11 जून, 2015

असमाप्त अन्तर्यात्रा - -

 उस अंतिम छोर में, कोई प्रतीक्षारत
नहीं और इस मोड़ में भी, मैं
रहा सदैव एकाकी, बूढ़ा
बरगद, सिमटती
नदी, विलीन
हुए सब
सांध्य कोलाहल, उड़ गए सुदूर सभी
प्रवासी पाखी। पिघली है बर्फ़
वादियों में, या फिर दिल
में जगी है कोई
आस पुरानी,
गोधूलि
बेला, सिंदूरी आकाश, तुलसी तले - -
माटी - प्रदीप, वही अनवरत
झुर्रियों से उभरती हुई
तेरी मेरी जीवन
कहानी।
वो तमाम स्मृति कपाट अपने आप
जब हो चलें बंद, तब अंतर पट
खोले नव दिगंत द्वार,
निरंतर असमाप्त
अन्तर्यात्रा !
कोई न
था एक मेरे अलावा उस भूल - भुलैया
के उस पार।

* *
- शांतनु सान्याल
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dusan djukaric art

09 जून, 2015

वीरान रहगुज़र - -

न कर इतनी मुहोब्बत कि पंछी भूल
जाए उड़ान भरना, कर ले ख़ुद
को ख़ुद तक ही मनहसर,*
और बन जाए ये
जिस्म महज़
एक
ख़ूबसूरत पिंजर। सामने हो खुला - -
आसमान, चाँद, सितारे, और
आकाशगंगा, बेबस रूह
तलाशे लेकिन टूटे
पंख अपना।
रंगीन
सपनों के शल्क लिए ज़िन्दगी न बन
जाए कहीं बंजर। ज़रूरत से
ज़्यादा की चाहत न
कर दे उजाड़
कहीं
दिलों की बस्ती,  दूर तक न रह जाएँ
कहीं वीरान रहगुज़र। न कर
इतनी मुहोब्बत कि पंछी
भूल जाए उड़ान
भरना, कर
ले ख़ुद
को ख़ुद तक ही मनहसर, - - - - - -

* *
- शांतनु सान्याल
* सिमित
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07 जून, 2015

इक अजनबी - -

न उजाड़ यूँ लम्हों में जज़्बात ए शहर,
इक ज़िन्दगी भी कम है इसे
जगमगाने के लिए।
क़दमों में जड़े
हों ज़ंजीर
और
नंगी पीठ पे उभरे दाग़ ए चाबुक, ये -
सौगात भी कम हैं मुहोब्बत में,
यूँ हद से गुज़र जाने के
लिए। वो कोई
इंतहाई
दीवाना था या ख़ालिस रूह, यूँ उठाए
फिरता रहा काँधे पे, पोशीदा
सलीब अपना, किसी
ने उसे नहीं
देखा,
न किसी ने पहचाना ही, लहूलुहान वो
गुज़रता रहा भीड़ में तनहा,
इंसानियत की सज़ा
पाने के लिए।
न उजाड़
यूँ लम्हों में जज़्बात ए शहर, इक - -
ज़िन्दगी भी कम है इसे
जगमगाने के लिए।
* *
- शांतनु सान्याल
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04 जून, 2015

गुमशुदा नदी - -

चलो फिर आज, सजल खिड़कियों
में कुछ जलरंग तसवीर उकेरें,
कुछ रंग जो छूट गए
अतीत के पन्नों
में कहीं,
चलो फिर आज, धूसर आकाश में
यूँ ही स्मृति अबीर बिखेरें।
कुछ काग़ज़ के नाव
रुके रुके से हैं,
हलकी
बारिश की चाह लिए, कुछ नन्हें -
नन्हें, गगन - धूलि फिर हैं
उभरने को बेक़रार,
चलों फिर खेलें
नदी -पहाड़
या लुक - छुप की वो छोटी छोटी -
मासूम अय्यारियां, फिर
सदियों से गुमशुदा
नदी है छलकने
को तैयार ।

* *
- शांतनु सान्याल
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26 मई, 2015

चलो साँझा कर लें - -

ये अंधेरे - उजालों के हैं खेल सारे,
कभी चाँद रात लगे फीकी -
फीकी और कभी पहलू
में उतरें सितारे।
अजीब सी
है ये उतरती दरिया किस ओर जा
मुड़े कहना नहीं आसां, कभी
तुम हो इस तरफ़, और
कभी हम दूर उस
किनारे।
यूँ ही कश्मकश में न गुज़र जाए -
ये ज़िन्दगी, चलो साँझा कर
लें कुछ दर्द हमारे कुछ
ग़म तुम्हारे।
वक़्त से
जीतना है बहोत मुश्किल, तक़दीर
से शिकवा लाज़िम नहीं,चलता
रहे यूँ ही आँख - मिचौनी
कभी यूँ ही जीता
दो मुझ को भी
झूठमूठ
ही, बचपन वाले वही दूधभात के
सहारे। ये अंधेरे - उजालों
के हैं खेल सारे,
कभी चाँद
रात लगे फीकी - फीकी और कभी
पहलू में उतरें सितारे।

* *
- शांतनु सान्याल
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23 मई, 2015

अधूरापन - -

अधूरापन है ज़िन्दगी की हक़ीक़त
यहाँ कोई शख़्स कामिल नहीं,
यूँ तो आज़माइशों की
अपनी अलग है
ख़ूबसूरती,
तुझ से मिल कर दिल को बहोत ही
सुकून मिलता है, फिर भी ये
दोस्त, तू मेरी मंज़िल
नहीं, बारहा
उठती
गिरती हैं जज़्बात की लहरें कुछ -
दूर तक जातीं भी ज़रूर हैं,
जिसे सोचते रहे हम
इक आख़री
किनारा,
क़रीब पहुँचने पे पता चला कि वो
है महज इक तैरता जज़ीरा,
समंदर का कोई
साहिल नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल
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19 मई, 2015

अपनापन - -

नाम - निहाद थे वो तमाम दावे उनके,
कोई किसी के लिए नहीं है मुंतज़िर
यहाँ, जो छूट गए भीड़ में कहीं,
रफ़्ता - रफ़्ता वक़्त उन्हें
इक दिन भूला
देता है।
न बढ़ा ख़ुलूस ए शिद्दत इस क़दर मेरे
दोस्त, कि निगाहों में बेवक़्त ही
अब्र छा जाएँ, ये अपनापन
है बहोत जानलेवा,
हँसते - हँसते
इक दिन
बहोत रूला देता है। जो छूट गए भीड़
में कहीं, रफ़्ता - रफ़्ता वक़्त
उन्हें इक दिन भूला
देता है।

* *
- शांतनु सान्याल
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15 मई, 2015

अनबुझ प्यास - -

कहाँ ज़िन्दगी में, हर ख़्वाब
को हक़ीक़त की ज़मीं
मिलती है,
कोई भी नहीं मुकम्मल इस
जहां में, कुछ न कुछ
तो कमी
रहती है,कभी भरे बरसात में
भी रहती है, सदियों
की अनबुझी
प्यास,कभी इक बूँद के लिए
सुलगती साँस थमी
रहती  है,
न बढ़ा ख़्वाहिशों की फ़ेहरिश्त
इस तरह कि ज़िन्दगी ही
कम पड़ जाए,
जिस्म तो है महज मामला ए
ख़ाक  लेकिन न जाने
क्यूँ रूह -
ए - तिश्नगी बनी रहती है, - -

* *
- शांतनु सान्याल
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art by alisa wilcher

28 अप्रैल, 2015

अंतहीन गहराइयों में - -

जब समंदर की लहरों में आ जाए इक
ठहराव सा, और रात डूब चली
हो अंतहीन गहराइयों में,
तुम्हें पाता हूँ, मैं
बहोत क़रीब
अपने, तब जिस्म मेरा बेजान सा और
तुम फिरती हो कहीं मेरी परछाइयों
में। चाँदनी का लिबास ओढ़े
तुम खेलती हो मेरे
वजूद से यूँ
रात भर, गोया आसमां ओ बादलों के -
दरमियां, है कोई  पुरअसरार
इक़रारनामा, किसी
लाफ़ानी ख़ुश्बू
की तरह
तुम बसती हो कहीं, मेरी रूह की अथाह
तन्हाइयों में - -

* *
- शांतनु सान्याल
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Clair De Lune, by Cyril Penny.jpg

15 अप्रैल, 2015

कुछ मौसमी फूल सजाए रखिए - -

शायद  वो कभी आए; सरे बज़्म भूली
याद की तरह, अपने  दर्द ओ
अलम को यूँ ही सहलाए
रखिए। 
वादियों में फिर धूप खिली है सहमी - -
सहमी, अहाते दिल के कुछ
मौसमी फूल सजाए
रखिए।
न जाने किस मोड़ पे उसका पता लिखा
हो, क़दीम ख़तों से यूँ ही दिल को
बहलाए रखिए।
हर एक दर
ओ बाम पे हैं यूँ तो चिराग़ रौशन, अंधेरों
से फिर भी ज़रा दोस्ती निभाए
रखिए। चाँद छुपते ही
फिर जागी हैं
किनारे
की सिसकियाँ, परछाइयों से गाहे बगाहे
ज़रा दामन बचाए रखिए। ये
आईना है बहोत ज़िद्दी;
कोई भी सुलह
नहीं करता,
बीते  लम्हात के सभी अक्स दिल में - -
बसाए रखिए। नाज़ुक थे सभी
रिश्ते; टूट गए आहिस्ता
आहिस्ता,
फिर भी मुस्कुराने का गुमां यूँ ही बनाए
रखिए। निगाह अश्क से हैं लबरेज़;
ओठों पे अहसास शबनमी,
दिल ए बियाबां को
यूँ ही बारहा
महकाए रखिए। शायद  वो कभी आए;
सरे बज़्म भूली याद की तरह,
अपने  दर्द ओ अलम
को यूँ ही सहलाए
रखिए।  

* *
- शांतनु सान्याल
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13 अप्रैल, 2015

सुंदरता की परिभाषा - -

सुंदरता की परिभाषा किताबों में नहीं,
मोतियों की तरह सीप के दिल
में, शायद रहती है वो कहीं,
कुछ गुमसुम सी,
कुछ सहमी
सहमी,
सजल आँखों के तीर उभरती है, वो -
अक्सर बारूह नज़र के सामने,
उसका पता शायर के
ख़्वाबों में नहीं।
सुंदरता की परिभाषा किताबों में नहीं।
न रूप न रंग, न कोई उपासना,
कभी अदृश्य, और कभी
वो इक मुखरित
प्रार्थना,
अहसास ए नफ़्स अतर, कभी दर्द की
अंतहीन लहर, दिल की रगों में
शायद वो बसता हैं कहीं,
क़ीमती असबाबों
में नहीं,
सुंदरता की परिभाषा किताबों में नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल
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09 अप्रैल, 2015

कुछ भी याद नहीं - -

बूंद बूंद गिरती रही दिल पे तेरी, शबनमी
ओंठों की नमी, क़तरा क़तरा पिघलता
रहा रात भर, मेरे सीने की ज़मीं।
आसमां, चाँद  ओ सितारे,
न जाने कब उभरे
और कब
न जाने डूब गए सारे। इक तेरे चेहरे के -
सिवा, गुज़िश्ता रात हमें कुछ याद
नहीं, वो कोई तैरता हुआ
कहकशां था या
ख़ला ए
जुनूं, हम बहते रहे बाहम न जाने कहाँ
तक, ख़ुदा क़सम हमें कुछ भी
याद नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल
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02 अप्रैल, 2015

उड़ने का अहसास - -

ये आहटें हैं बड़ी जानी पहचानी,
मुद्दतों बाद, फिर किसी 
ने शायद मेरी सांसों 
को छुआ है। 
न जाने क्यूँ अचानक दर ओ - -
दीवार महकने से लगे हैं, 
फिर मेरी तन्हाई 
को जाने 
कुछ तो हुआ है । अब तलक मेरे 
जज़्बात बंद थे कहीं  रेशमी 
कोष के अंदर, कुछ 
सहमे सहमे 
से कुछ 
बेचैन शायद, अभी अभी खुले हैं 
तेरी निगाहों के दरीचे ! अभी 
अभी मेरी नाज़ुक पंखों 
को कहीं उड़ने का 
अहसास 
हुआ है। फिर किसी ने शायद मेरी 
सांसों को छुआ है। 

* * 
- शांतनु सान्याल 
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22 मार्च, 2015

कच्ची माटी की दुनिया - -

तुम्हारी सुबह मेरी सुबह से है अलग बहोत,
मेरे सामने हैं कुछ मिट्टी के बर्तन,
और एक अदद, काठ का
पहिया, तुम्हारे
सामने हैं
बिखरे हुए कांच के टुकड़े, और बेतरतीब - -
रेशमी कपड़े, कुछ बेरंग सिलवटें !
कुछ ख़्वाब बदगुमां, मुझसे
मुख़ातिब हैं कुछ
थकन भरे
चेहरे लेकिन शिकस्ता नहीं, जिस आख़री
छोर पे, तुम्हारा उड़ान पुल रुक
जाता है हाँपता हुआ, ठीक
उसी जगह से मेरा
सफ़र करता
है शंखनाद ! और यही वजह है कि मैं कभी
मिटता नहीं, कभी थकता नहीं, कभी
रुकता नहीं, कच्ची माटी की है
मेरी दुनिया, जिसे टूटने
का कोई ख़ौफ़
नहीं होता,

* *
- शांतनु सान्याल
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Demetra Kalams Watercolors

13 मार्च, 2015

अभी अभी - -

अब जो भी हो मुझे
बेख़ुदी में,
रहने दे यूँ ही,
ये भरम
बरक़रार, कि अभी अभी मेरी -
पलकों पे है, झुकी हुई सी
तेरे रुख़ की परछाई,
अभी अभी
बेतरतीब टूट के बिखरे हों गोया
कुछ नाज़ुक बादलों के
साए, सुलगते
सीने में
फिर अचानक उभरा है कोई - -
लापता मरूद्यान !

* *
- शांतनु सान्याल


उसी एक बिंदु पर - -

हर नज़र जा के रूकती है उसी एक बिंदु पर,
कहने को हर एक का नज़रिया है अलगाना,

कहाँ तू भी है आज़ाद, दुनिया के बंधनों से -
मेरे जीवन का भी कहाँ  है दीगर अफ़साना,

यक़ीनन हर कोई बह रहा है वक़्त के साथ,
किसे ख़बर कहाँ है सागर और कहाँ मुहाना,

दो काँटों के दरमियां है सिमटी हुई ज़िन्दगी,

मिलना बिछुड़ना तो है इक ख़ूबसूरत बहाना।
* *
- शांतनु सान्याल 

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11 मार्च, 2015

हलफ़नामा - -

उसकी चाहत का मुतालबा,
ज़िन्दगी से है कहीं
ज़ियादा, बहुत
मुश्किल
 है निभाना, मुख़्तसर उम्र में
इंतहाई वादा, जो भी हो
अंजाम ए सफ़र,
अब लौटना
नहीं
मुमकिन, हमने तो कर दिए
दस्तख़त बिन देखे, बिन
पहचाने ! कौन  है
मुजरिम
और
कौन भला मासूम, दिल का भेद
ख़ुदा बेहतर जाने।

* *
- शांतनु  सान्याल
 

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09 मार्च, 2015

फिर कभी पूछ लेना - -


फिर कभी पूछ लेना, नम आँखों के राज़,
दीर्घ अंतराल के बाद मिलो हो तुम आज,



उम्र का तक़ाज़ा है, या बेवक़्त सिलवटें -
न रहा आईने को भी मुझसे कोई ऐतराज़,


न देख मुझे, यूँ हैरत भरी नज़र से दोस्त,
रोके रुकते नहीं बेरहम वक़्त के परवाज़,

तेरी निगाह में अब तलक है महक बाक़ी
क्या हुआ कि ज़माने से हूँ मैं नज़रअंदाज़,

न लौटने का सबब जो भी हो उनके साथ,
यूँ तो बेइंतहा हमने, दी थीं उन्हें आवाज़ !

- शांतनु सान्याल 

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16 फ़रवरी, 2015

मुन्तज़िर रहा उम्र भर - -

वो लम्हा कोई शबनम था या आँसू
मुन्तज़िर रहा उम्र भर किसी
के लिए, वो दर्द कोई
राज़ था या अँधा
कुआं, यूँ ही 
तरसता
रहा इक बूंद चश्म ए नूर के लिए, -
उन्हें यक़ीं हो या न हो, लेकिन
ये सच है कि इक शख़्स
ने गुज़ार दी, यूँ ही
ज़िन्दगी !
किसी के लिए लामहदूद इंतज़ार में,
शायद इक उम्र भी काफ़ी नहीं
इस सुलगते हुए प्यार में,
बेहिसाब राहतें हैं
किसका
ज़िक्र करें दोस्तों, मिलता है सुकूं - -
सिर्फ़ जल के इस इश्क़ ए
अंगार में।

* *
- शांतनु सान्याल
 

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27 जनवरी, 2015

लौट भी आओ तुम - -

अनाहूत, किसी सांध्य वर्षा की तरह,
कभी किसी पल बरस तो जाओ तुम,

रस्तों के जाल या वही मील के पत्थर
परिचित हैं सभी लौट भी आओ तुम,

सहज नहीं जीना अपरिग्रहित हो कर,
स्व के सिवा अन्य को अपनाओ तुम,

उस अज्ञातवास में कहाँ है निस्तार !
यूँ ही भीड़ का हिस्सा बन जाओ तुम,

मधुमास हो या तपती ग्रीष्म दुपहरी
अंतरतम में चन्दन तरु उगाओ तुम।

* *
- शांतनु सान्याल



 
 

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Jacqueline Gnott's painting

02 जनवरी, 2015

आग़ाज़ ए कायनात - -

दर दायरा बाग़, बाड़ों की कमी नहीं
होती, फिर भी कौन रोक पाए
है बाद मअतर, कि हर
एक सरहद को
पार कर
जाता है मुहोब्बत में, भीगा हुआ -
अहसास, तुम्हारी निगाहों
में कहीं हमने देखी
है ज़िन्दगी
की असल परछाई, अब कोई ग़म -
नहीं कि ज़माना हो जाए
इंतहाई मौसम ए
गरमा,
ये रास्ता है सर ज़मीं ए रूह की, जो
बसती है सतह आतिशफ़िशां
पे, आग़ाज़ ए कायनात
से कहीं पहले !

* *
- शांतनु सान्याल 

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13 दिसंबर, 2014

संदली परछाइयाँ - -

कभी फूलों से लदी लदी डालियाँ,
कभी दूर तक छायी रहीं
ख़मोशियाँ, कभी
तुम ख़ुद
में रहे उलझे उलझे से, तमाम -
दुनिया से अलग थलग,
कभी मुझे तलाशती
रही मेरे अंदर
माज़ी की
थकन भरी तन्हाइयाँ, न कोई
दस्तक, न ही ख़ैर ख़बर,
इक ज़माने से है
ज़िन्दगी
मुन्तज़िर कि इश्तबाहा ही सही,
सुलगते रूह को, छू जाए
यूँ ही उनकी संदली
परछाइयाँ - -

* *
- शांतनु सान्याल

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painting by artist Qiang Huang 2

22 नवंबर, 2014

मन्नतों की दुनिया - -

फिर तेरी निगाहों में उतर चले हैं कुछ
अक्स आसमानी, या आने को
है पुरअमन ज़िन्दगी में
तूफ़ान सा कोई !
इक ख़ौफ़
सा रहता है दिल के कोने में कहीं, न
बदल जाए कहीं तू राह अपना,
मौसमी हवाओं के हमराह,
न लूट ले सरे आम
कोई, मन्नतों
की दुनिया,
फ़रेब ए दस्तक दे के, बड़ी मुश्किलों
से हम ने माँगा है ख़ुदा से तुझ को।

* *
- शांतनु सान्याल


 

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Brita Seinfeld art

14 नवंबर, 2014

कुछ भी नहीं निःशर्त - -

,
इस दुनिया में कुछ भी नहीं
निःशर्त, हर कोई चाहे
किसी न किसी
रूप में
प्रतिदान,  कुछ भी नहीं यहाँ - -
शाश्वत, उस पल मुझे
उसकी बातें लगी
थीं बहुत ही
विषाक्त,
निर्मम समय और स्व - छाया
ने समझाया, मुझे जीवन
का कड़वा सच,
ढलती उम्र
के साथ
सभी रिश्ते नाते, धीरे धीरे खो -
जाते हैं कहीं, ठीक, जाड़े
की धूप की तरह,
ज़रा देर
के लिए, औपचारिकता निभाते
हुए छू जाते हैं, ईशान -
कोणीय गलियारा,
केवल कुछ
पलों के लिए इक गर्म अहसास,
साथ रह जाती है लम्बी
ठिठुरन भरी रात
और एक दीर्घ
निःश्वास।

* *
- शांतनु सान्याल 

11 नवंबर, 2014

दर्द गुज़िश्ता - -

बेहतर है न कुरेद बार बार, यूँ
दर्द गुज़िश्ता, तमाम
रात सुलगता
रहा नीला
आसमान, और गिरे चश्म ए
ओस आहिस्ता आहिस्ता,
न जाने वो ख़्वाब था,
या साहब नफ़स
मेरा, नादीद
हो कर
भी कर गया मुझे यूँ वाबस्ता, -
जब होश लौटे, उठ चुका
था नूर शामियाना
दूर तक थी
ख़मोशी
और इक अंतहीन लम्बा सा
रस्ता, बेहतर है न कुरेद
बार बार, यूँ दर्द
गुज़िश्ता,

* *
-  शांतनु सान्याल 


 

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Lorraine Christie Art 2

09 नवंबर, 2014

पोशीदा नज़्म कोई - -

कभी कभी, यूँ ही बेवजह, किसी
सुनसान से, पहाड़ी स्टेशन
के प्लेटफ़ार्म पे, रहता
है खड़ा मेरा वजूद,
कुछ अनमना,
तन्हा सा !
आधी रात की, वो आख़री रेल - 
जब गुज़रती है, धड़धड़ाती
हुई, पुरअसरार वादियों
की जानिब, दूर दूर
तक फैली
हुई चाँदनी में करती है मेरी रूह  
गुमशुदा नज़्म की तलाश, 

किसी जंगली नदी के 
किनारे, महुवा या 
खैर के तने
पे कहीं
जहाँ कभी मिलकर हमने उकेरा
था इक दिल का निशान, और
लिखी थी ख़ूबसूरत सी,
पोशीदा नज़्म कोई
ला उन्वान !

* *
- शांतनु सान्याल 


 
 

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Still Life After Shirley Trevena

31 अक्टूबर, 2014

तारुफ़ नामा - -

मुड़ कर भी उसने देखा नहीं इक बार,
मुन्तज़िर रही मेरी आँखें, यूँ तो
उम्र भर, कि फिर दोबारा
बस न पायी उजड़ी
हुई दिल की
दुनिया,
कहने को यूँ तो दस्तक आते रहे बहार
के, अपने ही घर में रहे गुमसुम
किसी मुहाजिर की तरह,
कि उनसे बिछड़
कर, वाक़िफ़
आईना भी मुझसे पूछता रहा तारुफ़ -
नामा ! कैसे बताएं उसको कि
अब हमें ख़ुद का चेहरा
भी याद नहीं - -

* *
- शांतनु सान्याल

 

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wild rose

उड़ते बादलों का साया - -

उड़ते बादलों का साया है वो कोई, -
या मृगजल का साकार होना,
न कोई आहट, न ही
निशानदेही,
बहोत
ही ख़तरनाक था, उस इक नज़र का
यूँ ख़मोश, जिगर के पार होना !
वो तमाम जादू - टोने, या थे
निगाहों के खिलौने !
कहना है बहोत
मुश्किल,
किसी हसीं क़ातिल का यूँ खुल के -
तलबगार होना, न जाने क्या
राज़ ए कशिश है, उसके
नाज़ुक ओंठों के
आसपास,
क्यूँ न चाहे दिल, क़ुर्बान उसपे, एक
नहीं हज़ार बार होना - -

* *
- शांतनु सान्याल


 

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spilling emotion

17 अक्टूबर, 2014

ख़ूबसूरत वजह - -

बहोत मुश्किल है ज़िन्दगी में,
मन माफ़िक़ चीज़ का
मय्यसर होना,
ज़मीं ओ
आसमां उम्र भर मिलते नहीं,
फिर भी, इक अहसास
रखती है ज़िंदा
उफ़क़ की
लकीर
को, कि तू ख़्वाब ही सही फिर
भी है, इक ख़ूबसूरत वजह !
ज़िन्दगी जीने के लिए,
लहूलुहान है जिस्म
मेरा, तो क्या
हुआ,
रूह की कोई इंतहा नहीं कि -
डूबती सांसों को भी होती
है आख़री लम्हे
तक, उभरते
किनारों
की ख़्वाहिश, ये दीगर बात है
कि फ़रेब ए क़िस्मत
मेहरबां न हो !

* *
- शांतनु सान्याल

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05 अक्टूबर, 2014

कोहरे में कहीं - -

वो बार बार यक़ीं दिलाता है मुझे,
कि उसके और मेरे दरमियां
अभी तक है, कुछ न
कुछ बाक़ी !
जबकि
ज़माना हुआ उसकी दी हुई, वो -
ख़ूबसूरत रेशमी रुमाल
गुमाए हुए, कि
वो इक
मीठा अहसास है कोई, या टीस
ऊँगली की नोक का, इक
सिहरन सी होती
है जब कभी
खिलते
हैं, गुलाब नज़र के सामने, फिर
भी काँटों की है, अपनी ही
ख़ूबसूरती, ख़ामोश
करते हैं बयां,
की इक
दूरी बहोत है ज़रूरी, हद पार - -
करने से पहले।

* *
- शांतनु सान्याल
 
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