Friday, 3 January 2014

बिखरने को आमादा - -

फिर आज हूँ मैं, बिखरने को आमादा,
कह भी जाओ, जो कुछ भी हो 
दिल में तुम्हारे, क़िस्तों 
में न जलाओ यूँ 
रूह ए शमा, 
ऐ दोस्त,
बाकामिल, फिर आज हूँ मैं, सुलगने -
को आमादा, न उतारो मुझे यूँ 
बारहा दर्द ए सलीब से, 
रहने दो मुझे यूँ ही 
अनदेखा 
अपनी आँखों में कहीं, उम्र भर के लिए, 
फिर आज हूँ मैं, बेक़रार तुम्हारे 
दिल में, यूँ ठहरने को 
आमादा - - 

* * 
- शांतनु सान्याल 


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