मक़ाम से देता है, मुझे सदायें तड़प कर  
तुरे आतिशफिशां पे तै था लेकिन ताज का ढहना

रोक लेता किसी तरह भी मैं उस कोलाके क़हर को
आसां न था शीशा ए दर्द को छूके फिर से संभलना

शबनम के वो  क़तरे ठहरे रहे काँटों की नोक पे यूँ
ख़ुश्क पत्ते थे बदनसीब, दुस्वार था फिरसे भीगना

रुकी रही देर तक फ़लक पे सितारों की वो मजलिस   
चाह कर भी हो न सका ज़ीस्त का घर से निकलना.

-- शांतनु सान्याल  
अर्थ -
मताजुब - आश्चर्य से
 सकूत - ख़ामोशी
आतिशफिशां - ज्वालामुखी
 मजलिस  - संस्था
कोलाके क़हर - तूफ़ान की बर्बादी
ज़ीस्त  - जीवन
 


24 सितंबर, 2011


अछूता बचपन 

परिसीमित अंचल मेरा स्रोत के विपरीत 
बह न सका, झूलते बरगद के मूल 
थामे मैं तकता रहा सांझ का 
उदास चेहरा, परिश्रांत, 
शिथिल,कोसों 
चल कर आता हुआ जीवन तटभूमि छू न 
सका, इस वन्य वीथि से हो कर जाती 
हैं कुछ पगडंडियाँ, नियति की 
रेखाओं की तरह, तिर्यक 
कभी समानांतर, 
निस्तेज आँखों में डूबती हैं भावी स्वप्नों की 
दुनिया, उसने चाहा था शरद की एक 
मुट्ठी ज्योत्स्ना, हेमंती धूप की 
कुछ परतें, शेमल की 
उड़तीं रेशमी रुई,
सभी ने कहीं न कहीं ऊँचाइयों को छू लिया, 
वो कुछ भी हो न सका, सुबह शाम 
एकटक देखता है वो लौटते 
हुए उजले परिधानों में 
सजे कुलीन बच्चे,
मुस्कराते हुए पालकों का आलिंगन, बड़े 
जतन से थामे हुए मज़बूत हाथ,
ख़ुद को पाता है इन्हीं भीड़ 
का हिस्सा, लेकिन 
कहीं कोई शून्यता उसे लौटा लाती है, वहीँ 
जहाँ से कोई भी राह निकलती नहीं,
आद्र आँखों से वो देखता है नदी 
का कटाव, धंसते किनारे 
बड़े ध्यान से वो पोंछता है रेस्तरां के मेज़ 
भाग्य की परछाई जो कभी उभर 
ही न सकी, जीवन ठहरता 
कहाँ है छूटते बचपन 
के लिए, 

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
  
     
  

नज़्म - - फ़लसफ़ा ए इश्क़

मर्तूब नफ़स से उठती हैं शाम ढलते
मज़तरब मेरी आहें, लोग कहते
हैं राज़े आतिश का पता नहीं,
महराबे जिस्म में रात
करती हैं तलाश मुझको, फ़िदा होने
से क़बल गुलेयास सजाती है
मेरा बदन खुश्बुओं से,
फिर ज़िन्दगी
गुज़रती है सोजिश राहों से नंगे पांव,
नक्ज़शुदा अहसास उठाते हैं   
ताबूत, मैं फिर ज़िन्दान
से निकल
राहे आसमां में करता हूँ सफ़र कामिल,
ये तेरी चाहत है जो मुझे हर
बार जीला जाती है,
नामहदूद तेरी मुहोब्बत मुझे मरने नहीं
देती, सिफ़र से बारहा उभर आता
हूँ मैं, नज़दीक तेरे बसते हैं
ख़ारिज अज़ आसमां
की दुनिया,
लेते हैं फ़लसफ़ा ए इश्क़ पैदाइश दोबारा.

-- शांतनु  सान्याल

अर्थ :   
  मरतूब - भीगी
गुलेयास - चमेली
मज़तरब - उद्वेलित
सोजिश - सुलगते
नक्ज़शुदा - टूटे हुए
ख़ारिज़ अज़ आस्मां - आकाश पार
फ़लसफ़ा - दर्शन  
 

22 सितंबर, 2011

ग़ज़ल - - ज़िन्दगी से कहीं ज़्यादा

ये गुमां था  वो चाहते हैं, हमें ज़िन्दगी से कहीं ज़्यादा
साँस रुकते ही सभी,वो ख़ुशी केअबहाम दूर होने लगे,

बामे हसरत पे शाम ढलते वो चिराग़ जलाना न भूले 
ताबिशे रूह लरजती है,राहत ओ आराम दूर होने लगे, 

मैंने ख़ुद ब ख़ुद ओढ़ ली है, तीरगी ए फ़रामोश शायद 
लज्ज़ते मुहोब्बत, मरहले शाद, तमाम दूर होने लगे,

इक पल नज़र से दूर न होने की, ज़मानत थी बेमानी 
रफ़्ता रफ़्ता यूँ, ज़िन्दगी से सुबहो शाम दूर होने लगे, 

-- शांतनु सान्याल 

अबहाम - कोहरा 
बाम - पठार
 ताबिश - चमक 
मरहला - वक़्त 
रफ़्ता - धीरे

20 सितंबर, 2011


पथराई आँखों के सपने 

ये मुमकिन न था किसी के लिए यूँ 

दुनिया ही भूला देना, दामन अपना 

हमने ख़ुद ही समेट लिया, रिश्ते वक़्त 

के साथ इक दिन ख़ुद ही सिमट गए,   

ये और बात थी की शमा बुझ के भी 

जलती रही उम्रभर, इंक़लाब उठा था 

हरीक हायल की मानिंद, देखे थे हमने 

मुख्तलिफ़ अल्मशकाल के सपने भी,  

रोटियां, पक्के मकानात, चिलमन से 

झांकते ताज़ारुह मुस्कराहटें, खुशनुमां  

ज़िन्दगी, माँ के आंसुओं में हमने कभी 

देखी थी तैरतीं बूंदों की क़स्तियां, आँचल 

से पोंछते हुए कांपते हाथ,दरवाज़े पे खड़ी

वो तस्वीर, जो अपना ज़ख्म कभी किसी को 

दिखा न सकी, सूनी कलाइयों में पुराने दाग़,    

जो कभी  भर ही न पाए, घर से निकलते हुए 

बहुत चाहा कि इक नज़र देख लें ज़िन्दगी,

लेकिन हर ख्वाहिश की तवील उम्र नहीं 

होतीं, उस आग में झुलसने की जुस्तज़ू थी 

सदीद, जलते रहे रात दिन, मिटते रहे 

लम्हा लम्हा, जब उस क़िले के मीनारों में 

परचम उड़े, हम स्याह कोने पे थे कहीं पड़े,

हमें मालूम ही न चला कब और कैसे 

हम हासिये से निकल ज़मी पे बिखर गए,

उस आग ने शायद उन ख्वाबों को भी जला 

दिया, अब हम ख़ुद से पूछते हैं इंक़लाब ओ 

आज़ादी के मानी, खाख में मिलने का सबब !

तलाशते हैं अपना इक अदद ठिकाना कि

रात है बेरहम, ज़िन्दगी मांगती है अपना 

हिसाब, हमने क्या दिया और किसने क्या 

लौटाया, हमें याद नहीं,  मुद्दत हुए आग पे 

रख कर हाथों पे हाथ, क़सम खाए हुए - 

-- शांतनु सान्याल 

हरीक हायल - जंगल की आग 

अल्मशकाल -Kaleidoscope बहुरूपमूर्तिदर्शी

मुख्तलिफ़ - विभिन्न 

19 सितंबर, 2011

उन्वान जो चाहे दे दो

ज़िन्दगी भी क्या चीज़ है अक्सर 
सोचता हूँ मैं, दोनों जानिब 
हैं रुके रुके  से धूप छाँव
की बस्तियां, दौड़ते दरख़्त 
कँवल भरे झील, रेत  के टीले 
 उदास चेहरों पे बबूल के 
साए, पलकों से गिरते पसीने 
की बूँदें, नंगे बदन बच्चों 
की भीड़, नदी किनारे उठता धुआँ,
कहीं कुछ छूटता नज़र आए 
रेल की रफ़्तार है ओझल, दौड़ 
चलीं हैं परछाइयाँ, उस पुल से क्या 
गुज़रती हैं कभी खुशियों की 
आहटें, जब भी देखा है तुम्हें ख़ामोश
निगाहें, तुम कुछ न कहते हुए 
भी बहुत कुछ कह जाते हो, उन इशारों 
का दर्द घुलता है रात गहराते, 
बेदिली से चाँद का धीरे धीरे सधे
क़दमों से ऊपर उठना, ढलती उम्र में 
जैसे किसी दस्तक की आस हो,   
चेहरे की झाइयाँ करती हैं 
मजबूर वर्ना आइने में रखा क्या है,
ये उम्मीद की लौटेंगी बहारें इक दिन 
वो रोज़ सवेरे दौड़ आता है,
कचनार के झुरमुट पार नदी के 
कगार, इंतज़ार करता है देर तक,
पटरियां हैं मौजूद अपनी जगह, पुल के 
नीचे बहती पहाड़ी नदी, अब सूख
चली है,  महुए की डालियों से झर 
 चले हैं उम्रदराज़ पत्ते, दूर तक उसका 
निशां कोई नहीं, शायद वक़्त का
 फ़रेब है या  अपनी क़िस्मत में मिलना 
लिखा नहीं, मुमकिन हैं उसने 
राहों को मोड़ लिया, ज़िन्दगी उदास लौट 
आती है वहीँ जहाँ किसी ने दी थीं 
ख्वाबों की रंगीन मोमबत्तियां, जो कभी 
जल ही न सकीं, अँधेरे में दिल 
चाहता है तुम्हें छूना महसूस करना, 
सांस लेना, दो पल और जीना --

-- शांतनु सान्याल  
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18 सितंबर, 2011

नज़्म - - जीने की आरज़ू,


आसमां की थीं शायद मजबूरियां
नजम टूट कर बिखरते रहे 
ज़मीं के थे अपने ही  
मंतक़, जो चाह कर भी अपना न 
सकी सिमटती नूरे जरयां
हर इक सांस में था 
ख़ुदा, हर क़दम 
पे जीने की आरज़ू, बेअसर रहीं न 
जाने क्यूँ अपना बनाने की 
अदा, हर इक बात पे न 
कहो कि लिल्लाह की 
मर्ज़ी, उसी ने कहा था मुझे कि मिलूं 
मैं तुमसे मस्जिद के साए 
मंदिर की सीड़ियों में 
कहीं, तपते धूप में, सर्द चाँद रातों में,
मिले भी तुम मगर अजनबी की 
तरह, पूछते रहे लहू का रंग 
जीने की अहमियत 
बिखरने का 
मक़ाम, हज़ारों सवालात, दे न सका 
कोई माक़ूल जवाब, अपनी ये 
शख्सीयत लिए लौट चला 
मैं गुमशुदा क़ब्रगाहों
के क़रीब, जहाँ फिज़ाओं में है पुरसुकून 
ख़ामोशी, अपनापन, ज़िन्दगी 
यहीं कहीं करती है तलाश 
सितारों के टूटने की 
वजह, इश्क़िया लोगों के मक़बरे, रूहों की 
सरज़मीं, रात ढलते जहाँ लगते हैं 
सूफ़ियों  के मेले, अक़ीदत यहाँ 
है ग़ैरमानी, शर्त हैं सभी 
सिर्फ़ इंसानी !

-- शांतनु सान्याल
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  अर्थ -  
  नजम - तारा 
 मंतक़ - तर्क 
नूरे जरयां - रौशनी का प्रवाह 
सूफ़ी - रहस्यमय 
अक़ीदत  - श्रद्धा 
माक़ूल - सही  

16 सितंबर, 2011

रुको ज़रा

रुको ज़रा
न दिखा आइना, अक्स बिखरा हुआ
चला पड़ा हूँ मैं फिर उन्हीं राहों पे
तलाशे वजूद की ख़ातिर -
उभरती हैं दर्द की लकीरें, ज़िन्दगी का
हिसाब है ग़लतियों से भरा, इस्लाह
है मुश्किल, जिसे तू कहे
जाने महबूब वो कोई नहीं, है वहम मेरा
ये वही वाकिफ़ शख्स है जिसने
हर क़दम उलझाया मुझे
ताशिर में रह कर
 भटकाया सहरा सहरा, मज़िल मंज़िल !
कहीं शायद रुकी है बारिश, हवाओं
में ज़िन्दगी का अहसास लगे,
न यहाँ है कोई मज़ार न
सदग़ कोई, लेकिन गूंजती हैं फिज़ाओं में
नन्हें बच्चों की किलकारियां,
खेलते हैं वो देर रात इन
चांदनी की परछाइयों
में कहीं लुकछुप, उनकी मासूम चेहरे में
ज़िन्दगी तलाशती है नाख़ुदा की
सूरत, नदी है गहरी बहुत
जाना है रौशनी के
शहर, रुको ज़रा की चूम लूँ उनके क़दम !
--- शांतनु सान्याल 
इस्लाह - सुधार
नाख़ुदा - मल्लाह
सदग़- मंदिर
ताशिर- अंतर्मन

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09 सितंबर, 2011

ग़ज़ल - - कभी तो आ ज़िन्दगी,

भीगी शाम की तरह कभी तो आ ज़िन्दगी,
उदास लम्हात को यूँ  फिर सजा ज़िन्दगी.

वो सभी ख़ुश्बुओं के दायरे घुल चले स्वतः 
नीली नूर में धुली कोई आग जला ज़िन्दगी,

फिर उन आँखों में देखी है जीवन की उमंग,
साँसों को इकबार यकीं फिर दिला ज़िन्दगी,

रुके रुके से हैं, फूलों के मौसम न जाने क्यूँ 
व्यथित चेहरों में  गुल फिर खिला ज़िन्दगी,

कौन है जो, मासूम दिलों से खेलता है बारहा
न उठे दोबारा उन्हें मिट्टी में मिला ज़िन्दगी,

ये फिज़ाएं पुकारती हैं अमन के परिंदों को 
फिर कहीं से मुहोब्बत को ले आ ज़िन्दगी, 

--- शांतनु सान्याल 
आवाहन

वो राजपथ से बहते रुधिर धारे

क्लांत, कराह्तीं देवालय,

पाखंडों का पैशाचिक नृत्य

क्या यही है भरतवंशी तेरा अंत

फिर क्यूँ नहीं उठती शौर्य

की वो गंगन चुम्बित जयकारे,

हे ! नव प्रजन्म उठा शपथ

कोटि कोटि जन के परित्राण हेतु

कर कवच धारण,माँ भारती

करे आवाहन, हे! तुम्हें सनातनी,

हों एक धर्म रक्षार्थ सहस्त्र किनारे !

-- शांतनु सान्याल
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31 अगस्त, 2011

न कर तलाश - -


न कर तलाश मुझे 
ज़िन्दगी ढूँढती है 
अर्श से फ़र्श तलक मुसलसल 
की मेरा वजूद बिखरा है 
बेतरतीब, किसी की मजबूरियों 
में हूँ शामिल, बेचता हूँ
 जिस्म ओ जां, जीने के लिए,
क़र्ज़ में डूबे हैं खेत 
ओ खलिहान, पलायन है -
मेरी नियति, माथे 
पर खुदे हैं, अभिशापित लकीरें 
हर पल ठगे जाना,
हर क्षण जीना मरना, इसके 
सिवा कुछ भी नहीं मेरे 
पास, लौट जाओ भी -
इस धूलभरी राहों में तुम चल न 
सकोगे, ये राह नहीं आसां,
नदी पार, पगडंडियों से निकल, 
ईंट भट्टों में कहीं, आगे ज़रा बढ़ कर 
दाह घाटों में बिखरे फूलों में 
छुपे चंद सिक्कों में 
कहीं, संकरी गलियों से उठते धुएँ -
के ओट में, थके हुए बचपन में कहीं, 
चाय की दूकान के सामने, पंचर 
सुधारते नन्हीं उँगलियों में 
कहीं, पान की पीक भरे 
नुक्कड़ की वो दीवार, जिसमें किसी 
ने लिखा था," वो सुबह ज़रूर आएगी",
उसी दिवार से ढहते हुए 
प्लास्तरों के टुकड़ों में कहीं,
बिखरा पड़ा है 
अस्तित्व मेरा, ये ज़िन्दगी 
नाहक है तलाश तेरा, कि कब से मैं 
हूँ गुमशुदा ज़माने की भीड़ में !
* * - - शांतनु सान्याल 



26 अगस्त, 2011

नंगे पांव आओ ज़रा चल के - -


ग़ज़ल 

कोई  शीशा ऐ ख़्वाब नहीं, जैसा चाहा खेल गए 
जिस्म है ये काँटों से सजा, रुको ज़रा संभल के,

हिक़ारत, नफ़रत, आग के शोलों में ढला हूँ  मैं
आसपास भी हैं ज़िन्दगी,  देखो ज़रा निकल के,

बंद घरों  की खिड़कियों से, है दूर जलता चमन 
बच्चों की मानिंद फिर भी, खेलो ज़रा मचल के,

इन लहरों में उठती हैं हार ओ जीत की तस्वीरें 
किसी दिन के लिए यूँ दिल, देखो ज़रा बदल के,

समंदर का खारापन,साहिल को अपना न सका
नदी की मिठास में कभी ख़ुद, देखो ज़रा ढल के,

कुंदन हो या हीरे की चुभन, मुझे मालूम नहीं -
भीगी निगाहों से तो कभी, देखो ज़रा पिघल के,

मंदिर मस्जिद तक, क्यूँ सिर्फ़ है तुम्हारी मंजिल !
क़रीब है ज़िन्दगी, नंगे पांव, आओ ज़रा चल के, 

-- शांतनु सान्याल 


24 अगस्त, 2011

ग़ज़ल - - शैलाबे जुनूं

अट्टहास के बीच ज़िन्दगी बेलिबास खड़ी
वक़्त की मेहरबानियाँ भी कुछ कम नहीं,

खींच लो जितना चाहों सांसों की रफ़्तार -
मज़िल पे कभी तुम और कभी हम नहीं,

इस दौर में हर कोई, खुद से है मुख़ातिब 
आइना  ख़ामोश, कि मुझे भी शरम नहीं,

बाँध लो निगाहों में पट्टियाँ ये रहनुमाओं
जान के भूली है राहें, मेरा कोई वहम नहीं,

मालूम है मुझे ज़माने की रस्मे वफ़ादारी
दौलत पे निगूँ सर, इनका कोई धरम नहीं,

वो फिर बनेगे शहंशाह लूट कर सारा शहर
करो राजतिलक, रोके कोई वो क़सम नहीं,

इस तरह जीने की आदत मुझे रास नहीं -
ये ज़हर है  मीठा, ये इलाजे  मलहम  नहीं,

उठो भी आसमानों से दहकते शक्ले तूफां
थाम ले  शैलाबे जुनूं, किसी में वो दम नहीं.

-- शांतनु सान्याल

  

23 अगस्त, 2011

ग़ज़ल - - निज़ात

तारों भरा ये शामियाना, रात सजी दुल्हन -

ज़िन्दगी चाहे निज़ात, फिर वही चिर दहन,

नदी से उठे धुंआ, बेचैन क़श्ती, रूह बेक़रार 
डूबती उभरती लहरें,फिर वही अधीर थकन,

रुके ज़रूर वादियों में, मुड़ के देखा भी हमें - 
न बढे क़दम, घेरती रही यूँ दिल की उलझन,

कोई  साया अंधेरों में भटकता रहा रात भर -
बंद दरवाज़े, दस्तक न दे सका, ये मेरा मन, 

वीरां सड़कों से कौन गुज़रा लहूलुहान पांव
जिस्म पे बिखरे दाग़, अनबुझ है वो जलन,

ख़ुद को समेटता हूँ, मैं मुसलसल ज़िन्दगी
क्या हुआ  कि वो तमाम मस्सरतें हैं,  रेहन 

सुबह की रौशनी में न देख यूँ  ज़माना  मुझे
मीलों लम्बी तीरगी से चुरा लाया हूँ ये बदन,

-- शांतनु सान्याल  
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22 अगस्त, 2011

ग़ज़ल - - ओझल हो गए

उड़ते  पुल  से वो गुज़रे, सफ़ेद  बादलों की  तरह 
नज़र  भी आये ज़रा  ज़रा, फिर  ओझल  हो गए,

ज़िन्दगी  तकती  रही,  इशारों  की  वो बत्तियां,
रिश्ते  सभी  यूँ निगाहों  से बहते काजल हो गए,

अपनापन, फुटपाथ, पुरानी  किताबों  की  दुकान
छू  न  सका, कि  इश्क़  आसमानी आँचल हो गए,

वो हँसे या आंसू बहाए, कुछ  भी फ़र्क नहीं पड़ता,
चाहने वाले न जाने  कब,कहाँ, क्यूँ  पागल हो गए,

गुफाओं में था कहीं गुम, वो  ख़ुद को यूँ मिटाए हुए
 रेशमी धागों के ख़्वाब सभी मकड़ी के जाल हो गए,

न  दे सदा  कि गूँज तेरी  उभर कर बिखर जायेगी
ज़िन्दगी के हसीन पल, पिघल कर बादल हो गए,

लोग कहते हैं, मुझे बर्बाद इक दर्दे अफ़साना, कहें
हमराहे तूफ़ान, जज़्बात सभी संगे साहिल हो गए !

-- शांतनु सान्याल 

painting by ananta 2010
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20 अगस्त, 2011

देखा है तुम्हें करीब से

देखा है तुम्हें करीब से

ज़िन्दगी को तुमने देखा हो जिस तरह भी
दो पल का साथ मगर मुतासिर कर गया, 

यूँ तो चाहत की फ़ेहरिस्त थी बहोत लम्बी
अपलक आँखों से वो सब ज़ाहिर कर गया,

उस मोड़ पे जा कर बिखर जाते हैं, रास्ते -
 दर्द को सहने के लिए  वो माहिर कर गया,

मुझसे चाहते हो न जाने क्या खुल के कहो
हूँ महलों में लेकिन दिल यूँ  बेघर कर गया,

उसने क़सम खाई थी, हर क़दम पे मेरे लिए 
न जाने,  क्यूँ आखिर तन्हां सफ़र कर गया,

रिश्तों की भीड़ में, शायद  खो गया हो कहीं,
दर्दे वसीयत लेकिन वो मेरे नज़र कर गया,

-- शांतनु सान्याल

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painting - Manuela Valenti

زندگی کو تھمنے دیکھا ہو جس طرح بھی 
دو پل کا ساتھ مگر متاثر کر گیا
یوں تو چاہت کی فہرشت تھی بھوت لمبی 
اپلک آنکھوں سے وو سب ظاہر کر گیا 

اس موڈ پی جا کر بکھر جاتے ہیں  راستے 
درد کو سہنے کے لئے وو ماہر کر گیا 

مجھسے چاہتے ہو نہ جانے کیا کھل کے کہو 
ہوں محلوں میں مگر دل بےگھر کر گیا 
اسنے قسم کھایی تھی ہر قدم پی میرے لئے 
نہ جانے آخر کیوں تنہاں سفر کر گیا 

رشتوں کی بھیڑ میں شاید کھو گیا ہو کہیں 
دردے وصیت لیکن وو میرے نظر کر گیا 

شانتانو سانیال -




11 अगस्त, 2011

नज़्म - - सांसों की धूप छांव

वो राहें जो कभी लौट आती नहीं, देखा -
है, तुम्हें ये ज़िन्दगी उसी राह से गुज़रते,
सूखे पत्तों के हमराह, मौसम बदल गए
देखा है, आसमां को अक्सर रंग बदलते,
अहाते के सभी बेल छू चले मुंडेर की ईंट,
उदास अक्श जाने क्यूँ फिर नहीं खिलते,
उनकी हर बात में है,  ख़ुश्बुओं  का गुमां -
उड़ चले बादल, चाह कर भी नहीं बरसते,
सांसों की धूप छांव, उन निगाहों की नमी
छू जाय दिल, वो मिलके भी नहीं मिलते,
चांदनी छिटकी है वादियों में फिर बेशुमार
वो सिमटे हैं इस तरह, कभी नहीं बिखरते,
 
पढ़ जाते हैं सभी राज़े दिल, यूँ निगाहों से, 
लबों से वो, लेकिन कभी कुछ नहीं लिखते,


-- शांतनु सान्याल  

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07 अगस्त, 2011


जाने कहाँ जाएँ 
नजुमे महफ़िल, बज़्मे कहकशां  हो मुबारक 
अँधेरी बस्तियों से गुज़रती हैं मेरी राहें,
उदास, मायूस चेहरे, ग़मज़दा, बेरौनक हयात 
हैं तमाम अह्बाबे जीस्त, सिर्फ़ मेरी चाहें,
उन पहाड़ियों के पार भी बसती है कोई दुनिया 
खिलते हैं ख़ाके गुल, मुस्कुराती हैं कराहें,

टूटे पुल के अहाते रख आया, सभी हर्फ़े मुहोब्बत 
ख़ुदा जाने बेहतर,नसीब कहाँ बहा ले जाए,
वो सायादार दरख़्त, बहारों में शायद फिर खिले !
हम तो चल दिए, तन्हां रास्ता जहाँ ले जाए,
हमें मालूम है लौटती सदाओं की हालत, ये दोस्त 
बिखरने से पहले शायद बादे नसीम उड़ा ले जाए,
-- शांतनु सान्याल  
   
 नजुमे महफ़िल - सितारों  की महफिल   
 बज़्मे कहकशां - आकाश गंगा की महफिल
 अह्बाबे जीस्त, - जिंदगी के दोस्त
 ख़ाके गुल     - राख के फूल
 हर्फ़े मुहोब्बत - प्रेम पत्र
 दरख़्त     - वृक्ष,बादे नसीम - सुबह की हवा
  

05 अगस्त, 2011

वो ख़ुशी

न मिलो मुझसे, न देखो मेरी तरफ
इक धुंध का बादल हूँ बिखर जाऊँगा, 
चट्टान से नीचे दुनिया लगे दिलकश
मोड़ से आगे न जाने किधर जाऊँगा,
दरख्तों में कहीं बसते हैं ढेरों जुगनू  
ज़रा ठहर ज़िन्दगी, मैं फिर आऊंगा,
न बाँध कोई धागा उभरती साँसों को 
दर्द के रिश्तों से न, यूँ  उभर पाऊंगा,
साए की मानिंद मुहोब्बत ठीक नहीं 
पत्तों की तरह इकदिन झर जाऊँगा,
न रोक मेरी राहें कि मंजिल पुकारतीं 
रात से पहले अंधेरों में घिर जाऊँगा,
कुछ भी तो नहीं बाक़ी, कि दे सकूँ -
फिर कभी सही वो ख़ुशी भर जाऊँगा,
-- शांतनु सान्याल 

  

04 अगस्त, 2011

नज़्म - - काग़ज़ के नाव

भीगते काग़ज़ के नाव रुक चले हों
शायद दिल के आँगन में कहीं -
तुमने छुआ है,अभी अभी जज़बात
इक सिहरन सी जगी लहरों में -
कहीं, बह चले  फिर भीगे अल्फाज़,
नन्हें हाथों के वो मिट्टी के बाँध
फिर दे चलें, मासूमियत से आवाज़,
न करो बंद हथेली, बेक़रार बूंदें -
हैं मुद्दत से बिखरने को यूँ भी बेताब,
कहाँ रख आये हँसी के मर्तबान 
खोल भी दो तमाम बंद रोशनदान,
किश्तों में मुस्कराने की अदा न
कर जाये कहीं ये ज़िन्दगी ही बर्बाद,
 
-- शांतनु सान्याल




03 अगस्त, 2011

ज़िन्दगी

बरसी हैं बूंदे रात ढलते, जलता रहा अंजुमन
यूँ तो कई बार छू कर गए वो अब्र, मेरा बदन, 
वो प्यास जो आग को दे गए झुलस नए नए
सदियों की भटकती रूह, है ये अनबुझ अगन,
पंखुड़ियों में  मैंने  लिखी थी शबनमी  ग़ज़ल !
पढ़ तो लिया उसने, न समझ पाया मेरा मन,
सिसकती वादियों में हैं कुछ मुरझाये नर्गिस
पाता हूँ आइने में अक्सर,ये वक़्त तेरी  थकन,
मुस्कराए तो सही, कि मज़ाक है ये चेहरा मेरा -
झूठ ही सही निभाए तो ज़रा,ज़िन्दगी का चलन.
-- शांतनु सान्याल 

01 अगस्त, 2011

ग़ज़ल - - ख़ामोश दस्तक


कोई आहट,जो नींद से कर जाए अनबन -
ख़ामोश दस्तक ने मुझे रात भर सोने न दिया,
वो शख्स जो निगाहों में रखता है ज़िन्दगी
पलकों के उस ख़्वाब ने उम्र भर रोने न दिया,
गहरी साँसों में लिए जीने की वो अदायगी
दिल की क़श्ती को मगर उसने डुबोने न दिया,
दामन में मेरे शिफ़र के सिवा कुछ भी न था
न जाने क्यूँ उसने किसी और का होने न दिया,
दुनिया की सौगातें बाँट न सका किसी को
भरी बरसात में उसने दिल को भिगोने न दिया,
वक़्त के झूले, रिश्तों के मेले, भटकता रहा !
हाथों को थाम मेरे हर लम्हा उसने खोने न दिया,
ख़ामोश दस्तक ने मुझे रात भर सोने न दिया !
-- शांतनु सान्याल
   

29 जुलाई, 2011

नज़्म

ख़ामोश निगाहें, लबे दरिया पे झुक चले
 हैं वो बादिलों के साए,
दिल की वादियों में रुके रुके से तूफ़ान -
लगे हैं फिर क्यूँ गहराए,
वो हसीं फ़रेब के धागे ख़ुद ब ख़ुद उलझे
बग़ैर उन्हें कोई उलझाए,
कमज़ोर थीं शायद सभी जंजीरों की लड़ी
जो छूते ही टूट जाए,
न बाँध मुझे अपनी ज़िन्दगी में इस क़द्र
के बिछड़ के जी न पाएं,
कोई वादा न लें उम्र भर के लिए, ये दोस्त
न कोई मुहर ही लगाएं,
मिलो इस तरह के मुतालबा न हो दिल में
न हर क़दम हों घबराए,
- -  शांतनु सान्याल

24 जुलाई, 2011


नज़्म 
आसां नहीं था आग की लपटों से 
खेलना,मुझे मालूम है ज़िन्दगी 
की हकीक़त,कि तुम दुनिया से 
अलहदा नहीं, वही अंदाज़े वफ़ा 
वही रश्मे उल्फ़त, निभाए जाओ -
ज़माने से छुप के न मिला करो 
ज़हर उतरे जिगर के पार इक ही 
बार, बढ़ा के प्याले लबों तक यूँ 
साफ़गोई से हाथ छुड़ाया न करो,
रिश्तों को ज़रा सा बहलाए जाओ - 
-- शांतनु  सान्याल 

22 जुलाई, 2011

मिट्टी के खिलौने 

गहराइयों का तो पता नहीं उड़ -
चले हैं ख़ुश्क पत्ते, न जाने किस तरफ 
शाख़ों के माथे कोई शिकन नहीं,
ज़िन्दगी है फिर मुन्तज़िर किसी की इक 
मुस्कराहट के लिए,कौन अल सुबह 
दे गया आँखों को ताज़गी भरी
इंतज़ार ए ख़ुशी फिर खिल चले हैं 
उदास टहनियों में ढेरों मुहोब्बत के फूल !
हथेली में छुपा रखी है इक बूंद
जो रात ने चुपके से आँखों में सजाया
था, तुम्हारे उँगलियों के निशान
छोड़ गए हैं,भीगी पलकों तले कोई ख़्वाब,
ज़िन्दगी फिर पुकारती है किसे
भर चले हैं वीरान सूखी नदी की घाटियाँ,
तुम हो यहीं कहीं या है भरम मेरा
जी चाहे कि संवार लूँ उलझी लटें,आइना
दे रहा है दस्तक,कोई भीग चला
है बाहर,खोल दूँ  इक बार बंद दरवाज़ा
बहोत तेज़ बारिश है,न बह जाएँ कहीं
रेत के मकां,कच्चे मिट्टी के खिलौने सभी !
--- शांतनु सान्याल

19 जुलाई, 2011

कंटीली सीमा रेखा 
 
टूटे सीप, शंख, शंबुक, जीर्ण शैवाल
कराह्तीं सागर तरंग, अस्ताचल से
पहले डूबता उभरता ये जीवन सूर्य !
एक अकेला सुदूर क्षितिज में खेता
जाय आश भरी नौका अविराम, वो
प्रतिध्वनित स्वर रचे स्वप्न मधुर,
क्लांत ह्रदय चुनना चाहे बिखरी -
सांझ लालिमा एक एक,उभरे सहसा
कोई शुक्रतारा प्रतीच्य गगन में, ले
नीलाभ किरण मुस्कान भरा, मन
चाहे फिर जीवन में लिखूं गीत नया,
जिसमे हों मासूम, निष्पाप शिशु की
निश्छल छवि, खिलता हुआ ज्यों
नवजात गुलाब, सभी दुःख दर्द से दूर,
एक ऐसी दुनिया जहाँ तुम तुम न
हों, मैं मैं न रहूँ, एक दूसरे में हों डूबे -
अपना पराया जहाँ कोई नहीं, न
कोई भूभाग न ही कंटीली सीमारेखा !


-- शांतनु  सान्याल

16 जुलाई, 2011

नज़्म - - तर्क़ब नज़र

न देख फिर मुझे तर्क़ब नज़र से यूँ
मजरूह जिस्म, दर्दे शख्सियत ले,
किस तरह से तेरी मुहोब्बत क़ुबूल
करूँ, कि ये खुशफ़हमी न दे जाये -
कहीं तवील जीने की सज़ा दोबारा,
रहने भी दे ये इश्फाक़े इनाम नया !
अभी अभी तो छायें हैं बादल घने -
बरसने दे निगाहों को दो पल कि
दूर हो जाएँ ज़रा सदियों की वीरानगी,
कोई ख़ूबसूरत गुले सबार तो खिले -
खुश्क़ दिल में गिरे चंद शबनमी बूंदें,
बोझिल सांसों में सजे संदली ख़ुश्बू
फिर बिखरतीं लहरों को साहिल मिले,
ज़िन्दगी को जीने का अंदाज़ मिले,
-- शांतनु सान्याल
तर्क़ब - आशा भरी
तवील - लम्बी
 इश्फाक़े इनाम - सहानुभूति का इनाम
 गुले सबार- कैक्टस 

14 जुलाई, 2011


ला उन्वान  
इन ख़ून की बूंदों में न कर तलाश
अक्शे ख़ुदा, हर दर्द भरी चीख में 
है शामिल ज़िन्दगी, ये टूट के 
आँखों से जो गिरती हैं बूंदें इनमें 
हैं अनदेखे ख़्वाब कई, न कर 
बर्बाद कि बड़ी मुश्किल से उठी 
हैं साँसें इक नयी सुबह के लिए, न 
दे अज़ाब इन खिलते फूलों को 
ये हैं तो हर सै में हैं ख़ुशी के मानी 
तू जीत भी ले ग़र सारी दुनिया 
दिल की विरानगी को आबाद न 
कर पायेगा, आग नहीं जानता 
अपना पराया, न झुलस जाय कहीं 
ख़ुद का घर, बस्ती सुलगने से 
पहले, अक़ीदत जो न समझ पाए
जज़्बा-ए- इंसानियत, ऐसे राहे
फ़लसफ़ा से आख़िर क्या हासिल,   
-- शांतनु सान्याल 
 ला उन्वान  - शीर्षक विहीन 
  अज़ाब - शाप 
अक़ीदत - श्रद्धा

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past