Sunday, 5 January 2014

किसी की अनंत चाह में - -

वो गुम है मुद्दतों से, किसी की अनंत 
चाह में, ख़ुद से जुदा, सुधबुध 
भूलाए, और कोई बैठा 
है, ज़माना हुआ 
आँखें 
बिछाए, सिर्फ़ उसकी राह में, इक -
अजीब सा है अंतर्विरोध, जल 
रहें है ज़मीं ओ आसमां,
फिर भी ज़िन्दगी 
है महफ़ूज़ 
कहीं 
न कहीं उसकी पनाह में, वो ज़ाहिर 
हो कर भी है, मेरे दिल में छुपा 
हुआ, इक बेनज़ीर इश्क़ 
है वो, कि मिलती 
है ख़ुशी, दर्द 
भरे 
आह में, न पूछे कोई इस रूह की - -
आवारगी, चैन मिलता है इसे
सिर्फ़, जिस्म ओ जां 
के तबाह में !

* * 
- शांतनु सान्याल  

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
artist amith bhar India