Thursday, 26 April 2018

खेद विहीन - -

ये उम्र की ढलान कुछ और नहीं, प्रेमचंद की
'बूढ़ी काकी' ही तो है, शायद तुमने पढ़ी
हो अगर नहीं तो पढ़ लेना, यहीं
आसपास किसी नुक्कड़ -
गली के एक कोने
में अपना पता
तलाशती
हुई
एक परिचित चेहरा, हम में से कोई एक ही तो
है। असंख्य दस्तक, दरवाज़ों की अपनी
अलग बेरूख़ी, घिरते अंधकार में
ख़ुद ब ख़ुद ख़्वाहिशों का
आत्मदाह, बहुत
मुश्किल है
अब
तुम्हारे वरीयता सूची में ख़ुद को शामिल करना,
अतएव बेहतर इसी में है कि क्यों न ख़ुद
को करें कपूर की तरह विलीनता
की ओर अग्रसर, अंतहीन
दुआओं के साथ। 
तरलता की
नियति
है
बहना ऊंचाई से ढलान की ओर यथारीति - - -
खेद विहीन।
* *
- शांतनु सान्याल


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