30 मई, 2012


कल रात कोई 
वो सभी इलज़ाम बहोत ख़ूबसूरत लगे -
जो उसने लगाये थे मुझ पर, यूँ 
भी ज़िन्दगी में इनामों की 
कमी न थी, इक और 
नायाब नगीना 
जड़ गया 
कोई,
दाग़े दिल लिए फिरता हूँ मैं उसकी गली 
में अकसर, बदहवास सा कुछ  कुछ, 
सुना है ; टूटे दहलीज़ पर कल
शब, भीगा  गुलाब
रख गया
कोई, 
- शांतनु सान्याल  
Paintings by Maria Serafina

26 मई, 2012

रौशनी का वादा

अन्तर्निहित थे मन में सभी अंकुरित भावनाएं ;
मौसम ने कदाचित शपथ उभरने का 
निभाया होता, मेघों की वरीयता 
जो भी हो, कुछ बूंद यूँ ही 
लापरवाही से तपते 
ह्रदय पर 
गिराया होता, उपेक्षित मरुभूमि की ख़ामोशी -
व नज़र अंदाज़ आसमान, कहीं से 
रात ने शबनम तो चुराया 
होता, नियति की थी 
अपनी  ही 
मज़बूरी, वरना रेत के टीलों में कम से कम 
चांदनी तो बिछाया होता, इन अंधेरों 
से निकल आने में वक़्त नहीं 
लगता ; ग़र रौशनी ने 
अपना वादा तो 
निभाया 
होता - - - 
- शांतनु सान्याल 

25 मई, 2012


कोई क़दम तो बढ़े
कोई तो उठे बज़्म से ललकारते हुए 
कि लपक जाए दहकता शोला, 
कोई तो आए लहराके यूँ 
बादलों की तरह 
राख़ होने से 
बच भी  जाए किसी का आशियाना, -
न पूछ ऐ दोस्त मेरी ज़िन्दगी 
की हकीक़त, इक आइना 
है जो टूट कर भी 
बिखरने नहीं 
देता मेरा 
वजूद, कि हर बार खाक़ से उभरता 
हूँ मैं तूफ़ान की तरह - - - 

- शांतनु सान्याल
painting by MARIE

23 मई, 2012


ग़र मिल जाए कोई 

ये ख़ामोशी अब लाज़िम नहीं कांपते लबों को
फिर ज़बां मिल जाए,

रात का सफ़र और धड़कता दिल, काश कोई 
तो कारवां मिल जाए,

सीने में लिए फिरता हूँ रौशनी का शहर, कहीं 
से आसमां मिल जाए,

क़िस्मत का सितारा डूबा नहीं, भूले से सही,
इक क़द्रदां मिल जाए,

- शांतनु सान्याल

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waves 4

22 मई, 2012


आवाज़ न दे कोई 
ये कैसे  ख़ुमार लिए रात भर गई जिस्मो जां,
है ज़माना बहोत दूर सहमा सहमा; और 
हम बस चले हैं रफ़्ता रफ़्ता जैसे 
लबे कहकशां, न दे हमें 
आवाज़ कोई कि
हमने छोड़ 
दी है ;
नफ़रतों से सुलगती वो जहां, इन ख़लाओं
में है न जाने क्या तिलिस्म गहरा,
जितना ही डूबते जाएँ उतना 
ही उन निगाहों में बढ़े
कोई राज़ 
बेक़रां, 

- शांतनु सान्याल 
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Circinus Galaxy

19 मई, 2012

फिर कभी - - -

किसी दिन, फिर पूछेंगे, उदासी का सबब
आज बसने भी दो ज़िन्दगी को ;
नज़दीकियों के आसपास,
वो सवाल जो कर
जाये दिल
की
गहराइयों में उथल पुथल, घिर आएं बेवक़्त
ही निगाहों में बदलियाँ, नहीं चाहिए
वो दर्द भरी बरसात, मखमली
शाम के साए, और उभर
चले हैं ख़्वाब नए !
खिलने दें
फिर
क्यों नहीं मुरझाये शबे गुल, भरने दें इक -
अह्सासे ख़ुश्बू ; कि मुख़्तसर है ये
रात ; और अरमानों की
फेहरिस्त बहोत
लम्बी - - -

- शांतनु सान्याल




13 मई, 2012

जिस्म ओ रूह

 
अब फ़र्क़ नहीं पड़ता दिल को 
किसी के नज़र अंदाज़ का;
हम छोड़ आये सभी 
मरहले दर्दो 
ग़म के
बहोत दूर, उनकी  तसल्ली
में  हैं ; अफ़सानों की 
इक लम्बी सी 
कतार,  
जी रहें हैं; अब तक ज़हर -
खाने के बाद, रख
जाओ कोई भी 
गुल, दिल 
चाहे 
जो, अब हमें कुछ भी नहीं  
चाहिए, इतना कुछ 
पाने के बाद,
वो चाहत 
जो 
जान से गुज़रे, मुमकिन 
कहाँ दोबारा उसका 
उभरना, ये शै
है; बहोत 
क़ातिल उभरती है इक बार
जिस्म ओ रूह लेने 
के बाद - - 
 - शांतनु सान्याल  



 

12 मई, 2012


काश वो मिल जाये 

न जाने क्या मज़बूरी थी उसकी, ख़ामोश
निःशब्द, वो गुज़र गया मेरे पहलू
से होकर यूँ ; जैसे हाथों से 
छूट जाय किसी की
उँगलियाँ डूबने 
से पहले, 
मेरी सांसों के साहिल पर था वो खड़ा दूर !
आवाज़ मेरी लौट आई मजरूह 
हमेशा की तरह; वो 
शायद था 
अपनी 
ही जहाँ में मसरूफ़, बहोत चाहा कि छू लूँ 
उसे, लेकिन उस भंवर से निकलना 
न था आसां, न उसने ही हाथ 
बढ़ाया, न  ज़िन्दगी ने 
साथ निभाया,
वो शख्स  
अँधेरे में आख़िर गुम होता गया; बहोत 
दूर - - - 

- शांतनु सान्याल
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Rising Moon by Clifford T. Bailey  

11 मई, 2012

कोई पूछे ज़रा 


गुज़री है रात नंगे पांव दहकते अंगारों से शायद;
क्षितिज पर उभरे हैं; फिर कहीं जा के कुछ
रंगीन नज़ारे, एक शून्यता जो ख़ुद
में समेटे है सारी दुनिया, वो
खोजते हैं अस्तित्व
बिखर जाने
के बाद,
कोई पूछे तो सही; आसमां से शामियाना होने
का दर्द, कितने ही तूफ़ान लिए सीने में
वो रौशन रहा रात भर, आंसुओं
को उसने कहा शबनम;
कितनी मुश्किल
से टपके थे
जज़्बात
कोई क्या जाने, ज़िन्दगी रुकी रही देर तक;
भोर की हलकी रौशनी में तनहा, साँस
थे यायावर प्रतिध्वनि; न जाने
किस ओर मुड़ गए - - -

- शांतनु सान्याल



10 मई, 2012

अभी बहोत बाक़ी है 

फिर जलाएं शमा कि रात अभी बहोत बाक़ी है,
ये अँधेरा न डस जाये कहीं मेरी ख्वाहिश -
निकले ही नहीं, जज़्बात अभी बहोत  बाक़ी है,

वक़्त ने निभाया साथ, उसकी मर्ज़ी से -
ज़रासे घिरे बादल, बरसात अभी बहोत बाक़ी है,  

उस शिफ़र के पार भी है ज़िन्दगी शायद 
दिल के अलावा, कायनात अभी बहोत बाक़ी है,

मेरी सांसों से गुज़र कर, देखो कभी तुम -
ख़्वाब तो देखा, अशरात  अभी बहोत बाक़ी है,

ये जूनून कहीं न कर जाय मुझे राख़ कि 
मुसलसल  दहन , निजात  अभी बहोत बाक़ी है .

- शांतनु सान्याल 
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by Steve Garfield 

08 मई, 2012

उसने कहा था

किस खूबसूरती से उसने की किनाराकशी,
न कोई आवाज़, न ही दर्दे अहसास
मासूम निगाहों से कहा -
शीशा ही था सो
टूट गया,
बूंद बूंद बिखरती रही ज़िन्दगी, दम ब दम
हर ख़ुशी, फूल बिखरे थे ज़मीं  पे
बेतरतीब, मुस्कान लिए
उसने कहा - गुल ही
थे सो झर गए,
इक साँस
जो उभरती रही रात दिन किसी के लिए यूँ
टूट कर, आँखों में  नमी थी या कोई
ख़्वाब की चुभन, पलकों में
ठहरे ज़रा देर ज़रूर,
और फिर गिर
पड़े, उसने
कहा - आंसू ही थे छलके और टूट कर बिखर
गए - -

- शांतनु सान्याल

04 मई, 2012


अनहद संवेदना 

अनुभूति व कल्पना के मध्य कहीं देखा है संभवतः 
उसका अस्तित्व एक मौन साधक की तरह,
अदृश्य, लेकिन है शामिल हर साँस में,
ज्यों मरुभूमि में अप्रत्याशित 
वृष्टि भिगो जाय तप्त 
संध्या, लिख जाय
कोई उम्मीद 
की 
रुबाई, खंडहरों में फैलती वन बेलियों की तरह, है 
वो अंतर्मन की गहराइयों में छुपा, कोई 
गुमनाम कवि की तरह, अनहद 
उसकी भावना, हर पल 
जगाये उपासना,
अलौकिक 
हो कर
भी वो है विद्यमान प्राकृत, किसी साधारण से 
इन्सान की तरह - - - 

- शांतनु सान्याल 
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Painting by Donald Zolan 

02 मई, 2012


लापता मेरा वजूद 

जब कभी उसने कहा, मैंने दिल से सुना
ये और बात थी कि उसने कभी दिल 
से कहा ही नहीं, हर लफ़्ज़ में 
इक नपातुला सा अंदाज़,
वो शख्स अक्सर 
भंवरजाल में 
मुझे डुबो गया, उस ख़्वाब में थीं न जाने 
कितनी सलवटें, ज़िन्दगी चाह कर 
भी कोरा कागज़ हो न सकी, 
लिख गए मौसम मेरे 
दर पे, मेरी ही 
गुमनामी
के इश्तेहार, कि बेघर हूँ आजकल अपने 
ही घर में, ये हस्र, मुझसे पूछता है 
मेरी मासूमियत का सबब, 
कैसे कहूँ  कि बाहोश 
ही मैंने दस्तख़त
की थी,
कभी उसके तहरीरे जज़्बात पर, बेख़ुदी में 
शायद - - - 

- शांतनु सान्याल
creeper 

25 अप्रैल, 2012


अभिनव अंगीकार 

वो कोई अन्य न था, मेरी अपनी ही प्रतिच्छाया थी
प्रश्न चिन्हों को समेटे, कभी दहलीज और 
कभी अहाते में, कदाचित खड़ा रहा
प्रखर धूप हो या चांदनी रात, 
खुले वक्षस्थल में लिए
समय  चक्र 
निशान, 
कोई निवृत आनंद हो जैसे युगों से प्रतीक्षारत, कर 
चला हो नीरव अनुसन्धान, कभी आमने 
सामने, कभी अदृश्य दर्पण की 
तरह सतत अनुसरण, मैं 
चाह कर भी उसे 
अपरिग्रह 
कर न सका, वो मेरे अस्तित्व के रास्ते कब व कैसे 
अंतर्मन की गहराई लांघता रहा, हर पल मेरा 
अहम, अभिमान, ईर्ष्या का दहन करता 
रहा मुझे पता ही न चला, कोई तो 
है,जो छद्म रूप लिए उसे कर 
जाता है,सक्रीय और 
मैं झुकाता हूँ   
शीश बेझिझक, करता हूँ अपनी भूलों का पश्चाताप,
हर दिन जीवन  करता है उसे अभिनव रूप 
में अंगीकार - - - 

- शांतनु सान्याल 
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painting by Ivan Aivazovsky 

23 अप्रैल, 2012

पतझर से हो कर गुज़रे हैं ये ख़्वाब तमाम रात 
तभी उभरते तूफ़ानी हवाओं से नहीं डरते,
हर क़दम इक तलातुम, हर मोड़ पे दुस्वारियां 
ताबीरे हयात, जूनूनी बहावों से नहीं डरते,
- शांतनु सान्याल 
midnight - midnight - Tania Farrugia 
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09 अप्रैल, 2012

नज़्म ( اردو عبارت کے ساتھ )तिश्नगी

कुछ और वजह होगी भूल जाने की, वो शख्स 
कभी था वाबस्ता ज़िन्दगी से, आसां
कहाँ ज़मीर को दग़ा देना, इक 
आग बुझा दिल में फिर 
दोबारा आग लगा 
लेना, वो 
कोई 
राज़ लिए सीने में भटकता है सहरा सहरा, 
मुमकिन कहाँ जहाँ में, हर क़दम 
पे गुमनाम चश्मों का उभर 
आना, वो इक ऐसी 
तिश्नगी है 
जो 
लब से उठती है ख़ामोश, रूह पे होती तमाम,
बहुत ही मुश्किल मेरे अहबाब - ए -
जावदाँ, सांसों का जिस्म 
से जुदा होना - - 

- शांतनु सान्याल 
نظم 
کچھ اور وجہ ہوگی بھول جانے کی، وہ شخص
کبھی تھا وابستہ زندگی سے، آساں
کہاں ضمیر کو دغا دینا، اک
آگ بجھا دل میں پھر
دوبارہ آگ لگا
لینا، وہ
کوئی
راز لئے سینے میں بھٹكتا ہے صحرا صحرا،
ممکن کہاں جہاں میں، ہر قدم
پہ گمنام چشموں کا ابھر
آنا، وہ اک ایسی
تشنگي ہے
جو
لب سے اٹھتی ہے خاموش، روح پہ ہوتی تمام،
بہت ہی مشکل میرے احباب - اے -
جاوداں ، سانسوں کا جسم
سے جدا ہونا -

- شانتنو سانیال 
painting by Barbara Fox

08 अप्रैल, 2012

नज़्म - - लबरेज़ ख़्वाब

जालीदार मेहराब से, जब रात ढलते -
उतरती है चांदनी, उनींदी आँखों
में तैरते हैं कुछ ख़ुश्बुओं
में लबरेज़ ख़्वाब,
कुछ ख़ामोश
वादे
लिए, अनकहे हज़ार अफ़साने, कोई
दहलीज़ पे रख जाता है चुपके
से हैरत अंगेज़ तोहफ़ा,
पंखुड़ियों में
लिपटा
इक बंद लिफ़ाफ़ा, नज़्म या ग़ज़ल न
जाने क्या है उसमें, रात भर
इक मीठा सा दर्द लिए
सीने में, वजूद
सोचता है
उसे खोलें की नहीं, राज़ ग़र खुल जाए
तो ज़िन्दगी में लुत्फ़ क्या
बाक़ी होगा, यही
ख्याल मुझे
तमाम रात सांस लेने नहीं देता, ये तेरा
अंदाज़े बयां है या जानलेवा
इक़रार नामा, अक्सर
सोचता है दिल
लेकिन
वो तहरीरे ज़िन्दगी चाह कर भी पढ़ नहीं
पाता, हर बार सोचता है ज़ेहन
हर बार चाहता है कहना,
मुझे तुमसे मुहोब्बत
है लेकिन हर
बार ये
कह नहीं पाता, लौट जातीं हैं जालियों से
छन कर आने वाली रौशनी या
घिर चलीं हैं फिर आसमां
में बदलियाँ - -

- शांतनु सान्याल

07 अप्रैल, 2012


सहयात्री 

ये  नीरवता  जो अपने आप में ही है एक 
विप्लव, भूल से न  समझे कोई 
सब कुछ  है अच्छा, न 
जाने कब उठे 
सहसा 
किस  दिशा से ले कर अग्निशिखा, कर 
जाए  पलक  झपकते  सब  तहस
नहस, विस्मृत  व  मृत
के  शाब्दिक अर्थों 
में  है अंतर, 
भूलना और भूला  देना  दोनों  सहज  नहीं, 
रत्न जड़ित मुकुट, मयूर -
सिंहासन और धूसर 
कंटकमय  पथ 
के  मध्य 
की  दूरी  बहुत  नहीं, कब  कालचक्र थम 
जाए  इसकी भविष्यवाणी 
सरल  नहीं, अदृश्य 
अभिशाप जब 
हो जाएँ 
जागृत, मौन शक्ति कर जाती  हैं पलभर 
में  स्वाहा, कौन राजा और कौन
रंक, उस पथ के यात्री 
सभी  समान, 
रिक्त 
हाथ सभी मुसाफिर, कभी तू  गंतव्य की 
ओर  कभी मैं आकाश पार, 
फिर  क्यूँ  इतना  करे 
हाहाकार - - - 

- शांतनु सान्याल 
shadows midnight 



06 अप्रैल, 2012

नज़्म ( اردو عبارت کے ساتھ ) दुआओं की बस्ती

तंग दायरे से निकल कर तो देख ज़रा बाहर
बेइन्तहां ख़ूबसूरत है ये दुनिया, ख़ुद
तलक  महदूद होने का नाम
नहीं ज़िन्दगी, नरम
धूप की मानिंद
बिखर जा वादियों में अल सुबह, बेक़रार से
हैं, कितने ही ख़्वाब शबनम में भीगे
हुए, आ बाद - ए - नसीम के
हमराह, दिल के जज़्बात
हैं बेसबर खिल जाने
के लिए, तेरा
हर क़दम हो मंज़िल - ए - मसावात की
जानिब, यहाँ अपना पराया कोई
नहीं, ये है दुआओं की बस्ती,
यहाँ हर कोई मिस्कीं
और हर दिल है
शहंशाह,
छोड़ जा क़दमों के निशां, ये राह जाती है
बहोत दूर, दर्ब - ए - बहिश्त
की तरफ, न सोच देर
तक की ज़िन्दगी
है मुख़्तसर,

- शांतनु सान्याल 
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 نظم


تنگ دائرے سے نکل کر تو دیکھ ذرا باہر
بےنتها خوبصورت ہے یہ دنیا، خود
تلک مهدود ہونے کا نام
نہیں زندگی، نرم
دھوپ کی ماند
بکھر جا مدعیان میں القاعدہ صبح، بےقرار سے
ہیں، کتنے ہی خواب شبنم میں بھیگے
ہوئے، آ بعد - اے - نسیم کے
ہمراہ، دل کے جذبات
ہیں بےسبر کھل جانے
کے لئے، تیرا
ہر قدم ہو منزل - اے - مساوات کی
جانب، یہاں اپنا کا ہے کوئی
نہیں، یہ ہے دعاؤں کی بستی،
یہاں ہر کوئی مسكي
اور ہر دل ہے
شہنشاہ،
چھوڑ جا قدموں کے نشاں، یہ راہ جاتی ہے
بهوت دور، درب - اے - بهشت
کی طرف، نہ سوچ دیر
تک کی زندگی
ہے مختصر،
-شانتنو سانیال




04 अप्रैल, 2012


मध्य रात्रि 

जलती बुझती जुगनू सी कुछ बातें, मन 
के सजल तरंगों में लिखती हों जैसे 
प्रतिबिंबित कविताएँ, मेह 
बरसे आधी रात या 
छू जाए किसी 
के आँखों 
से निकलती, रहस्यमयी मद्धम नीली 
रौशनी, दूर तक  बिखरे हों जैसे 
श्वेत रंगी वन्य कुसुम 
या तुषार कण 
पिघलने 
को हों व्याकुल, कोई आहट जो घेरती है 
मन को, या चांदनी में नहाये हुए 
देवदार फेंकते हैं जादुई
प्रतिच्छाया, एक 
मीठा सा 
आभास या है कोई आसपास, बढ़ चले 
हैं क़दम किसी की तरफ अनजान,
अनायास, न जाने कौन है 
छुपा सा बहुत ही 
नज़दीक,
भीगे भावनाओं के क़रीब, या ज़िन्दगी
चल रही ख़्वाब के 
हमराह - - 

- शांतनु सान्याल 
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mountain range - source Cheryl gallery 



03 अप्रैल, 2012

नज़्म - - मुहोब्बत के हरूफ़,

कुछ भी तो नहीं मेरे पास, फिर है किस
चीज़ की तुम्हें तलाश, कहीं और 
हो शायद वो गुमशुदा, कोई 
चाहत या ख़्वाब  की 
ताबीर, न  देख 
मुझे यूँ 
पुरअसरार निगाहों से बार बार, मैं वो 
नहीं जिसकी है तुम्हें तलाश, 
वज़ाहत जो भी हो इस 
वजूद के मानी हैं 
मुख़्तसर,
इक  चिराग़ जो बुझ  के भी जलता है 
बारहा शाम ढलते ही, बामे 
मुक़द्दस ढह चुका है 
तो क्या हुआ, 
अब भी 
हैं मौजूद कुछ पोशीदा इबादत के निशां, 
ग़र चाहो तो ले जाओ कुछ बिखरे 
मुहोब्बत के हरूफ़, कुछ 
अश्के रूह, इसके 
अलावा 
मेरे दामन में कुछ भी नहीं - - - 

- शांतनु सान्याल  

02 अप्रैल, 2012


बंद आँखों की दुनिया 

न करो प्रत्याशा इतनी कि बोझ बन जाय जीवन,
मिलने और खोने में था अंतर केवल कुछ 
क्षणों का, चिरस्थायी कहाँ आलिंगन,
बंद आँखों में था सम्पूर्ण व्योम 
समाया, पलक खुलते ही 
उठ गए सभी तारों 
के समारोह,
भटक गयी हो शायद मेरी आवाज़ वादियों से -
गुज़रते, या बिखर गए हों स्वर लहर,
अच्छा ही हुआ तुमने न सुनी 
वो आर्तनाद, एक थकन,
कुछ  शून्यता, वो 
प्रतिध्वनि 
जो टूटती है बार बार, जुड़ने की उम्मीद लिए 
हज़ार, झंझा में जैसे कोई दीपक चाहे 
दीर्घ ज्वलन, डूबते तारों का वो 
दिव्य अवतरण या जीने 
की असीम अभिलाष
लिए मरू प्रांतर, 
ह्रदय की 
भी हैं अपनी ही मजबूरियां, ढूंढ़ता है विलुप्त 
अपनापन, चाह कर हटा नहीं पाता
देह से लिपटे मोह वल्लरी, 
अंतर से जुड़े असंख्य 
मायावी तंतु,
चाहता 
है आँखें बंद कर देखना स्वप्नों की दुनिया, या 
वक्ष जड़ित जीने की कोई अमूल्य 
वसीयत - - 

- शांतनु सान्याल 
April Morning - painting by - Vesna Vera 

01 अप्रैल, 2012

لا عنوان (शीर्षक विहीन ) हिंदी /اردو

इक तलाश जो जिस्मो जान से हो गुज़र गया, 
बराह रास्त न थे, ज़िन्दगी के मरहले फिर भी 
बमुश्किल धीरे धीरे क़िस्मत तेरा असर गया,
इस राह की भी हैं अपनी ही दर्दे दास्ताँ लेकिन 
हक़ीक़त जो भी हो, वो इब्दी तौर से संवर गया,
उस मंज़िल पे रौशन  हैं, यूँ  हज़ारों दवी चिराग़ 
दस्ते शमशीर का जत्था भी दो पल ठहर गया, 

- शांतनु सान्याल 
اک تلاش جو جسمو جان سے ہو گزر گیا،
براه راست نہ تھے، زندگی کے مرحلے پھر بھی
بمشکل دھیرے دھیرے قسمت تیرا اثر گیا،
اس راہ کی بھی ہیں اپنی ہی درد داستاں لیکن
حقیقت جو بھی ہو وہ ابدي طور سے سںور گیا،
اس منزل پہ روشن ہیں، یوں ہزاروں دوي چراغ
دستے شمشير کا جتتھا بھی دو پل ٹھہر گیا،
شانتنو سانیال 
angels-flight - Painting by Marina Petro

31 मार्च, 2012


जन अरण्य की ओर

अज्ञात स्पर्श  जो जलरंग चित्र की तरह बिखेर 
जाती है सांत्वना, अनजान सी एक 
दस्तक रख जाती है पुष्प -
गुच्छ दरवाज़े के 
समीप, 
कोई दे जाता है धीरे से सुरभित अनुबंध, फिर 
जीवन है अग्रसर छूने को प्रतिबद्धता, 
फिर ह्रदय करता है अंगीकार 
भूल कर विगत सभी 
दुःस्वप्न, भोर 
की तरुण 
किरणें, भीगे पंखुड़ियों का हौले हौले खुलना -
निसर्ग भर चला हो जैसे पुरातन घाव,
कोई अदृश्य स्वर में फिर गा 
चला है प्रभाती राग, दे 
रहा हो ज्यों 
आह्वान,
जीवन संघर्ष के लिए फिर व्यक्तित्व है तैयार.

- शांतनु सान्याल
painting morning sunlight-watercolor by Sergey Zhiboedov 

29 मार्च, 2012


मोक्ष की प्राप्ति 

मांगी न थी हमने, कोई अमूल्य इच्छापत्र या
राज सिंहासन, सिर्फ़ चाहा था परिचय -
पत्र की वापसी, जो हुतात्माओं 
की थी धरोहर, लहू में 
अंकित वो शपथ 
पत्र जिसमे 
थे वचनबद्ध, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु -
निरामयः की भावना, न जाने कहाँ 
गए वो पृष्ठ जिनकी पंक्तियों 
में सुलगते थे, मानवता 
के अखंडित लौ, 
वो कल्प 
वृक्ष जिसकी शाखाओं में उगते थे देश प्रेम के 
कोंपल, वो  भव्य बरगदी वात्सल्य जो 
समेट ले अपनी छाया में सभी 
को समरसता के साथ, 
न जाने कहाँ 
गयीं  वो
संवेदनाएं जो कभी बहती थी ह्रदय मध्य, अब 
तो सांस भी लेनी हो तो लेनी होगी 
भ्रष्ट शासकों  से अनुमति, 
अपना मृत देह लिए 
फिर मैं खड़ा 
हूँ उसी 
मणिकर्णिका घाट पर दोबारा कोई तो आगे 
बढे, करे मुझे श्मशान शुल्क से 
मुक्त कि चाहती है मेरी 
आत्मा इस पवित्र 
भूमि में 
दोबारा मोक्ष प्राप्ति - - - 

- शांतनु सान्याल
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Sun Rising in Fog

  

28 मार्च, 2012


आत्मसात 

मूल्यांकन जो भी हो, सच तो ये है कि अस्तित्व 
को बिखेरना सहज नहीं, चौखट के बाहर
मैं रहूँ या परछाई, हर दृष्टि में
न मैं याचक न तुम ही हो 
दाता, उनकी 
अपनी हों,
कदाचित  बाध्यताएं, आंचल समेटने से पूर्व  बंद 
हो गए आशीषों के द्वार, भाग्य लेखन 
जो भी हो, बंद होते नहीं उद्भासित 
दिव्य पांथशाला, सुपात्र  की 
परिभाषा किसने गढ़ी
उन्हें सठिक हो 
ज्ञात,
ऋत्विक ने तो सींचा था पवित्र जल सबके लिए 
एक समान, ये कहना कठिन है, कौन
कितना और किस तरह कर 
सका उसे परिपूर्ण 
आत्मसात.

- शांतनु सान्याल 
mystic light 



अदृश्य छाया 

अंतहीन चाहत जीवन के, लेकिन हाथों में 
चार प्रहर, कभी तो आ बन कर सांध्य
प्रदीप, शून्य देवालय हैं कब से 
प्रतीक्षारत, उठ चले प्राणों 
से ज्यों धूम्र वलय, 
घिर चले हों 
जैसे 
ईशान्यकोणी मेघदल, कभी तो आ यूँ ही 
निशि पुष्पित गंधों में ढल कर, 
भर जा सांसों में कोई 
चंदनी आभास, 
रख जा 
फिर से कोई, नयन पातों पर स्वप्नील 
आकाश, सजने दे क्लांत यामिनी 
खिल चले हों जैसे रजनी 
गंध के वृंत, लिख 
जा पुनः 
अप्रकाशित, स्निग्ध बिहानी गीत, मन के 
स्वरलिपि हैं आतुर, फिर उसे 
गुनगुनाने को, दे जा 
कोई ओष में 
भीगी 
जीवन प्रभात, तृषित हिय चाहे दो पल 
विश्राम - - - 

- शांतनु सान्याल
rare flower 1

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