19 सितंबर, 2018

जाने क्यों - -

सभी कुछ है सांस लेता हुआ मेरे आसपास,
फिर भी, न जाने क्यों रहता है ये दिल
उदास, वक़्त की सांप सीढ़ियों ने
मुझे, हर मोड़ पे, गिर कर
संभलना है सिखाया,
फिर भी न जाने
क्यों अभी
तक
हैं नाज़ुक मेरे एहसास। घर से मंदिर तक
का सफ़र, यूँ तो है बहोत ख़ुशगवार,
मुश्किल तो तब होती है, जब
मुख़ातिब हों उजड़े चेहरों
के नक़्क़ास। शहर
की भीड़ में
सिर्फ़
मैं ही न था तनहा, न जाने कितने लोग -
यूँ ही भटकते मिले अपने ही घरों के
आसपास। अजीब सा नशा है
उस अनदेखे वजूद का,
खो देते हैं दानिशवर
भी अक्सर,
अपने
होश वो हवास। फिर भी न जाने क्यों, ये
दिल रहता है उदास। 

* *
- शांतनु सान्याल

वो कौन थे - -

न जाने वो कौन थे अजेय पथिक,
गुज़रे अंतिम प्रहर, देह रंगाए
राख, छोड़ गए दूर तक
सुलगते पैरों के
निशान।
न जाने वो कौन थे, किस चाह में
जीवन को बनाया महाज्वाल -
स्तूप, और मुस्कुराते हुए
किया सर्वस्व दान।
काश, वो महा -
मानव
फिर लौट आएं, और सिखाएं हमें -
स्वाधीनता का सत्य अभिप्राय,
पुनः एक बार मानवता का
रचे हम, वास्तविक -
संविधान।

* *
- शांतनु सान्याल


 

07 सितंबर, 2018

किसी और दिन - -

कोई नहीं रुकता किसी के लिए,
ये ज़िन्दगी का सफ़र है कोई
ख़ूबसूरत ख़्वाब नहीं।
तहत तबादिल
से है तमाम
कारोबार
ए जहाँ, यहाँ कोई भी किसी -
का अहबाब नहीं। तुम्हारी
वाबस्तगी बेशक है
बहुत ही दिलकश
लेकिन तहे
दिल में
है क्या, मुझे इसका ज़रा भी -
अंदाज़ नहीं। चलो मान
भी लें कि हैं बहोत
गहरी तुम्हारी
निगाहें,
किसी और दिन डूब के देखेंगे
ज़रूर, लेकिन आज नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 





04 सितंबर, 2018

इक मुश्त रौशनी - -

अहाते की धूप को यूँ ही
चुपके से आने दो,इक
मुश्त रौशनी है
काफ़ी दिल
ए नाशाद
के लिए,
किस
किस का रोना रोएं जिसे
जाना है उसे जाने दो।
हमें अपने बेरंग
दर ओ दीवार
से कोई
शिकायत नहीं, काग़ज़ी
फूलों को देख ग़र
कोई बहके तो
बहक जाने
दो।
ये आईना है बहोत ही - -
बेमुरव्वत, कोई
समझौता नहीं
करता,उनकी
मर्ज़ी,
नाज़ुक शीशमहल बारहा
चाहे सजाने दो। ताश
के घर ही तो  हैं
सभी, कोई
बादशाह
हो या
फ़क़ीर, ढहना तो है मुक़र्रर
 इक दिन, चाहे घर
जितना ऊंचा
बनाने दो।

* *
- शांतनु सान्याल


 

03 सितंबर, 2018

आलोक प्रवाह - -

एक तृषित मैं ही नहीं इस जग में,
हर एक चेहरे में है बसा कहीं
न कहीं एक मृग मरीचिका,
एक यायावर सिर्फ़ नहीं
मेरा मन, हर एक
मोड़ पर है
कोई न
कोई अनबूझ प्रहेलिका। उतार -
चढ़ाव की अपनी ही है एक
अलग अनुभूति, जीवन -
पथ कभी सरल रेखा
और कभी लगे
अपरिभाषित
तालिका।
कुछ फूल तुम्हारे नाम किए अर्पण,
कुछ गंध रहे जीवित मम हृदय
अभ्यंतरण, देह - प्राण
सब तुम्हारे नाम
फिर भी तुम
हो चिर -
अनामिका, अनंत प्रवाह में बहती -
हों जैसे असंख्य दीप मलिका।

* *
- शांतनु सान्याल

मुहाने के यात्री - -

जनशून्य तटभूमि, या अनावृत वक्षस्थल,
लहरों का आघात निरंतर, कुछ
बुझते जलते अदृश्य आग्नेय -
कण, कभी तुम्हारे मध्य
कभी मेरे अंदर।
जीवन के
रूप
या मुहाने पर समर्पित जलधार, कहीं
उभरते जुगनुओं के बहते द्वीप,
कहीं टूटते रिश्तों के कगार।
निशि पुष्प की तरह
कभी महकते
अनुरागी
पल,
और कभी नीरवता फैलाए अपना - -
अंचल।  फिर भी जीवन नदी बहे
निःशब्द अविरत,सांसों में
बांधे विस्तृत समुद्र -
सैकत।

* *
- शांतनु सान्याल

23 अगस्त, 2018

मुक्ति स्नान - -

सभी रंग थे फीके, सभी अक्स अधूरे,
उस छुअन में था न जाने कैसा
जादू, इक बार जो तन से
लगा, उम्र भर न मन
से छूटे। बग़ैर
लब  छुए
वो
हलक़ के पार हुआ, हाँ जान बूझ कर
ही मैंने विषपान किया। अब सभी
जीवन मरण के पैमाने लगे
बहोत हलके, निगाहों
में दूर तक सिर्फ़
उसी का
नूर है
झलके, मैंने अपने आप ही सभी दुःख -
दर्द का अवसान किया। न जाने
किसने कहा था कि मोक्ष
मिलता है नदियों के
किनारे, मैंने
अपने
भीतर जा कर बारहा मुक्ति स्नान किया।

* *
- शांतनु सान्याल

22 अगस्त, 2018

उम्र भर - -

कुछ एहसास होते हैं सोंधी ख़ुश्बू
की तरह मिटते नहीं उम्र भर,
अगरचे बारिश आती
जाती रही मौसमी
हवाओं के
साथ
 अक्सर, कुछ मोह सूत  होते हैं
अमरबेल की तरह, सिमटते
नहीं उम्र भर। कौन सा
अहद था जो दिल
से उतर कर
रूह तक
दख़ल
कर गया, इस मोम के दहन हैं - -
अनंत, ये हर हाल में पिघलते
नहीं उम्र भर। पिंजरे
की नियति में है
शून्यता,चाहे
मायावी
तंतु से कसो जितना, सीने के कुछ
अदृश्य अनल हैं चिरकालीन,
सुलगते नहीं उम्र भर।
इस जीवन
उत्सव
का,
अपना ही है अलग आलोकमय - - -
शामियाना, उभरते टूटते
तारों की रौशनी ग़र
खो जाएं तो
मिलते
नहीं
उम्र भर।

* *
- शांतनु सान्याल 




 

05 अगस्त, 2018

जाने कौन है वो - -

एक दिन अचानक गुलाब की -
तरह खिले बिहान ! हर
चेहरे पर हो ताज़गी
और जीने का
इत्मीनान।
एक
सुबह हो यूँ दुआओं वाली शबनम
से तरबतर, आईना छुपा ले
अपने सीने में झुर्रियों के
निशान। कौतूहल
मेरा फिर ढूंढ
लाए वो
 गुमशुदा लड़कपन, दरवाज़ा
खोलते ही नज़र आए
सपनों की दूकान।
दौड़ा ले जाए
मुझे,
फिर किसी फेरीवाले की पुकार,
ख़रीद लाऊँ कोई मीठा
अहसास,छोटे
मोटे सामान।
मीठी
झिड़कियां सुने हुए यूँ तो एक
उम्र गुज़र गई, वही मासूम
नादानियाँ फिर सर पे
उठाए आसमान।
इतनी भी
दूरी
ठीक नहीं ये सच है कि मशीन
 हैं सभी, किसी बहाने ही
सही ग़लत नहीं
रखनी जान
पहचान।
अगरचे वक़्त की बेरहमी ने - -
मुझे कहीं का न छोड़ा,
न जाने कौन है
जो अक्सर
मुश्किल
कर
जाए आसान।
* *
- शांतनु सान्याल 

04 अगस्त, 2018

मेरे घर का पता - -

लज्जित था दर्पण जब -
मुखौटे उतरने लगे,
उस महासभा
में थे
सभी मस्तक झुके हुए, -
घावों के निशान
जब देह से
यूँ उभरने
लगे।
दोहराते रहे मन्त्र, ''मातृ - -
रूपेण संस्थिता '' की,
नमस्तस्यै के
पूर्व, छद्म
पलस्तर उखड़ने लगे। - - -
रहस्य कूपों के जाल
 से हैं सभी आश्रय
स्थल, कहाँ
जाएं
लोग जब रक्षक ही निगलने
लगे। यूँ तो बात थी हर
एक चेहरे पे हंसी
लौटने की,
दांत
भी नहीं निकले और वो विष
उगलने लगे। तथाकथित
मानव तालिका में
नाम मेरा भी
हो, डर
सा
लगता है जब पड़ौसी बेवजह
घूरने लगे। मालूम है
अच्छी तरह
तुम्हारे
न आने की वजह, अब तो ख़ुद
हम भी अपने घर का पता
भूलने लगे।   

* *
- शांतनु सान्याल   
 

03 अगस्त, 2018

इस तरफ से - -

इस राजपथ से कभी,
पाँव बंधे ज़ंजीर
लिए गुज़रो
तो जाने,
हर
एक भीड़ में कहीं - - -
भटकती है
मेरी
ही
गुमशुदा परछाई, - - -
झुलसे हुए
चेहरों
की
ज़मीं पे, नंगे पाँव - -
कभी ठहरो तो
माने। न
जाने
कौन है जो अभिशाप
दे गया मेरे पुरसुकूं 
शहर को, कभी
इन वीरान
बस्तियों
के दरमियान हो के -
गुज़रो तो जाने।
एक मुद्दत
से आस
लगाए, लोग बैठे हैं -
खंडित घाट के
किनारे,
आसमानी कश्ती से,
अंधकारमय
गली
कूचों पे उतरो तो माने।

* *
- शांतनु सान्याल

27 जुलाई, 2018

विस्मृत संदूक - -

उभरते हैं यूँ कुछ अतीत के -
पृष्ठ दीर्घ निःश्वास से,
जीवन खोलता है
विस्मृत वृद्ध
संदूक
अपने आप से, सुप्त कहानियां,
डिंभक से कोष बने और
एक दिन पंख फैलाए
न जाने किस
ओर उड़
गए
मेरे पास से। गुल्लक मिट्टी का
था या शीशे का याद नहीं
मुझको, टूटा था वो
 बहुत पहले
किसी
शून्यता के अहसास से। ये - - 
अभिनंदन, फूलों के
सौगात कुछ
ग़ैर ज़रूरी
 से हैं,
यहीं कहीं था मैं, और वो सोचें
लौटा हूँ दीर्घ प्रवास से।

* *
- शांतनु सान्याल

09 जुलाई, 2018

उजाले का वहम - -

न बुझा यूँ चिराग़ ए अहसास
मेरा, कुछ उजाले का
वहम रहने दे, इस
शाहराह
से निकलते हैं न जाने कितने
धुंध भरे गली कूचे, कुछ
रौशनी के टुकड़े
अनजाने
ही सही, इस तरफ तो बहने दे।
 हाँ पहचानता हूँ अच्छी
तरह से मैं,  उन
नक़ाबपोशों
का फ़रेब,
जो भी हो अंजाम, उन अंधेरों
का दर्द खुल के आज मुझे
कहने दे। हर सिम्त
हैं ताजिर ए
ख़्वाब, हर तरफ है बिकने की
लाचारी, मेरे ज़ख़्म हैं नासूर,
लाइलाज, बहते हैं तो
यूँ ही इन्हें बहने
दे। जो अभी
अभी जलसा ए रहनुमा था
उसी ने ख़रीदा मुझे कई
बार, ज़ंजीर जड़े
पांवों का दर्द
ग़र मेरा
अपना है तो मुझे तनहा सहने दे।
न बुझा यूँ चिराग़ ए अहसास
मेरा, कुछ उजाले का
वहम रहने दे।

* *
- शांतनु सान्याल 



05 जुलाई, 2018

शाश्वत पथ - -

धूप - छाँव के उतरन पे, -
रफू करता ये जीवन,
साथ यवनिका
के जागृत
है रंगमंच अष्टप्रहर,मुखौटे
के दर्द में है छुपा, अट्टहास
प्रतिवेदन। नेपथ्य के
 रेशमी डोर,
नियति के हैं हाथ गढ़े, सुधार
कठिन है चाहे कर लो
जितना आवेदन।
सिद्धार्थ हो
या सुजाता कोई नहीं मोह - -
विहीन, एक ही है
शाश्वत पथ,
याचक
चले या महाजन।

* *
- शांतनु सान्याल


  

स्थिर बिंदु - -

जल भँवर हो जब तुम, मैं
एक पत्ता
टूटा
हुआ, अभी नदी का उतार 
है मुहाने की ओर
अविरल बहते
जाओ, शाम
ढले,
बेशक तुम्हें याद आएगा,
दूर किनारा छूटा हुआ।
निःसीम है मेरा
अधिकार,
तुम्हें
हर हाल में लौटा ले आएगा,
अपनी जगह है अचल
पाषाणी घाट, कहने
को यूँ ही रूठा
हुआ। 

* *
- शांतनु सान्याल


 

04 जुलाई, 2018

सृष्टि का सौंदर्य - -

बदस्तूर, सपनों का फेरीवाला, रात के आख़री
पहर, हमेशा की तरह, चाँदनी के फ़र्श पर,
खोलता है अपनी दुकान, और तुम्हारे
स्पर्श का तिलिस्म, धीरे - धीरे
देह को ले जाता है महाशून्य
की ओर, उन अंतरंग
क्षणों में कहीं -
जीवन
चाहता है अभ्यंतरीण मुक्ति, लेकिन कहाँ - -
इतना आसान है, मोहपाश से पूर्ण बाहर
निकलना, अभिलाषों के मायाजाल
में तब भटकते हैं श्वास तंतु !
फेरीवाला, गहराते रात
के साथ, और भी
क़रीब से 
आवाज़ देता है - - "अभी तो रात बहोत बाक़ी है,
अभी - अभी निशि पुष्पों ने खोला है गंध -
कोष, चाँदनी को और सुरभित होने
दो, जीवन के बंजर ज़मीन पर
कुछ बूँद शिशिर के गिरने
दो, सृष्टि का सौंदर्य
इसी में है, हर
हाल में
जीवन का नव अंकुरण होने दो, मुझे कुछ देर यूँ
ही शुभ्र प्रवाह में बहने दो।"

* *
- शांतनु सान्याल   

01 जुलाई, 2018

सर्वस्व - -

तुम एक दिन आए अनंत वृष्टि के साथ,
और बहा ले गए सब कुछ मेरा, ठीक
अप्रत्याशित मरू सैलाब की
तरह। अब कुछ है मेरे
अंदर, तो वो है इक
मृत नदी, रेत
और पत्थरों
से भरी,
दूर तक सूखे किनारों को अपने आलिंगन
में समेटे हुए, किसी अभिशापित टूटे
ख़्वाब की तरह। अदृश्य पंखों
की दुनिया बदल देती है
सब कुछ, यहाँ तक
की लोग भूला
देते हैं सभी
अंतरंग
चेहरे, हम खड़े रहते है अपनी जगह किसी
खोखले वृक्ष, बाओबाब की तरह। हाँ,
मैं आज भी चाहता हूँ अतीत  को
पुनः लौटा लाना, तुम्हारे
वही  अंतहीन वर्षा
वाली रात को
निःशब्द,
अपने
अंदर तक उतार लाना, सांसों के तटबंध - -
आज भी हैं तने हुए अपनी जगह,
किसी तामीर लाजवाब की
तरह।तुम एक दिन
आए अनंत
वृष्टि के
साथ, और बहा ले गए सब कुछ मेरा, ठीक
अप्रत्याशित मरू सैलाब की तरह।

* *
- शांतनु सान्याल



28 जून, 2018

अनजाना सुख - -

अपनी अपनी चाहत का है
अपना ही अलग पैमाना,
कोई सुख तो है ज़रूर,
मोती और सीप के
दरमियां,
उस बंद दरवाज़े का रहस्य,
चिरंतन हैं अनजाना।
मेघों का अस्तित्व,
नहीं मिटा
पाए वज्रों के हुंकार, बरसने
की ज़िद्द  में, दुश्वार था
उनका रुक जाना।
उस दिगंत
रेखा पर जा मिलते हैं - - - 
तिमिर -आलोक,
एक तीर
उठता
धुंआ, दूसरी ओर बेसुध है
ज़माना। पहेलियों का
शहर है, हर मोड़
से जुड़े मायावी
रस्ते, इस
मोह के
सफ़र से मुश्किल है दोस्त
लौट आना।
* *
- शांतनु सान्याल

25 जून, 2018

अंतराल - -

ज़िन्दगी में कहीं न कहीं, थोड़ा
बहुत अंतराल चाहिए,
नज़दीकियों के
अपने
अलग ही हैं कुछ नफ़ा नुक़सान,
फिर भी सर रखने के लिए
कोई कंधा हर हाल
चाहिए।
वजूद की असलियत कुछ और
थी, अक्स थे अर्थहीन,
जवाब हैं मुंतज़िर
लेकिन
कोई दमदार सवाल चाहिए। - -
उनकी बसीरत वो जाने,
हर चीज़ कहना
नहीं मुमकिन,
दुनिया
है फ़ानी तो रहे, दिल मगर - -
मालामाल चाहिए। चाँद
तारों को यूँ ही
आसमान
में रहने
दो अपनी जगह, दे सके रूह को
सुकूं ऐसा कोई ख़्वाब ओ
ख़्याल चाहिए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 

16 जून, 2018

लौटने की मजबूरी - -

वो मिले मुद्दतों बाद कुछ इस तरह
कि आईना जैसे अपने पास
बुलाए मुझे, मौसमों
की  है अपनी
अलग
मजबूरी, फिर भी लौटतीं बहारें - -
जाते - जाते, बरगलाए मुझे।
उम्र, यूँ तो बीत गई ठीक
करते हुए रिश्तों के
नाज़ुक -
समीकरणों को, नियति भी किसी - -
अनबूझ ज्यामिति से कुछ
कम नहीं, हर क़दम,
अदृश्य रेखाओं
में उलझाए
मुझे।
अनगिनत ज़ख्मों को लिए सीने में,
उठ तो आए उनकी महफ़िल से
हम, न जाने कौन सा क़र्ज़
अभी तलक है बाक़ी,
रह - रह कर यूँ
ज़िन्दगी
अपने पास बुलाए मुझे।

* *
- शांतनु सान्याल


09 जून, 2018

ऐनक के इस पार - -

दूर तक वही बियाबां, वही अंतहीन शून्यता,
प्रतिध्वनियों का इंतज़ार अब बेमानी है,
जो कभी था चिड़ियों के कलरव 
से आबाद, वो गूलर का पेड़
अब किताबों की कहानी
है। कंक्रीट के जंगल
में उड़ान पुल के
सिवा कुछ
भी नहीं,
सभी रिश्तों के जिल्द हैं ख़ूबसूरत, लेकिन -
अंदर से महज मुँह ज़ुबानी है। कोई नहीं
पढ़ता दिल की किताब, शायद
आजकल, सभी को वक़्त
न मिलने की, बहुत
परेशानी है।
ऐनक के
उस  पार दुनिया अपनी जगह झिलमिलाती
सी नज़र आए, ऐनक के इस पार सिर्फ़
पानी ही पानी है।

* *
- शांतनु सान्याल  




 

30 मई, 2018

निःशब्द समझौता - -

काग़ज़ के फूलों की तरह कुछ आवेग
अपने आप झर जाते हैं, रह जाती
हैं अगर कुछ तो, वो है काँटों
के नोंक पर ठहरी हुई
एक बूँद की तरह
चाहत की
नमी,
कुछ नज़दीकियाँ मौन रह कर मुँह - 
चिढ़ाती हैं और धूसर स्मृति को
बेवजह साफ़ करती हैं, अब
कौन इन्हें समझाए कि
अलबम बदलने से
तस्वीर रंगीन
नहीं होते,
बस
एक मीठी टीस दे जाते हैं। तुम और
मैं आज भी उतने ही क़रीब हैं
जितने कि कभी हुआ
करते थे, पहले
शायद हम
एक
दूसरे की ज़रूरत थे या मजबूरियों के
तहत कोई मैत्री पुल, जो भी हो
उन्ही स्तम्भों के सहारे
हमने जीवन की
लम्बी यात्रा
की, और
आज
हमारे बीच छुपने छुपाने की कोई भी
वजह न रही, अब बिन संवाद ही
हम बन गए हैं पारदर्शी,
शायद यही है रूह से
रूह तक का एकल
रास्ता, जहाँ
से लौटना
नहीं
मुमकिन, अंतहीन सहयात्रा या कोई
सह मुक्ति अभियान का सूत्रपात,
जो भी हो अब हम बढ़  चले
हैं सुदूर धुंधभरी लेकिन
ख़ूबसूरत वादियों
की ओर - -

* *
- शांतनु सान्याल 

  

24 मई, 2018

कोई रहगुज़र नहीं - -

तलाश ए सुकूं थी उम्र से
कहीं ज़ियादा तवील,
तीर सीने के पार
कब हुआ
कुछ
भी ख़बर नहीं। दर्द ओ
मुस्कान के बीच थी
इक छुअन नादीद,
फ़रमान ए
हाक़िम
का
हम पे अब कोई असर
नहीं। खुले दिल
मिलें जहाँ
राजा

रंक दोस्तों की तरह, ये
जगह यूँ तो है बेहद
हसीं लेकिन मेरा
शहर नहीं।
तूफ़ान
 की
 है अपनी अलग ही
मजबूरियां शाम
से,रहने दें
अभी
तो है आधी रात आख़री
पहर नहीं। अब तुम
भी चाहो तो
आज़मा
लो 
ईमान हमारा, हर सिम्त
है धुंध और दूर तक
कोई रहगुज़र
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल



 

08 मई, 2018

अनुबंध के तहत - -

हम जहाँ से चले थे वहां कोई सायादार -
दरख़्त न था, लिहाज़ा हमने मौसम
से निःशर्त अनुबंध कर लिया,
पतझर हो या मधुऋतु
अनुभूति का रहस्य
अपनी जगह,
हमने
अपनी साँसों में सदाबहार सुगंध भर लिया।
हमें मालूम है तपते राहों पर, नंगे पाँव
चलने का दर्द, अतः जीवन के
सभी धूसर कैनवासों को,
अपनी तरह से हमने
जलरंग कर
 लिया।
तुम्हारे दहलीज़ में शायद आज भी उतरते
हैं वही धूप - छाँव के स्वरलिपि, हालांकि
हमने अपनी भावनाओं को बहोत
पहले से ही बेरंग कर लिया।
वो ख़त जो तुम तक न
पहुँच पाए कभी,
दिल के
सन्दूक में हमने उन्हें तह करके रख दिया,
उम्र की सिलवटों को रोकना नहीं
आसान इसलिए मुस्कुराहटों
से हमने सभी कमज़ोर
तटबंध भर लिया।
अपनी साँसों
में सदाबहार सुगंध भर लिया। - - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल






02 मई, 2018

स्वप्न मंजरी - -

उन गहन अवशोषित क्षणों में तुम हो
कोअनाम गंध कोष, बिखरने को
चिर व्याकुल, उन उन्मुक्त पलों
में जीवन जैसे पुनर्जन्म को
हो आकुल। दिवा -
निशि के सेतु
पर झूले
सारी सृष्टि, कहीं बहे अविराम  मरू -
समीरण, कहीं झरे अंतहीन वृष्टि।
कुछ स्वप्न मंजरी मेरी आँखों
के, जाएँ तुम्हारे पलकों
के तीर, रात ढले ले
आएँ कुछ राहत
के नीर।

* *
- शांतनु सान्याल


01 मई, 2018

जीवन स्रोत - -

न जाने कौन कहाँ उतरे सभी तो हैं
एक ही कश्ती के मुसाफ़िर,
किसी घाट पर दीपमाला
बहे संग जलधार,
और किसी
तट पर
जा लगे सपनों का चन्द्रहार, कहीं से
निकले संकरी पगडण्डी और
पहुंचे किसी मीनाबाज़ार,
कहीं जीवन मूल्यों में
अपर्ण और कहीं
मूल्यों का
व्यापार,
न जाने कौन कहाँ से आ मिले इस -
पथ के मिलन बिंदु अनेक, कुछ
चाहें मिलना लहरों की तरह
निःशर्त, कुछ मिल कर
गुपचुप कर जाएँ
अंदरख़ाने
गर्त,
फिर भी जीवन स्रोत बहे अनवरत।
* *
- शांतनु सान्याल







26 अप्रैल, 2018

खेद विहीन - -

ये उम्र की ढलान कुछ और नहीं, प्रेमचंद की
'बूढ़ी काकी' ही तो है, शायद तुमने पढ़ी
हो अगर नहीं तो पढ़ लेना, यहीं
आसपास किसी नुक्कड़ -
गली के एक कोने
में अपना पता
तलाशती
हुई
एक परिचित चेहरा, हम में से कोई एक ही तो
है। असंख्य दस्तक, दरवाज़ों की अपनी
अलग बेरूख़ी, घिरते अंधकार में
ख़ुद ब ख़ुद ख़्वाहिशों का
आत्मदाह, बहुत
मुश्किल है
अब
तुम्हारे वरीयता सूची में ख़ुद को शामिल करना,
अतएव बेहतर इसी में है कि क्यों न ख़ुद
को करें कपूर की तरह विलीनता
की ओर अग्रसर, अंतहीन
दुआओं के साथ। 
तरलता की
नियति
है
बहना ऊंचाई से ढलान की ओर यथारीति - - -
खेद विहीन।
* *
- शांतनु सान्याल


24 अप्रैल, 2018

ख़ुश्बू की तरह - -

मैं आज भी हूँ मौजूद उसी मुहाने पर
जहाँ उफनती नदी मिलती है
सागर के बेचैन लहरों से,
मैं आज भी हूँ मौजूद
तुम्हारे नरम
हथेलियों
में
बंद जुगनू की तरह, मैं आज भी हूँ - -
मौजूद तुम्हारे अंदर नींबू फूलों
की मादक  महक लिए
हमेशा की तरह
बेपरवाह,
कुछ
बेतरतीब और बिखरा बिखरा सा, मैं
आज भी हूँ तुम्हारे सीने में कहीं,
परदे के ओट से झांकता
हुआ मासूम बच्चे की
मुस्कराहट की
तरह, कुछ
छुपा -
छुपा सा, कुछ आत्म प्रकाशक सा, जिसे
हो एक मुश्त तवज्जो की आरज़ू, मैं
आज भी हूँ मौजूद तुम्हारे आस
पास ये और बात है कि
तुम मुझे तलाशते
हो आईने के
फ्रेम में
कहीं,
जिसे उम्र के जंग ने न जाने कब से - -
धूसर कर दिया है।


* *
- शांतनु सान्याल






 

23 अप्रैल, 2018

कोई फ़र्क़ नहीं - -

कहाँ मिलती है मनचाही मुराद, कुछ न कुछ
उन्नीस बीस रह ही जाती है तामीर ए -
ख़्वाब में। जाना तो है हर एक
मुसाफ़िर को उसी जानी
पहचानी राह के बा -
सिम्त, जहाँ कोई
फ़र्क़ नहीं
होता
दुश्मन ओ अहबाब में। उसने बहुत कोशिशें -
की, लेकिन आईना साफ़ साफ़ मुकर
गया, सारी उम्र का निचोड़ था
उसके प्रतिबिंबित जवाब
में। शबनम को तो है
छलकना  हर
हाल में,
उसे ज़रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ता कांटें और गुलाब
में।
* *
- शांतनु सान्याल


21 अप्रैल, 2018

न धुआं न राख़ अब हैं बाक़ी, फिर भी न जाने
अब तलक क्यूँ दिल है, कि सुलगता है रह
रह कर, वो आज भी है शामिल मेरी
साँसो से गुज़र कर, रूह तक
उतर कर। 

- शांतनु सान्याल

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