नदी पहाड़ का खेल खेलते हुए, बचपन
में कहीं मिला था एक घिसा हुआ
कांच का टुकड़ा, किसी दूर -
बीन से टूट कर गिरा
था शायद, बस
वहीं से
धुंधला गई थी ये पृथ्वी, आकाश बन -
गया था चिर धूसर, मिट्टी के घर
बनाते हुए कहीं मिला था
कभी एक स्फटिक
का टुकड़ा बस
वहीं से
चाहतों को, कदाचित लगा था एक - -
अभिशप्त ग्रहण, आजन्म जिस
से न मिल सकी मुक्ति,
आँख मिचौली के
उस खेल में
कौन,
किस, कोने में जा छुपा, आज तक - -
कुछ भी पता न चला, बस वहीं
से शुरू हुई थी अंतर्यात्रा,
कभी किसी अलस
दोपहरी में हम
ने किया
था
माचिस फोन का आविष्कार, मोह - -
का धागा बांधा था अपने दरमियां,
बस वहीं से ज़िन्दगी ढूंढ रही
है विलोपित शब्दों का
अर्थ - -
* *
- - शांतनु सान्याल

गहन रचना है, बहुत गहनतम विचारों से परिपूर्ण।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंगहरे अर्थ एक खास अंदाज में।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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