Monday, 19 February 2018

डूबते गए - -


सभी आधे - अधूरे हैं, कहीं मेरी परछाइयाँ
कहीं तुम्हारा सूखता हुआ अपनापन,
सारे देह में कभी उग आएं काँटों
के सहस्त्र  कोशिकाएं
और कभी एक
सजल -
स्पर्श भर जाए मीलों लम्बा सूनापन। सेमल
के फूलों सा कभी गिर आए स्वप्न -
फिरकी और उदास  ज़िन्दगी
को दे जाए भोर का
उजलापन।
मोड़ -
विहीन इस रहगुज़र में कोई दरख़्त साया -
दार मिले न मिले, सफ़र अपनी
जगह है जारी यथावत,
जब साहिल पे
उतरे रात
ढले,
किसे याद रहा कहाँ पे थी अथाह गहराई
और कहाँ साँसों का उथलापन।

* *
- शांतनु सान्याल