14 अप्रैल, 2018

नेपथ्य का रहस्य - -

खुल जाते हैं अपने आप सभी
अंतरतम दरवाज़े, जब
कभी ख़ुद को देखते
हैं आईने के
आर - पार। 
हमारी अपनी ही कृति है वो
मायावी चक्र -व्यूह,
जिसमें उलझने
को जीवन
चाहता है बारम्बार। ज्ञात है
सभी को अंधकारमय
नेपथ्य का रहस्य,
फिर भी
परछाइयों के पीछे दौड़ता है
ये संसार। नदी हमेशा
की तरह झेलती है
दीर्घ एकांतवास,
लोग लौट
जाते हैं अग्नि दे कर अपने
घर द्वार। नदी का यक्ष -
प्रश्न अपनी जगह है
दृढ़ स्थिर,
अनुत्तरित देवताओं को नहीं
 जैसे कोई सरोकार।
पुरोहित लौट
जाता है
स्वगृह  संध्या के पश्चात, जीवन
 - मरण के मध्य है तव लीला
अपरम्पार।

* *
- शांतनु सान्याल

10 अप्रैल, 2018

कांच के पोशाक - - SAVE THE GIRL CHILD

अँधेरे के उसपार हैं कुछ उजालों के
फ़रेब ख़ूबसूरत, ज़िन्दगी हर
क़दम पे मांगे है अपना
ही अलग जुर्माना,
कोई ख़्वाब
का है
सौदागर, रात गहराए फेंके चाँदनी के
छल्ले, कोहरे के रास्ते है, उसका
रोज़ आना जाना। कांच के
पोशाक में सजते हैं
आधी रात, 
मेरे
नाज़ुक अरमान, टूटते बिखरते यूँ ही -
गुज़रती है लहूलुहान ये रात, और
सुबह छीन लेती है हमेशा की
तरह कुछ बाक़ी मेरी
पहचान।

* *
- शांतनु सान्याल




 

08 अप्रैल, 2018

धूप - छाँव की बस्तियां - -

ख़्वाहिशात भी इक दिन बूढ़ा जाएंगे अपने
आप, न खींच इतना उम्र को रबर की
तरह, कुछ हाशिए के लोग भी
रखते हैं अहमियत अपनी
जगह, न देख यूँ मेरी
शख़्सियत को
भूले हुए
रहगुज़र की तरह। कब कौन किस मुकाम पे
मिल जाए अनाहूत देवदूत के रूप में,
कहना है बहोत मुश्किल, खुला
रहने दे दिल अपना, किसी
उन्मुक्त परिंदे के, 
अनंत सफ़र
की तरह,
ये धूप - छाँव की बस्तियां, मुखौटों से उतरते
नामवर हस्तियां, सभी एक दिन साहिल
से टकरा कर लौट जाएंगे, किसी
अनजान लहर की तरह, दूर
मझधार में कहीं उभरती
है जुगनुओं की बस्ती,
या मेरा वहम है
किसी गुम
रौशनी के शहर की तरह। न देख यूँ मेरी - -
शख़्सियत को भूले हुए रहगुज़र की
तरह।

* *
- शांतनु सान्याल
 



07 अप्रैल, 2018

रिक्त वक्षस्थल - -

दोनों किनारे हैं धूसर, दोनों तरफ रेत के समंदर,
ढलती उम्र की बस्ती है सूखे नदी के अंदर।
न जाने किस देश उड़ गए सभी बया -
पाखियों के झुण्ड, उदास से हैं
तटबंध के बबूल वन, सिर्फ़
झूलते हैं टहनियों के
नीचे कुछ शून्य
नीड़ पिंजर।
जीवन -
नदी की है अपनी ही अलग कहानी, कुछ मौन -
कथानक झुर्रियों में हैं क़लमबन्द, कुछ
सजल वृत्तांत पथराई आँखों की
जुबानी। ऋतुओं की तरह
हैं रिश्तों के बहाव,
कभी दोनों
किनारे
लहरों से बंधे, और कभी अंजुरी न पाए एक भी
बूँद पानी। जीवन नदी की है अपनी ही
अलग कहानी।

* *
- शांतनु सान्याल
 
 

04 अप्रैल, 2018

प्रतीक्षारत - -

मालूम है हमें दास्तां ए राहज़नी, फिर भी
सफ़र यूँ अधूरा कैसे छोड़ दें, अभी -
अभी तो उभरे हैं कुछ नूर की
बूंदे दिगंत के हमराह,
सुबह होने में है
अभी देर -
बहोत,
नाज़ुक सपनों को अभी से क्यूँ कर तोड़ दें।
झूठे लिबास, मुखौटों का इंद्रजाल,
रंग फ़रेबी, अंदर और बाहर
के दरमियां इक अँधा
कुआं, अँधेरा अभी
तक हैं घना
चाहो तो
सभी परतों को आईना जड़े अरगनी पे टांग
आओ, दूर दूर तक इक सुलगता हुआ
पलाश वन है या अग्निस्नान का
रास्ता, कहना बहोत कठिन
है, ग़र तुम हो सिक्का
ख़ालिस, देर न
करो नदी -
पहाड़, समुद्र सैकत, वृष्टि - मरुधरा, तमाम -
अपवादों को निर्वस्त्र लांघ आओ। अँधेरा
अभी तक हैं घना चाहो तो सभी
परतों को आईना जड़े
अरगनी पे टांग
आओ।

* *
- शांतनु सान्याल




02 अप्रैल, 2018

सच्चा रहनुमा - -

अंधकार उतरते हैं, हमेशा
की तरह निःशब्द,
नग्न दरख़्तों 
के बीच,
अपना रास्ता बनाते हुए।
उजालों का षड्यंत्र,
है अपनी जगह
स्थिर,
फेंकते हैं नयन पाशे, माथे
पे जुगनू सजाते हुए।
जीने की ललक
करती है
मजबूर मुझे बारहा, मज़ा
आता है जीती बाज़ी,
अक्सर हार
जाते हुए।
उन
चेहरों में जब होती है
नौनिहालों सी
चमक,
दुःख
नहीं होता है मुझे ज़ुल्मे
सलीब उठाते हुए।
कोई तो हो
इस
कारवां का रहनुमा ए - -
सादिक़, यूँ तो लूटा
 है न जाने
कितनों
ने, आते जाते हुए। - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल

29 मार्च, 2018

सदियों का दर्द - -

वो सभी थे शामिल आधी
रात की साजिश में,
फूलों की ख़ुश्बू
हो या
चाँद का डूबना उभरना,
मोम की तरह ख़ाक
हुई रात, नींद
की
आज़माइश में। बुझते
चिराग़ों ने हमें
गिर के
संभलना है सिखाया, कुछ
रौशनी अक्सर रहती
है बाक़ी, जीने की
 गुंजाइश में।
तुम चाह
कर भी मिटा नहीं सकते
 इन्क़लाब ए जुनूं,
सदियों का दर्द
होता है भरा
इनकी
इक अदद पैदाइश में। - -

* *
- शांतनु सान्याल


22 मार्च, 2018

शेष पहर - -

बहुत दूर जहाँ नदी मुड़ जाती है अनजान
द्वीप की ओर, और किनारे खो जाते
हैं निविड़ अंधकार में, जीवन तब
खोजता है अपनी परछाइयां,
कुछ जीत में कुछ हार
में। धूप का धुआँ
ही था तुम्हारा
अपनापन,
दिल से उठा या देवालय से, तर्क है बेमानी,
मानों तो सब कुछ है यहाँ, और ग़र न
मानों तो कुछ भी नहीं इस संसार
में। जिन्हें उतरना था घाट पर
वो कब से उतर गए, शून्य
नौकाओं के सिवाय
अब कुछ भी
नहीं इस
पार में। ईशान कोण में फिर उभर चले हैं -
आवारा बादल, शेष पहर शायद बिखर
के बरसें, और सुबह हो जागृत
दोनों प्रणय कगार में। 
जीवन तब खोजता
है अपनी
परछाइयां, कुछ जीत में कुछ हार में। - -

* *
- शांतनु सान्याल

तितली या व्याध - पतंग - -

घेरे लगाए हुए वही विस्मित चेहरे और
डमरू की आवाज़, मदारी का वही
जादूभरा अंदाज़, व्यस्क घुटनों
से अंदर झांकता हुआ कोई
बच्चा उम्र से पहले
बुढ़ाता हुआ
देखता
है वही खोया हुआ सपनों का देश। वो -
कोई पारदर्शी - तितली है, या एक
ख़ूबसूरत, लेकिन ख़तरनाक
व्याध - पतंग, कहना
बहुत है मुश्किल,
निरीह शिशु
चाहता
है उसे क़रीब से छूना, महसूस करना।
सभी ख़ामोश हैं पोखर का मटमैला
पानी हो या, अधझुके,  ख़ज़ूर
पेड़ वाले गौरैयों के झुंड,
जंग लगे साइकिल
का रिंग आज
भी है वो
वहीँ एक कोने में पड़ा हुआ लावारिस।
कुछ भी ख़ास नहीं बदला मेरे गाँव
में, ये और बात है कि मेरी
उम्र साठ कब पार कर
गई मुझे कुछ
भी याद
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 

 

18 मार्च, 2018

कहीं और चलें - -

मायावी अंधकार अपनी जगह अगोचर, ये
ज़रूरी नहीं कि हर एक शरीर की अपनी
ही परछाई हो, महानगर सोया हुआ,
राजपथ ऊंघते हुए, ज़रूरी नहीं
कि सांसों के डूबने के लिए
अंतहीन गहराई हो।
आकाश से उठ
चले हैं, एक
के बाद एक, सभी रौशनी के जागीरदार - -
कांधे पर ज़रा रख लूँ, लहूलुहान वही
आख़री पहर का ख़्वाब, ख़ुदा -
करे मुझ पे भी, सुबह तक
तो कम अज़ कम,  
मसीहाई हो।
अब यूँ भी समेटने को कुछ भी नहीं है मेरे
पास, कुछ उजालों ने लूटा, कुछ अंधेरों
ने जज़्ब किया, चलो चलें हिसाब
किताब से बाहर निकल,
कहीं दूर जहाँ इक
पुरसुकूं  तन्हाई
हो - -

* *
- शांतनु सान्याल



 

16 मार्च, 2018

आधा - अधूरा ख़त - -

फिर मुद्दतों बाद जी चाहता है कि पढ़ें
तुम्हारा वही आधा - अधूरा ख़त,
कुछ  लजाए - सकुचाए से
अल्फ़ाज़, कुछ  नाज़ -
अंदाज़ लिए भीगे
हुए जज़्बात -
अलमस्त।
मेहंदी की तरह कब हाथों से छूट गए
वो सभी मुहोब्बत के नक़्श ओ -
निगार, इक लम्बी सी रात
गुज़री हो जैसे अभी -
अभी, और
पथराई
आँखों में तैरते हों जैसे धुंधभरे ख़ुमार।
आईना देखना कैसे छोड़ दें हम,
कि ज़िन्दगी का सफ़र अभी
है बाक़ी, उन्हें हम से
लेना - देना कुछ
भी न हो
लेकिन हम आज भी हैं सिर्फ़ उन्हीं के
तलबगार।

* *
- शांतनु सान्याल
 

 


15 मार्च, 2018

सुबह से पहले - -

मुझे मालूम है, उन्हें मुद्दतों से 
मेरी तलाश है, है रास्ता
वही पुराना मगर
मंज़र बदल
गए।
वही झील का किनारा, वही - -
परिंदों का डेरा, न जाने
कितने शाम आए,
और यूँ ही ढल
गए। सच
है कि
कुछ तो मेरा, अब तक उनके
पास है, कुछ सीने में हैं
दफ़्न, कुछ आँखों
से निकल
गए।
नज़रबंद सांसों का बाहर
निकलना था मुश्किल,
चिलमन ए जिस्म
में ख़ामोश
वो सभी
जल गए। कोई घायल मुसाफ़िर
 गुज़रा है इन सख़्त राहों से,
शीशे के सभी नाज़ुक
दरीचे अचानक
से दहल
गए।
इक ख़ामोशी जो सारे शहर को -
सुन्न कर गई, जो लोग
समझदार थे वो
सुबह से पहले
संभल
गए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 



 

01 मार्च, 2018

रंग ज़ाफ़रानी - -

फीके थे तमाम रंग दुनिया के, शाम
ढले अपने आप उतर गए, कोई
ख़्वाब था आख़री पहर वाला
या निगाहों में तैरती
मृगजल की बूंदे,
साथ तो
चले थे सभी, लेकिन सुबह से पहले -
न जाने लोग किधर गए। बहुत
सहेज कर रखा था तुम्हारा
वही बंद, पुरअसरार
लिफ़ाफ़ा, लेकिन
खोलते ही,
तमाम रंगे ज़ाफ़रानी हवाओं में बिखर
गए। राज़ ए ख़ामोशी रहने दे यूँ ही
गुमशुदा, निगाह की वादियों
में ऐ दोस्त, खिल उठे
हज़ार ख़्वाहिश
तुम्हारे
क़दम जिधर गए। फीके थे तमाम रंग
दुनिया के, शाम ढले अपने आप
उतर गए - -

* *
- शांतनु सान्याल

23 फ़रवरी, 2018

मधुऋतु - -

एक अजीब सी लाजवंती कशिश है
हवाओं में, फिर खिल उठे हैं
पलाश सुदूर मदभरी
फ़िज़ाओं में।
यूँ तो
ज़िन्दगी में उधेड़बुन कुछ कम नहीं,
फिर भी बुरा नहीं, कभी कभार,
रंगीन ख़्वाबों को यूँ बुनना,
अलसभरी निगाहों
में। न पूछ यूँ
घूमा फिरा
कर
इल्म हिसाब ऐ दोस्त, हमेशा सरल -
रेखा पर चलना नहीं आसान,
बहुत सारे मोड़ होते हैं
ज़िन्दगी के राहों
में। ज़रूरी
नहीं कि,
हर
बार उछाला हुआ सिक्का हो विजयी
हमारी चाहों में।

* *
- शांतनु सान्याल


19 फ़रवरी, 2018

डूबते गए - -


सभी आधे - अधूरे हैं, कहीं मेरी परछाइयाँ
कहीं तुम्हारा सूखता हुआ अपनापन,
सारे देह में कभी उग आएं काँटों
के सहस्त्र  कोशिकाएं
और कभी एक
सजल -
स्पर्श भर जाए मीलों लम्बा सूनापन। सेमल
के फूलों सा कभी गिर आए स्वप्न -
फिरकी और उदास  ज़िन्दगी
को दे जाए भोर का
उजलापन।
मोड़ -
विहीन इस रहगुज़र में कोई दरख़्त साया -
दार मिले न मिले, सफ़र अपनी
जगह है जारी यथावत,
जब साहिल पे
उतरे रात
ढले,
किसे याद रहा कहाँ पे थी अथाह गहराई
और कहाँ साँसों का उथलापन।

* *
- शांतनु सान्याल



23 जनवरी, 2018

अदाकारी - -

काश, सजल अहसासों का - -
कोई मरूद्वीप होता
अंतरतम के अंदर,
तो शायद
भटकती हुई सांसों को मिल
जाती कुछ पलों की
राहत। वही
 दालान,
वही दर ओ दीवार, वही आईने
की नामुराद हसरत,
परछाइयों के
शहर में
ख़त्म कहाँ होती हैं चाँदनी रात
की चाहत। पतझड़ की है
अपनी ही मजबूरियां,
क़ुदरत से लड़ना
आसां नहीं,
हर कोई है
अपनी
अपनी जगह इक अदाकार - - -
मुक़्क़दर के मातहत।

* *
- शांतनु सान्याल 

11 जनवरी, 2018

अतृप्त प्यास - -

 कुछ अँधेरे उजालों के टुकड़े, कुछ
बूंद आसमानी शायद रात
ढले छलके थे मेरे
नयन कोरों
से, या
आख़री पहर तुमने छुआ था मुझे
निशि पुष्प की तरह निःशब्द
मख़मली अहसास लिए।
कोई रेशमी सिहरन
जागी थी श्वास
तंतुओं में,
या
कदाचित, ज़िन्दगी लौट आई थी -
पुनर्जागरण की प्यास लिए।

* *
- शांतनु सान्याल










31 दिसंबर, 2017

मनुहार - -

न बांध पाए लाख कोशिशों के बाद,
बहुत चंचल थे नेह गंध, मौसम
बदलते ही तितलियों के
संग, बहुत दूर कहीं
उड़ गए। वक़्त
कहाँ ठहरा
है किसी के लिए, चाहे तुम पुकारा
करो ले के किसी का नाम
अंतहीन, जनशून्य
सा कोई स्टेशन
और दूर
तक बिखरे हुए सूखे पत्तों के सिवा
कुछ नहीं होता। मुझे मालूम
है दस्तकों का फ़रेब,
फिर भी, जी
चाहता
कि, फिर सुबह उजालों का उपहार दे
जाए, अधखिले फूलों को उन्मुक्त
खिलने का प्यार दे जाए।

* *
- शांतनु सान्याल

19 दिसंबर, 2017

तुम्हारा शहर - -

न जाने किस दिगंत पर जा उभरे,
वो टूटे ख़्वाब के कतरन, जब
नींद से जागे तो पाया हर
तरफ बिखरे हुए थे
धुंधलाए दर्पण।
कोई आहट
है जो
सीने पे आ ठहर जाती है मुस्तक़ल,
ख़ुश्बू की तरह कोई छुअन, छू के
मेरी रूह की परतें, पल में हो
जाती हैं ओझल। कौन
है वो, न जाने जो
खेलता है मेरी
सांसों से
आख़री पहर, इक अंतहीन ख़ामोशी
कोहरे में लिपटी हुई, सुनसान
राहों के बीच कहीं गुम होता
 है तब, रौशनियों में डूबा
हुआ तुम्हारा
शहर।

* *
- शांतनु सान्याल



23 अक्टूबर, 2017

फेरीवाला - -

अख़बार की सुर्ख़ियों से
 कभी निकल न पाए
ख़्वाब, फिर
अलसुबह,
घंटियां बजा रहा है वही 
फेरीवाला। आवाज़
तो है वही
जानी
पहचानी मुद्दतों से सुनी,
मुखौटों के पीछे कभी
वो साफ़ मुंडा
कभी
दाढ़ीवाला। चारों तरफ
है सैलाब और लोग
अपनी अपनी
छतों पर,
 दीवार ढहने तक  नहीं
आया वो  जांबाज 
सीढ़ीवाला।
तमाम
उम्मीद बंद हैं, जंग
लगे संदूक में
यहाँ - वहाँ,
उंगलियों
 में नचाता है वो - - -
अक्सर रंगीन
चाबीवाला।

* *
- शांतनु सान्याल

22 अक्टूबर, 2017

आसान तर्जुमा - -

ज़िन्दगी इतनी भी मुश्किल
ज़ुबां नहीं, यूँ तो मैंने हर
इक सांस में जिया है
उनको अफ़सोस
यही कि,
उनके पास  कोई तर्जुमा नहीं।
जिस्म ओ जां से उठ कर
रूह तक सुलगता रहा,
कहने को हद ए
नज़र रौशन
कोई शमा नहीं। सारी दुनिया
इक दायरा ए कूचे में सिमट
आई कौन कहता है कि
दिल में  वजूद ए
आसमां नहीं।
सब कुछ तो है यहाँ फिर भी
वो उदास रहता है, भीड़
भरे शहर में शायद
उसका कोई
हमनवा
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल

05 अक्टूबर, 2017

मुखौटों के परे - -

 ऊसर खेत, मेघविहीन आकाश और
सांझ बेला के यात्री, आईने के
इस पार हूँ मैं, और उस
पार मौन अट्टहास।
विवर्ण दीवारें,
उखड़ते
पलस्तर, जीर्ण शीर्ण अतीत का श्वेत 
श्याम अलबम, अधखुली खिड़की
से झांकता हो जैसे लौटता
हुआ मधुमास। तुम
साथ हो या नहीं,
अब जैसे
कोई
फ़र्क़ पड़ता नहीं, सांध्य आरती, देह
से उठता हुआ धुआं, लहरों पर
बहते हुए असंख्य प्रदीप,
क्रमशः चप्पुओं की
आवाज़ थमती
हुई, और
धीरे -
धीरे अंधकार, अस्तित्व को अपने में -
अन्तःसलिल करती हुई - - अब
सिर्फ़ है कुछ अपने पास, तो
वो है अवकाश ही
अवकाश।

* *
- शांतनु सान्याल 


01 अक्टूबर, 2017

उसने कहा था - -

बहोत कुछ उसने कहा
था यूँ ख़ामोश
निगाहों से
ताउम्र
आती रही सदायें, यूँ - -
ख़ानाबदोश राहों
से। उम्र की
तहरीर
थी कि बढ़ती रही  दम -
ब - दम हाशिए तक
न पहुँच पाए
नूर उन
ख़्वाबगाहों से। हर एक
चेहरे पे था गोया
कोई इसरार
ए पोशीदा,
हमने
भी सीख लिया जीना
इन पागल हवाओं
से। रास्ता नहीं
मिलता है
कभी
मख़मली या मनचाहा,
जब दवा ख़ुद
निकल
आए
दिल के रिसते घाओं से,
ज़िन्दगी ख़ुद ब ख़ुद
उभर आती है दर्द
के पनाहों
से।

* *
- शांतनु सान्याल


21 सितंबर, 2017

दरमियान ए असल ओ सूद - -

तमाम अशराफ़िया* उनकी महफ़िल -
में रहें मौजूद, हमारी दुनिया ख़ुश
है लरज़ते ज़मीन के बावजूद।
ख़ौफ़ज़दा रहें वो, जो हों
शीशमहल के 
रहने वाले,
हमारे इर्दगिर्द है पत्थरों की इक दिवार
लामहदूद। बियाबां में राह तलाशने
के, हैं हम जन्म से माहिर रूकती 
नहीं ये ज़िन्दगी,चाहे क़दम
रहें खूं आलूद। बिरादरी
है अपनी आबाद,
बर हस्ब, 
राह ऐ  फ़कीरी, वो उलझे रहें उम्र भर -
दरमियान ए असल ओ सूद।

* *
- शांतनु सान्याल 

* संभ्रांत लोग 

16 सितंबर, 2017

जाली मुस्कान - -

सच बोलने का हासिल हमसे पूछो
न यारों तमाम वाबस्तगी इक
पल में निकले  बेगाने।
उनके हाथों में
था यूँ भी
इंसाफ़ का तराज़ू, दलील ए जुर्म, -
हम जाने या सिर्फ ख़ुदा
जाने। ख़ामोश था
शहर, जब पा
ए ज़ंजीर
हम गुज़रे, शाम ढलने से पहले, - -
वो लगे महफ़िल सजाने।
वादी ए तारीख़ पे,
वीरानगी के
सिवा
कुछ भी नहीं, यहाँ अब कोई नहीं
आता रस्मो रिवाज निभाने।
मुद्दतों बाद वो मिले
ज़रूर लेकिन
बेरुख़ी
ओढ़े हुए, जाली मुस्कानों में थे - -
छुपे हुए अनगिनत  बहाने।

* *
- शांतनु सान्याल



 

09 सितंबर, 2017

दूर तक कोई नहीं - -

वैसे तो यहाँ  रहनुमाओं की
कोई कमी नहीं, फिर भी
ज़िन्दगी लौट आती
है अक्सर किसी
अवितरित
लिफ़ाफ़े की तरह, उम्र से
पहले बुढ़ापा ओढ़े हुए, 
दहलीज़ पर अपने,
बेतरतीब से
पड़े हुए।
तुम्हारे और मेरे दरमियान
आज भी है मौजूद शायद
वही पुराना पुल,
 हालाँकि
वक़्त ने बहती नदी को,
बहोत पहले ही चुरा
लिया हमसे, न
अब कोई
किनारा
रहा बाक़ी, और नहीं क़दमों
के निशां दूर तक, दस्तूर
ए ज़माने को बदलना
इतना भी
आसान
नहीं, माथे  से जब क़फ़न
हमने उतारा तो देखा,
तनहा खड़े थे हम
बीच चौक पर,
और ओझल
थे सभी
कारवां दूर तक।

* *
- शांतनु सान्याल

19 अगस्त, 2017

कुछ बूंदें - -

कुछ बूंद उन शबनमी निगाह के,
कुछ दर्द मेरे सीने के, यही
सब तो हैं ख़ूबसूरत
वजूहात, बिंदास
मेरे जीने के।
वो आज
भी है दिलकश ओ हंसीं, पहले से 
बेशतर कहीं, उस जादुई -
रूमान से, यूँ दिल
मेरा भी, 
बेअसर
नहीं।
अभी अभी तो सजी है, मजलिस -
ए -आसमां दूर तक. बढे और
ज़ियादा हौले - हौले,
जज़्बात ए
कारवां
दूर तक। तिलस्म - ए - निगाह
का अभी रसूख़ ओ असर
बाक़ी है, अभी तो है
सिर्फ़ आग़ाज़
ए शब,
अभी कामिल सहर बाक़ी है - - -

* *
- शांतनु सान्याल

 







02 अगस्त, 2017

अभी तो रात बाक़ी है - -

लौटते कभी नहीं उद्गम की ओर, बहुत नाज़ुक
होते हैं नेह के धारे, ढलानों का मोह भुला
देता है धीरे - धीरे,  बचपन के सभी
मासूम किनारे । हर शख़्स
यहाँ है खोज में,  कोई
न कोई दरख़्त
सायादार,
चंद लम्हात के हैं सभी अनुबंध, फिर ख़ूबसूरती -
से हो लें दरकिनार। न जाने कहाँ उड़ा ले
जाए, इन मौसमी हवाओं का कोई
ऐतबार नहीं, उगते सूरज के
सभी हैं पैरोकार यहाँ,
अंधकारमय  राहों
का यहाँ
कोई मददगार नहीं। सुबह की तलाश तनहा चले
बदस्तूर, कारवां नहीं देखता मुड़ कर घायल
मुसाफ़िरों को, इन्क़लाब, ख़ुद तलाशती
है भीड़ में, लहूलुहान हाथों में लिए
हुए जलते मशाल, उन जांबाज़
सिरफ़िरों को।

* *
- शांतनु सान्याल



18 जुलाई, 2017

बज़्म -ए -ज़िन्दगी - -

 ख़्वाहिशों का यूँ भी कोई किनारा नहीं होता,

इक बेमौज नदी है, कोई बेसदा बहती हुई -
डूबनेवाले का यहाँ कोई भी सहारा नहीं होता।

जब आग लगी हो सारे शहर में बेलगाम - -
तब अपने - ग़ैर में कोई बँटवारा नहीं होता।

बहुत मुश्किल से बनते हैं, घरौंदे मेरे दोस्त -
अपनी मर्ज़ी से कोई यूँ ही बंजारा नहीं होता।

सिर्फ़ समझ का है उलटफेर, ऐ ईमानवालों !
हरगिज ख़ुदा, हमारा या तुम्हारा नहीं होता।

बज़्म -ए -ज़िन्दगी की है अपनी ही चाँद रात,
हर टूटनेवाला क़तरा नामी सितारा नहीं होता।

* *
- शांतनु सान्याल 

02 जून, 2017

सजल अभिलाष - -

वो चीख जो ख़ामोश हो कर भी,
भेद जाएँ, क्षितिज की
दीवारें, न बाँट इस
ज़मीन को इस
दर्ज़ा, कि
हर
टुकड़े से निकले दुःखी माँ की - -
आवाज़, और बन जाए ये
ख़ूबसूरत दुनिया महज़
किसी वृद्धाश्रमीय
अभिशाप। न
जाने
कौन सा ईश है तुम्हारा, कभी - -
फ़ुरसत मिले तो हमें भी
उनसे मिलवाओ,
हमारा ख़ुदा,
पत्थर
का
हो कर भी ज़िन्दगी नहीं लेता। न
जाने किस स्वर्गलोक की है
उनकी कल्पना, हमारी
ख़्वाहिश है बहुत
सरल, किसी
नवजात
बच्चे
की एक निश्छल हंसी और रात ढले
फूलों पर गिरती हुई मद्धम -
मद्धम  कुछ सजल
बूंदें।

* *
- शांतनु सान्याल

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