Monday, 9 July 2018

उजाले का वहम - -

न बुझा यूँ चिराग़ ए अहसास
मेरा, कुछ उजाले का
वहम रहने दे, इस
शाहराह
से निकलते हैं न जाने कितने
धुंध भरे गली कूचे, कुछ
रौशनी के टुकड़े
अनजाने
ही सही, इस तरफ तो बहने दे।
 हाँ पहचानता हूँ अच्छी
तरह से मैं,  उन
नक़ाबपोशों
का फ़रेब,
जो भी हो अंजाम, उन अंधेरों
का दर्द खुल के आज मुझे
कहने दे। हर सिम्त
हैं ताजिर ए
ख़्वाब, हर तरफ है बिकने की
लाचारी, मेरे ज़ख़्म हैं नासूर,
लाइलाज, बहते हैं तो
यूँ ही इन्हें बहने
दे। जो अभी
अभी जलसा ए रहनुमा था
उसी ने ख़रीदा मुझे कई
बार, ज़ंजीर जड़े
पांवों का दर्द
ग़र मेरा
अपना है तो मुझे तनहा सहने दे।
न बुझा यूँ चिराग़ ए अहसास
मेरा, कुछ उजाले का
वहम रहने दे।

* *
- शांतनु सान्याल 



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