Tuesday, 24 April 2018

ख़ुश्बू की तरह - -

मैं आज भी हूँ मौजूद उसी मुहाने पर
जहाँ उफनती नदी मिलती है
सागर के बेचैन लहरों से,
मैं आज भी हूँ मौजूद
तुम्हारे नरम
हथेलियों
में
बंद जुगनू की तरह, मैं आज भी हूँ - -
मौजूद तुम्हारे अंदर नींबू फूलों
की मादक  महक लिए
हमेशा की तरह
बेपरवाह,
कुछ
बेतरतीब और बिखरा बिखरा सा, मैं
आज भी हूँ तुम्हारे सीने में कहीं,
परदे के ओट से झांकता
हुआ मासूम बच्चे की
मुस्कराहट की
तरह, कुछ
छुपा -
छुपा सा, कुछ आत्म प्रकाशक सा, जिसे
हो एक मुश्त तवज्जो की आरज़ू, मैं
आज भी हूँ मौजूद तुम्हारे आस
पास ये और बात है कि
तुम मुझे तलाशते
हो आईने के
फ्रेम में
कहीं,
जिसे उम्र के जंग ने न जाने कब से - -
धूसर कर दिया है।


* *
- शांतनु सान्याल