22 मार्च, 2011

कहीं बरसी हैं घटायें, हवाओं में है ताज़गी
ये गीलापन छुपा ले गईं आँखों की नमी
पलकों की वादियों में फिर खिलने लगे हैं
फूल, संवार भी लो बिखरे ज़ुल्फ़ परेशां !
कि ज़िन्दगी का सफ़र अभी है बहुत बाक़ी,
--- शांतनु सान्याल

16 मार्च, 2011

नज़्म

जो नज़र झुके न किसी के दर्द में भीग कर
ख़ुद को तबाह कर जाती है इक दिन दर्द बन कर,
ये ज़िद की  मैं हूँ सिर्फ़ शाहे कायनात इस दौर का 
ख़लाओं  में  भटकती हैं तमाम रूहें मौत बन कर,
वो कोई ग़ैर नहीं मेरा ही साया था हमराह चला 
छलता रहा वही हर क़दम मेरी चाहत बन कर, 
मेरी ज़ात है सिर्फ़ इक ख़ुदा की मख़लूक़ , ये सोच 
न डूब ले जाए वक़्त के क़ब्ल क़यामत बन कर, 
पत्थरों में भी हैं देवता, ये है इश्क ए इन्तहां 
उसने आदमी मुझे बनाया मेरी ही चाहत बन कर,
हर शख्स में देखूं ख़ुदा की मूरत मैं बेपनाह 
बिखर जाऊं सुखी वादियों में आबे हयात बन कर,   
किसी के अश्क, ग़र कर न सके दिल को तरबतर 
जीना ही क्या ऐसा , ख्वाब ओ ख्यालात बन कर,
जी हाँ, बुत परस्त हूँ मैं मुझे हर सै से है मुहोब्बत 
अह्सासे वफ़ा न बुझने दे मुझे ख़ुद बरसात बन कर,
अहमियत इसी में है कि मिट जाऊं किसी के लिए 
मुझे मंज़ूर नहीं लम्बी उम्र, जी

ऊँ  सवालात बन कर !
- - शांतनु सान्याल    



15 मार्च, 2011

अपरिचित मुख

न जाने कौन थे वो लोग जो पत्थरों में 
आग से लिख गए अनगिनत जिवंत कविताएं
आज भी पठारों में खिलते हैं झरबेरी 
हल्की बूंदों से भी भरती हैं मृत मरू सरिताएं 
जाने क्या बात थी उनमें की गूंजती हैं 
आवाज़ें, मंदिर कलश को छुएं अतृप्त भावनाएं 
कुछ तो रहस्य था उनकी इस आत्मीयता में 
वो हर पल हर डगर उम्मीदों की अलख जगाएं 
नदी घाटों में वृन्द आरती गढ़े अलौकिक -
अनुभूति, चहुँ दिशा निसर्ग वैदिक ऋचा दोहराएँ. 
--- शांतनु सान्याल

12 मार्च, 2011

नज़्म

किस से करें शिकायत की हर कोई है यहाँ बदगुमां
ये वही शख्स है जिसने दी थीं झूठी गवाहियाँ
ये वही रक़ीब है मेरा जो रहा मुद्दतों बनके रहनुमां
न पूछो हस्र ए मुहोब्बत, ऐ डूबते सितारों मुझसे 
ये वही ज़मीं है मेरी और मुस्कराता वही आसमाँ
लिपटा रहा आस्तींसे ताउम्र नफ्से दोस्त बनकर 
ये वही जगह है, कभी रौशन था मेरा भी आशियाँ !
वो जो कहते थे कि हूँ मैं मिशाले हुस्न बेपनाह 
वही आईना है वही चेहरा मेरा और ये छाइयाँ.
कभी कोई मंदिर हुआ करता था यहीं कहीं क़रीब
आज बाज़ारे जिस्त में रहती हैं मशहूर हस्तियाँ.
न जाने कौन सी शै थी जो ले गई काजल चुराकर 
ये वही उदास आँखें तकतीं हैं खुद की परछाइयां .
यहीं कहीं से उठा था धूल का बवंडर बहुत ऊपर 
ये वही है फ़िज़ा वही रास्ते वही बिखरता कारवां.
यहीं आसपास ख्वाबों ने ली थी कभी आखरी साँसें  
हदे नज़र शायद यहीं कहीं हो रौशन मज़ारे बागबां. 
वो दहकते मशालों वाले हाथ वही हिकारत की नज़र 
अब भी छलते हैं वो ज़िन्दगी, आंसू व्  तनहाइयाँ.
कौन गुज़रा है टपकते खून भरे क़दमों से यहाँ 
फिसलन भरी है क्यूँ दर्द की ये राहे मेहरबानियाँ.
मैं उठा तो लूँ  तीरों कमान, अहदे वफ़ा फिरसे 
चाहत के सफ़र में लेकिन कम नहीं हैं दुस्वारियां.
सरकते पर्दों से झांकती हैं क़हर भरी निगाहें 
राख़ के बादिलों में भी क्या होती हैं बिजलियाँ.
बरसने की ख्वाहिश लिए जागता रहा उम्र भर मैं
क्यूँ फिर नहीं सुलगतीं ये खामोश सूखी वादियाँ.
--- शांतनु सान्याल

09 मार्च, 2011

ग़ज़ल - - इंद्रजाल सा आकाश

ये इंद्रजाल सा आकाश, अधखुली सीप सा मन
झांकती हैं नन्हीं सी किरण, अँधेरे के आर पार,
कोई मासूम हथेली छुपाये रखे हों जैसे जुगनू
उँगलियों के दरारों से जो निकल जाएँ  बार बार,
 ख़ुशी की उम्र बढ़ न पाई सींचा उसे निशि दिन
बौने पौधों में न फूल खिले, लौटती रहीं बहार,
जीवन के ताने बाने में बिनीं रेशमी सपनों की
डोरी, हर वक़्त संवारा प्रति पल टूटे तार तार ,
रात गुज़रे कौन रंग जाता है रोज़ पूरब की रेखा
अनचाहे न जाने रोज़ दे जाता है,जीवन उधार,
ये सलीब रहा ज़िन्दगी भर मेरा जिगरी दोस्त
कांधे के सिवाय इसका नहीं कोई भी आधार ,
कहाँ छोड़ आऊं उम्मीद भरे ये इर्द गिर्द चेहरे
उदास लम्हों में भी मुस्कुराते हैं ये बेरंग दीवार,
--- शांतनु सान्याल

08 मार्च, 2011

नज़्म

 नज़्म 
अफ़सोस क्या करें हम ये रश्मे दुनिया है -
निभा जाओ तुम भी ज़माने के दस्तूर,
न पहचाने की वो अदायगी है ख़ूबसूरत 
हैं टूटती बूंदें आखिर बिखरने को मजबूर, 
हिसाब क्या करें सुबह की धूप के लिए -
यूँ भी ज़िन्दगी में दर्दो अलम हैं भरपूर,
ये सितारों की भीड़, फिर रात की नीलामी 
ख़्वाबों न छुओ मुझे, हूँ मैं थकन से चूर,
वो सभी मरहम  दे न सके राहतें उम्रभर -
लौटा दिए, माना है मंज़िल बहुत ही दूर, 
न देखो मुझे फिर उसी अंदाज़े वफ़ा से 
ग़र ज़िन्दगी रही तो लौट आएंगे ज़रूर,
--- शांतनु सान्याल

 


05 मार्च, 2011

नज़्म - - अनकही बातें


संगे साहिल पर रुको तो ज़रा 
टूटतीं लहरों में जीने की उम्मीद बंधे 
अभी तो डूबा है, सूरज सागर पार 
शाम के धुंधलके में सांस लेतीं हैं -
अनकही बातें, कैसे कहूँ तुमसे वो 
दर्दे बेक़रां, कांप से जाते हैं ओंठ 
सहम सी जाती हैं जां, पत्तों की
ये सरसराहट है, या टूट टूट जाये 
कोमल शाखों से अरमानों के ओस,
ये समंदर भी क्या चीज़ है, तकता
हूँ, मैं बड़ी हसरत से प्यास लिए -
इक बूंद में जैसे ज़िन्दगी हो शामिल,
उसे बरसना ही नहीं जब क्या कीजे 
ये अँधेरा है, या कोई बादलों का साया 
छू तो जाए सारा बदन हवाओं की तरह 
दिल ही छुट जाए तो कीजे।
--- शांतनु सान्याल 

02 मार्च, 2011

मधुमास की छुअन

मधुमास की छुअन
वो ख़ूबसूरत इत्र की शीशी अब भी
   हमने रखी है, बहुत ही सहेज के -
सुगंध है ओझल, अहसास बाक़ी !
  जी चाहे अक्सर की सजा दूँ तुम्हें
फिर मौसमी फूलों से, दायरे हैं -
  सिमटे,ज़ख़्म के गुच्छे हैं वज़नी,
झुक सी जातीं हैं निगाहें कहीं पे
  जा कर, ये आग की लपटें हैं या -
फिर सुलगती हैं, अनबुझी यादें,
   कौन है,न जाने शाम ढलते -
सजा जाता है आहिस्ते ख़ामोशी,
   दूर तलक फिर खिले हैं बुरुंस
पहाड़ी में फिर लगे हैं शायद
  जुगनुओं के मेले, झरनों में हैं
बहती मधुमास की छुअन धीमे धीमे,
--- शांतनु सान्याल

مدھماس  کی چھوون 
 خوبصورت  عطر  کی  شیشی 
  ہمنے  رکھی  ہے ،  بہت  ہی  سہیج  کر -
سگندہ  ہے  اوجھل ، احساس  باقی
جی  چاہے   اقسر  کی  سجا  دوں  تمہیں
پھر  موسمی  پھولوں  سے ، دایرے  ہیں   
سمٹے ، زخم  کے  گچچھے  ہیں  وزنی 
جھک  سی  سی  جاتیں  ہیں  نغاہیںکہیں پے
جا  کر ، یہ  آگ  کی  لپٹیں  ہیں  یا   
پھر سلگتی  ہیں ، انبجھی  یادیں
کون  ہے  نہ  جانے  شام  ڈھلتے
سجا  جاتا  ہے  آھستے  خاموشی  
دور  تک  پھر  کھلے  ہیں  برنس
جگنوؤں  کے میلے ،  جھرنوں  میں  ہیں
بہتی  مدھماس  کی چھن  دھیمے  دھیمے
شانتانو  سانیال - 
  


    

    

23 फ़रवरी, 2011

सांसों की धुंध

इन लक्ष्मण रेखाओं के उसपार भी हैं 
जीवन की अनगिनत वक्र पगडंडियाँ 
कुछ मेघाच्छादित आकाश और झरते 
पुष्प वीथिकाएँ, न समेटो मुझे 
अपनी हथेलियों में हलकी धूप की तरह 
मोहपाश में दम घुटता सा है 
खोल दें फिर वातायन, आने दें कोई 
अपनापन, कभी तो मुझे जानने की ललक 
हो, और कभी मैं देखूं तुम्हें नज़दीक से 
कांपते हैं क्यूँ हाथ छूते ही ह्रदय स्पंदन 
झुकी डालियों से कुछ फूल गिर जाएँ 
असावधानी में, तो कोई बात नहीं, पुष्प 
गिरते हुए भी कम सुन्दर नहीं लगते 
चाहे वो ज़मीं पर गिरें या देवता के पग तले
एक अजनबीपन का रंग घिर आता है 
अक्सर, हालाकि तुम्हारी आँखों में उतरती 
है सांझ इन्द्रधनुषी कई बार, उतरोत्तर 
सजल यामिनी भरती है अथाह सुरभि 
निशि कुसुमों की, न जाने क्या बात है ?
कि तुम तकते हो बंद दरवाज़े यूँ बार बार 
हमने तो कोई दस्तक सुनी नहीं 
पास रह कर भी तुम छोड़ नहीं पाते अपनी 
मौजूदगी का अहसास, जबकि हम खुद को भूल 
जाते हैं तुम्हारी सोच में डूब कर, ये विनिमय 
भावनाओं का या हो तुम काँच के उसपार 
दिखाई जो दे लेकिन छूते ही टूट जाए, ये नाज़ुक 
सपनो की परत है या सांसों की धुंध !
--- शांतनु सान्याल  



19 फ़रवरी, 2011

मन जाना चाहे

मन जाना चाहे! उस सुदूर 
नील पार्वत्यमालाओं के उसपार,
किसी ध्यानमग्न योगी की भांति 
जो  बैठा ऑंखें मूंद पुरातन कालों से 
एक चित्त, चिर स्थिर, आत्म अनुसन्धान लिए,
शताब्दी गुज़र गए यूँ ही एकाकी 
आग्नेयशैलों में कभी उभरे अग्नि शिखा 
निम्नवर्तीय घाटियों में जन्मे अनगिनत श्रोत 
वन्य पुष्पों में लिपटे असंख्य कालबेल 
सघन श्रावणी जलधाराओं का उत्पात 
कभी ज्येष्ठ की झुलस, न तोड़ पायी उसका 
मौन, न ही भेद पाए झंझा की तीव्र हवाएं !
उसके पाषाणी वक्षों में जागे नित नव 
स्वप्नमयी भूभाग, वृक्षों में खिले फूल 
नीली झीलों से निकले नव प्रजन्मित धाराएँ 
भूकंपीय गुप्त तड़ित न कर पायीं उसे विचलित 
वो युगपुरुष सम दिखलाये हर रात्रि दिशाएं 
आकाशगंगा, तारकवृन्द, चन्द्र किरण झुक 
झुक नमन जताएं !दावानल में भी जो जीवन 
की राह दिखाए, नव कोपल स्वप्न खिलते जाएँ.
-- शांतनु सान्याल 



17 फ़रवरी, 2011

समानांतर रेखाएं

एक अंतहीन पथ का पथिक हूँ मैं -
एकाकी और मीलों लम्बी रात, उध्वस्त आकाश 
बहु कोणों में टूटता चाँद, दिशाहीन धूमकेतु 
उठतीं हैं धूल भरी आंधियां, तो क्या -
लुप्तप्रायः हैं जीवन की परछाइयां फिर भी है 
चलना मुझे, दैत्याकार घाटियाँ हों या 
अंधकारमय सुरंग, गुफाएं या दावानल 
देह बने विषपुरुष, मायावी नागपाश से हूँ मैं 
विमुक्त, अविराम प्रवाहित बैरागी मन,
 थमना न  जाने,एक नयी सुबह की  तलाश 
अनिद्रित मेरी आँखें, देखें प्रतिपल जागृत स्वप्न 
कुम्हलाये शाखों में खिले हैं अनाम फूल 
धूल कण झर झर जाएँ, विकशित होते कोमल 
किशलय, शिशिर बिंदु में डूबी कलियाँ 
लेतीं मधु निश्वास, खंडहर के ईंटों से जागे 
अंकुरित बेल, कवक हटाते कमल नाल 
करे अस्तित्व उजागर-
शतदल की पंखुड़ियों में लिखें जीवन गीत 
कुम्हार के चाकों में डोले मेरा मन 
कोई छुए हौले हौले, दे जाए आकार मनोहर 
बन जाए स्वप्न सुराही सम, आतुर प्यास बुझाने को, 
अंतर्मन में जागें दीप शिखा, देखूं हर 
चेहरे में मुस्कान छलक जाने का दृश्य, 
बन जाऊं मैं पलक किसी सजल आँखों का 
रोक लूँ अप्रत्याशित लय में अश्रु धारा अपनी 
ह्रदय की अनगिनत तंतुओं में बूँद बूँद,
देखूं मैं हर वक़्त एक ही ख्वाब, दुनिया बन जाये 
एक विस्तृत परिधि, हर बिंदु में तुम, हर एक रेखाओं में हम 
 आखिर बिन्दुओं से ही बनतीं हैं रेखाएं,
क्यूँ न बन जाएँ हम सब अनंत समानांतर रेखाएं.
--- शांतनु सान्याल   

13 फ़रवरी, 2011

रात ढलते

उम्मीद हद से आगे न बढ़े इसका भी ख़याल हो
 दिल ग़र खो जाय कहीं उसका न ज़रा भी मलाल हो,
इतना क्या सोचते हो के ख़ुद को ही यूँ  भूल जाओ
न रुके कोई किसे के लिए खुश रहो जहाँ जिस हाल हो,
उस नुक्कड़ में सजती हैं, यूँ महफ़िलें रात ढलते
 तकते हो आसमां,जैसे कोई अनसुलझा इक सवाल हो,
 सूख जाएँ न कहीं मौसमी फूलों के दरीचे,ऐदोस्त !
निकल भी आओ क़फ़स से,जहाँ तुम अभी बहरहाल हो,
थाम भी लो निगाहों के ऐतराब, ख़्वाबों की दुनिया
क़बल इसके के हर सिम्त,पुरसर हंगामा ओ बवाल हो,
इस रात के दामन से हैं कुछ राज़े उलफ़त वाबस्ता
न खुले वो रिश्तों के गिरह,चाहे हर जानिब भूचाल हो,
--- शांतनु सान्याल


04 फ़रवरी, 2011

नज़्म - - ख़्वाबों की बेरुख़ी

कैसे तुम्हें बताएं, आस्मां का वो बिखर जाना
तरसते रहे रातभर, हम इक बूँद रौशनी के लिए.
वो सांसों का इन्क़लाब, ख़्वाबों की बेरुख़ी -
तकते रहे सूनी राहों को, दो पल ख़ुशी के लिए.
जाने कहाँ ठहर से गए सितारों के कारवां -
ख़लाओं में तलाशा उन्हें, बाक़ी ज़िन्दगी के लिए.
हवाओं में तैरते रहे, भीगे अहसास-ऐ-खतूत
तरसे निगाह वादी वादी, बरसने की ज़मीं के लिए.
हर तरफ थे शीशमहल, अक्श धुंधलाया सा
कोई तो आवाज़ दे, ज़िन्दा हूँ मैं इस यकीं के लिए.
.
- - शांतनु सान्याल
.

01 फ़रवरी, 2011

नज़्म - - कोई दस्तक

रौशनदान से उतरती सुनहरी धूप
की तरह, मुठ्ठी भर ख़ुशी मिल जाये कहीं
दालान  के पौधों में जीने की तमन्ना जागे,
बहुत दूर न जाओ छोड़ कर यूँ तन्हां
कोई सुराग़, कोई बहाना, मिलने की आरज़ू
बेख़ुदी में ही सही इक लम्हा रख जाओ कहीं,
इस तरह न भूलो कि याद फिर आ ही न सकें
कोई निशां, कोई दस्तक, सांसों की आहट
उड़ते सफ़ेद बादलों में बरसने की मियाद
तो लिख जाओ कहीं -
यकीं कर लूँ मैं हर सूरत, जीवन बेल खुलकर
संवरना चाहे, पतझर के बाद बहारों का आना
तै हो न हो, ज़रा सा वक़्त मिले कि देख लूँ
गहराइयों कि ज़मीं, कोई वादा, कोई ख्वाहिश
गुलमोहर के शाखों में अपना पता लिख जाओ
कहीं --
--- शांतनु सान्याल     

28 जनवरी, 2011

भूली सुबह की तरह


अभी अभी है चाँद ढला, दूर पहाड़ों में
चाँदनी फिर भी ढकी सी है दूर तक,
तलहटी में उभरें हैं, साँसों के
बादल मन चाहे तुम्हें
देखूं अन्धेरें में
क़िस्मत
की
तरह, बन जाओ कभी तुम रहनुमां, भूल
जाऊं मैं मुश्किल भरे ज़िन्दगी के
रास्ते, कौंधती हैं बिजलियाँ
पूरब में कहीं, बरस भी
जाओ किसी दिन,
दिल की
बस्तियां उजड़ने से पहले,कुछ तो मिले
सुकूं,के उड़ भी आओ कहीं से मसीहा
की  तरह, हर क़दम बोझिल के
टूट टूट जाए  ख्वाबों की
सीढियां, मैं चाहूँ तुम्हें
छूना और तुम हो
के बेख़बर
भूली
सुबह की तरह,
- - शांतनु सान्याल      


25 जनवरी, 2011

सूनापन

अरण्य अनल सम जागे मन की
सुप्त व्यथाएं
दूर कहीं टिटहरी टेर जाय
फिर जीवन में दहके बांस वन,
पल छिन बरसे मेह
झर जाएँ मौलश्री
स्थिर ह्रदय को जैसे दे जाए
दस्तक, कोई विस्मृत सन्देश,
भीगी साँसों में कोई चेहरा
उभरे डूबे बार बार
लहरों से खेले चाँद आँख  मिचौली
हिय उदासीन, जस अधखिली
कुमुद की नत पंखुडियां
रह रह जाय कांप,
रात की अंगडाई तारों से सजी
मेघों ने खोल दिया रात ढलते
सजल शामियाना आहिस्ते आहिस्ते,
खुली आँखों में मरू उद्यान  बसा
सपनों के क़ाफिले रुके ज़रूर
गीतों की बूंदें बरसीं
स्मृतियों ने बांधे नुपुर सुरीले
धड़कनों में था लेकिन सूनापन
आकाश ने उड़ेला पूरा आलोक
हमने चाहा बहुत मुस्कुराएँ
हँसी ओंठों तक पहुँचीं सहमे सहमे
सुबह से पहले बिखर गयीं सब
ओष की बूंदें बन कर .
--- शांतनु सान्याल




  

20 जनवरी, 2011

अदृश्य त्वम् रूप


अदृश्य त्वम् रूप 
पृथ्वी व् आकाश मध्य है, अन्तर्निहित 
अविरल प्रवाहित त्वम् रूप माधुर्य अनंत,
अदृश्य करुणासागर सम कभी वृष्टि रुपी 
तुम जाते हो बरस, कभी शिशुमय क्रंदन, 
धूसर मेघों को दे जाते हो पल में मधु स्पर्श,
तृषित धरा के वक्ष स्थल पर हो तुम ओष
बिंदु, हे अनुपम !अश्रु जल में भी समाहित,
त्वम् दिव्य आलोक निमज्जित सर्व जीवन,
झंझा के विध्वंस अवशेषों में भी तुम हो एक 
आशा की किरण, ज्यों प्लावित भूमिखंड 
में उभर आयें आग्नेय शैल बारम्बार,
इस गहन अंधकार में हो तुम दिग्दर्शक 
कभी खंडित भू प्रस्तर से सहसा हो प्रगट,
कर जाते हो अचंभित, भर जाते हो प्रणय सुधा,
--- शांतनु सान्याल 
painting by - Jone Binzonelli

19 जनवरी, 2011

जीवन किसी तरह भी जी न सके

जीवन किसी तरह भी जी न सके

जीवन किसी तरह भी जी न सके 
बिहान से पहले बिखर गए निशि पुष्प 
अर्धअंकुरित बीजों में थी नमी दो पल, 
अंजनमय मेघ, शपथ  भूल गए,
टूटती सांसों का इतिहास कहीं भी नहीं,
सजल नेहों ने पतझड़ को द्वार 
खटखटाते पाया, जीवन व्यथा अपने 
आप ही भर जाये इस उम्मीद से,
उड़ते पत्तों का मनुहार मन में लिए, 
मरुस्थल  में असंख्य प्रसून  सजाया -
फिर से आँगन में डाली प्रणय रंगोली 
दर्पण की धूल हटाई निमग्न हो कर 
खुद को संवारा हमने, रक्तिम साँझ को 
आना है, आये, यमन रुपी ज़िन्दगी को, 
दुख हो या सुख हमने तो हर पल गाया,
ये और बात है कि तुम स्वरलिपि बन न 
सके, हम जीवन किसी तरह जी न सके !
--- शांतनु सान्याल

07 जनवरी, 2011

स्मृति मेघ

वो श्यामपट अब भी है मौजूद
वही खपरैलों वाली प्राथमिक पाठशाला
जहाँ हमने लिखी थीं बारहखड़ी
उस अरण्य गाँव में हमने सीखी थीं
हिंदी वर्ण माला, पढ़ी थीं -
रसखान और कबीर, हमें याद है
अब तक निराला की - वर दे वीणावादिनी,
 नंगे पांव हमने की थीं प्रभात फेरी,
 उस आम्र कुञ्ज के नीचे न तुम थे
हिंदी न हम थे मराठी या बंगाली
माघ की सिहरन में बिछाए टाट पट्टी
हमने दोहराए संस्कृत सुभाषितानि,
तुम्हें याद हो की न हो,हमने देखी थी
एक सी दुनिया, खेले थे -
नदी पहाड़, लुकछुप, संग गाए
 प्रचलित लोकगीत - इतना इतना पानी -
वो सीमाविहीन मधुरिम एक जगत,
वसंत पंचमी में न तुम थे हिन्दू
न हम ही मुसलमान, एक साथ गुथा
फूलों का हार,गाए थे सरस्वती वंदना
उस गाँव भी आज भी उडती है
धान की ख़ुश्बू हवाओं में,
सरसराते हैं गन्ने के फूल, गोधूली में
अक्सर उड़ते हैं रंगीन स्मृति मेघ
कहीं न कहीं वहीँ आसपास हमारी साँसें
आज भी तकती हैं उस नन्हीं सी नदी को
किसी नई आश लिए -
--- शांतनु सान्याल 

04 जनवरी, 2011

झूठ मूठ ही सही

झूठ मूठ ही सही चलों खेलें, फिर इक बार 
वो कच्ची उम्र की नादानियाँ, 
कुछ छोटे छोटे प्लास्टिक के बर्तन, 
ले आओ मिटटी के दीये बरामदे में 
कहीं हैं पड़े, पिछले दिवाली के 
चलो चलें जीने के नीचे या 
पलंग के किसी एक कोने में 
नन्हीं आँखों की दुनिया बसायें दोबारा 
तुम फिर पुकारो मुझे उसी 
मीठी मासूम मुस्कान लिए 
पप्पू के पापा, मैं कहूँ तुमें पप्पू की 
मम्मी, एक रिश्ता जो कभी हो 
न सका, सोचो ज़रा उसी अंदाज़ में 
कि हम लौट जाएँ उसी सुन्दर 
बचपन की वादियों में 
इस मायावी पृथ्वी से कहीं अधिक 
खूबसूरती है उस जहाँ में, 
कल्पना करो कि हम फिर से छूएं
इक दूजे को पवित्र भावनाओं से,
उसी निश्छल हँसी में तलाशें फिर 
खोई हुई ख़ुशियाँ, चलो फिर एक बार 
घर घर खेलें ---
--- शांतनु सान्याल    
 

26 दिसंबर, 2010

ख़ुदा हाफिज़

सलीब तो उठाली है,
 ज़िन्दगी न जाने और क्या चाहे 
मुझे बिंधते हैं वो तीर व् भालों से 
बेअसर हैं तमाम सज़ाएँ , मैं बहुत पहले 
दर्द को निज़ात दे चुका, पत्थर से मिलो 
ज़रूर मगर फ़ासला रखा करो, 
न जाने किस मोड़ पे क़दम  डगमगा जाएँ,
वो ख़्वाबों की बस्तियां उठ गईं 
मुद्दतों पहले, हीरों के  खदान हैं 
ख़ाली, सौदागर लौट चुके ज़माना हुआ 
दूर तलक है मुसलसल  ख़ामोशी 
बारिश ने भर दिए वो तमाम खदानों को 
वक़्त ने ढक दिए, धूल व् रेत से 
वो टूटे बिखरे मकानात, कहाँ है 
तुम्हारा वो गुलाबी रुमाल, फूल व् 
बेल बूटों से कढ़ा हुआ मेरा नाम ,
कभी मिले ग़र तो लौटा जाना 
आज भी हम खड़े हैं वहीँ, जहाँ  
पे तुमने ख़ुदा हाफिज़ कहा था इकदिन, 
---- शांतनु सान्याल 













19 दिसंबर, 2010

लकीरें

आकाश पार बहती हैं अदृश्य
कुछ सप्तरंगीय प्रवाहें,
एक स्वप्नमयी पृथ्वी शायद
है कहीं अन्तरिक्ष में,
सुप्त शिशु के मंद मंद मुस्कान
में देखा है उसे कभी,

नदी के बिखरे रेत में
किसी ने लिखा था पता उसका
बहुत कोशिश की, पढ़ पायें!
लकीरें जो वक़्त ने
मिटा दिए, चेहरें में उभर आयीं
काश ! उठते ज्वार की
लहरें इन्हें भी बहा लेतीं,

अर्घ्य में थे कुछ शब्द
जो कभी वाक्य न बन पाए
कुछ बूंदें पद चिन्हों में
सिमट कर खो गए वो
कभी मेघ न बन पाए
सुना है ये नदी गर्मियों में
कगार बदल जाती है फिर
कभी मधुमास में मिलेंगे तुमसे !
--- शांतनु सान्याल

11 दिसंबर, 2010

सीने में डूबता कोई माहताब देखा होगा

१. नीचे है, अथाह खाई लो मैं खड़ा हूँ
किनारे, क्या है दिल में तुम्हारे ख़ुदा जाने,
बेपरवाह ये ज़िन्दगी यूँ ही गुज़र जाये
सामने हो तुम, उम्र है कितनी  ख़ुदा जाने,


२. ओष की बूंदें थीं या दर्द के क़तरे
पंखुडियां गुलाब की क्यूँ झुक सी गयीं,
कोई जिस्म पे चला है दहकते पांव
देखते ही उनको सांसें क्यूँ रुक सी गयीं,

३. हमने तो उम्र का बिछौना दे दिया
सर्दियाँ थीं सदीद, चादर नाकाम रही,
तुमने ओढ़ ली ऊनी तश्मीना कम्बल
 यहाँ सिहरन भरी सुबह ओ शाम रही,

४. मुस्कुराने के लिए कोई तो सबब होता
क्या करें बेवजह ही मुस्करा गए,
अश्क छुपाना भी इक सलाहियत है
जान कर भी हम दरवाज़े से टकरा गए,

५. लोग जो हँस पड़े हमने भी साथ दिया
किस लिए इतनी ख़ुशी थी मालूम नहीं,
हम ख़ुद को तलाशते रहे या उनको
ज़िन्दगी थी या ख़ुदकुशी मालूम नहीं,

६.  भीड़ में भी थे सहमे सहमें तन्हां तन्हां
किसी ने  पुकारा ज़रूर, पहचान न पाए,
कब तन्हाईयाँ घिर आयीं घटा बन कर
भीगते गए लेकिन हम उन्हें जान न पाए,

७. लबों को किसी ने छुआ ज़रूर था
बंद पलकों ने कोई ख़्वाब देखा होगा,
गर्म सांसों में नमी  घोल गया कोई
सीने में डूबता कोई माहताब देखा होगा,
- शांतनु सान्याल

04 दिसंबर, 2010

भूमिगत ग्रंथियां

भूमिगत ग्रंथियां भित्तियों को पार
कर गईं, नीड़ की दरारें पूछती हैं
कहाँ व् कैसे तिनकों में परकीय
भावों ने घर किया, हमें तो  पता
ही न चला, हमने तो प्रणय ईंटें
क्रमशः बड़े ही कलात्मक शैली में
सजाया था, सपनों के गारे से,
खिडकियों से झाँकतीं कृष्ण कलि
के फूलों ने कहा- शायद प्रीत में
थी सजलता ज्यादा या अश्रु ही
मिलाना भूल गए, दरारों में भी
जीवन थे, हमने महसूस किया
आत्मीयता की साँसें गिरती
उठतीं हों, जैसे असमय हो जाये
मोहभंग, ग्रंथियों के जनक थे
अपने अति प्रिय, हमने बड़े स्नेह
से उन्हें रोपण किया, सूर्य व्
वर्षा से बचने के लिए, दालान
में थे वो सभी अब तक, लेकिन
कब व् कैसे जड़ों ने आधार भेद,
गृह प्रवेश किया, ये सोच पाते
कि फर्श में स्वप्न हाथों से छूट
कर यूँ बिखरे, जैसे कोई अमूल्य
फूलदानी टूट जाये अकस्मात् -
-- शांतनु सान्याल

03 दिसंबर, 2010

खुद से बाहर कभी,यूँ निकल ही न सके

 ख़याल कि छूट न जाएँ हम कहीं दुनिया की  भीड़ में
 खुद से बाहर कभी,यूँ  निकल ही न सके /

आधी रात किसी ने दी है, कांपती हाथों से दस्तक
सांसों की तपिश, हम पिघल ही न सके /

वो जो कहते हैं, हमसे बेशुमार मुहोब्बत हैं उनको
बारहा चाहा, सांचे में कभी ढल ही न सके /

धनक ने तो बिखेरी हैं रंग ओ नूर उम्र भर ऐ दोस्त
बेमुराद दिल है कि हम मचल ही न सके /

उनकी आहट में भी ख़ुशबू ऐ चमन होता है अक्सर
संदल की तरह मंदिर में बहल ही न सके /

धूप दीप तुलसी शंख की आवाज़े हमें बुलाये हर बार
न जाने क्या नमी है चाह कर जल ही न सके  /

सुलगती  हैं धीमी धीमी लौ से कोई आग सीने में
सारी नदी  है आगे, इक बूंद भी निगल न सके/

बिल्लोरी बदन ले के जाएँ  कहाँ पत्थर के शहर में
ख़ूबसूरत ख्वाबों से,खुद को बदल ही न सके/

खुद से बाहर कभी,यूँ  निकल ही न सके/
---- शांतनु सान्याल

धुँध की गहराइयाँ

धुँध की गहराइयाँ या निगाहों का धोखा
लौटतीं सदाओं ने क्यूँ राह मोड़ लिया

उफ़क़ के पार थे वो सभी कांच के ख़्वाब
बर्फ़ के नाज़ुक परतों में हमें छोड़ दिया,

क़दमों के नीचे था आसमां या झील कोई
चाहा दिल से खेला फिर उसे तोड़ दिया,

इक पुल जो सदियों से था हमारे बीच
पलक झपकते उसे कहीं और जोड़ दिया,

सीने में कहीं है इक गुमशुदा नदी
बहती लहरों का रूख़ तुमने मोड़ दिया,

रेत के वो तमाम घर ढह गए शायद
बड़ी बेदर्दी से जिस्त, तुमने मरोड़ दिया,
लौटतीं सदाओं ने क्यूँ राह मोड़ लिया ,

- - शांतनु सान्याल

ग़ज़ल - - बरसना है तो बरस जाओ

आसमां है कुछ आज मुंह फुलाए, घने बादलों में रुख छुपाये 
बरसना है तो बरस जाओ भी, थम थम के क़हर गिराया न करो,
लटों में उलझ जाती हैं, उमर खय्याम की ख़ूबसूरत रुबाइयाँ 
कांप से जाये है तुम्हारे लब, घबरा के नज़र मिलाया न करो ,
बिखरना ही है ग़र तो समंदर की तरह साहिल को ज़ब्त करें 
मंझधार से उठे लहर की तरह, करीब आ ठहर जाया न करो,
हमने रस्मे उलफ़त, बड़ी खूबी से निभाया, ईमान की मानिंद
संगसार नहीं ये  सर्द बूंदें, हलकी बारिश में यूँ डर जाया न करो, 
निकलो भी कभी खुले मौसम में, खिलते हुए बहार की तरह,
चिलमन से झांकते हुए जाने जाँ, फूलों में रंग भर जाया न करो,
बरसना है तो बरस जाओ भी, थम थम के क़हर गिराया न करो, 
--- शांतनु सान्याल  

01 दिसंबर, 2010

अग्नि वृत्त

कुछ आकृतियाँ शैल चित्रों की तरह जीवन भर अर्थ
की खोज में भटकती हैं, व्यक्तित्व के परिधि में,
त्रिज्या थे वो सभी भावनाएं केंद्र बिंदु को भेद गईं
ज्यामितीय संकेतों ने छला, जीवन गणित था या
कोई महा दर्शन, हम तो केवल छद्म रूपी शतदल
में यूँ उलझ के रह गए कि निशांत का पता न चला,
क्षितिज के आँखों से जब काजल धुले, समुद्र तट
बहुत दूर किसी अपरिचित दिगंत में खो चुका,
प्रतिध्वनियाँ लौट आईं अक्सर हमने तो आवाज़ दी,
किसने किसका हाथ छोड़ा, कौन कहाँ खुद को जोड़ा
बहुत मुश्किल है,समीकरणों का शून्य होना -
किस के माथे दोष मढ़े हमने स्वयं अग्नि वृत्त घेरा,
- - शांतनु सान्याल

क्षणिका - - अरण्य पथ

अरण्य पथ में कुछ किंसुक कुसुम अब तक
पड़े हैं बिखरे, विगत  मधुमास की निशानी
पग चिन्हों तले  कहीं दबे हैं निसर्ग अर्घ्य
या भावनाएं, जीवन तो है लहर अनजानी
मैं डूब जाऊं उस नेह में हर बार हर जनम
प्रीत की गहराइयाँ हैं उनमें जानी पहचानी /
-- शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past