अभी बहुत कुछ देखना है बाक़ी, अहाते
में फैली हुई है सुख की नरम धूप,
कुछ अर्ध - अंकुरित स्वप्न
भूगर्भ से बाहर आने
को हैं व्याकुल,
न बंद करो
सदर -
दरवाज़ा, अभी बहुत कुछ देखना है - -
बाक़ी। बरामदे से लग कर है एक
ज़ीना, बोगनवेलिया से ढका
हुआ, कुछ सूखे पत्तों
पर बिखरे पड़े हैं
शिशिर बिंदु
इतिवृत्त
की
पृष्ठों से पुनः उभरेंगे हम अनाम देश के
जैसे रानी और राजा, न बंद करो
सदर दरवाज़ा, अभी बहुत
कुछ देखना है बाक़ी।
सीढ़ियों से लगे
छत पर है
रहस्य
की
एक दुनिया, खुला नीला आकाश, तारों
से सजा मायावी शामियाना, अशेष
आलोक स्रोत, शून्य में तैरते
हुए असंख्य ग्रह नक्षत्र,
अनंत मुग्धता का
का अज्ञात
प्रदेश,
बहने दो हमें इस रात की गहनता में दूर
तक चाहे जो भी हो ख़ामियाज़ा, न
बंद करो सदर दरवाज़ा, अभी
बहुत कुछ देखना है
बाक़ी।
* *
- - शांतनु सान्याल

अभी बहुत कुछ देखना है बाक़ी, अहाते
जवाब देंहटाएंमें फैली हुई है सुख की नरम धूप,
कुछ अर्ध - अंकुरित स्वप्न
भूगर्भ से बाहर आने
को हैं व्याकुल, बहुत बहुत सुन्दर सटीक रचना |
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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