06 मई, 2011

अपरिभाषित
सुदूर धूसर पहाड़ियों में, जब कभी दावानल धधक उठतें हैं ,
इक अजीब सी बेचैनी दिल के अन्दर होती है -
ओ फाल्गुनी रातें ,गर्म साँसों की तरह बहती बयारें
मध्य निशा ,रह रह कर चीखते मृग दल
सरसराते पीपल के सघन पत्ते , छाया पखेरू
थम थम कर रजनीगंधा का महकना
दूर तक परछाइयों का लगातार पीछा करना
ज़िन्दगी और मैं अक्सर अकेले में बातें करतें हैं
हिसाब करना बहोत ही मुश्किल है किसने, किसे, क्यों ?
मंज़िल से पहले ही धीरे से , खामोश चलते चलते
यूँ रास्ता बदल लिया अपना , जैसे कोई गुलदान टूट जाए
और हम कहें जाने भी दो ,शीशा ही था टूट गया -
टूटे रिश्ते और पहाड़ों में धधकती आग
बरसात का इंतजार नहीं करते
कौन किस गली में मिल जाये बादलों की तरह
जिसे बरसना है वो वादी और सेहरा में फर्क नहीं करते
हमें भी जीना है चाहे रात लम्बी हो या चंद लम्हात की
हिरण की दर्द भरी चीखें काश हम समझ पाते /
----शांतनु सान्याल
जाने किस ओर मुड़ गए वो सभी बंजारे बादल
देख सूखी रिश्तों की बेल, हम बहुत परेशां हुए
जोगी जैसा मासूम चेहरा, मरहमी दुवागो हाथ
आमीन से पहले,जाने कब व् क्यों लहुलुहान हुए
बूढ़ा बरगद, सुरमई सांझ, पक्षियों का कोलाहल
पलक झपकते, जाने क्यों ये  सब सुनसान हुए
खो से गए कहीं दूर, मुस्कराहटों के वो झुरमुट
आईने का शहर, और भीड़ में हम अनजान हुए
स्याह , खामोश, बेजान, बंद खिड़की ओ दरवाज़े
संग-ए-दिल,मुस्ससल दस्तक, हम पशेमान हुए
ज़िन्दगी भर दोहराया,आयत,श्लोक, पाक किताबें
मासूम की चीख न समझे,जी हाँ सभी बेईमान हुए
जाने किस देश में बरसेंगे मोहब्बत के गहरे बादल,
ज़मीं,गुल-ओ-दरख़्त,लेकिन अभी तो वीरान हुए .
----शांतनु सान्याल

एक लम्बी रात रहस्मयी

धूमिल आकाश, सूर्य अस्तगामी
अलस मरुभूमि,सांझ बोझिल
प्रवासी विह्ग, अन्तरिक्ष विशाल
कुछ अवाक चेहरे, अनजान शहर
अज्ञात भविष्य, बूँद बूँद स्मृति
देश,माटी,नदी,पहाड़,समुद्र,वर्षा
शरत, चन्द्रमा,और अश्रु घनीभूत
मौसमी पुष्प, सुवासित वातायन
बच्चों की किलकारियां, अतुलनीय
माँ की झिड़क, और आलिंगन
जन अरणय, रेल का गुज़ारना
उदास आँखों से छुटता अपनापन
विमान का अकस्मात् उड़ना
और एक लम्बी रात रहस्मयी /
---शांतनु सान्याल

वक़्त के पहले

वक़्त के पहले 

इक उम्र से तलाश थी जिसकी
निग़ाह दर निग़ाह भटकते रहे हम

वो जो मेरे अश्क से था तर ब तर
दिल के किसी कोने में छुपा हुआ
गुम सुम सा डरा डरा - - - - - -
इक ख्याल, कमसिन अहसास
दरवाज़े के इक कोने में
किसी नादान बच्चे की तरह
अक्सर छुप कर लिबास बदलता हुआ
दुनिया की निगाहों से बचता रहा
आज बात कुछ और है,
वो  नन्हा सा मासूम कहीं खो सा गया

अब वो खुद को देखता है,
बेलिबास आईने के सामने  -
और अपनी शख्सियत  को सजाता है,
दरवाज़े के बाहर बेचने के लिए
ज़माने ने  उसे वक़्त के पहले ही
जवान बना छोड़ा ,
--शांतनु सान्याल

05 मई, 2011

ज़िन्दगी

इक लम्बी, खट्टी मीठी सी ज़िन्दगी
और लुकछुप करता बचपन-
पहाड़ी झरने की मानिंद बिखरते लम्हात
रेत पे लिख लिख कर किसी का नाम,
मुस्कराके मिटा देना --
अपनी ही परछाइयों से सहमते हुए
ज़माने के तमाम पहरे को
मुंह चिड़ाना, ओ खुबसूरत यादें --
शाम ढलते टूटे मंदिर के जानिब
दीप जलाने के बहाने
निगाहों से दिल की बात कहना
न कोई हसरत, न ही तकाज़ा
मासूम जज्बात, इश्क की बुनियाद
ओ ख्वाब जो कभी हकीक़त में ढल न सके -
ज़िन्दगी इक किताब जिसे पढ़ न सका कोई
पन्ने अपने आप जुढ़ते गए, दिन ब दिन-
मौसम की तरह रिश्तों के रंग, बदलते रहे
चाहत के तलबगार एक लम्बी फेहरिश्त -
हर कोई चाहे ढल जाऊं उसके सांचे में,
काश ओ गुमनाम पन्ने, किसीने पढ़ा होता
इक ग़ज़ल जो लबों पे आकार बिखर गयी वादियों में
आज भी फूल ओ खुशबुओं में उसके अक्श हैं मौजूद
वक़्त मिले कभी तो तलाश कीजिये
कुछ गुमनाम पन्ने--हवाओं में तैरती तहरीरें,
बादलों में पैगाम-ए मुहोब्बत, ओ इज़हार-ए-वफ़ा
जो कांच की तरह नाज़ुक, लेकिन बेदाग़ मुक़द्दस था /
----शांतनु सान्याल

04 मई, 2011

काश जान पाते قاش جان پاتے

वो आदमी जो फूटपाथ पे

وو  آدمی  جو  فوٹ پاتھ  پے   
रात दिन, धुप छांव, गर्मी सर्दी
رات،  دیں ، دھوپ  چھاؤں 
अपने हर पल गुज़ार गया
اپنے  ہر  پل  گزار  گیا 
काश जान पाते उसके ख्वाबों में
قاش  جان  پاتے اسکے  خوابوں  میں 
ज़िन्दगी का अक्श क्या था //
زندگی  کا  اقص  کیا  تھا
वो शक्स रोज़ झुकी पीठ लिए
وو شقص  روز جھکی پیٹھ  لئے
बड़ी मुश्किल से रिक्शा चलाता हुवा
باڈی  مشکل سے اکشا  چلاتا  ہوا   
कल शाम गिर कर उठ न पाया
کل شام  گر کر اٹھ  نہ  پایا 
काश जान पाते कभी उसके दिल में
قاش جان پاتے  کے اسکے  دل  میں
सुबह की तस्वीर क्या थी //
صبح  کی  صراط  کیا  تھی 
वो चेहरा गुमसुम रेस्तरां में
وو  چہرہ  گمسم  ریستراں میں
आधी रात ढले काम करता रहा
آدھی رات  کام  کرتا  رہا 
उम्र भर गालियाँ सुनता रहा
عمر بھر گالیاں  سنتا  رہا  
काश जान पाते उसके बचपन के
قاش  جان  پاتے کہ  اسکے  بچپن  کے  
हसीं लम्हात क्या थे //
حسیں لمحات  کیا تھے 
एक बूढ़ा माथे पे बोझ लादे हुए
ایک بوڑھا ماتھے  پے  بوجھ  لادے  ہے 
मुक्तलिफ़ रेलों का पता देता रहा
مختلف ریلوں  کا پتہ  دیتا  رہا  
मुद्दतों प्लेटफ़ॉर्म में तनहा ही रहा
مدّتوں  پلاتفارم میں  تنہا   ہی  رہا
काश जान पाते उसकी
قاش  جان  پاتے  اسکی
मंज़िल का पता क्या था //
مزل کا  پتہ  کیا  تھا
शहर के उस बदनाम बस्ती में
شہر  کے  اس  بدنم  بستی  میں
पुराने मंदिर के ज़रा पीछे
پرانے  مندر  کے  ذرا  پیچھے
मुगलिया मस्जिद के बहोत करीब
مغلیہ  مسجد  کے  بھوت  قریب
शिफर उदास वो बूढी निगाहें
شیفر  اداس  وو  بوڑھی  نغاہیں
तकती हैं गुज़रते राहगीरों को
تکتیں  گزرتے  راہ گیروں  کو 
काश जान पाते उसकी नज़र में
قاش  جان  پاتے  اسکی  نظر  میں
मुहब्बत के मानि क्या थे //
مھوبّت  کے مانی  کیا تھے
वृद्धाश्रम में अनजान
وریدحہٰ آشرم میں  انجان
भूले बिसरे वो तमाम आँखें
بھولے  بسرے  وو  تمام  آنکھے
झुर्रियों में सिमटी जिंदगी
جھرریوں  میں  سمٹی  زندگی
काश जान पाते, वो उम्मीद की गहराई
قاش  جان  پاتے  وو امید  کی  گہری
जब पहले पहल तुमने चलना सिखा था //
جب  پہلے  پھل  تھمنے  چلنا  سیکھا  تھا
वो मुसाफिरों की भीड़ , कोलाहल
وو  مسافروں  کی بھیڑھ، کولاحال
जो बम के फटते ही रेत की मानिंद
جو  بم  کے پھٹے  ہی  ریت  کی مانند
बिखर गई खून और हड्डियों में
بکھر گئی  خون  اور  ہددیوں میں
काश जान पाते के, उनके लहू
قاش  جان  پاتے  انکے  لہو
का रंग हमसे अलहदा न था //
کا رنگ  ہمسے  الحدا  نہ  تھا
सिसकियों की ज़बाँ भी होती है
سسکیوں  کی  بھی  زباں  ہوتی  ہے 
करवट बदलती परछाइयाँ
کروٹ بدلی  پرچھائیاں  
और सुर्ख भीगी पलकों में कहीं ,
اور  سرخ  بھیگی  پلکوں  میں  کہیں
काश हम जान पाते खुद के सिवाय
قاش  ہم  جان  پاتے  خود  کے  صوا
ज़माने में ज़िन्दगी जीतें हैं और भी लोग //
زمانے  میں  زندگی  جیتیں  ہیں  اور بھی  لوگ 


شانتانو  سانیال - 
शांतनु सान्याल    

13 अप्रैल, 2011

कटाल के फूल

ज़िन्दगी की वो तमाम मजबूरियां
हमने यूँ छुपा ली, लोग समझे की
दर्द की इन्तहां हो गई -
दरअसल किसी की मुहोब्बत ने हमें
सख्त पत्थरों में तब्दील कर दिया,
ज़िद्दी हवाओं ने आखिर अपना रुख़
मोड़ा, लड़ाकू तूफान समझौता नहीं
जानता, कभी कभी प्यार में खुबसूरत
हार में भी जीत की महक होती है,
चट्टान की दरारों में अक्सर कटाल के
फूल खिलते देखे हम ने, तुम चाह कर
भी दामन बचा न पाए -
 शबनमी बूंदों की तरह ज़िन्दगी में
बूंद बूंद बिखरते चले गए, कंटीला ही
सही, मेरा वजूद तुम्हें अपना बना गया - -
- शांतनु सान्याल

07 अप्रैल, 2011

संभवतः


सुबह फूलों की बहार वो भीगा रविवार 
सहसा पुराने दर्पण का टूट जाना 
हाथों से फिसल ज़मीं  पर बिखर जाना 
कुहरा मय आकाश, धूसर बादलों के दाग़ 
हस्त चिन्हों की तरह स्थूल 
वाष्प कणिकाएं , खिडकियों के शीशे
आईने के टुकड़ों का संग्रह 
फूलों के गमले, कुछ अनकही बातें 
पुराने ख़तों का उड़ उड़ बिखर जाना
अर्ध पढ़ी किताब के पृष्ठों का आन्दोलन 
दरवाज़े पर दस्तक का आभास 
सोंधी ख़ुश्बू संभवतः वृष्टि आगमन 
एक शिशु हाथों में लिए नन्हा सा फूल 
कहे आओ मेरे साथ बाहर उड़तीं हैं 
कितनी रंग बिरंगी तितलियाँ 
आँखों में जीने की उम्मीद 
बादलों का ज़ोरों  से बिखर  जाना.
--- शांतनु सान्याल 

05 अप्रैल, 2011


सबब- ए - रतजगा 
गहराइयाँ सांसों की, तुम जान ही न पाए 
सतह पर बहे चाँद का अक्श लिए 
छू तो लिया हमको बेक़रारी में यूँ ही 
दिल की नाज़ुक परतों तक कभी लेकिन 
पहुंच ही न पाए,
आँखों तलक आ रुक सी जाती हैं आहटें 
शीशे की ज़मीं थी शायद तुम चले ज़रूर 
लेकिन नक्शों क़दम छोड़ न पाए 
ये तलाश की आती हैं अनाम ख़ुशबू कहाँ 
से, खिड़कियाँ खोलीं, परदे सरकाए 
दूर तलक देखा, थी मुसलसल ख़ामोशी 
बरस रही थी चांदनी या टूट रहे थे तारे 
ये खलिस दिल की, ये बेचैनी का आलम 
सबबे रतजगा लेकिन तुम 
जान ही न पाए !
--- शांतनु सान्याल

22 मार्च, 2011

कहीं बरसी हैं घटायें, हवाओं में है ताज़गी
ये गीलापन छुपा ले गईं आँखों की नमी
पलकों की वादियों में फिर खिलने लगे हैं
फूल, संवार भी लो बिखरे ज़ुल्फ़ परेशां !
कि ज़िन्दगी का सफ़र अभी है बहुत बाक़ी,
--- शांतनु सान्याल

16 मार्च, 2011

नज़्म

जो नज़र झुके न किसी के दर्द में भीग कर
ख़ुद को तबाह कर जाती है इक दिन दर्द बन कर,
ये ज़िद की  मैं हूँ सिर्फ़ शाहे कायनात इस दौर का 
ख़लाओं  में  भटकती हैं तमाम रूहें मौत बन कर,
वो कोई ग़ैर नहीं मेरा ही साया था हमराह चला 
छलता रहा वही हर क़दम मेरी चाहत बन कर, 
मेरी ज़ात है सिर्फ़ इक ख़ुदा की मख़लूक़ , ये सोच 
न डूब ले जाए वक़्त के क़ब्ल क़यामत बन कर, 
पत्थरों में भी हैं देवता, ये है इश्क ए इन्तहां 
उसने आदमी मुझे बनाया मेरी ही चाहत बन कर,
हर शख्स में देखूं ख़ुदा की मूरत मैं बेपनाह 
बिखर जाऊं सुखी वादियों में आबे हयात बन कर,   
किसी के अश्क, ग़र कर न सके दिल को तरबतर 
जीना ही क्या ऐसा , ख्वाब ओ ख्यालात बन कर,
जी हाँ, बुत परस्त हूँ मैं मुझे हर सै से है मुहोब्बत 
अह्सासे वफ़ा न बुझने दे मुझे ख़ुद बरसात बन कर,
अहमियत इसी में है कि मिट जाऊं किसी के लिए 
मुझे मंज़ूर नहीं लम्बी उम्र, जी

ऊँ  सवालात बन कर !
- - शांतनु सान्याल    



15 मार्च, 2011

अपरिचित मुख

न जाने कौन थे वो लोग जो पत्थरों में 
आग से लिख गए अनगिनत जिवंत कविताएं
आज भी पठारों में खिलते हैं झरबेरी 
हल्की बूंदों से भी भरती हैं मृत मरू सरिताएं 
जाने क्या बात थी उनमें की गूंजती हैं 
आवाज़ें, मंदिर कलश को छुएं अतृप्त भावनाएं 
कुछ तो रहस्य था उनकी इस आत्मीयता में 
वो हर पल हर डगर उम्मीदों की अलख जगाएं 
नदी घाटों में वृन्द आरती गढ़े अलौकिक -
अनुभूति, चहुँ दिशा निसर्ग वैदिक ऋचा दोहराएँ. 
--- शांतनु सान्याल

12 मार्च, 2011

नज़्म

किस से करें शिकायत की हर कोई है यहाँ बदगुमां
ये वही शख्स है जिसने दी थीं झूठी गवाहियाँ
ये वही रक़ीब है मेरा जो रहा मुद्दतों बनके रहनुमां
न पूछो हस्र ए मुहोब्बत, ऐ डूबते सितारों मुझसे 
ये वही ज़मीं है मेरी और मुस्कराता वही आसमाँ
लिपटा रहा आस्तींसे ताउम्र नफ्से दोस्त बनकर 
ये वही जगह है, कभी रौशन था मेरा भी आशियाँ !
वो जो कहते थे कि हूँ मैं मिशाले हुस्न बेपनाह 
वही आईना है वही चेहरा मेरा और ये छाइयाँ.
कभी कोई मंदिर हुआ करता था यहीं कहीं क़रीब
आज बाज़ारे जिस्त में रहती हैं मशहूर हस्तियाँ.
न जाने कौन सी शै थी जो ले गई काजल चुराकर 
ये वही उदास आँखें तकतीं हैं खुद की परछाइयां .
यहीं कहीं से उठा था धूल का बवंडर बहुत ऊपर 
ये वही है फ़िज़ा वही रास्ते वही बिखरता कारवां.
यहीं आसपास ख्वाबों ने ली थी कभी आखरी साँसें  
हदे नज़र शायद यहीं कहीं हो रौशन मज़ारे बागबां. 
वो दहकते मशालों वाले हाथ वही हिकारत की नज़र 
अब भी छलते हैं वो ज़िन्दगी, आंसू व्  तनहाइयाँ.
कौन गुज़रा है टपकते खून भरे क़दमों से यहाँ 
फिसलन भरी है क्यूँ दर्द की ये राहे मेहरबानियाँ.
मैं उठा तो लूँ  तीरों कमान, अहदे वफ़ा फिरसे 
चाहत के सफ़र में लेकिन कम नहीं हैं दुस्वारियां.
सरकते पर्दों से झांकती हैं क़हर भरी निगाहें 
राख़ के बादिलों में भी क्या होती हैं बिजलियाँ.
बरसने की ख्वाहिश लिए जागता रहा उम्र भर मैं
क्यूँ फिर नहीं सुलगतीं ये खामोश सूखी वादियाँ.
--- शांतनु सान्याल

09 मार्च, 2011

ग़ज़ल - - इंद्रजाल सा आकाश

ये इंद्रजाल सा आकाश, अधखुली सीप सा मन
झांकती हैं नन्हीं सी किरण, अँधेरे के आर पार,
कोई मासूम हथेली छुपाये रखे हों जैसे जुगनू
उँगलियों के दरारों से जो निकल जाएँ  बार बार,
 ख़ुशी की उम्र बढ़ न पाई सींचा उसे निशि दिन
बौने पौधों में न फूल खिले, लौटती रहीं बहार,
जीवन के ताने बाने में बिनीं रेशमी सपनों की
डोरी, हर वक़्त संवारा प्रति पल टूटे तार तार ,
रात गुज़रे कौन रंग जाता है रोज़ पूरब की रेखा
अनचाहे न जाने रोज़ दे जाता है,जीवन उधार,
ये सलीब रहा ज़िन्दगी भर मेरा जिगरी दोस्त
कांधे के सिवाय इसका नहीं कोई भी आधार ,
कहाँ छोड़ आऊं उम्मीद भरे ये इर्द गिर्द चेहरे
उदास लम्हों में भी मुस्कुराते हैं ये बेरंग दीवार,
--- शांतनु सान्याल

08 मार्च, 2011

नज़्म

 नज़्म 
अफ़सोस क्या करें हम ये रश्मे दुनिया है -
निभा जाओ तुम भी ज़माने के दस्तूर,
न पहचाने की वो अदायगी है ख़ूबसूरत 
हैं टूटती बूंदें आखिर बिखरने को मजबूर, 
हिसाब क्या करें सुबह की धूप के लिए -
यूँ भी ज़िन्दगी में दर्दो अलम हैं भरपूर,
ये सितारों की भीड़, फिर रात की नीलामी 
ख़्वाबों न छुओ मुझे, हूँ मैं थकन से चूर,
वो सभी मरहम  दे न सके राहतें उम्रभर -
लौटा दिए, माना है मंज़िल बहुत ही दूर, 
न देखो मुझे फिर उसी अंदाज़े वफ़ा से 
ग़र ज़िन्दगी रही तो लौट आएंगे ज़रूर,
--- शांतनु सान्याल

 


05 मार्च, 2011

नज़्म - - अनकही बातें


संगे साहिल पर रुको तो ज़रा 
टूटतीं लहरों में जीने की उम्मीद बंधे 
अभी तो डूबा है, सूरज सागर पार 
शाम के धुंधलके में सांस लेतीं हैं -
अनकही बातें, कैसे कहूँ तुमसे वो 
दर्दे बेक़रां, कांप से जाते हैं ओंठ 
सहम सी जाती हैं जां, पत्तों की
ये सरसराहट है, या टूट टूट जाये 
कोमल शाखों से अरमानों के ओस,
ये समंदर भी क्या चीज़ है, तकता
हूँ, मैं बड़ी हसरत से प्यास लिए -
इक बूंद में जैसे ज़िन्दगी हो शामिल,
उसे बरसना ही नहीं जब क्या कीजे 
ये अँधेरा है, या कोई बादलों का साया 
छू तो जाए सारा बदन हवाओं की तरह 
दिल ही छुट जाए तो कीजे।
--- शांतनु सान्याल 

02 मार्च, 2011

मधुमास की छुअन

मधुमास की छुअन
वो ख़ूबसूरत इत्र की शीशी अब भी
   हमने रखी है, बहुत ही सहेज के -
सुगंध है ओझल, अहसास बाक़ी !
  जी चाहे अक्सर की सजा दूँ तुम्हें
फिर मौसमी फूलों से, दायरे हैं -
  सिमटे,ज़ख़्म के गुच्छे हैं वज़नी,
झुक सी जातीं हैं निगाहें कहीं पे
  जा कर, ये आग की लपटें हैं या -
फिर सुलगती हैं, अनबुझी यादें,
   कौन है,न जाने शाम ढलते -
सजा जाता है आहिस्ते ख़ामोशी,
   दूर तलक फिर खिले हैं बुरुंस
पहाड़ी में फिर लगे हैं शायद
  जुगनुओं के मेले, झरनों में हैं
बहती मधुमास की छुअन धीमे धीमे,
--- शांतनु सान्याल

مدھماس  کی چھوون 
 خوبصورت  عطر  کی  شیشی 
  ہمنے  رکھی  ہے ،  بہت  ہی  سہیج  کر -
سگندہ  ہے  اوجھل ، احساس  باقی
جی  چاہے   اقسر  کی  سجا  دوں  تمہیں
پھر  موسمی  پھولوں  سے ، دایرے  ہیں   
سمٹے ، زخم  کے  گچچھے  ہیں  وزنی 
جھک  سی  سی  جاتیں  ہیں  نغاہیںکہیں پے
جا  کر ، یہ  آگ  کی  لپٹیں  ہیں  یا   
پھر سلگتی  ہیں ، انبجھی  یادیں
کون  ہے  نہ  جانے  شام  ڈھلتے
سجا  جاتا  ہے  آھستے  خاموشی  
دور  تک  پھر  کھلے  ہیں  برنس
جگنوؤں  کے میلے ،  جھرنوں  میں  ہیں
بہتی  مدھماس  کی چھن  دھیمے  دھیمے
شانتانو  سانیال - 
  


    

    

23 फ़रवरी, 2011

सांसों की धुंध

इन लक्ष्मण रेखाओं के उसपार भी हैं 
जीवन की अनगिनत वक्र पगडंडियाँ 
कुछ मेघाच्छादित आकाश और झरते 
पुष्प वीथिकाएँ, न समेटो मुझे 
अपनी हथेलियों में हलकी धूप की तरह 
मोहपाश में दम घुटता सा है 
खोल दें फिर वातायन, आने दें कोई 
अपनापन, कभी तो मुझे जानने की ललक 
हो, और कभी मैं देखूं तुम्हें नज़दीक से 
कांपते हैं क्यूँ हाथ छूते ही ह्रदय स्पंदन 
झुकी डालियों से कुछ फूल गिर जाएँ 
असावधानी में, तो कोई बात नहीं, पुष्प 
गिरते हुए भी कम सुन्दर नहीं लगते 
चाहे वो ज़मीं पर गिरें या देवता के पग तले
एक अजनबीपन का रंग घिर आता है 
अक्सर, हालाकि तुम्हारी आँखों में उतरती 
है सांझ इन्द्रधनुषी कई बार, उतरोत्तर 
सजल यामिनी भरती है अथाह सुरभि 
निशि कुसुमों की, न जाने क्या बात है ?
कि तुम तकते हो बंद दरवाज़े यूँ बार बार 
हमने तो कोई दस्तक सुनी नहीं 
पास रह कर भी तुम छोड़ नहीं पाते अपनी 
मौजूदगी का अहसास, जबकि हम खुद को भूल 
जाते हैं तुम्हारी सोच में डूब कर, ये विनिमय 
भावनाओं का या हो तुम काँच के उसपार 
दिखाई जो दे लेकिन छूते ही टूट जाए, ये नाज़ुक 
सपनो की परत है या सांसों की धुंध !
--- शांतनु सान्याल  



19 फ़रवरी, 2011

मन जाना चाहे

मन जाना चाहे! उस सुदूर 
नील पार्वत्यमालाओं के उसपार,
किसी ध्यानमग्न योगी की भांति 
जो  बैठा ऑंखें मूंद पुरातन कालों से 
एक चित्त, चिर स्थिर, आत्म अनुसन्धान लिए,
शताब्दी गुज़र गए यूँ ही एकाकी 
आग्नेयशैलों में कभी उभरे अग्नि शिखा 
निम्नवर्तीय घाटियों में जन्मे अनगिनत श्रोत 
वन्य पुष्पों में लिपटे असंख्य कालबेल 
सघन श्रावणी जलधाराओं का उत्पात 
कभी ज्येष्ठ की झुलस, न तोड़ पायी उसका 
मौन, न ही भेद पाए झंझा की तीव्र हवाएं !
उसके पाषाणी वक्षों में जागे नित नव 
स्वप्नमयी भूभाग, वृक्षों में खिले फूल 
नीली झीलों से निकले नव प्रजन्मित धाराएँ 
भूकंपीय गुप्त तड़ित न कर पायीं उसे विचलित 
वो युगपुरुष सम दिखलाये हर रात्रि दिशाएं 
आकाशगंगा, तारकवृन्द, चन्द्र किरण झुक 
झुक नमन जताएं !दावानल में भी जो जीवन 
की राह दिखाए, नव कोपल स्वप्न खिलते जाएँ.
-- शांतनु सान्याल 



17 फ़रवरी, 2011

समानांतर रेखाएं

एक अंतहीन पथ का पथिक हूँ मैं -
एकाकी और मीलों लम्बी रात, उध्वस्त आकाश 
बहु कोणों में टूटता चाँद, दिशाहीन धूमकेतु 
उठतीं हैं धूल भरी आंधियां, तो क्या -
लुप्तप्रायः हैं जीवन की परछाइयां फिर भी है 
चलना मुझे, दैत्याकार घाटियाँ हों या 
अंधकारमय सुरंग, गुफाएं या दावानल 
देह बने विषपुरुष, मायावी नागपाश से हूँ मैं 
विमुक्त, अविराम प्रवाहित बैरागी मन,
 थमना न  जाने,एक नयी सुबह की  तलाश 
अनिद्रित मेरी आँखें, देखें प्रतिपल जागृत स्वप्न 
कुम्हलाये शाखों में खिले हैं अनाम फूल 
धूल कण झर झर जाएँ, विकशित होते कोमल 
किशलय, शिशिर बिंदु में डूबी कलियाँ 
लेतीं मधु निश्वास, खंडहर के ईंटों से जागे 
अंकुरित बेल, कवक हटाते कमल नाल 
करे अस्तित्व उजागर-
शतदल की पंखुड़ियों में लिखें जीवन गीत 
कुम्हार के चाकों में डोले मेरा मन 
कोई छुए हौले हौले, दे जाए आकार मनोहर 
बन जाए स्वप्न सुराही सम, आतुर प्यास बुझाने को, 
अंतर्मन में जागें दीप शिखा, देखूं हर 
चेहरे में मुस्कान छलक जाने का दृश्य, 
बन जाऊं मैं पलक किसी सजल आँखों का 
रोक लूँ अप्रत्याशित लय में अश्रु धारा अपनी 
ह्रदय की अनगिनत तंतुओं में बूँद बूँद,
देखूं मैं हर वक़्त एक ही ख्वाब, दुनिया बन जाये 
एक विस्तृत परिधि, हर बिंदु में तुम, हर एक रेखाओं में हम 
 आखिर बिन्दुओं से ही बनतीं हैं रेखाएं,
क्यूँ न बन जाएँ हम सब अनंत समानांतर रेखाएं.
--- शांतनु सान्याल   

13 फ़रवरी, 2011

रात ढलते

उम्मीद हद से आगे न बढ़े इसका भी ख़याल हो
 दिल ग़र खो जाय कहीं उसका न ज़रा भी मलाल हो,
इतना क्या सोचते हो के ख़ुद को ही यूँ  भूल जाओ
न रुके कोई किसे के लिए खुश रहो जहाँ जिस हाल हो,
उस नुक्कड़ में सजती हैं, यूँ महफ़िलें रात ढलते
 तकते हो आसमां,जैसे कोई अनसुलझा इक सवाल हो,
 सूख जाएँ न कहीं मौसमी फूलों के दरीचे,ऐदोस्त !
निकल भी आओ क़फ़स से,जहाँ तुम अभी बहरहाल हो,
थाम भी लो निगाहों के ऐतराब, ख़्वाबों की दुनिया
क़बल इसके के हर सिम्त,पुरसर हंगामा ओ बवाल हो,
इस रात के दामन से हैं कुछ राज़े उलफ़त वाबस्ता
न खुले वो रिश्तों के गिरह,चाहे हर जानिब भूचाल हो,
--- शांतनु सान्याल


04 फ़रवरी, 2011

नज़्म - - ख़्वाबों की बेरुख़ी

कैसे तुम्हें बताएं, आस्मां का वो बिखर जाना
तरसते रहे रातभर, हम इक बूँद रौशनी के लिए.
वो सांसों का इन्क़लाब, ख़्वाबों की बेरुख़ी -
तकते रहे सूनी राहों को, दो पल ख़ुशी के लिए.
जाने कहाँ ठहर से गए सितारों के कारवां -
ख़लाओं में तलाशा उन्हें, बाक़ी ज़िन्दगी के लिए.
हवाओं में तैरते रहे, भीगे अहसास-ऐ-खतूत
तरसे निगाह वादी वादी, बरसने की ज़मीं के लिए.
हर तरफ थे शीशमहल, अक्श धुंधलाया सा
कोई तो आवाज़ दे, ज़िन्दा हूँ मैं इस यकीं के लिए.
.
- - शांतनु सान्याल
.

01 फ़रवरी, 2011

नज़्म - - कोई दस्तक

रौशनदान से उतरती सुनहरी धूप
की तरह, मुठ्ठी भर ख़ुशी मिल जाये कहीं
दालान  के पौधों में जीने की तमन्ना जागे,
बहुत दूर न जाओ छोड़ कर यूँ तन्हां
कोई सुराग़, कोई बहाना, मिलने की आरज़ू
बेख़ुदी में ही सही इक लम्हा रख जाओ कहीं,
इस तरह न भूलो कि याद फिर आ ही न सकें
कोई निशां, कोई दस्तक, सांसों की आहट
उड़ते सफ़ेद बादलों में बरसने की मियाद
तो लिख जाओ कहीं -
यकीं कर लूँ मैं हर सूरत, जीवन बेल खुलकर
संवरना चाहे, पतझर के बाद बहारों का आना
तै हो न हो, ज़रा सा वक़्त मिले कि देख लूँ
गहराइयों कि ज़मीं, कोई वादा, कोई ख्वाहिश
गुलमोहर के शाखों में अपना पता लिख जाओ
कहीं --
--- शांतनु सान्याल     

28 जनवरी, 2011

भूली सुबह की तरह


अभी अभी है चाँद ढला, दूर पहाड़ों में
चाँदनी फिर भी ढकी सी है दूर तक,
तलहटी में उभरें हैं, साँसों के
बादल मन चाहे तुम्हें
देखूं अन्धेरें में
क़िस्मत
की
तरह, बन जाओ कभी तुम रहनुमां, भूल
जाऊं मैं मुश्किल भरे ज़िन्दगी के
रास्ते, कौंधती हैं बिजलियाँ
पूरब में कहीं, बरस भी
जाओ किसी दिन,
दिल की
बस्तियां उजड़ने से पहले,कुछ तो मिले
सुकूं,के उड़ भी आओ कहीं से मसीहा
की  तरह, हर क़दम बोझिल के
टूट टूट जाए  ख्वाबों की
सीढियां, मैं चाहूँ तुम्हें
छूना और तुम हो
के बेख़बर
भूली
सुबह की तरह,
- - शांतनु सान्याल      


25 जनवरी, 2011

सूनापन

अरण्य अनल सम जागे मन की
सुप्त व्यथाएं
दूर कहीं टिटहरी टेर जाय
फिर जीवन में दहके बांस वन,
पल छिन बरसे मेह
झर जाएँ मौलश्री
स्थिर ह्रदय को जैसे दे जाए
दस्तक, कोई विस्मृत सन्देश,
भीगी साँसों में कोई चेहरा
उभरे डूबे बार बार
लहरों से खेले चाँद आँख  मिचौली
हिय उदासीन, जस अधखिली
कुमुद की नत पंखुडियां
रह रह जाय कांप,
रात की अंगडाई तारों से सजी
मेघों ने खोल दिया रात ढलते
सजल शामियाना आहिस्ते आहिस्ते,
खुली आँखों में मरू उद्यान  बसा
सपनों के क़ाफिले रुके ज़रूर
गीतों की बूंदें बरसीं
स्मृतियों ने बांधे नुपुर सुरीले
धड़कनों में था लेकिन सूनापन
आकाश ने उड़ेला पूरा आलोक
हमने चाहा बहुत मुस्कुराएँ
हँसी ओंठों तक पहुँचीं सहमे सहमे
सुबह से पहले बिखर गयीं सब
ओष की बूंदें बन कर .
--- शांतनु सान्याल




  

20 जनवरी, 2011

अदृश्य त्वम् रूप


अदृश्य त्वम् रूप 
पृथ्वी व् आकाश मध्य है, अन्तर्निहित 
अविरल प्रवाहित त्वम् रूप माधुर्य अनंत,
अदृश्य करुणासागर सम कभी वृष्टि रुपी 
तुम जाते हो बरस, कभी शिशुमय क्रंदन, 
धूसर मेघों को दे जाते हो पल में मधु स्पर्श,
तृषित धरा के वक्ष स्थल पर हो तुम ओष
बिंदु, हे अनुपम !अश्रु जल में भी समाहित,
त्वम् दिव्य आलोक निमज्जित सर्व जीवन,
झंझा के विध्वंस अवशेषों में भी तुम हो एक 
आशा की किरण, ज्यों प्लावित भूमिखंड 
में उभर आयें आग्नेय शैल बारम्बार,
इस गहन अंधकार में हो तुम दिग्दर्शक 
कभी खंडित भू प्रस्तर से सहसा हो प्रगट,
कर जाते हो अचंभित, भर जाते हो प्रणय सुधा,
--- शांतनु सान्याल 
painting by - Jone Binzonelli

19 जनवरी, 2011

जीवन किसी तरह भी जी न सके

जीवन किसी तरह भी जी न सके

जीवन किसी तरह भी जी न सके 
बिहान से पहले बिखर गए निशि पुष्प 
अर्धअंकुरित बीजों में थी नमी दो पल, 
अंजनमय मेघ, शपथ  भूल गए,
टूटती सांसों का इतिहास कहीं भी नहीं,
सजल नेहों ने पतझड़ को द्वार 
खटखटाते पाया, जीवन व्यथा अपने 
आप ही भर जाये इस उम्मीद से,
उड़ते पत्तों का मनुहार मन में लिए, 
मरुस्थल  में असंख्य प्रसून  सजाया -
फिर से आँगन में डाली प्रणय रंगोली 
दर्पण की धूल हटाई निमग्न हो कर 
खुद को संवारा हमने, रक्तिम साँझ को 
आना है, आये, यमन रुपी ज़िन्दगी को, 
दुख हो या सुख हमने तो हर पल गाया,
ये और बात है कि तुम स्वरलिपि बन न 
सके, हम जीवन किसी तरह जी न सके !
--- शांतनु सान्याल

07 जनवरी, 2011

स्मृति मेघ

वो श्यामपट अब भी है मौजूद
वही खपरैलों वाली प्राथमिक पाठशाला
जहाँ हमने लिखी थीं बारहखड़ी
उस अरण्य गाँव में हमने सीखी थीं
हिंदी वर्ण माला, पढ़ी थीं -
रसखान और कबीर, हमें याद है
अब तक निराला की - वर दे वीणावादिनी,
 नंगे पांव हमने की थीं प्रभात फेरी,
 उस आम्र कुञ्ज के नीचे न तुम थे
हिंदी न हम थे मराठी या बंगाली
माघ की सिहरन में बिछाए टाट पट्टी
हमने दोहराए संस्कृत सुभाषितानि,
तुम्हें याद हो की न हो,हमने देखी थी
एक सी दुनिया, खेले थे -
नदी पहाड़, लुकछुप, संग गाए
 प्रचलित लोकगीत - इतना इतना पानी -
वो सीमाविहीन मधुरिम एक जगत,
वसंत पंचमी में न तुम थे हिन्दू
न हम ही मुसलमान, एक साथ गुथा
फूलों का हार,गाए थे सरस्वती वंदना
उस गाँव भी आज भी उडती है
धान की ख़ुश्बू हवाओं में,
सरसराते हैं गन्ने के फूल, गोधूली में
अक्सर उड़ते हैं रंगीन स्मृति मेघ
कहीं न कहीं वहीँ आसपास हमारी साँसें
आज भी तकती हैं उस नन्हीं सी नदी को
किसी नई आश लिए -
--- शांतनु सान्याल 

04 जनवरी, 2011

झूठ मूठ ही सही

झूठ मूठ ही सही चलों खेलें, फिर इक बार 
वो कच्ची उम्र की नादानियाँ, 
कुछ छोटे छोटे प्लास्टिक के बर्तन, 
ले आओ मिटटी के दीये बरामदे में 
कहीं हैं पड़े, पिछले दिवाली के 
चलो चलें जीने के नीचे या 
पलंग के किसी एक कोने में 
नन्हीं आँखों की दुनिया बसायें दोबारा 
तुम फिर पुकारो मुझे उसी 
मीठी मासूम मुस्कान लिए 
पप्पू के पापा, मैं कहूँ तुमें पप्पू की 
मम्मी, एक रिश्ता जो कभी हो 
न सका, सोचो ज़रा उसी अंदाज़ में 
कि हम लौट जाएँ उसी सुन्दर 
बचपन की वादियों में 
इस मायावी पृथ्वी से कहीं अधिक 
खूबसूरती है उस जहाँ में, 
कल्पना करो कि हम फिर से छूएं
इक दूजे को पवित्र भावनाओं से,
उसी निश्छल हँसी में तलाशें फिर 
खोई हुई ख़ुशियाँ, चलो फिर एक बार 
घर घर खेलें ---
--- शांतनु सान्याल    
 

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