04 जुलाई, 2018

सृष्टि का सौंदर्य - -

बदस्तूर, सपनों का फेरीवाला, रात के आख़री
पहर, हमेशा की तरह, चाँदनी के फ़र्श पर,
खोलता है अपनी दुकान, और तुम्हारे
स्पर्श का तिलिस्म, धीरे - धीरे
देह को ले जाता है महाशून्य
की ओर, उन अंतरंग
क्षणों में कहीं -
जीवन
चाहता है अभ्यंतरीण मुक्ति, लेकिन कहाँ - -
इतना आसान है, मोहपाश से पूर्ण बाहर
निकलना, अभिलाषों के मायाजाल
में तब भटकते हैं श्वास तंतु !
फेरीवाला, गहराते रात
के साथ, और भी
क़रीब से 
आवाज़ देता है - - "अभी तो रात बहोत बाक़ी है,
अभी - अभी निशि पुष्पों ने खोला है गंध -
कोष, चाँदनी को और सुरभित होने
दो, जीवन के बंजर ज़मीन पर
कुछ बूँद शिशिर के गिरने
दो, सृष्टि का सौंदर्य
इसी में है, हर
हाल में
जीवन का नव अंकुरण होने दो, मुझे कुछ देर यूँ
ही शुभ्र प्रवाह में बहने दो।"

* *
- शांतनु सान्याल   

01 जुलाई, 2018

सर्वस्व - -

तुम एक दिन आए अनंत वृष्टि के साथ,
और बहा ले गए सब कुछ मेरा, ठीक
अप्रत्याशित मरू सैलाब की
तरह। अब कुछ है मेरे
अंदर, तो वो है इक
मृत नदी, रेत
और पत्थरों
से भरी,
दूर तक सूखे किनारों को अपने आलिंगन
में समेटे हुए, किसी अभिशापित टूटे
ख़्वाब की तरह। अदृश्य पंखों
की दुनिया बदल देती है
सब कुछ, यहाँ तक
की लोग भूला
देते हैं सभी
अंतरंग
चेहरे, हम खड़े रहते है अपनी जगह किसी
खोखले वृक्ष, बाओबाब की तरह। हाँ,
मैं आज भी चाहता हूँ अतीत  को
पुनः लौटा लाना, तुम्हारे
वही  अंतहीन वर्षा
वाली रात को
निःशब्द,
अपने
अंदर तक उतार लाना, सांसों के तटबंध - -
आज भी हैं तने हुए अपनी जगह,
किसी तामीर लाजवाब की
तरह।तुम एक दिन
आए अनंत
वृष्टि के
साथ, और बहा ले गए सब कुछ मेरा, ठीक
अप्रत्याशित मरू सैलाब की तरह।

* *
- शांतनु सान्याल



28 जून, 2018

अनजाना सुख - -

अपनी अपनी चाहत का है
अपना ही अलग पैमाना,
कोई सुख तो है ज़रूर,
मोती और सीप के
दरमियां,
उस बंद दरवाज़े का रहस्य,
चिरंतन हैं अनजाना।
मेघों का अस्तित्व,
नहीं मिटा
पाए वज्रों के हुंकार, बरसने
की ज़िद्द  में, दुश्वार था
उनका रुक जाना।
उस दिगंत
रेखा पर जा मिलते हैं - - - 
तिमिर -आलोक,
एक तीर
उठता
धुंआ, दूसरी ओर बेसुध है
ज़माना। पहेलियों का
शहर है, हर मोड़
से जुड़े मायावी
रस्ते, इस
मोह के
सफ़र से मुश्किल है दोस्त
लौट आना।
* *
- शांतनु सान्याल

25 जून, 2018

अंतराल - -

ज़िन्दगी में कहीं न कहीं, थोड़ा
बहुत अंतराल चाहिए,
नज़दीकियों के
अपने
अलग ही हैं कुछ नफ़ा नुक़सान,
फिर भी सर रखने के लिए
कोई कंधा हर हाल
चाहिए।
वजूद की असलियत कुछ और
थी, अक्स थे अर्थहीन,
जवाब हैं मुंतज़िर
लेकिन
कोई दमदार सवाल चाहिए। - -
उनकी बसीरत वो जाने,
हर चीज़ कहना
नहीं मुमकिन,
दुनिया
है फ़ानी तो रहे, दिल मगर - -
मालामाल चाहिए। चाँद
तारों को यूँ ही
आसमान
में रहने
दो अपनी जगह, दे सके रूह को
सुकूं ऐसा कोई ख़्वाब ओ
ख़्याल चाहिए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 

16 जून, 2018

लौटने की मजबूरी - -

वो मिले मुद्दतों बाद कुछ इस तरह
कि आईना जैसे अपने पास
बुलाए मुझे, मौसमों
की  है अपनी
अलग
मजबूरी, फिर भी लौटतीं बहारें - -
जाते - जाते, बरगलाए मुझे।
उम्र, यूँ तो बीत गई ठीक
करते हुए रिश्तों के
नाज़ुक -
समीकरणों को, नियति भी किसी - -
अनबूझ ज्यामिति से कुछ
कम नहीं, हर क़दम,
अदृश्य रेखाओं
में उलझाए
मुझे।
अनगिनत ज़ख्मों को लिए सीने में,
उठ तो आए उनकी महफ़िल से
हम, न जाने कौन सा क़र्ज़
अभी तलक है बाक़ी,
रह - रह कर यूँ
ज़िन्दगी
अपने पास बुलाए मुझे।

* *
- शांतनु सान्याल


09 जून, 2018

ऐनक के इस पार - -

दूर तक वही बियाबां, वही अंतहीन शून्यता,
प्रतिध्वनियों का इंतज़ार अब बेमानी है,
जो कभी था चिड़ियों के कलरव 
से आबाद, वो गूलर का पेड़
अब किताबों की कहानी
है। कंक्रीट के जंगल
में उड़ान पुल के
सिवा कुछ
भी नहीं,
सभी रिश्तों के जिल्द हैं ख़ूबसूरत, लेकिन -
अंदर से महज मुँह ज़ुबानी है। कोई नहीं
पढ़ता दिल की किताब, शायद
आजकल, सभी को वक़्त
न मिलने की, बहुत
परेशानी है।
ऐनक के
उस  पार दुनिया अपनी जगह झिलमिलाती
सी नज़र आए, ऐनक के इस पार सिर्फ़
पानी ही पानी है।

* *
- शांतनु सान्याल  




 

30 मई, 2018

निःशब्द समझौता - -

काग़ज़ के फूलों की तरह कुछ आवेग
अपने आप झर जाते हैं, रह जाती
हैं अगर कुछ तो, वो है काँटों
के नोंक पर ठहरी हुई
एक बूँद की तरह
चाहत की
नमी,
कुछ नज़दीकियाँ मौन रह कर मुँह - 
चिढ़ाती हैं और धूसर स्मृति को
बेवजह साफ़ करती हैं, अब
कौन इन्हें समझाए कि
अलबम बदलने से
तस्वीर रंगीन
नहीं होते,
बस
एक मीठी टीस दे जाते हैं। तुम और
मैं आज भी उतने ही क़रीब हैं
जितने कि कभी हुआ
करते थे, पहले
शायद हम
एक
दूसरे की ज़रूरत थे या मजबूरियों के
तहत कोई मैत्री पुल, जो भी हो
उन्ही स्तम्भों के सहारे
हमने जीवन की
लम्बी यात्रा
की, और
आज
हमारे बीच छुपने छुपाने की कोई भी
वजह न रही, अब बिन संवाद ही
हम बन गए हैं पारदर्शी,
शायद यही है रूह से
रूह तक का एकल
रास्ता, जहाँ
से लौटना
नहीं
मुमकिन, अंतहीन सहयात्रा या कोई
सह मुक्ति अभियान का सूत्रपात,
जो भी हो अब हम बढ़  चले
हैं सुदूर धुंधभरी लेकिन
ख़ूबसूरत वादियों
की ओर - -

* *
- शांतनु सान्याल 

  

24 मई, 2018

कोई रहगुज़र नहीं - -

तलाश ए सुकूं थी उम्र से
कहीं ज़ियादा तवील,
तीर सीने के पार
कब हुआ
कुछ
भी ख़बर नहीं। दर्द ओ
मुस्कान के बीच थी
इक छुअन नादीद,
फ़रमान ए
हाक़िम
का
हम पे अब कोई असर
नहीं। खुले दिल
मिलें जहाँ
राजा

रंक दोस्तों की तरह, ये
जगह यूँ तो है बेहद
हसीं लेकिन मेरा
शहर नहीं।
तूफ़ान
 की
 है अपनी अलग ही
मजबूरियां शाम
से,रहने दें
अभी
तो है आधी रात आख़री
पहर नहीं। अब तुम
भी चाहो तो
आज़मा
लो 
ईमान हमारा, हर सिम्त
है धुंध और दूर तक
कोई रहगुज़र
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल



 

08 मई, 2018

अनुबंध के तहत - -

हम जहाँ से चले थे वहां कोई सायादार -
दरख़्त न था, लिहाज़ा हमने मौसम
से निःशर्त अनुबंध कर लिया,
पतझर हो या मधुऋतु
अनुभूति का रहस्य
अपनी जगह,
हमने
अपनी साँसों में सदाबहार सुगंध भर लिया।
हमें मालूम है तपते राहों पर, नंगे पाँव
चलने का दर्द, अतः जीवन के
सभी धूसर कैनवासों को,
अपनी तरह से हमने
जलरंग कर
 लिया।
तुम्हारे दहलीज़ में शायद आज भी उतरते
हैं वही धूप - छाँव के स्वरलिपि, हालांकि
हमने अपनी भावनाओं को बहोत
पहले से ही बेरंग कर लिया।
वो ख़त जो तुम तक न
पहुँच पाए कभी,
दिल के
सन्दूक में हमने उन्हें तह करके रख दिया,
उम्र की सिलवटों को रोकना नहीं
आसान इसलिए मुस्कुराहटों
से हमने सभी कमज़ोर
तटबंध भर लिया।
अपनी साँसों
में सदाबहार सुगंध भर लिया। - - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल






02 मई, 2018

स्वप्न मंजरी - -

उन गहन अवशोषित क्षणों में तुम हो
कोअनाम गंध कोष, बिखरने को
चिर व्याकुल, उन उन्मुक्त पलों
में जीवन जैसे पुनर्जन्म को
हो आकुल। दिवा -
निशि के सेतु
पर झूले
सारी सृष्टि, कहीं बहे अविराम  मरू -
समीरण, कहीं झरे अंतहीन वृष्टि।
कुछ स्वप्न मंजरी मेरी आँखों
के, जाएँ तुम्हारे पलकों
के तीर, रात ढले ले
आएँ कुछ राहत
के नीर।

* *
- शांतनु सान्याल


01 मई, 2018

जीवन स्रोत - -

न जाने कौन कहाँ उतरे सभी तो हैं
एक ही कश्ती के मुसाफ़िर,
किसी घाट पर दीपमाला
बहे संग जलधार,
और किसी
तट पर
जा लगे सपनों का चन्द्रहार, कहीं से
निकले संकरी पगडण्डी और
पहुंचे किसी मीनाबाज़ार,
कहीं जीवन मूल्यों में
अपर्ण और कहीं
मूल्यों का
व्यापार,
न जाने कौन कहाँ से आ मिले इस -
पथ के मिलन बिंदु अनेक, कुछ
चाहें मिलना लहरों की तरह
निःशर्त, कुछ मिल कर
गुपचुप कर जाएँ
अंदरख़ाने
गर्त,
फिर भी जीवन स्रोत बहे अनवरत।
* *
- शांतनु सान्याल







26 अप्रैल, 2018

खेद विहीन - -

ये उम्र की ढलान कुछ और नहीं, प्रेमचंद की
'बूढ़ी काकी' ही तो है, शायद तुमने पढ़ी
हो अगर नहीं तो पढ़ लेना, यहीं
आसपास किसी नुक्कड़ -
गली के एक कोने
में अपना पता
तलाशती
हुई
एक परिचित चेहरा, हम में से कोई एक ही तो
है। असंख्य दस्तक, दरवाज़ों की अपनी
अलग बेरूख़ी, घिरते अंधकार में
ख़ुद ब ख़ुद ख़्वाहिशों का
आत्मदाह, बहुत
मुश्किल है
अब
तुम्हारे वरीयता सूची में ख़ुद को शामिल करना,
अतएव बेहतर इसी में है कि क्यों न ख़ुद
को करें कपूर की तरह विलीनता
की ओर अग्रसर, अंतहीन
दुआओं के साथ। 
तरलता की
नियति
है
बहना ऊंचाई से ढलान की ओर यथारीति - - -
खेद विहीन।
* *
- शांतनु सान्याल


24 अप्रैल, 2018

ख़ुश्बू की तरह - -

मैं आज भी हूँ मौजूद उसी मुहाने पर
जहाँ उफनती नदी मिलती है
सागर के बेचैन लहरों से,
मैं आज भी हूँ मौजूद
तुम्हारे नरम
हथेलियों
में
बंद जुगनू की तरह, मैं आज भी हूँ - -
मौजूद तुम्हारे अंदर नींबू फूलों
की मादक  महक लिए
हमेशा की तरह
बेपरवाह,
कुछ
बेतरतीब और बिखरा बिखरा सा, मैं
आज भी हूँ तुम्हारे सीने में कहीं,
परदे के ओट से झांकता
हुआ मासूम बच्चे की
मुस्कराहट की
तरह, कुछ
छुपा -
छुपा सा, कुछ आत्म प्रकाशक सा, जिसे
हो एक मुश्त तवज्जो की आरज़ू, मैं
आज भी हूँ मौजूद तुम्हारे आस
पास ये और बात है कि
तुम मुझे तलाशते
हो आईने के
फ्रेम में
कहीं,
जिसे उम्र के जंग ने न जाने कब से - -
धूसर कर दिया है।


* *
- शांतनु सान्याल






 

23 अप्रैल, 2018

कोई फ़र्क़ नहीं - -

कहाँ मिलती है मनचाही मुराद, कुछ न कुछ
उन्नीस बीस रह ही जाती है तामीर ए -
ख़्वाब में। जाना तो है हर एक
मुसाफ़िर को उसी जानी
पहचानी राह के बा -
सिम्त, जहाँ कोई
फ़र्क़ नहीं
होता
दुश्मन ओ अहबाब में। उसने बहुत कोशिशें -
की, लेकिन आईना साफ़ साफ़ मुकर
गया, सारी उम्र का निचोड़ था
उसके प्रतिबिंबित जवाब
में। शबनम को तो है
छलकना  हर
हाल में,
उसे ज़रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ता कांटें और गुलाब
में।
* *
- शांतनु सान्याल


21 अप्रैल, 2018

न धुआं न राख़ अब हैं बाक़ी, फिर भी न जाने
अब तलक क्यूँ दिल है, कि सुलगता है रह
रह कर, वो आज भी है शामिल मेरी
साँसो से गुज़र कर, रूह तक
उतर कर। 

- शांतनु सान्याल

14 अप्रैल, 2018

नेपथ्य का रहस्य - -

खुल जाते हैं अपने आप सभी
अंतरतम दरवाज़े, जब
कभी ख़ुद को देखते
हैं आईने के
आर - पार। 
हमारी अपनी ही कृति है वो
मायावी चक्र -व्यूह,
जिसमें उलझने
को जीवन
चाहता है बारम्बार। ज्ञात है
सभी को अंधकारमय
नेपथ्य का रहस्य,
फिर भी
परछाइयों के पीछे दौड़ता है
ये संसार। नदी हमेशा
की तरह झेलती है
दीर्घ एकांतवास,
लोग लौट
जाते हैं अग्नि दे कर अपने
घर द्वार। नदी का यक्ष -
प्रश्न अपनी जगह है
दृढ़ स्थिर,
अनुत्तरित देवताओं को नहीं
 जैसे कोई सरोकार।
पुरोहित लौट
जाता है
स्वगृह  संध्या के पश्चात, जीवन
 - मरण के मध्य है तव लीला
अपरम्पार।

* *
- शांतनु सान्याल

10 अप्रैल, 2018

कांच के पोशाक - - SAVE THE GIRL CHILD

अँधेरे के उसपार हैं कुछ उजालों के
फ़रेब ख़ूबसूरत, ज़िन्दगी हर
क़दम पे मांगे है अपना
ही अलग जुर्माना,
कोई ख़्वाब
का है
सौदागर, रात गहराए फेंके चाँदनी के
छल्ले, कोहरे के रास्ते है, उसका
रोज़ आना जाना। कांच के
पोशाक में सजते हैं
आधी रात, 
मेरे
नाज़ुक अरमान, टूटते बिखरते यूँ ही -
गुज़रती है लहूलुहान ये रात, और
सुबह छीन लेती है हमेशा की
तरह कुछ बाक़ी मेरी
पहचान।

* *
- शांतनु सान्याल




 

08 अप्रैल, 2018

धूप - छाँव की बस्तियां - -

ख़्वाहिशात भी इक दिन बूढ़ा जाएंगे अपने
आप, न खींच इतना उम्र को रबर की
तरह, कुछ हाशिए के लोग भी
रखते हैं अहमियत अपनी
जगह, न देख यूँ मेरी
शख़्सियत को
भूले हुए
रहगुज़र की तरह। कब कौन किस मुकाम पे
मिल जाए अनाहूत देवदूत के रूप में,
कहना है बहोत मुश्किल, खुला
रहने दे दिल अपना, किसी
उन्मुक्त परिंदे के, 
अनंत सफ़र
की तरह,
ये धूप - छाँव की बस्तियां, मुखौटों से उतरते
नामवर हस्तियां, सभी एक दिन साहिल
से टकरा कर लौट जाएंगे, किसी
अनजान लहर की तरह, दूर
मझधार में कहीं उभरती
है जुगनुओं की बस्ती,
या मेरा वहम है
किसी गुम
रौशनी के शहर की तरह। न देख यूँ मेरी - -
शख़्सियत को भूले हुए रहगुज़र की
तरह।

* *
- शांतनु सान्याल
 



07 अप्रैल, 2018

रिक्त वक्षस्थल - -

दोनों किनारे हैं धूसर, दोनों तरफ रेत के समंदर,
ढलती उम्र की बस्ती है सूखे नदी के अंदर।
न जाने किस देश उड़ गए सभी बया -
पाखियों के झुण्ड, उदास से हैं
तटबंध के बबूल वन, सिर्फ़
झूलते हैं टहनियों के
नीचे कुछ शून्य
नीड़ पिंजर।
जीवन -
नदी की है अपनी ही अलग कहानी, कुछ मौन -
कथानक झुर्रियों में हैं क़लमबन्द, कुछ
सजल वृत्तांत पथराई आँखों की
जुबानी। ऋतुओं की तरह
हैं रिश्तों के बहाव,
कभी दोनों
किनारे
लहरों से बंधे, और कभी अंजुरी न पाए एक भी
बूँद पानी। जीवन नदी की है अपनी ही
अलग कहानी।

* *
- शांतनु सान्याल
 
 

04 अप्रैल, 2018

प्रतीक्षारत - -

मालूम है हमें दास्तां ए राहज़नी, फिर भी
सफ़र यूँ अधूरा कैसे छोड़ दें, अभी -
अभी तो उभरे हैं कुछ नूर की
बूंदे दिगंत के हमराह,
सुबह होने में है
अभी देर -
बहोत,
नाज़ुक सपनों को अभी से क्यूँ कर तोड़ दें।
झूठे लिबास, मुखौटों का इंद्रजाल,
रंग फ़रेबी, अंदर और बाहर
के दरमियां इक अँधा
कुआं, अँधेरा अभी
तक हैं घना
चाहो तो
सभी परतों को आईना जड़े अरगनी पे टांग
आओ, दूर दूर तक इक सुलगता हुआ
पलाश वन है या अग्निस्नान का
रास्ता, कहना बहोत कठिन
है, ग़र तुम हो सिक्का
ख़ालिस, देर न
करो नदी -
पहाड़, समुद्र सैकत, वृष्टि - मरुधरा, तमाम -
अपवादों को निर्वस्त्र लांघ आओ। अँधेरा
अभी तक हैं घना चाहो तो सभी
परतों को आईना जड़े
अरगनी पे टांग
आओ।

* *
- शांतनु सान्याल




02 अप्रैल, 2018

सच्चा रहनुमा - -

अंधकार उतरते हैं, हमेशा
की तरह निःशब्द,
नग्न दरख़्तों 
के बीच,
अपना रास्ता बनाते हुए।
उजालों का षड्यंत्र,
है अपनी जगह
स्थिर,
फेंकते हैं नयन पाशे, माथे
पे जुगनू सजाते हुए।
जीने की ललक
करती है
मजबूर मुझे बारहा, मज़ा
आता है जीती बाज़ी,
अक्सर हार
जाते हुए।
उन
चेहरों में जब होती है
नौनिहालों सी
चमक,
दुःख
नहीं होता है मुझे ज़ुल्मे
सलीब उठाते हुए।
कोई तो हो
इस
कारवां का रहनुमा ए - -
सादिक़, यूँ तो लूटा
 है न जाने
कितनों
ने, आते जाते हुए। - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल

29 मार्च, 2018

सदियों का दर्द - -

वो सभी थे शामिल आधी
रात की साजिश में,
फूलों की ख़ुश्बू
हो या
चाँद का डूबना उभरना,
मोम की तरह ख़ाक
हुई रात, नींद
की
आज़माइश में। बुझते
चिराग़ों ने हमें
गिर के
संभलना है सिखाया, कुछ
रौशनी अक्सर रहती
है बाक़ी, जीने की
 गुंजाइश में।
तुम चाह
कर भी मिटा नहीं सकते
 इन्क़लाब ए जुनूं,
सदियों का दर्द
होता है भरा
इनकी
इक अदद पैदाइश में। - -

* *
- शांतनु सान्याल


22 मार्च, 2018

शेष पहर - -

बहुत दूर जहाँ नदी मुड़ जाती है अनजान
द्वीप की ओर, और किनारे खो जाते
हैं निविड़ अंधकार में, जीवन तब
खोजता है अपनी परछाइयां,
कुछ जीत में कुछ हार
में। धूप का धुआँ
ही था तुम्हारा
अपनापन,
दिल से उठा या देवालय से, तर्क है बेमानी,
मानों तो सब कुछ है यहाँ, और ग़र न
मानों तो कुछ भी नहीं इस संसार
में। जिन्हें उतरना था घाट पर
वो कब से उतर गए, शून्य
नौकाओं के सिवाय
अब कुछ भी
नहीं इस
पार में। ईशान कोण में फिर उभर चले हैं -
आवारा बादल, शेष पहर शायद बिखर
के बरसें, और सुबह हो जागृत
दोनों प्रणय कगार में। 
जीवन तब खोजता
है अपनी
परछाइयां, कुछ जीत में कुछ हार में। - -

* *
- शांतनु सान्याल

तितली या व्याध - पतंग - -

घेरे लगाए हुए वही विस्मित चेहरे और
डमरू की आवाज़, मदारी का वही
जादूभरा अंदाज़, व्यस्क घुटनों
से अंदर झांकता हुआ कोई
बच्चा उम्र से पहले
बुढ़ाता हुआ
देखता
है वही खोया हुआ सपनों का देश। वो -
कोई पारदर्शी - तितली है, या एक
ख़ूबसूरत, लेकिन ख़तरनाक
व्याध - पतंग, कहना
बहुत है मुश्किल,
निरीह शिशु
चाहता
है उसे क़रीब से छूना, महसूस करना।
सभी ख़ामोश हैं पोखर का मटमैला
पानी हो या, अधझुके,  ख़ज़ूर
पेड़ वाले गौरैयों के झुंड,
जंग लगे साइकिल
का रिंग आज
भी है वो
वहीँ एक कोने में पड़ा हुआ लावारिस।
कुछ भी ख़ास नहीं बदला मेरे गाँव
में, ये और बात है कि मेरी
उम्र साठ कब पार कर
गई मुझे कुछ
भी याद
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 

 

18 मार्च, 2018

कहीं और चलें - -

मायावी अंधकार अपनी जगह अगोचर, ये
ज़रूरी नहीं कि हर एक शरीर की अपनी
ही परछाई हो, महानगर सोया हुआ,
राजपथ ऊंघते हुए, ज़रूरी नहीं
कि सांसों के डूबने के लिए
अंतहीन गहराई हो।
आकाश से उठ
चले हैं, एक
के बाद एक, सभी रौशनी के जागीरदार - -
कांधे पर ज़रा रख लूँ, लहूलुहान वही
आख़री पहर का ख़्वाब, ख़ुदा -
करे मुझ पे भी, सुबह तक
तो कम अज़ कम,  
मसीहाई हो।
अब यूँ भी समेटने को कुछ भी नहीं है मेरे
पास, कुछ उजालों ने लूटा, कुछ अंधेरों
ने जज़्ब किया, चलो चलें हिसाब
किताब से बाहर निकल,
कहीं दूर जहाँ इक
पुरसुकूं  तन्हाई
हो - -

* *
- शांतनु सान्याल



 

16 मार्च, 2018

आधा - अधूरा ख़त - -

फिर मुद्दतों बाद जी चाहता है कि पढ़ें
तुम्हारा वही आधा - अधूरा ख़त,
कुछ  लजाए - सकुचाए से
अल्फ़ाज़, कुछ  नाज़ -
अंदाज़ लिए भीगे
हुए जज़्बात -
अलमस्त।
मेहंदी की तरह कब हाथों से छूट गए
वो सभी मुहोब्बत के नक़्श ओ -
निगार, इक लम्बी सी रात
गुज़री हो जैसे अभी -
अभी, और
पथराई
आँखों में तैरते हों जैसे धुंधभरे ख़ुमार।
आईना देखना कैसे छोड़ दें हम,
कि ज़िन्दगी का सफ़र अभी
है बाक़ी, उन्हें हम से
लेना - देना कुछ
भी न हो
लेकिन हम आज भी हैं सिर्फ़ उन्हीं के
तलबगार।

* *
- शांतनु सान्याल
 

 


15 मार्च, 2018

सुबह से पहले - -

मुझे मालूम है, उन्हें मुद्दतों से 
मेरी तलाश है, है रास्ता
वही पुराना मगर
मंज़र बदल
गए।
वही झील का किनारा, वही - -
परिंदों का डेरा, न जाने
कितने शाम आए,
और यूँ ही ढल
गए। सच
है कि
कुछ तो मेरा, अब तक उनके
पास है, कुछ सीने में हैं
दफ़्न, कुछ आँखों
से निकल
गए।
नज़रबंद सांसों का बाहर
निकलना था मुश्किल,
चिलमन ए जिस्म
में ख़ामोश
वो सभी
जल गए। कोई घायल मुसाफ़िर
 गुज़रा है इन सख़्त राहों से,
शीशे के सभी नाज़ुक
दरीचे अचानक
से दहल
गए।
इक ख़ामोशी जो सारे शहर को -
सुन्न कर गई, जो लोग
समझदार थे वो
सुबह से पहले
संभल
गए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 



 

01 मार्च, 2018

रंग ज़ाफ़रानी - -

फीके थे तमाम रंग दुनिया के, शाम
ढले अपने आप उतर गए, कोई
ख़्वाब था आख़री पहर वाला
या निगाहों में तैरती
मृगजल की बूंदे,
साथ तो
चले थे सभी, लेकिन सुबह से पहले -
न जाने लोग किधर गए। बहुत
सहेज कर रखा था तुम्हारा
वही बंद, पुरअसरार
लिफ़ाफ़ा, लेकिन
खोलते ही,
तमाम रंगे ज़ाफ़रानी हवाओं में बिखर
गए। राज़ ए ख़ामोशी रहने दे यूँ ही
गुमशुदा, निगाह की वादियों
में ऐ दोस्त, खिल उठे
हज़ार ख़्वाहिश
तुम्हारे
क़दम जिधर गए। फीके थे तमाम रंग
दुनिया के, शाम ढले अपने आप
उतर गए - -

* *
- शांतनु सान्याल

23 फ़रवरी, 2018

मधुऋतु - -

एक अजीब सी लाजवंती कशिश है
हवाओं में, फिर खिल उठे हैं
पलाश सुदूर मदभरी
फ़िज़ाओं में।
यूँ तो
ज़िन्दगी में उधेड़बुन कुछ कम नहीं,
फिर भी बुरा नहीं, कभी कभार,
रंगीन ख़्वाबों को यूँ बुनना,
अलसभरी निगाहों
में। न पूछ यूँ
घूमा फिरा
कर
इल्म हिसाब ऐ दोस्त, हमेशा सरल -
रेखा पर चलना नहीं आसान,
बहुत सारे मोड़ होते हैं
ज़िन्दगी के राहों
में। ज़रूरी
नहीं कि,
हर
बार उछाला हुआ सिक्का हो विजयी
हमारी चाहों में।

* *
- शांतनु सान्याल


19 फ़रवरी, 2018

डूबते गए - -


सभी आधे - अधूरे हैं, कहीं मेरी परछाइयाँ
कहीं तुम्हारा सूखता हुआ अपनापन,
सारे देह में कभी उग आएं काँटों
के सहस्त्र  कोशिकाएं
और कभी एक
सजल -
स्पर्श भर जाए मीलों लम्बा सूनापन। सेमल
के फूलों सा कभी गिर आए स्वप्न -
फिरकी और उदास  ज़िन्दगी
को दे जाए भोर का
उजलापन।
मोड़ -
विहीन इस रहगुज़र में कोई दरख़्त साया -
दार मिले न मिले, सफ़र अपनी
जगह है जारी यथावत,
जब साहिल पे
उतरे रात
ढले,
किसे याद रहा कहाँ पे थी अथाह गहराई
और कहाँ साँसों का उथलापन।

* *
- शांतनु सान्याल



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