22 मार्च, 2018

तितली या व्याध - पतंग - -

घेरे लगाए हुए वही विस्मित चेहरे और
डमरू की आवाज़, मदारी का वही
जादूभरा अंदाज़, व्यस्क घुटनों
से अंदर झांकता हुआ कोई
बच्चा उम्र से पहले
बुढ़ाता हुआ
देखता
है वही खोया हुआ सपनों का देश। वो -
कोई पारदर्शी - तितली है, या एक
ख़ूबसूरत, लेकिन ख़तरनाक
व्याध - पतंग, कहना
बहुत है मुश्किल,
निरीह शिशु
चाहता
है उसे क़रीब से छूना, महसूस करना।
सभी ख़ामोश हैं पोखर का मटमैला
पानी हो या, अधझुके,  ख़ज़ूर
पेड़ वाले गौरैयों के झुंड,
जंग लगे साइकिल
का रिंग आज
भी है वो
वहीँ एक कोने में पड़ा हुआ लावारिस।
कुछ भी ख़ास नहीं बदला मेरे गाँव
में, ये और बात है कि मेरी
उम्र साठ कब पार कर
गई मुझे कुछ
भी याद
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल 

 

18 मार्च, 2018

कहीं और चलें - -

मायावी अंधकार अपनी जगह अगोचर, ये
ज़रूरी नहीं कि हर एक शरीर की अपनी
ही परछाई हो, महानगर सोया हुआ,
राजपथ ऊंघते हुए, ज़रूरी नहीं
कि सांसों के डूबने के लिए
अंतहीन गहराई हो।
आकाश से उठ
चले हैं, एक
के बाद एक, सभी रौशनी के जागीरदार - -
कांधे पर ज़रा रख लूँ, लहूलुहान वही
आख़री पहर का ख़्वाब, ख़ुदा -
करे मुझ पे भी, सुबह तक
तो कम अज़ कम,  
मसीहाई हो।
अब यूँ भी समेटने को कुछ भी नहीं है मेरे
पास, कुछ उजालों ने लूटा, कुछ अंधेरों
ने जज़्ब किया, चलो चलें हिसाब
किताब से बाहर निकल,
कहीं दूर जहाँ इक
पुरसुकूं  तन्हाई
हो - -

* *
- शांतनु सान्याल



 

16 मार्च, 2018

आधा - अधूरा ख़त - -

फिर मुद्दतों बाद जी चाहता है कि पढ़ें
तुम्हारा वही आधा - अधूरा ख़त,
कुछ  लजाए - सकुचाए से
अल्फ़ाज़, कुछ  नाज़ -
अंदाज़ लिए भीगे
हुए जज़्बात -
अलमस्त।
मेहंदी की तरह कब हाथों से छूट गए
वो सभी मुहोब्बत के नक़्श ओ -
निगार, इक लम्बी सी रात
गुज़री हो जैसे अभी -
अभी, और
पथराई
आँखों में तैरते हों जैसे धुंधभरे ख़ुमार।
आईना देखना कैसे छोड़ दें हम,
कि ज़िन्दगी का सफ़र अभी
है बाक़ी, उन्हें हम से
लेना - देना कुछ
भी न हो
लेकिन हम आज भी हैं सिर्फ़ उन्हीं के
तलबगार।

* *
- शांतनु सान्याल
 

 


15 मार्च, 2018

सुबह से पहले - -

मुझे मालूम है, उन्हें मुद्दतों से 
मेरी तलाश है, है रास्ता
वही पुराना मगर
मंज़र बदल
गए।
वही झील का किनारा, वही - -
परिंदों का डेरा, न जाने
कितने शाम आए,
और यूँ ही ढल
गए। सच
है कि
कुछ तो मेरा, अब तक उनके
पास है, कुछ सीने में हैं
दफ़्न, कुछ आँखों
से निकल
गए।
नज़रबंद सांसों का बाहर
निकलना था मुश्किल,
चिलमन ए जिस्म
में ख़ामोश
वो सभी
जल गए। कोई घायल मुसाफ़िर
 गुज़रा है इन सख़्त राहों से,
शीशे के सभी नाज़ुक
दरीचे अचानक
से दहल
गए।
इक ख़ामोशी जो सारे शहर को -
सुन्न कर गई, जो लोग
समझदार थे वो
सुबह से पहले
संभल
गए। 

* *
- शांतनु सान्याल

 



 

01 मार्च, 2018

रंग ज़ाफ़रानी - -

फीके थे तमाम रंग दुनिया के, शाम
ढले अपने आप उतर गए, कोई
ख़्वाब था आख़री पहर वाला
या निगाहों में तैरती
मृगजल की बूंदे,
साथ तो
चले थे सभी, लेकिन सुबह से पहले -
न जाने लोग किधर गए। बहुत
सहेज कर रखा था तुम्हारा
वही बंद, पुरअसरार
लिफ़ाफ़ा, लेकिन
खोलते ही,
तमाम रंगे ज़ाफ़रानी हवाओं में बिखर
गए। राज़ ए ख़ामोशी रहने दे यूँ ही
गुमशुदा, निगाह की वादियों
में ऐ दोस्त, खिल उठे
हज़ार ख़्वाहिश
तुम्हारे
क़दम जिधर गए। फीके थे तमाम रंग
दुनिया के, शाम ढले अपने आप
उतर गए - -

* *
- शांतनु सान्याल

23 फ़रवरी, 2018

मधुऋतु - -

एक अजीब सी लाजवंती कशिश है
हवाओं में, फिर खिल उठे हैं
पलाश सुदूर मदभरी
फ़िज़ाओं में।
यूँ तो
ज़िन्दगी में उधेड़बुन कुछ कम नहीं,
फिर भी बुरा नहीं, कभी कभार,
रंगीन ख़्वाबों को यूँ बुनना,
अलसभरी निगाहों
में। न पूछ यूँ
घूमा फिरा
कर
इल्म हिसाब ऐ दोस्त, हमेशा सरल -
रेखा पर चलना नहीं आसान,
बहुत सारे मोड़ होते हैं
ज़िन्दगी के राहों
में। ज़रूरी
नहीं कि,
हर
बार उछाला हुआ सिक्का हो विजयी
हमारी चाहों में।

* *
- शांतनु सान्याल


19 फ़रवरी, 2018

डूबते गए - -


सभी आधे - अधूरे हैं, कहीं मेरी परछाइयाँ
कहीं तुम्हारा सूखता हुआ अपनापन,
सारे देह में कभी उग आएं काँटों
के सहस्त्र  कोशिकाएं
और कभी एक
सजल -
स्पर्श भर जाए मीलों लम्बा सूनापन। सेमल
के फूलों सा कभी गिर आए स्वप्न -
फिरकी और उदास  ज़िन्दगी
को दे जाए भोर का
उजलापन।
मोड़ -
विहीन इस रहगुज़र में कोई दरख़्त साया -
दार मिले न मिले, सफ़र अपनी
जगह है जारी यथावत,
जब साहिल पे
उतरे रात
ढले,
किसे याद रहा कहाँ पे थी अथाह गहराई
और कहाँ साँसों का उथलापन।

* *
- शांतनु सान्याल



23 जनवरी, 2018

अदाकारी - -

काश, सजल अहसासों का - -
कोई मरूद्वीप होता
अंतरतम के अंदर,
तो शायद
भटकती हुई सांसों को मिल
जाती कुछ पलों की
राहत। वही
 दालान,
वही दर ओ दीवार, वही आईने
की नामुराद हसरत,
परछाइयों के
शहर में
ख़त्म कहाँ होती हैं चाँदनी रात
की चाहत। पतझड़ की है
अपनी ही मजबूरियां,
क़ुदरत से लड़ना
आसां नहीं,
हर कोई है
अपनी
अपनी जगह इक अदाकार - - -
मुक़्क़दर के मातहत।

* *
- शांतनु सान्याल 

11 जनवरी, 2018

अतृप्त प्यास - -

 कुछ अँधेरे उजालों के टुकड़े, कुछ
बूंद आसमानी शायद रात
ढले छलके थे मेरे
नयन कोरों
से, या
आख़री पहर तुमने छुआ था मुझे
निशि पुष्प की तरह निःशब्द
मख़मली अहसास लिए।
कोई रेशमी सिहरन
जागी थी श्वास
तंतुओं में,
या
कदाचित, ज़िन्दगी लौट आई थी -
पुनर्जागरण की प्यास लिए।

* *
- शांतनु सान्याल










31 दिसंबर, 2017

मनुहार - -

न बांध पाए लाख कोशिशों के बाद,
बहुत चंचल थे नेह गंध, मौसम
बदलते ही तितलियों के
संग, बहुत दूर कहीं
उड़ गए। वक़्त
कहाँ ठहरा
है किसी के लिए, चाहे तुम पुकारा
करो ले के किसी का नाम
अंतहीन, जनशून्य
सा कोई स्टेशन
और दूर
तक बिखरे हुए सूखे पत्तों के सिवा
कुछ नहीं होता। मुझे मालूम
है दस्तकों का फ़रेब,
फिर भी, जी
चाहता
कि, फिर सुबह उजालों का उपहार दे
जाए, अधखिले फूलों को उन्मुक्त
खिलने का प्यार दे जाए।

* *
- शांतनु सान्याल

19 दिसंबर, 2017

तुम्हारा शहर - -

न जाने किस दिगंत पर जा उभरे,
वो टूटे ख़्वाब के कतरन, जब
नींद से जागे तो पाया हर
तरफ बिखरे हुए थे
धुंधलाए दर्पण।
कोई आहट
है जो
सीने पे आ ठहर जाती है मुस्तक़ल,
ख़ुश्बू की तरह कोई छुअन, छू के
मेरी रूह की परतें, पल में हो
जाती हैं ओझल। कौन
है वो, न जाने जो
खेलता है मेरी
सांसों से
आख़री पहर, इक अंतहीन ख़ामोशी
कोहरे में लिपटी हुई, सुनसान
राहों के बीच कहीं गुम होता
 है तब, रौशनियों में डूबा
हुआ तुम्हारा
शहर।

* *
- शांतनु सान्याल



23 अक्टूबर, 2017

फेरीवाला - -

अख़बार की सुर्ख़ियों से
 कभी निकल न पाए
ख़्वाब, फिर
अलसुबह,
घंटियां बजा रहा है वही 
फेरीवाला। आवाज़
तो है वही
जानी
पहचानी मुद्दतों से सुनी,
मुखौटों के पीछे कभी
वो साफ़ मुंडा
कभी
दाढ़ीवाला। चारों तरफ
है सैलाब और लोग
अपनी अपनी
छतों पर,
 दीवार ढहने तक  नहीं
आया वो  जांबाज 
सीढ़ीवाला।
तमाम
उम्मीद बंद हैं, जंग
लगे संदूक में
यहाँ - वहाँ,
उंगलियों
 में नचाता है वो - - -
अक्सर रंगीन
चाबीवाला।

* *
- शांतनु सान्याल

22 अक्टूबर, 2017

आसान तर्जुमा - -

ज़िन्दगी इतनी भी मुश्किल
ज़ुबां नहीं, यूँ तो मैंने हर
इक सांस में जिया है
उनको अफ़सोस
यही कि,
उनके पास  कोई तर्जुमा नहीं।
जिस्म ओ जां से उठ कर
रूह तक सुलगता रहा,
कहने को हद ए
नज़र रौशन
कोई शमा नहीं। सारी दुनिया
इक दायरा ए कूचे में सिमट
आई कौन कहता है कि
दिल में  वजूद ए
आसमां नहीं।
सब कुछ तो है यहाँ फिर भी
वो उदास रहता है, भीड़
भरे शहर में शायद
उसका कोई
हमनवा
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल

05 अक्टूबर, 2017

मुखौटों के परे - -

 ऊसर खेत, मेघविहीन आकाश और
सांझ बेला के यात्री, आईने के
इस पार हूँ मैं, और उस
पार मौन अट्टहास।
विवर्ण दीवारें,
उखड़ते
पलस्तर, जीर्ण शीर्ण अतीत का श्वेत 
श्याम अलबम, अधखुली खिड़की
से झांकता हो जैसे लौटता
हुआ मधुमास। तुम
साथ हो या नहीं,
अब जैसे
कोई
फ़र्क़ पड़ता नहीं, सांध्य आरती, देह
से उठता हुआ धुआं, लहरों पर
बहते हुए असंख्य प्रदीप,
क्रमशः चप्पुओं की
आवाज़ थमती
हुई, और
धीरे -
धीरे अंधकार, अस्तित्व को अपने में -
अन्तःसलिल करती हुई - - अब
सिर्फ़ है कुछ अपने पास, तो
वो है अवकाश ही
अवकाश।

* *
- शांतनु सान्याल 


01 अक्टूबर, 2017

उसने कहा था - -

बहोत कुछ उसने कहा
था यूँ ख़ामोश
निगाहों से
ताउम्र
आती रही सदायें, यूँ - -
ख़ानाबदोश राहों
से। उम्र की
तहरीर
थी कि बढ़ती रही  दम -
ब - दम हाशिए तक
न पहुँच पाए
नूर उन
ख़्वाबगाहों से। हर एक
चेहरे पे था गोया
कोई इसरार
ए पोशीदा,
हमने
भी सीख लिया जीना
इन पागल हवाओं
से। रास्ता नहीं
मिलता है
कभी
मख़मली या मनचाहा,
जब दवा ख़ुद
निकल
आए
दिल के रिसते घाओं से,
ज़िन्दगी ख़ुद ब ख़ुद
उभर आती है दर्द
के पनाहों
से।

* *
- शांतनु सान्याल


21 सितंबर, 2017

दरमियान ए असल ओ सूद - -

तमाम अशराफ़िया* उनकी महफ़िल -
में रहें मौजूद, हमारी दुनिया ख़ुश
है लरज़ते ज़मीन के बावजूद।
ख़ौफ़ज़दा रहें वो, जो हों
शीशमहल के 
रहने वाले,
हमारे इर्दगिर्द है पत्थरों की इक दिवार
लामहदूद। बियाबां में राह तलाशने
के, हैं हम जन्म से माहिर रूकती 
नहीं ये ज़िन्दगी,चाहे क़दम
रहें खूं आलूद। बिरादरी
है अपनी आबाद,
बर हस्ब, 
राह ऐ  फ़कीरी, वो उलझे रहें उम्र भर -
दरमियान ए असल ओ सूद।

* *
- शांतनु सान्याल 

* संभ्रांत लोग 

16 सितंबर, 2017

जाली मुस्कान - -

सच बोलने का हासिल हमसे पूछो
न यारों तमाम वाबस्तगी इक
पल में निकले  बेगाने।
उनके हाथों में
था यूँ भी
इंसाफ़ का तराज़ू, दलील ए जुर्म, -
हम जाने या सिर्फ ख़ुदा
जाने। ख़ामोश था
शहर, जब पा
ए ज़ंजीर
हम गुज़रे, शाम ढलने से पहले, - -
वो लगे महफ़िल सजाने।
वादी ए तारीख़ पे,
वीरानगी के
सिवा
कुछ भी नहीं, यहाँ अब कोई नहीं
आता रस्मो रिवाज निभाने।
मुद्दतों बाद वो मिले
ज़रूर लेकिन
बेरुख़ी
ओढ़े हुए, जाली मुस्कानों में थे - -
छुपे हुए अनगिनत  बहाने।

* *
- शांतनु सान्याल



 

09 सितंबर, 2017

दूर तक कोई नहीं - -

वैसे तो यहाँ  रहनुमाओं की
कोई कमी नहीं, फिर भी
ज़िन्दगी लौट आती
है अक्सर किसी
अवितरित
लिफ़ाफ़े की तरह, उम्र से
पहले बुढ़ापा ओढ़े हुए, 
दहलीज़ पर अपने,
बेतरतीब से
पड़े हुए।
तुम्हारे और मेरे दरमियान
आज भी है मौजूद शायद
वही पुराना पुल,
 हालाँकि
वक़्त ने बहती नदी को,
बहोत पहले ही चुरा
लिया हमसे, न
अब कोई
किनारा
रहा बाक़ी, और नहीं क़दमों
के निशां दूर तक, दस्तूर
ए ज़माने को बदलना
इतना भी
आसान
नहीं, माथे  से जब क़फ़न
हमने उतारा तो देखा,
तनहा खड़े थे हम
बीच चौक पर,
और ओझल
थे सभी
कारवां दूर तक।

* *
- शांतनु सान्याल

19 अगस्त, 2017

कुछ बूंदें - -

कुछ बूंद उन शबनमी निगाह के,
कुछ दर्द मेरे सीने के, यही
सब तो हैं ख़ूबसूरत
वजूहात, बिंदास
मेरे जीने के।
वो आज
भी है दिलकश ओ हंसीं, पहले से 
बेशतर कहीं, उस जादुई -
रूमान से, यूँ दिल
मेरा भी, 
बेअसर
नहीं।
अभी अभी तो सजी है, मजलिस -
ए -आसमां दूर तक. बढे और
ज़ियादा हौले - हौले,
जज़्बात ए
कारवां
दूर तक। तिलस्म - ए - निगाह
का अभी रसूख़ ओ असर
बाक़ी है, अभी तो है
सिर्फ़ आग़ाज़
ए शब,
अभी कामिल सहर बाक़ी है - - -

* *
- शांतनु सान्याल

 







02 अगस्त, 2017

अभी तो रात बाक़ी है - -

लौटते कभी नहीं उद्गम की ओर, बहुत नाज़ुक
होते हैं नेह के धारे, ढलानों का मोह भुला
देता है धीरे - धीरे,  बचपन के सभी
मासूम किनारे । हर शख़्स
यहाँ है खोज में,  कोई
न कोई दरख़्त
सायादार,
चंद लम्हात के हैं सभी अनुबंध, फिर ख़ूबसूरती -
से हो लें दरकिनार। न जाने कहाँ उड़ा ले
जाए, इन मौसमी हवाओं का कोई
ऐतबार नहीं, उगते सूरज के
सभी हैं पैरोकार यहाँ,
अंधकारमय  राहों
का यहाँ
कोई मददगार नहीं। सुबह की तलाश तनहा चले
बदस्तूर, कारवां नहीं देखता मुड़ कर घायल
मुसाफ़िरों को, इन्क़लाब, ख़ुद तलाशती
है भीड़ में, लहूलुहान हाथों में लिए
हुए जलते मशाल, उन जांबाज़
सिरफ़िरों को।

* *
- शांतनु सान्याल



18 जुलाई, 2017

बज़्म -ए -ज़िन्दगी - -

 ख़्वाहिशों का यूँ भी कोई किनारा नहीं होता,

इक बेमौज नदी है, कोई बेसदा बहती हुई -
डूबनेवाले का यहाँ कोई भी सहारा नहीं होता।

जब आग लगी हो सारे शहर में बेलगाम - -
तब अपने - ग़ैर में कोई बँटवारा नहीं होता।

बहुत मुश्किल से बनते हैं, घरौंदे मेरे दोस्त -
अपनी मर्ज़ी से कोई यूँ ही बंजारा नहीं होता।

सिर्फ़ समझ का है उलटफेर, ऐ ईमानवालों !
हरगिज ख़ुदा, हमारा या तुम्हारा नहीं होता।

बज़्म -ए -ज़िन्दगी की है अपनी ही चाँद रात,
हर टूटनेवाला क़तरा नामी सितारा नहीं होता।

* *
- शांतनु सान्याल 

02 जून, 2017

सजल अभिलाष - -

वो चीख जो ख़ामोश हो कर भी,
भेद जाएँ, क्षितिज की
दीवारें, न बाँट इस
ज़मीन को इस
दर्ज़ा, कि
हर
टुकड़े से निकले दुःखी माँ की - -
आवाज़, और बन जाए ये
ख़ूबसूरत दुनिया महज़
किसी वृद्धाश्रमीय
अभिशाप। न
जाने
कौन सा ईश है तुम्हारा, कभी - -
फ़ुरसत मिले तो हमें भी
उनसे मिलवाओ,
हमारा ख़ुदा,
पत्थर
का
हो कर भी ज़िन्दगी नहीं लेता। न
जाने किस स्वर्गलोक की है
उनकी कल्पना, हमारी
ख़्वाहिश है बहुत
सरल, किसी
नवजात
बच्चे
की एक निश्छल हंसी और रात ढले
फूलों पर गिरती हुई मद्धम -
मद्धम  कुछ सजल
बूंदें।

* *
- शांतनु सान्याल

31 मई, 2017

अगला दरवाज़ा - -

 रात के आख़री पहर, सर्द हवाओं
के हमसफ़र, कभी तो गुज़रो
यूँ ही बेख़ुदी में इस
रहगुज़र।
वो तमाम कागज़ी नाव डूब गए
रफ़्ता - रफ़्ता, किनारों में
अब नहीं बसते
जुगनुओं के
शहर। वो
मांगते हैंअक्सर हम से वफ़ादारी
का सबूत, जो  लोग ओढ़े रहे,
फ़रेब का लबादा उम्र भर।
चेहरे और मुखौटे में
यहाँ तफ़ावत
नहीं आसां,
हाथ तो
मिलते
 हैं मगर, दिल होता है बेख़बर। चलो 
किसी बहाने ही  सही उसने 
याद किया, वरना अगला
दरवाज़ा भी यहाँ होता
है बेअसर। 

* *
- शांतनु सान्याल
 

22 मई, 2017

रौशनी की बूंद - -

 कुछ कच्चे ख़्वाब टूट जाते हैं सुबह से
पहले, और कुछ तपते हैं उम्र भर,
फिर भी कहीं न कहीं सूरज
से शिकायत रह जाती
है दिल ही दिल
में, काश !
नरम
धूप में खिलता मुरझाया बचपन और - -
ख़्वाबों को मिलते धीरे धीरे एक
मुश्त तपन, लेकिन नियति
के आगे सब कुछ जैसे
होता है अर्थहीन,
कब कोंपल
बन जाए
एक
धूसर वृक्ष कहना नहीं सहज, देह में रहते
हैं केवल अस्थिपंजर, और सूरज के
दिए हज़ारों दग्ध निशान, फिर
भी जीवन सेमल की तरह
खिला रहता है सुबह
शाम, सीने में
समेटे
अनगिनत कांटों  के गुलिस्तान, सजाता
है वो हर हाल में लेकिन, नाज़ुक
ख़्वाबों के बियाबान।

* *
- शांतनु सान्याल

10 मई, 2017

निमिष मात्र - -

बिन कुछ कहे, बिन कुछ बताए, साथ चलते
चलते, न जाने कब और कहाँ निःशब्द
मुड़ गए वो तमाम सहयात्री।
असल में बहुत मुश्किल
है जीवन भर का
साथ निभाना,
कुछ न
चाह कर भी बदल जाते हैं रास्ता अपना, कुछ
यूँ ही बंधे रहते हैं मजबूरियों की बेड़ियाँ
पांवों में डाल कर। न जाने वो कौन
थे जिन्होंने लिखी थी रूहानी
प्रणय कहानियाँ, जन्म - 
जन्मांतर के बंधनों
पर मख़मली
मुहर की
निशानियाँ। कोई भी साथ नहीं चलता उम्रभर,
वस्तुतः सब कुछ बंधा है, निमिष मात्र
की झिलमिलाहट पर। कौन किस
मोड़ पर अकेला छोड़ जाए,
कहना नहीं आसान।
यहाँ तक की
प्रतिबिम्ब
भी
बहुधा मांगता है मौजूद होने का एक मुश्त - -
प्रमाण।

* *
- शांतनु सान्याल






08 मई, 2017

ये सोच कर अच्छा लगता है - -

बेवजह ही हम सोचते हैं कल सुबह
के वास्ते, जबकि पल में क्या
हो कहना है मुश्किल,
रोज़ सींचता हूँ
मैं गैलरी
के उस नन्हें से पौधे को, सोचता हूँ
कि कब उसमें फूल खिलेंगे,
और कब गन्धकोष से
सुगंध बिखरेंगे,
हालाँकि
हर चीज़ बंधा है अपनी जगह काल
चक्र से, फिर भी सपनों की
भूमि में सैर करना अच्छा
लगता है। मुझे मालूम
है किसी को भी
अपना बनाना
इतना भी
आसान नहीं, फिर भी रोज़ सुबह -
सवेरे, पक्षियों को बाजरी देना
अच्छा लगता है, उनका
यूँ निर्भय हो कर
पास आना
और
कौतूहल दृष्टि लिए देखना दिल को
सुकून देता है तपती  दुपहरी
में यूँ मैनों का चहचहाना,
अंतर्मन को कुछ
अलग तरह
से
पुलकित कर जाता है। माटी के - -
कटोरों में जल भरना अच्छा
लगता है, मालूम है
मुझको रस्मे
दुनिया
फिर भी नन्हें क़दमों को सहारा देना
अच्छा लगता है। पक्षी हों या
पौधे या मासूम बच्चों की
निर्मल हंसी, सब एक
दिन अपनी
तरह से
खिलेंगे, अपनी तरह से उड़ेगें, ये - -
सोच कर जीवन सार्थक
लगता है।

* *
- शांतनु सान्याल


07 मई, 2017

उन्मुक्त अभियान - -

रिश्तों के ग्राफ, सागरमुखी नदी,अहाते
की धूप, स्थिर कहाँ होते हैं, मौसम
के साथ बदल जाते हैं अपना
रास्ता, कुछ उकताहट,
कुछ मीठापन
रह जाता
है अपने साथ। यूँ तो बड़ी नज़ाकत से -
उसने, दिल के संदूक में तह किया
था मेरे हिस्से के रौशनी को,
लेकिन वक़्त ने आख़िर
छोड़ दी सिलवटों
के निशान।
जो भी
हो अच्छा लगता है नाज़ुक तितलियों का
यूँ हथेली पर आ उड़ जाना, मेघों
का ईशानकोण में उभरना,
अनाहूत नीम सर्द हवाओं
का शाम ढले
धीरे धीरे
बहना। दरअसल ज़िन्दगी को चाहिए कभी
कभी, इक मुश्त कबूतरों की उड़ान,
बहुत दूर, उन्मुक्त अभियान।

* *
- शांतनु सान्याल

06 मई, 2017

मेरे आसपास - -

जो कुछ टूटा फूटा बिखरा हुआ सा था
वो सभी तो मेरा अपना था, किसे
स्वीकार करें और किसे त्याग
करें, कहाँ मिलता है इस
दुनिया में मन वांछित
सुख। हमने भी
रफ़ू करके
जीना
सीख लिया। जो कुछ भी था अपने पास
बस उसी को भाग्य समझ लिया,
कुछ बेरंग दीवारों पर हमने
टांग दिए पुराने कैलेण्डर,
रंग विहीन फर्निचरों
पर चढ़ा दिए
चटक
रंगों के सस्ते आवरण, आईने की भी
शिकायत दूर की, गीले कपड़े से
उसे पोंछ दिया, लेकिन
बिम्ब को संवारना
नहीं था सहज,
अतएव
उसे सहर्ष स्वीकार किया, जैसा भी था
अपना जीवन, उसे हमने भरपूर
जिया। आए हो बरसों बाद
ज़रा बैठो, कुछ सुनो,
कुछ सुनाओ, न
देखो मेरे
आसपास, ये सभी आत्मीय स्वजन हैं -
मेरे, ज़रा से फटे पुराने ज़रूर हैं,
जब देह में ही दरारें निकल
आएं तब इन निर्जीव
वस्तुओं की क्या
बिसात।
समय अपना सूद हर हाल में वसूलता
है और छोड़ जाता है झुर्रियों के
निशान, जंग लगे परतों पर
लिख जाता है अतीत
के अहंकारी
गान।

* *
- शांतनु सान्याल



05 मई, 2017

मौन आर्तनाद - -

तमाम लेनदेन रहते हैं निस्तब्ध से
जब उतरती है, सांझ दबे पाँव
पीपल तले, देह में लपेटे
रहस्यमयी अंधकार।
पुरातन मंदिर
के पट
जब होते हैं बंद, जीवन चक्र होता
है पुनः जागृत। सांध्य प्रदीप
के उठते धूम्र वलय
के साथ फिर
सजते हैं
राजपथ के मीनाबाज़ार। कुछ मृत
सीपों के खोल, कुछ वीरान
निगाहों के मरुस्थल,
कुछ दम तोड़तीं
समंदर की
लहरें
लिख जाती हैं गीले रेत पर जीवन
की कुछ अनकही कहानी,
कुछ अभिशप्त कथा
जो हैं यथावत
अपनी
जगह अडिग -अचल, कहने को - 
सारी पृथ्वी का रूप - रंग हो
चुका है बदल, लेकिन
नग्न सत्य है अपनी
जगह अविचल।
वही सजल
नेहों से
तकती, थकीहारी रात्रि करती है
पुनः विहान का अभिवादन,
स्व विलीन हो कर नव
सृजन की ओर
अग्रसर।

* *
- शांतनु सान्याल

04 मई, 2017

सभी को चाहिए - -

सभी को चाहिए कहीं न कहीं कुछ पल
सुकून भरा, कुछ महकते हुए दिन
कुछ खिलती हुईं रातें, कुछ
ख़ालिस अपनापन, कुछ
ख़ामोश निगाहों की
बातें | सभी को
चाहिए
कभी न कभी, कुछ नज़दीकियों की - -
गर्माहट, कुछ सर्दियों के ढलते
दिन, कुछ जाने पहचाने
दिल को छूते हुए
मधुरिम से
आहट,
सभी को चाहिए किसी न किसी मोड़ पर
मुन्तज़िर चेहरे, कुछ गुलाबी मुस्कान,
कुछ ख़ुश्बुओं  में डूबे हुए कलरव,
कुछ खुला खुला सा नीला
आसमान, तमाम
मुखौटों से
दूर
कोई इक सच्चा इंसान, सभी को चाहिए
कुछ पल के लिए ही सही सभी दुःख
दर्द से अवसान |

* *
- शांतनु सान्याल 

 

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