30 अक्टूबर, 2013

हो सके तो करना इंतज़ार - -

उभरने दे मुझे बेक़रार लहरों से ज़रा,
ग़र हो सके तो करना इंतज़ार
साहिल ए शिकस्ता पे
मेरा, है मुझे
ऐतबार
तेरे इश्क़ हक़ीक़ी पे इस क़दर, तुझे
पाने की हसरत में मौज ए
दरिया तो क्या, हर
क़यामत से
गुज़र
जाऊं मैं, रस्म ज़माना, ईमान ओ -
अक़ीदत रहे अपनी जगह,
इक तेरी नज़र की
बात है फिर
किसे
चाहिए पोशीदा आसमानी खुशियां !
* *
- शांतनु सान्याल

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29 अक्टूबर, 2013

बहोत मुश्किल है - -

तुम जाओ कहीं भी, आसां नहीं रिहाई ए -
वाबस्तगी, लौट आओगे दिल के 
क़रीब इक दिन, बहोत 
मुश्किल है दोबारा 
कहीं दिल 
लगाना, ये वो हक़ीक़त है जो जां से गुज़र 
जाए, अहसास नाज़ुक लेकिन, जो 
दिलकी परतों पे दे जाए 
अंतहीन निशां ! 
बहोत 
मुश्किल होगी ज़ख़्मी जिगर छुपाना, वो 
जो हमारे दरमियां थी मसावात ए 
ज़िन्दगी, सांस टूट जाए 
मगर उसका टूटना 
है नामुमकिन,
नहीं -
आसां ये हमनफ़स, नाबूद चमन को फिर 
बसाना, बहोत मुश्किल है दोबारा 
कहीं दिल लगाना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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23 अक्टूबर, 2013

अहसास पहले - -

न दिखाओ मुझे गुल ए ख़्वाब कोई, 
जिसके मुरझाने का इमकां रहे 
तारी रात भर, इतना भी 
अपनापन ठीक 
नहीं कि 
आँख खुलते बिखर जाए आसमां -
की जामियत, क़तरा क़तरा 
नज़र आए मासूम 
वजूद मेरा,
और तुम मुस्कुराओ उफ़क़ पार यूँ 
गोया हो चला हो वक़्त से पहले
रंग तलुअ फ़ज़र कोई !
कुछ तो वक़्त 
दो मुझे,
कि तुम्हें अहसास करने से पहले - -
साँसों को संभलना आ जाए !
* * 
- शांतनु सान्याल  


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21 अक्टूबर, 2013

मुखालिफ़ ज़हर - -

वो तमाम शिकायतें जो कभी तुमको -
हमसे थीं, क्यूँ न फिर दोहरा 
जाओ, तुम्हें हमसे अब 
कोई दिलबस्तगी 
नहीं, इस 
बात का यक़ीन फ़िर इक बार तो दिला 
जाओ, तुम्हें फ़ुरसत मिले न मिले, 
हम तो हैं मुन्तज़िर उम्र 
भर के लिए, फिर 
भी रस्मियत 
ही सही,
किसी इक पल के लिए, राह निजात -
तो दिखा जाओ, हमें तलाश नहीं 
दरवाज़ा ए बहिश्त की,
ग़र हो सके तो 
अपने 
हाथों जो चाहे पिला जाओ, हम हो चुके 
है मुखालिफ़ ज़हर, इक ज़माने से !
* * 
- शांतनु सान्याल 

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20 अक्टूबर, 2013

जिस्म ओ रूह चाहे राहत ज़रा - -

मालूम है मुझको शीशे की मजबूरी 
फिर भी दिल चाहे ख़्वाबों से 
खेलना, न छीनो मुझसे -
ये खिलौना, बहोत 
मुख़्तसर है - 
रात की ज़िन्दगानी, न दोहराओ -- -
वही रंज ओ ग़म की बातें, 
नई पुरानी दर्द भरी 
अलहदगी, 
जंग आलूद धुंधली मुलाक़ातें, अब -
इन बातों से ऊबती है ज़िंदगी,
कुछ नयापन चाहे दिल 
मेरा, जिसमें हो 
इक मुश्त 
ताज़गी, इक अहसास ए ख़ुशबू -- -
जो कर जाए तिलिस्म गहरा, 
कि जिस्म ओ रूह 
चाहे राहत 
ज़रा - -
* * 
- शांतनु सान्याल 
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18 अक्टूबर, 2013

शाश्वत प्रकाश - -

वो लुप्त है अंतर्मन में कहीं और नयन -
खोजें उसे धुंध भरी राहों में, एक 
मृगजल है; मेरी अंतहीन 
अभिलाषा, सब कुछ 
है आसपास 
लेकिन 
ह्रदय ढूंढ़े उसे धूमिल अरण्य के बीच, न 
अदृश्य, न ही उजागर वो है हर 
सांस के लेखाचित्र में 
निहित, केवल 
चाहिए 
स्व प्रतिबिम्ब का गहन अवलोकन, वो 
चेतना जो पढ़ पाए व्यथित मन 
की भाषा, जो हो घुलनशील 
हर चेहरे के ख़ुशी 
और दुःख
में डूब कर, जीवन चाहे वो शाश्वत - - 
सत्य का प्रकाश, जो दे जाए 
चिरस्थायी दीप्ति, 
अंतर तमस 
पाए - 
अनंतकालीन मुक्ति, जन्म जन्मान्तर 
से परिपूर्ण मोक्ष प्राप्ति - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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13 अक्टूबर, 2013

चश्म अंदाज़ तुम्हारा - -

तुम्हारे दिल की गहराइयों का मुझे 
पता नहीं लेकिन ये सच कि 
तुम्हारी आँखों से 
छलकती 
है बाज़्ताबी अज़ ज़िन्दगी, और -
यही वो वजह है, जो मुझे 
उभारती है बहरान 
ए लहर से,
वक़्त मेहरबां रहे न रहे, चाहे रस्मे 
दुनिया भी जाए बदल, चश्म 
अंदाज़ तुम्हारा है इक 
संगे किनारा,
हर हाल में मेरा वजूद जी उठता है 
अनजाने क़हर से, 
* * 
- शांतनु सान्याल 

बाज़्ताबी अज़ ज़िन्दगी - जीवन का 
प्रतिबिम्ब 
बहरान ए लहर - तूफ़ानी लहर 
चश्म  अंदाज़- दृष्टिकोण 

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12 अक्टूबर, 2013

राहत ए गुलिस्तां - -

बज़्म में है तेरी क्यूँ ख़ामोशी दूर तलक,
हम तो आए थे बड़ी उम्मीद लिए,
कि ज़िन्दगी से हो जाए खुल 
के मुलाक़ात, ये क्या 
हर चेहरा लगे 
गुमसुम,
हर लब पे गोया पाबंदी आयद, ये कैसी 
है तेरी महफ़िल, उभरते तो हैं रह 
रह कर इन्क़लाब ए अरमां, 
लेकिन बदोन सदा,
ये कौन सी 
ज़मीं है, 
ये कैसा है आसमां, लौटती नहीं जहाँ से 
गूँज, तब्दील ए जहां बन कर !
बरसती नहीं क्यूँ तेरी 
निगाह करम,
हर रूह 
पे राहत ए गुलिस्तां बन कर - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

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11 अक्टूबर, 2013

बहोत नज़दीकी ठीक नहीं - -

बहोत नज़दीकी ठीक नहीं, बेहतर हो, इक
पोशीदा दूरी हो दरमियां अपने,
बिखरना हो, जब कभी
तो यूँ बिखरें कि
किसी को
भी
दर्द महसूस न हो, न मांग मुझसे ख़्वाबों -
की ज़मीं, इक वही है मेरी अपनी
मिल्कियत ए हयात, वर्ना
शिफ़र हथेलियों में
आड़ी तिरछी
लकीरों
के सिवा, कुछ भी नहीं, न देख मुझे बारहा
यूँ उम्मीद भरी नज़र से, कि मैं हूँ
इक बहता हुआ दरिया ए
घुम्मकड़, न जाने
किस ओर
बह
जाऊँगा, बेहतर है लौट जाओ किनारे से -
चुपचाप, ग़ैर मुन्तज़िर तूफ़ान
घिरने से पहले - -
* *
- शांतनु सान्याल



09 अक्टूबर, 2013

मुकम्मल फ़िदाकारी !

न रख कोई उम्मीद मुझसे ये ज़माना 
कि इश्क़ में, मैंने पा लिया है 
चाहत से कहीं ज़्यादा,
अब दिल में 
कोई 
ख़्वाहिश बाक़ी नहीं, तखैल से परे है,
वो अहसास ए इत्मीनान, अब 
क्या ज़हर, या नोश अमृत,
हर चीज़ है बेअसर,
मैं तमाम उन 
ख़ुमारी 
से निकल बहोत दूर जा चुका हूँ, जहाँ 
रूहें मिलती हैं इक दूसरे से यूँ 
गोया कोई अज़ीम दरिया 
समा जाए ख़ामोश 
समंदर के 
सीने 
में, अंतहीन गहराइयों की जानिब - - 
न कोई पता, न ही कोई नाम 
ओ निशां, मुकम्मल
फ़िदाकारी !
* * 
- शांतनु सान्याल   

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08 अक्टूबर, 2013

न वो ज़ाहिर, न ही ग़ायब - -

ख़ानाबदोश - -

न जाने कौन, जो देता है दस्तक अँधेरा -
घिरते, शाम ढलते इक चिराग़
जैसे जला जाता है, दिल
की वीरान बस्ती
में, बारहा
लौट आती है मेरी रूह, तर्ज़ बाज़गश्त !
पुरअसरार वादियों का बदन
छू कर, न जाने क्या
है छुपा, उन
आँखों
की गहराइयों में, महकते हैं जज़्बात रात
गहराते, उठते हैं दिल की धड़कनों में
रह रह कर ख़ुशबुओं के, ठहरे
हुए तूफ़ान अनगिनत !
फ़िर ख़्वाबों में
भटकती
है ज़िन्दगी हमराह कहकशाँ, बहोत दूर
तलक, जहाँ मिलती है नदी की
मानिंद, ये गरेज़ान शब !
सीने में दबाए राज़
गहरे, सुबह के
समंदरी
आग़ोश में, लबरेज़ कोई रूह ख़ानाबदोश
की मानिंद - -
* *
- शांतनु सान्याल  


07 अक्टूबर, 2013

सर्व व्याप्त सत्ता - -

न पृथ्वी, न अन्तरिक्ष, न महासागर,
उसका अस्तित्व है, अंतरतम 
की गहराइयों में कहीं, 
सभी तर्क जहाँ 
हो जाएँ 
मिथक, सभी दर्शन जहाँ हों निर्वाक,
उसी निःशब्द, अदृश्य सत्ता 
का प्रतिबिम्ब झलकता 
है, सजल नयन की 
गहराइयों में, 
कहीं, न
लिपि, न कोई वर्णमाला, न ही कोई -
भाषाई कलह, वो अनुभूति है 
दिव्य, जो समझ पाए 
दूसरों की व्यथा,
और वहीँ 
रहती है वो अगोचर शक्ति, रूप - रंग 
रहित लेकिन सर्व व्याप्त सत्ता,
हर सांस, हर एक स्पंदन 
में है वो सम्मिलित।
* * 
- शांतनु सान्याल 
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evening beauty - - 

04 अक्टूबर, 2013

दोबारा मिलने का अरमान - -

न जाने फिर किस मक़ाम पे हो -
मुलाक़ात, कुछ मुस्कान
अपने साथ तो लेते
जाइए, मिलें
न मिलें
दोबारा, ये तो अख़तियार ए - - -
तक़दीर की है बात, फिर
भी, दोबारा मिलने
का अरमान,
अपने
दिल में लेते जाइए, कहने को ये -
दुनिया है बहोत ही उलझी हुई,
फिर भी इक मुश्त
आसमान,
मेरे हिस्से का अपने साथ तो लेते
जाइए - -
* *
- शांतनु सान्याल


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feelings

02 अक्टूबर, 2013

ज़िन्दगी का सफ़र - -

हर एक लम्हा अपनी जगह रखता है 
अहमियत, इक ख़्वाब ही तो 
है टूटा, निगाहों में 
उम्मीद तो 
बाक़ी 
है, बिखरे हैं जाम के टुकड़े फ़र्श पर -
बेतरतीब, तो क्या, मेरे पहलू 
में वजूद ए साक़ी है, न 
देख यूँ  मुड़ मुड़ 
के दर ए 
आसमां से, उजालों के लिए ज़मीर -
मेरा काफ़ी है, तेरा जाना 
बेशक है इक कमी, 
लेकिन, अभी 
तलक 
वादियों में बहार आना बाक़ी है, कैसे 
कहूँ ख़ुदा हाफ़िज़, ज़िन्दगी 
का सफ़र अभी तो 
बहोत बाक़ी 
है - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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blooming feeling.jpg


29 सितंबर, 2013

दिल से हमने भुला दिया - -

ज़रा सी धूप की ख़्वाहिश थी मेरी, उसने -
तो वजूद ही झुलसा दिया, न जाने 
उसकी नज़र में मुहोब्बत के 
मानी क्या थे, जिस्म 
तो है नापायदार 
इक महल,
उसने 
तो रूह तक हिला दिया, अब कोई न पूछे 
अफ़साना ए ज़िन्दगी मेरी, हमने 
अपने ही हाथों, वो तमाम 
उभरते ख़्वाबों को 
जला दिया,
न देख 
फिर मुझे हसरत भरी नज़र से यूँ, जा -
तुझे दिल से हमने भुला दिया - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 


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painting by artist Marina Petro 2

28 सितंबर, 2013

आग़ाज़ सफ़र - -

कुछ यादें जो चुभती हैं कांटों की तरह,
उन्हें वक़्त रहते निकाल फेंकना 
है बेहतर, नासूर न हो जाए 
कहीं दर्द ए जिगर
मेरा, वो 
राह 
जो ख़ुद में ही हो उलझा हुआ, रात - - 
गहराने से पहले उसे भूलना है 
बेहतर, हर क़दम पे 
ज़िन्दगी लेती 
है इम्तहां,
और 
दे जाती है हर बार सबक़ नया, गिरह 
जो न खुल पाए वक़्त रहते उसे 
तोड़ना है बेहतर, न तू ही 
है कोई सिकंदर, न 
ही मेरी मंज़िल 
आख़िर,
यहीं से है मेरा आग़ाज़ सफ़र, अब जो 
भी हो आगे, देखा जाएगा - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
 आग़ाज़ सफ़र - यात्रा की शुरुआत 


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painting by artist Jacqueline Gnott 1

26 सितंबर, 2013

ख़्वाबों के परिंदे - -

किस तरह समझाएं उन्हें, हँसने की चाह 
में, आंसुओं ने अक्सर अपना 
वादा तोड़ दिया, हमने 
समझाया लाख 
मगर 
ज़िन्दगी ने हर क़दम पे ग़मों से नाता - -
जोड़ दिया, तुम्हारी ख़्वाहिशों की 
सतह थी, शायद आसमां 
से कहीं ऊपर, कुछ 
दूर तक तो 
उड़े 
मेरे ख़्वाबों के परिंदे, थक हार के आख़िर 
हमने भी, मजरूह ए वजूद का रूख़ 
मोड़ दिया, ये कम तो नहीं 
कि तुम्हारी निगाहों 
में अब  तलक 
हैं रौशन 
मेरी 
मुहोब्बत के चिराग़, इसलिए आजकल 
हमने अंधेरों से डरना छोड़ दिया,
किस तरह समझाएं उन्हें,
हँसने की चाह में, 
आंसुओं ने 
अक्सर 
अपना वादा तोड़ दिया - - - - - - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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oil painting candle light flower by nora macphail

25 सितंबर, 2013

आँखों के तह में - -

इन आँखों के तह में छुपे हैं कितने बरसात 
शायद तुम्हें ख़बर नहीं, तुम कभी 
पल भर के लिए, मेरी नज़र 
से सुलगता जहां 
तो देखो,  
इस दिल की नाज़ुक धड़कनों में हैं न जाने 
कितने ही टूटे शीशमहल, शायद 
तुम्हें ख़बर नहीं, तुम किसी 
दिन के लिए, मेरे 
जज़्बात का 
का यूँ 
पिघलता आसमां तो देखो, तुम्हारी अपनी
दुनिया है ख़ुशबुओं से लबरेज़, कभी 
वक़्त ग़र मिले, मेरे दर्द का 
दूर तक बिखरता
कारवाँ तो 
देखो,
मेरी नज़र से सुलगता जहां तो देखो - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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warning fires - - unknown art

16 सितंबर, 2013

मृगतृष्णा या कुछ और - -


ये कैसी अनुभूति है जो खींचे जाए अनजानी
राहों पर, न ज़मीं का अपनापन, न ही
फ़लक की उदारता, बढ़े जा रहे
हैं क़दम न जाने किन
मंज़िलों की ओर,
ये कैसा
सूनापन है ज़िन्दगी में, सजी हुई हैं ख़्वाबों
की दुनिया, फिर भी आँखों में है क्यों
अधूरापन, न तुम्हारे वादों
का ऐतबार, न अपनी
तस्मीम पर है
भरोसा,
दूर तक हद ए निगाह बरस रहे है बादल -
फिर भी दिल की ज़मीं है गिरफ़्त
ए बियाबां, न कोई क़रीब,
न ही कोई दूर, इक
ख़ामोशी है
जो कहना चाहती है बहोत कुछ, लेकिन - -  
अफ़सोस, सुनने वाला मेरे हम -
क़दम कोई नहीं - -
* *
- शांतनु सान्याल


15 सितंबर, 2013

अंदरूनी कोहरा - -

हासिल चाहे जो भी हो ज़िन्दगी में कुछ 
भी फ़िक़्र नहीं, ये कम तो नहीं कि 
मुस्कुराना तो हमें आ ही 
गया, जब कभी 
दर्द बढ़ा 
दिल में हमने इंतज़ार किया बारिश का,
इक शिद्दत से थी आँखों को 
शिकायत हमसे, चलो 
अच्छा ही हुआ 
आंसू छुपाना 
तो हमें  
आ ही गया, मेरी पलकों में तुम न ढूँढ - 
पाओगे एक भी अश्क क़तरा,
ये राज़ ए बरसात है 
दिल के दाग़ 
बहाना 
तो हमें आ ही गया, ये और बात है, कि 
भीगे जिस्म के अन्दर है सुलगता 
आतीशफ़िशां कोई, फिर भी 
अंदरूनी कोहरा दबाना 
तो हमें आ ही 
गया - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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chinese painting traditional 1

14 सितंबर, 2013

हमने भी आख़िर सीख लिया - -

ज़िन्दगी जीने का सलीका हमने भी आख़िर 
सीख लिया, काँटों से दामन बचाने 
का तरीक़ा हमने भी आख़िर 
सीख लिया, वो ज़ख्म 
जो दिल की 
गहराइयों में थे कहीं सहमें सहमें, उन्हीं - - 
ज़ख्मों से इल्म इलाज बनाना 
हमने भी आख़िर सीख 
लिया, हमें मालूम 
है रस्म ए 
दुनिया 
अच्छी तरह, कोई नहीं जो निभा जाए अहद 
उम्र भर के लिए, ख़्वाबों से निकल 
रेगिस्तां में जीना हमने भी 
आख़िर सीख लिया, 
तुम्हारे लब 
ओ रूह 
के बीच थे सदियों के फ़ासले, दर्रों के बीच - - 
ख़ुद को बचाए निकलना हमने भी 
आख़िर सीख लिया - - 
* * 
-  शांतनु सान्याल 
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12 सितंबर, 2013

कुछ लम्हों की कहानी - -

कभी सोचा ही नहीं तुम्हारे बग़ैर ज़िन्दगी के 
मानी, ये सच है लेकिन हर चीज़ यहाँ 
है बस कुछ लम्हों की कहानी, 
फिर मेरी जगह ले 
लेगा कोई,
ये धुंध नहीं अविराम स्थायी, घाटियों में - -
पुनः खिलेंगे बुरुंश के फूल, दूर 
दूर तक गूंजेंगी गुंजन 
जानी पहचानी,
कहाँ रुकता 
रोके वक़्त का क़ाफ़िला, इक बहता स्रोत है 
ये भावनाओं का निरंतर, कोई किसी 
के लिए नहीं करता इंतज़ार 
उम्रभर, पलक झपकते 
ही सब कुछ हो 
जाए गुम,
जो नज़र के सामने हो, वही इक शाश्वत 
सत्य है ओझल होते ही सभी बातें
हो जाएँ पुरानी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

11 सितंबर, 2013

समीकरण ज़िन्दगी का - -

समीकरण ज़िन्दगी का आसां नहीं सुलझाना,
तमाम योग वियोग के बाद भी ज़रूरी 
नहीं, अंत में शून्य आना, नियति 
का अंकगणित है बहोत 
ही जटिल, सहज 
कहाँ सपनों 
का 
साकार होना, उनके सभी भविष्यवाणियाँ - -
रहे धरे के धरे, मस्तक की रेखाओं 
से है मुश्किल लड़ पाना, मझ -
धार की लहरों से निकल 
तो आई नैय्या, 
अद्भुत 
था उसका किनारे से लग डूब जाना, दूर तक 
गूंजती रही उसकी गुहार, सांध्य 
आरती के मध्य किसी ने 
भी न सुनी उसकी 
पुकार, डोलती 
नौका 
बता न पायी उसका ठिकाना, समीकरण - - 
ज़िन्दगी का आसां नहीं सुलझाना,
* * 
- शांतनु सान्याल 
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art by elena balekha

10 सितंबर, 2013

प्रीत रुपी तुहिन जल - -

कभी अंतर्मन से तो फूटे सत्य जल स्रोत,
किसी शुष्क नेत्र में तो जगे जीवन 
बीज, कभी अहम् ब्रह्मास्मि
का चक्रव्यूह तो टूटे !
वक्षस्थल से 
उभरे 
अनमोल भावनाओं के खनिज, हर एक 
सांस में है छुपा सुरभित संवेदन,
ज़रूरत है सिर्फ़ एक गहन 
आत्म विश्लेषण,
कभी ह्रदय 
झील 
में तो जागे मानवता का शतदल, लिए 
पंखुड़ियों में प्रीत रुपी तुहिन जल।
* * 
- शांतनु सान्याल 

07 सितंबर, 2013

तलाश - -

सफ़र ज़िन्दगी का रुकता नहीं कभी, कोई 
इंतज़ार करे या न करे, हर सांस 
को है इक मंज़िल की 
तलाश, धुंध 
भरे 
रास्ते या हों वीरान मरू प्रांतर, स्वप्नील 
अंधकार या हों चाँद रात, हर हाल 
में ज़िन्दगी को है इक 
मंज़िल की 
तलाश, 
उनकी तजवीज़ों में है कितना अपनापन !
सोचेंगे कभी फ़ुरसत में हम, अभी 
तो जी लें अपनी तरह, अभी 
तो है दिल को वाज़ी 
इक मंज़िल 
की 
तलाश, दूर हो या आसपास हर सांस को है 
इक मंज़िल की तलाश - - 
* * 
- शांतनु सान्याल

तजवीज़ - सुझाव 
वाज़ी - स्पष्ट 


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painting by artist Karen Margulis

04 सितंबर, 2013

सनम आतीश - -

न बुझे लौ, दिल की गहराइयों से उठता हुआ,
आँधियों की मजबूरियां रहे, अपनी 
जगह, सहरा ही सही मेरी 
क़िस्मत, तेरी 
निगाहों 
की परछाइयाँ रहे अपनी जगह, मैं उभर तो 
जाऊं बेचैन मौज ए दरिया से, दिल 
की रौशन बस्तियां रहे, अपनी 
जगह, इक गुमशुदा 
किनारा है - 
कहीं, तेरे लरज़ते लब के दरमियां, ख़ामोश 
लफ़्ज़ों की परेशानियाँ रहे, अपनी 
जगह, तू है कोई  मुजस्मा 
जादुई, या सनम 
आतीश !
अहतराक़ महताबी है मेरा इश्क़ कोई, - - 
गुलाबी आग में जलती तन्हाइयां -
रहे, अपनी जगह - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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art by barbara fox 2
अहतराक़ महताबी- चांदनी का दहन 
मुजस्मा  - मूर्ति 

03 सितंबर, 2013

अनबुझ क़रारदार - -

न जाने है ये कैसी दिलबस्तगी, मैं नहीं मेरे 
अन्दर, कोई और सांस लेता नज़र 
आए, इक तरफ़ है रस्म 
जहान और दूसरी 
जानिब 
तक़ाज़ा इश्क़ अंतहीन, किधर का रुख़ करे 
कोई, हर सिम्त इक उसी का चेहरा 
उभरता नज़र आए, उसकी 
शर्तों में हैं शामिल 
तज़दीद -
हयात तक का, इक अनबुझ क़रारदार - - 
कैसे समझाए कोई उनको, दूर तक 
है अँधेरा घना, और ये वजूद 
फ़ानी, दुनिया ए सिफ़र 
में डूबता नज़र 
आए - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
तज़दीद - हयात - पुनर्जन्म  
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02 सितंबर, 2013

ख़बर ही नहीं - -

उन्हें ख़बर ही नहीं, और हम दुनिया भुला बैठे, 
वो हैं मशग़ूल कुछ यूँ अपने ही दायरे में 
सिमटे हुए, और हम सब कुछ 
भूल, उनको अपना बना 
बैठे, न जाने कहाँ 
किस दरिया 
के सीने 
में है डूबा सूरज, फ़िज़ा में है इक तैरता अँधेरा
बेइन्तहा, शाम तक तो सब कुछ ठीक 
ही था, उसके बाद न जाने क्या 
दिल में रोग लगा बैठे, 
अभी तो है रात 
का इक 
लम्बा सफ़र बाक़ी, अभी अभी आँखों में उभरे 
हैं कुछ ख़्वाबों के जुगनू, अभी अभी 
साँसों में जगे हैं कुछ भीगे से 
ख़ुशबू, न जाने ये 
कैसा तिलिस्म 
है उनकी 
चाहत का, जिस्म तो सिर्फ़ जिस्म है इक शै 
फ़ानी, जुनूं देखें कि हम रूह तक भुला 
बैठे, उन्हें ख़बर ही नहीं, और 
हम दुनिया भुला बैठे - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
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