Thursday, 17 December 2015

सुबह का इंतज़ार - -

तयशुदा है जब रात का
गुज़रना, फिर सुबह
का इंतज़ार कौन
करे। हम यूँ
भी मुकम्मल हो चुके
तुम्हारे अब क़िश्तों
में भला प्यार
कौन करे।
हाकिम ओ मुहाफ़िज़
सभी हैं हैरां, रूह
गुमशुदगी का
ऐतबार
कौन करे। किसी ने -
भी न देखा दो
बदन का
एक जान होना, वो -
हमआहंगी का
आलम, वो
रूहों का
एक होना, जो गुज़र
गए, वो लम्हात
अब भी हैं
सांसों में कहीं गुम, -
इक अहसास
ए ज़िन्दगी
थी उसकी
नज़दीकी, इस से -
ज़ियादा किसी
और चीज़
का तलबगार कौन करे।
* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in