बुधवार, 28 सितंबर 2022

अज्ञात स्वर्ग - -

उस एक बिंदु तक पहुँचने के लिए हर शख़्स
रहता है बेक़रार, कभी चाहता है ओढ़ना
इंद्रधनुषी पोशाक, सजल बूंदों के
चन्द्रहार, कभी गहन चुप्पी
और कभी उन्मुक्त
जल प्रपात, हर
एक चेहरे
के नेपथ्य में छुपे होते हैं अदृश्य प्रतिबिंब कई
हज़ार, उस एक बिंदु तक पहुँचने के लिए
हर शख़्स रहता है बेक़रार। उस क्षण
भंगुर ख़्वाब में है अज्ञात स्वर्ग
का कोई नाज़ुक अहसास,
या प्रणय सुधा की
प्यास, हर
एक सोच में रहती है किसी न किसी मंज़िल
की आस, अंदर का रहस्य होता है बहुत
गहरा, आंखें देखती हैं केवल फूलों
से सजा मुख्य द्वार, उस एक
बिंदु तक पहुँचने के लिए
हर शख़्स रहता है
बेक़रार। हम
बहुधा उसे
पा कर भी खो देते हैं, बहुत कठिन है अग्नि
वलय से हो कर गुज़रना, हर हाल में तै
है मुट्ठियों में बंद, मोह माया का
एक दिन बिखरना, अनंत
कालीन प्रयास से
कहीं जा कर
मिलता
है विश्वसनीयता का पुरस्कार, उस एक - -
बिंदु तक पहुँचने के लिए हर शख़्स
रहता है बेक़रार।
* *
- - शांतनु सान्याल




गुरुवार, 15 सितंबर 2022

त्रिकोण के मध्य - -

 

कुछ नदियां अपने गर्भ में रखती

हैं अंतहीन गहराइयां, देह की

असंख्य शिराओं से हो 

कर बहते हैं अणु

जल स्रोत, वो

बहा ले जाते

हैं अपने

संग

सड़े गले फूल, शव वस्त्र, भीगे

हुए मोह डोर, स्वप्निल नेहों

की जालीदार  छाइयाँ ।

कई रातों की कोई

सुबह नहीं 

होतीं

फिर भी उन्हें चलना होता है

दिगंत पार तक, जीवन के

वक्ष स्थल में जलता

रहता है एक 

अमरदीप,

बस हम

देख

नहीं पाते इस पार से उस पार

तक, सुबह घास के ऊपर

बूंद बूंद बिखरी होती

हैं अनगिनत 

कहानियां ।

हर एक

प्रातः

मैं चाहता हूं एक नई शुरुआत,

कुछ वृक्ष आकाश कभी

नहीं छूते लेकिन

उनके अदृश्य

मूल वसुधा

के सीने

में 

आंक जाते हैं नए पौधों के देश

विराट, कभी नहीं मरती

 नारी, नदी और वृक्ष 

की परछाइयां,

इन्हीं तीनों

के मध्य

मैं

खोजता हूँ अपने अस्तित्व की

अशेष गहराइयां ।

**

- - शांतनु सान्याल 



शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

नियति के हवाले - -

एक अजीब से ऊहापोह में जी रहे हैं सभी,
राग दरबारी के सुर में सुर मिलाते
हुए, रंगीन प्यालों में भर कर
असत्य का विष पी रहे
हैं सभी । किसी
एक बिंदु
पर
आ रुक सी गई है उत्क्रांति, मुखौटे पर है
दर्ज, पुरसुकून अमन की कशीदाकारी,
दरअसल सीने के अंदर है मौजूद
अशांति ही अशांति । चौखट
पर आ कर न आवाज़
दो यूँ सूदखोर
महाजन
की
तरह, कुछ वक़्त चाहिए वजूद को फिर
से टटोलने के लिए, मृत नदी की
तरह बेसुध पड़ा है चिराग़ों
का जुलूस, बहुत कुछ
खोना होता है,
खुलेआम
सच
बोलने के लिए । तथाकथित मसीहा ने
ही कल रात जलाई है बस्तियां,
आज सुबह वही शख़्स
दे रहा है दोस्ती
पर तक़रीर,
लोग
भी
हैं वही लकीर के फ़क़ीर, कर रहे हैं सिर
झुकाए तस्लीम अपनी बिखरी
हुई तक़दीर।
* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 


गुरुवार, 25 अगस्त 2022

पांथ पखेरू - -

उस पथ का हूँ पांथस्थ मैं जहाँ मिलते
हैं सागर और आकाश, कुछ पल
का ठहराव, कुछ पल ख़ुद
से संवाद, यूँ ही चलता
रहता है जीवन
प्रवास,
समय का हिंडोला नहीं थमता, कभी
तुम हो शून्य पर, और मैं पृथ्वी
पर एकाकी, कभी खिलते
हैं नागफणी के फूल,
 और कभी
असमय
मुरझाए मधुमास, दिवा - निशि अंतहीन
है अंतरतम की यात्रा, उतार चढ़ाव,
शहर जंगल, सरल वक्राकार,
शब्दों का उत्थान पतन,
पीछे मुड़ कर देखने
का नहीं मिलता
अवकाश,
यूँ तो हर शख़्स है यहाँ अपने आप में
गुम, फिर भी पहचानते हैं मुझे
चाँदनी रात, जुगनुओं के
नील प्रकाश, भोर
के बटुए में
बंद सुबह
की
नाज़ुक धूप, गुलाब खिलने की एक
छोटी सी आस, मरुद्यान में
कहीं है एक कुहासामय
पांथ शाला, कुछ
पल का विश्राम,
कुछ क्षण
पुनर्जीवन का एहसास, अश्रु बूंद के - -
अतिरिक्त भी बहुत कुछ है
मेरे पास, उस पथ का
हूँ पांथस्थ मैं जहाँ
मिलते हैं सागर
और आकाश,
आहत
पांथ पखेरू को है पुनः उड़ने का विश्वास !
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

शनिवार, 13 अगस्त 2022

माया मृदंग - -

न तुम कुछ कह सके, न ओंठ मेरे ही हिले,
सब कुछ अनसुना ही रहा, सिहरन के
मध्य, सिर्फ़ बजता रहा समय
का मायामृदंग, सुबह की
बारिश में फिर खिले
हैं नाज़ुक गुलाब,
शायद दिन
गुज़रे
अपने आप में लाजवाब, कुछ दूर ही सही
चले तो हम एक संग, सिहरन के
मध्य, सिर्फ़ बजता रहा
समय का माया -
मृदंग । एक
बिंदु
रौशनी जो उभरती है दिगंत रेखा के उस
पार, बौछार से फूल तो झरेंगे ही
फिर उन का शोक कैसा,
बादलों के नेपथ्य
में है कहीं
उजालों
का
शहर, ये अँधेरा है कुछ ही पलों का इनका
भला अफ़सोस कैसा, किनारे पर आ
कर कहाँ रुकते हैं महा सागर के
विक्षिप्त तरंग, सिहरन के
मध्य, सिर्फ़ बजता
रहा समय का
माया मृदंग ।
* *
- - शांतनु सान्याल
   

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

रूपांतरण - -

एक पगडंडी झाड़ियों से ढकी हुई, जाती है
बहुत दूर, छुपते छुपाते, उस जगह
जहाँ पर उतरती है सुरमयी
शाम, ऊँचे ऊँचे पेड़
की परछाइयां,
सहसा
जी
उठते हैं एक दूसरे को छूने के लिए, उन - -
निस्तब्ध पलों में हमारे दरमियां,
दस्तक देते हैं जल प्रपात
की रहस्यमयी कुछ
सरगोशियां,
धूसर
पर्वतों में दिन का सफ़र होता है तमाम,
उस जगह पर हमारे सिवा कोई
नहीं होता, जहाँ पर उतरती
है सुरमयी शाम। उन
निझुम पलों में
ज़िन्दगी
छूना
चाहती है प्रणयी अन्तःस्थल, ईशान - -
कोण में उभरते हैं धीरे धीरे कुछ
मेघ दल, हवाओं के साथ
उड़ आते हैं हज़ार
ख़्वाहिशों के
चिरहरित
जंगल,
कुछ ख़्वाबों के कोष खुलने को होते हैं
तब बेक़रार, रेशमी गुच्छों से
उभर कर रात करती है
तब ज़िन्दगी का
स्वागत, जिस्म
को मिलता
उन पलों
में इक
पुरसुकूं आराम, तितलियों के नाज़ुक
परों पर लिखा होता है कहीं
तुम्हारा मधुर नाम !
* *
- - शांतनु सान्याल
















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